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आलोचना के कब्रिस्तान से...:अरुण माहेश्वरी



आलोचना के कब्रिस्तान से...


अरुण माहेश्वरी


सन् 1984 की बात है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म शताब्दी वर्ष था। कहा जा सकता है - आज की हिन्दी आलोचना के गोमुख का शताब्दी वर्ष। जनवादी लेखक संघ को बने अभी दो साल ही हुए थे। लेखकों में भारी उत्साह था। जलेस के जन्म में प्रेमचंद शताब्दी वर्ष की बड़ी भूमिका थी। ‘84 में शुक्ल शताब्दी वर्ष के पालन से जलेस हिंदी के अकादमिक जगत की मुख्यधारा में प्रवेश करना चाहता था। और बिल्कुल वैसा ही हुआ। जलेस ने शुक्ल शताब्दी वर्ष के पालन का बिगुल बजाया और देश भर के कालेज-विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों और हिंदी-सेवी सरकारी संस्थाओं का पूरा ताना-बाना जाग उठा। जलेस ने शुक्ल जी को अपनाया और विश्वविद्यालयों-अकादमियों में बैठे हिंदी के पेशेवरों ने जलेस को। देखते ही देखते प्रेमचंद शताब्दी वर्ष के जनवादी विमर्श से उत्पन्न संगठन को शुक्ल शताब्दी वर्ष ने साहित्य की परंपरा-पोषित मुख्यधारा से जोड़ दिया। 

आज जब हम हिन्दी आलोचना की स्थिति पर विचार करते हैं तब अनायास ही जलेस के इस अभूतपूर्व ‘विस्तार’ की कहानी का वह ‘स्वर्णिम’ अध्याय याद आ जाता है। और, इसके साथ ही कौंध उठती है शुक्ल शताब्दी वर्ष को केंद्र में रखकर जलेस के अंदर, हाशिये पर चल रही बहस की एक और अंतरकथा की यादें। इस कथा के केंद्रीय नायक थे इलाहाबाद के कथाकार, आलोचक नीलकांत। 

दर्शनशास्त्र की अकादमिक पृष्ठभूमि से आए सौन्दर्यशास्त्र के अध्येता नीलकांत मार्कण्डेय की ‘कथा’ पत्रिका के पृष्ठों पर कई धारदार टिप्पणियों से सबका ध्यान अपनी ओर पहले ही खींच चुके थे। जलेस की आचार्य रामचंद्र शुक्ल राष्ट्रीय परिसंवाद समिति की ओर से भी नीलकांत को भोपाल में होने वाले राष्ट्रीय परिसंवाद (7-8 सितंबर 1984) के लिये शुक्ल जी की विश्वदृष्टि पर लेख भेजने के लिये कहा गया। नीलकांत ने वह लेख लिख लिया, तभी उनसे कहा गया कि इस विषय पर कोई दूसरा लिख रहा है, इसलिये आप उनकी सौन्दर्यानुभूति पर आलेख तैयार करके भेज दें। नीलकांत ने इस विषय पर भी अपना लेख लिख कर जैसे ही परिसंवाद समिति के पास भेजा, समिति में एक प्रकार का हड़कंप सा मच गया। उनके लेख का शीर्षक था - मृत सौन्दर्य का मसीहा आचार्य रामचंद्र शुक्ल। शुक्ल जी की विश्वदृष्टि वाले लेख को नीलकांत ने नामवर सिंह की मांग पर ‘आलोचना’ के लिये भेज दिया, जिस पर नामवर जी ने टिप्पणी की थी - ‘‘लेख मिला आज ही। एक सांस में पढ़ गया। दृष्टि निर्मम, भाषा तल्ख, निर्णय सख्त, फिर भी संपूर्ण निबंध तर्कसंगत और प्रमाण पुष्ट। बहुत दिनों बाद ऐसा प्रौढ़ निबंध पढ़ने को मिला।’’

