फ़रिश्ते निकले :मैत्रेयी पुष्पा - विश्वहिंदीजन

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गुरुवार, 29 सितंबर 2016

फ़रिश्ते निकले :मैत्रेयी पुष्पा


किताब - फ़रिश्ते निकले
लेखिका - मैत्रेयी पुष्पा
प्रकाशन - राजकमल
कीमत - 935 रुपये 


किताब का अंश - ‘अखबार में हम क्या पढ़ें? हत्याओं, बलात्कारों और औरतों को जलाने की वारदातों से पटा पड़ा रहता है. हमें अजूबा लगता है बिन्नू कि हमें लोग डकैत, हत्यारा क्यों मान रहे हैं? औरतों और लड़कियों की गुहार ऐसी कि रास्ता न सूझे...क्या वे बाहर निकलना छोड़ दें, सड़क उनके लिए नहीं है, विश्वविद्यालय खूनी जंगल हैं, बसें बलात्कारियों के लिए सेफ जगह! क्या अब आदमी नहीं, भेड़िये जन्म ले रहे हैं और लूट का माल खा-पीकर बलवान की तरह लड़की के शिकार का मजा लेते हैं. बिन्नू, हमने समर्पण क्यों किया था? यह कैसा विधान है कि नागरिक डाका डाल रहे हैं, हत्या कर रहे हैं, बलात्कारों के क्षेत्र बनते जा रहे हैं और एक डाकू, तथाकथित अपराधी समाज का कलंक इस दशा पर विलाप कर रहा है.’
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