शुक्ल जी की सौन्दर्यानुभूति पर नीलकांत का लेख, ‘मृत सौन्दर्य का मसीहा’ विश्वदृष्टि वाले लेख की बुनियादी समझ पर टिका उतना ही ‘तल्ख, तर्कसंगत और प्रमाण पुष्ट निर्मम’ लेख था। लेकिन जलेस का जो आयोजन शुक्ल जी को पूरे भक्तिभाव के साथ दोनों हाथ खोल कर अपनाने के उद्देश्य से किया जा रहा था, जो सामंती रूढि़वाद से बुरी तरह से जकड़े हुए क्षेत्र में नवजागरण के कल्पनाप्रसूत भव्य महल के संस्थापक रामविलास शर्मा से संगति रखते हुए विश्वविद्यालयों के अध्यापकों, प्राचार्यों के मनों को जीतने के लिये किया जा रहा था, उसके आयोजकों को ऐसा ‘निंदापूर्ण’ लेख कैसे रास आ सकता था। हमें अच्छी तरह से याद है, नीलकांत ने उस लेख को आयोजन समिति के पास दिल्ली भेजा था, लेकिन वहां पहुंचने के साथ ही तत्काल उसकी गूंज-अनुगूंज गुजरात, वाराणसी, कोलकाता, भोपाल - सर्वत्र सुनाई देने लगी थी। ‘’शीर्षक प्रतिमा-भंजक, मुद्दआ नकारात्मक और जलेस के रंग में भंग डालने वाला’’। डा. शिवकुमार मिश्र, चंद्रबली सिंह, डा.चंद्रभूषण तिवारी, कुंवरपाल सिंह सबने भरसक कोशिश की कि इस ‘विध्वंसक’ लेख को राष्ट्रीय परिसंवाद में न पढ़ने दिया जाएं। मामला पार्टी के प्रभारी कामरेड बी.टी.रणदिवे की अदालत तक पहुंच गया। हम वहां मौजूद थे। हमें अच्छी तरह से याद है कि कामरेड बीटआर और सुरजीत ने भी सिर्फ मत-भिन्नता के आधार पर लेख को न पढ़ने देने के विचार का सख्त विरोध किया। और अंत में, वह लेख, जलेस के कई प्रमुख नेतृत्वकारी व्यक्तियों की आपत्ति के बावजूद भोपाल में पढ़ा गया। 

कुछ निजी कारणों से हम भोपाल के उस परिसंवाद में उपस्थित नहीं हो पाये थे। लेकिन हमें आज भी, परिसंवाद के बाद हुई मुलाकात में इस विषय पर डा.चंद्रभूषण तिवारी, चंद्रबली सिंह, डा.शिवकुमार मिश्र के तमतमाये हुए चेहरे और उनकी बौखलाहट याद है। नीलकांत इन सबकी नजरों में किसी दागी व्यक्ति से कम नहीं थे। तब से तीस साल बाद, आज भी जब हमें उस पूरी घटना की याद आती है, कहना न होगा, उससे आज की हिंदी आलोचना, खास तौर पर मार्क्सवादी आलोचना की दयनीय दशा पर से जैसे एक झटके में पर्दा उठ जाता है। एक वाक्य में कहे तो आज की हिंदी आलोचना शुक्ल जी द्वारा तैयार किये गये ‘छात्रोपयोगी नोट्स’ के आधार पर निर्मित हिंदी साहित्य के इतिहास का आगे और, कोरा इतिवृत्तात्मक विस्तार बन कर रह गयी है। 

अभी, हाल में कोलकाता की ‘वागर्थ’ पत्रिका के कई अंकों में हिंदी साहित्य के पचास सालों का उत्सव जिस प्रकार के सपाट और बेजान ब्यौरों के इतिवृत्तों के आधार पर मनाया गया है, इस कलावादी कर्मकांड, समग्रत: हिंदी आलोचना की ऐसी परिणति में डा. शर्मा, नामवर सिंह और पूरे प्रगतिवादी-जनवादी साहित्य आंदोलन का योगदान किसी से कम नहीं है। प्रगतिवादियों की ‘पहल’ और जलेस की पत्रिका ‘नया पथ’ क्रमश: मुर्दा सामग्रियों को चकदक पैकेजिंग में खपाने और व्यवसायिक प्रकाशकों के लिये एक बेचने लायक किताब बन जाने से अधिक कोई भूमिका अदा करती नहीं दिखाई देती है। संकट की इस घड़ी में भी किसी नये विमर्श को पैदा करने में इनकी जरा भी दिलचस्पी नहीं है। 

सारी दुनिया में मार्क्सवाद ने ज्ञान-विज्ञान के सभी क्षेत्रों को उनकी आत्मलीनता, प्राकृतिक विज्ञान की तरह की सीमाबद्धताओं से मुक्त करने में प्रमुख भूमिका अदा की है। सामान्यत:, सामाजिक आंदोलनों के दबावों से साहित्य अक्सर खुद की सीमाओं से मुक्त होकर सामाजिक सरोकारों से जुड़ता रहा है। हमारे यहां भक्ति काल का साहित्य रीतिकालीन आत्मलीनता से मुक्ति का इतिहास है, तो राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन ने कथा साहित्य को कोरी तिलस्मी और ऐय्यारों की किस्सागोई से मुक्त किया। छायावादी आत्मवाद ने प्रगतिवाद के लिये जगह छोड़ी। लेकिन खास तौर पर, मार्क्सवाद का स्पर्श दुनिया के पूरे साहित्य और वैचारिक विमर्श को स्थायी तौर पर उसकी आत्मलीनता से मुक्त कराने वाला स्पर्श साबित हुआ है। यह विचारों की दुनिया की एक कोपरनिकस क्रांति है। जो खगोलशास्त्र हजारों सालों से पृथ्वी-केन्द्रित धुरी पर चक्कर काट रहा था, एक कोपरनिकस की सौर-प्रणाली की खोज ने उसे उससे सदा के लिये मुक्त कर दिया। उसी प्रकार, चेतना के माध्यम से प्रतिबिंबित यथार्थ से बनने वाले विचारधारा के सभी क्षेत्रों के अध्ययन को मार्क्स ने सदा के लिये बदल डाला। माल में मूल्य के प्रवेश से जैसे उसका ठोस अस्तित्व लुप्त हो जाता है, वैसे ही यथार्थ के साहित्यिक पाठों में रूपांतरण से सामाजिक यथार्थ असंख्य विखंडित चित्रों में बदल जाता है। माल की आधिभौतिक सत्ता के ब्रह्मांड की तरह ही साहित्य और विचारधारा की दुनिया सामाजिक यथार्थ की असंख्य विरूपित सत्ताओं का एक ब्रह्मांड बन जाती है। साहित्य और कला जगत के अपने स्वतंत्र नियमों का भ्रामक संसार भी तैयार होता है। मार्क्सवादी आलोचना की भूमिका यह रही कि उसने इस विखंडित, विरूपित, चेतना से प्रतिबिंबित यथार्थ को मूल सामाजिक संरचना के आधार पर समग्रत:, परस्पर गुंथे हुए रूप में परखने के औजार दिये, यह मानते हुए कि जो दिखाई देता है, वही सच नहीं होता। मार्क्स कहते थे कि जो दिखाई देता है वही सच हो तो विज्ञान उथला हो जायेगा। उसी प्रकार, दिखाई दे रहे पाठ को ही स्वायत्त सच मान कर बढ़ा जाए तो आलोचना भी उथली हो जायेगी, संधान और सृजन की संभावनाओं का अंत हो जायेगा। यही वजह रही कि ‘कला कला के लिये’ की तरह की सारी सैद्धांतिक शेखियां सामाजिक अंतर्विरोधों की गतिशीलता से बल पाते मार्क्सवादी यथार्थवादी साहित्य विमर्श की तेज आंच के सामने कभी टिक नहीं पायीं। 

चिकित्सा विज्ञान में आत्मलीनता (autism) एक बीमारी है, मंद बुद्धि माने जाने वाले लोगों की बीमारी। यह बीमारी जीवन के सभी अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े लोगों में समान रूप से पाई जाती है। यह कमजोर आदमी का एक रक्षा कवच भी होती है, सीप में बंद दीन-हीन घोंघा बसंत। मार्क्सवाद ने साहित्य विमर्श को उसकी आत्मलीनता से मुक्त किया, जीवनोन्मुख बनाने की भूमिका अदा की। लेकिन, इसी के समानांतर, मार्क्सवाद और कम्युनिस्ट आंदोलन से ही जुड़ा इतिहास का एक दूसरा चिंताजनक पहलू भी रहा है, जो पुन: जीवनोन्मुखता के बजाय साहित्य पर खास प्रकार की दलीय प्रतिबद्धता का दबाव पैदा करता है। लेनिन ने जब बोल्शेविक क्रांति के संदर्भ में पार्टी की सेवा करना साहित्यकारों का कत्‍​र्तव्य बताया, वही से सामाजिक क्रांति का अर्थ सीमित होते हुए बोल्शेविक पार्टी में और पार्टी के नेतृत्व और नेता में सिमट जाने की एक उल्टी यात्रा शुरू होगयी। यह पैगंबर की करुणा के गिरिजाघरों, मस्जिदों, मठों में पतित होने वाली प्रक्रिया है। मार्क्स-एंगेल्स की साहित्य संबंधी सारी बातें पृष्ठभूमि में चली गयी। एक दूसरे प्रकार की आत्मलीनता में साहित्य को डुबो देने का उपक्रम शुरू हुआ। ‘साहित्य का उद्देश्य जितना छिपा रहे इसी में साहित्य की भलाई है’ की तरह की मार्क्सवादी सीखें आलोचनात्मक यथार्थवाद और समाजवादी यथार्थवाद की पूरी बहस से गायब हो गयी। लुकाच और ब्रेश्त के बीच, ब्रेश्त और बेंजामिन के बीच, अल्थूसर और लासान के बीच विचारों की जो तनातनी दिखाई देती है, उसके मूल में मार्क्सवाद के नाम पर तात्कालिक राजनीति की सेवा की इसी कुत्सित समझ की बड़ी भूमिका थी। पश्चिमी यूरोप में ग्राम्शी से लेकर लुकाच, बेंजामिन, ब्रेश्त, अल्थूसर, थामसन, कॉडवेल, अन्‍​र्सट फिशर और सार्त्र, हर्बर्ट मार्कूज, दरीदा, जेमिसन तथा एरिक हाब्सवाम और अभी के स्लावोय जिजेक और अम्बर्तो इको तक के लेखन में मार्क्सवाद से उनकी संबद्धता और कम्युनिस्ट आंदोलन के इस पहलू के दबाव की छाप को साफ तौर पर देखा जा सकता है। 

हिंदी में भी, डा. शर्मा और नामवर सिंह के लेखन का कुछ-कुछ इसी आधार स्पष्ट काल-विभाजन किया जा सकता है। जब तक वे साहित्य में कलावादियों की आत्मलीनता से लोहा ले रहे थे, उनके लेखन में एक खास प्रकार की धार थी। फिर एक दौर सीधे पार्टी की सेवा का आया। डा. शर्मा की ‘प्रगतिवाद की समस्याएं’ के लेखों को देखिये। लेकिन डा. शर्मा और नामवर सिंह पर से जैसे ही उस दौर का भूत उतरा, वे नये सामाजिक यथार्थ के साथ जुड़ कर साहित्य में स्वतंत्रता और जनतंत्र के मूल्यों के आधार पर मार्क्सवादी आलोचना को एक नये उत्कर्ष की दिशा में लेजाने के बजाय आचार्य शुक्ल और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की अतीतोन्मुखी इतिवृत्तात्मकता की शरण में चले गये। नामवर जी अपने ‘इतिहास और आलोचना’ के लेखन के उल्लेख से भी बचने लगे। लेखनी की पुरानी धार भी भोथरी होगयी और हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना स्वतंत्रतापूर्व की कल्पित हिंदी नवजागरण की बहस में उलझ कर रह गयी। आलोचना तालाब के ठहरे हुए बंद पानी की काई का इतिवृत्त बन गयी। धीरे-धीरे, वैचारिक सह-अस्तित्व का आलम यह होगया कि अभी अज्ञेय जन्म शताब्दी पर इसी लेखक ने टिप्पणी की - ‘नामवर का लोप ही अज्ञेय का लोप है’। 

‘‘ अज्ञेय जी का शताब्दी वर्ष पूरा होगया। हिंदी जगत में उनके लिये श्रद्धा-सुमनों की कोई कमी नहीं रही। अलग-अलग शहरों में कई आयोजन हुए। अखबारों, पत्रिकाओं में कुछ छोटी-मोटी टिप्पणियां आयीं। उनके निकट के मित्रों, संबंधियों ने एक-दो किताबें भी निकाली। कुछ स्वघोषित ‘सांस्कृतिक दूतों’ के शहर-शहर फेरे लगे। लेकिन गौर करने की बात यह है कि कुल मिला कर यह पूरा वर्ष बिना किसी वैचारिक उत्तेजना और सामाजिक-सांस्कृतिक व्यग्रता के एक स्निग्ध और शान्त, तनाव-रहित वातावरण में बीत गया। ...हाल के वर्षों तक हिन्दी में सबसे विवादास्पद समझे जाने वाले अज्ञेय की शताब्दी कोई मामूली वैचारिक आलोड़न भी पैदा नहीं कर पाये, यह स्थिति किस बात का संकेत है? क्या यह अज्ञेय पर या आज के समय पर या दोनों पर ही कोई विशेष टिप्पणी है?

‘‘...कुल मिला कर इस पूरे साल ‘अज्ञेयपंथ’ और ‘नामवरपंथ’ की खूब छनी। सब कुछ भले-भले निपट गया। इस ‘भले-भले’ ने ही आज हमारे लिये यह प्रश्न छोड़ दिया है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? किसी जमाने में हिंदी में प्रगतिशील साहित्य आंदोलन के बरक्स अज्ञेय का प्रयोगवाद (परिमल) विचारधारा के एक दूसरे धुर का मंच हुआ करता था। ...इसीलिये स्वाभाविक तौर पर हिंदी में उस काल की सारी साहित्यिक-वैचारिक बहसों के केंद्र में अज्ञेय हुआ करते थे। लेकिन आज वह सारा विवाद कहां रफ्फू-चक्कर होगया? यही एक प्रश्न किसी को भी आज की साहित्यिक दुनिया के सच पर गहराई से नजर डालने के लिये प्रेरित कर सकता है। 

‘‘... प्रेमचंद शताब्दी के दौरान प्रेमचंद को केंद्र में रख कर चंद्रबली सिंह ने ‘आलोचनात्मक’ और ‘समाजवादी’ यथार्थवाद के साथ ही यथार्थ की एक और, तीसरी श्रेणी ‘जनवादी क्रांतिकारी यथार्थवाद’ की अवधारणा रखी। प्रगतिशील लेखक संघ वस्तुत: बिखर गया लेकिन हिंदी-उर्दू के लेखकों के एक नये संगठन, जनवादी लेखक संघ (1982) का उदय हुआ। जनतंत्र का सवाल केंद्रीय सवाल बना और भारत की जनता की जनतंत्र की लड़ाई के मोर्चे की जो इंद्रधनुषी तस्वीर पेश की गयी उसमें डा. रामविलास शर्मा से लेकर अज्ञेय तक, सबके लिये समान स्थान का आश्वासन था। ...आंतरिक आपातकाल के पहले और बाद के इस दौर में अज्ञेय जीवित ही नहीं, खासे सक्रिय थे। ... वह पूरा दौर भारत में जनतंत्र की रक्षा के लिये सबसे तीव्र संघर्ष का दौर था और जयप्रकाश के साथ जुड़ कर अपने अखबारों के जरिये अज्ञेय ने उस पूरी लड़ाई में अपनी एक भूमिका अदा की थी। फिर भी आज तक कोई यह प्रश्न क्यों नहीं उठाता है कि जनवादी लेखक संघ के वैचारिक परिप्रेक्ष्य के इंद्रधनुषी दायरे में अज्ञेय को उनके जीवित काल में कभी क्यों नहीं शामिल किया जा सका? 

‘‘इस एक सवाल के जवाब से जहां प्रलेस-जलेस की विचारधारात्मक प्रतिश्रुतियों और निष्ठाओं की सचाई की परख हो सकती है, वहीं अज्ञेय की भी ‘जनतांत्रिक प्रतिबद्धताओं’ की वास्तविकता को समझा जा सकता है। कहना न होगा कि आज जहां जलेस-प्रलेस प्रकार के संगठन पार्टी की जकड़नों से बेदम होकर अस्तित्वीय संकट के गह्वर में हांफ रहे हैं, और लेखक क्रमश: जयपुर उत्सव की तरह की साहित्य-मंडियों में अपनी कीमत लगवाने को व्याकुल हो रहे हैं, वहीं अज्ञेय की ‘जनतांत्रिक प्रतिबद्धताओं’ का भी आज कोई दो-कौड़ी का दाम लगाने के लिये तैयार नहीं है। अज्ञेय शताब्दी वर्ष के आयोजनों की रपटों से तो कम से कम यही जाहिर होता है। 

‘‘सचमुच यह एक अनोखी विडंबना है। नामवर का लोप ही अज्ञेय का भी लोप है। ऐसे ही ‘विचारधारा का अंत’ विचार मात्र के अंत का भी सबब बनता है।’’ 

इस टिप्पणी में भी जलेस का प्रसंग आया था। जलेस के निर्माण के समय सन् ‘80 के नये जनवादी उभार के साथ मार्क्सवादी आलोचना ने अपने समय के सामाजिक मुद्दों से जुड़ कर एक नयी धार अर्जित की थी। लेकिन, यह बहुत ही थोड़े से समय की चमक भर साबित हुई। इससे पश्चिम की तरह जनतंत्र और स्वतंत्रता के मूल्यों के आधार पर यहां मार्क्सवादी आलोचना के एक दीर्घस्थायी लगातार विकासमान वैचारिक विमर्श की शुरूआत नहीं हो पायी। इसके जन्म के साथ ही इसकी सीमाएं जाहिर होने लगी थी, जैसा कि इस लेख के शुरू में ही हमने रामचंद्र शुक्ल जन्म शताब्दी पर राष्ट्रीय परिसंवाद की घटना के विषय में बताया है। संगठन का विस्तार प्रमुख लक्ष्य होगया, बदलते हुए यथार्थ के बरक्श आलोचना के औजारों का विकास नहीं। जितनी तेजी के साथ इस नये जनवादी उभार ने प्रेमचंद और मुक्तिबोध के जरिये एक वैचारिक नवोन्मेष की चमक दिखाई थी, उतनी ही तेजी से उसकी चमक बुझती हुई भी नजर आने लगी। 

चन्द्रबली सिंह ने नीलकांत को लिखा था - ‘‘ मैं समझता हूं, शुक्ल जी में कुछ ऐसे तत्व हैं जो हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं - पूरी तरह से निषेधात्मक रुख गलत है।’’ और इसप्रकार, मार्क्सवाद के नाम पर संतुलन बनाने अर्थात वैचारिक समझौता करके चलने का एक नया रास्ता खोज लिया गया - सब कुछ संगठन के हित के नाम पर। न रामविलास शर्मा, नामवर सिंह ने शुक्ल जी और द्विवेदी जी की रहस्यवाद में लिपटी भाववादी साहित्य दृष्टि को पूरी तरह से ठुकराते हुए एक नये मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र की दिशा में कोई साहसपूर्ण कदम बढ़ाया, जैसा हमें हेगेल के प्रति मार्क्स की दृष्टि में, टालस्टाय के विचारों के प्रति लेनिन के नजरिये में और क्रोचे के विचारों के साथ ग्राम्शी के संघर्ष में दिखाई देती है। और, न ही ऐसी किसी टकराहट का कोई परिचय दिया परवर्ती जनवादी आंदोलन के उभार से जुड़े आलोचकों ने। नीलकांत जैसों ने जिस भिन्न धारा की ओर बढ़ने की कोशिश की, उसे शुरू में ही दबा डालने की भरसक कोशिश की गयी। मार्क्स ने हेगल से मुक्ति पाई उसके दर्शन को पूरी तरह से जानकर। हमारे यहां इस जानने की प्रक्रिया में पुराने रहस्यवाद के बंधन से मुक्ति की नहीं, बल्कि उसे अपना कर समाज में ‘परमहंस’ का सम्मान अर्जित करने की लालसा प्रमुख रही। हिंदी आलोचना हिंदी विभागों में बैठे अध्यापकों की सार-संग्रहवादिता की दासी बन कर रह गयी। 

हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना पाठ के प्रत्यक्ष को ही सच मान लेने के उथलेपन की शिकार हुई है। आचार्य शुक्ल ने कहीं ‘रहस्यवाद’ पद का तिरस्कार के साथ उल्लेख कर दिया और इतने भर से उन्हें प्रगतिशील आलोचना का गोमुख मान लिया गया। उनके सनातनपंथी, वर्णवादी पूर्वाग्रहों को देखने से इंकार कर दिया गया। शुक्लजी ने रहस्यवाद का विरोध सिर्फ कबीर के प्रति अपनी वर्णवादी नफरत को व्यक्त करने के लिये किया था, इस नग्न सचाई से भी आंखें मूंद ली गयी। 

‘‘यत्क्रतुर्मवति तत् कर्म कुरुते’’। जिसके प्रति मन में मोह होगा, वह वैसा ही कर्म करेगा। मार्क्सवाद पदार्थ की गतिशीलता का विज्ञान है। परंपरा से उसका संबंध समाज की गति को चिन्हित करने के लिये है, न कि उसे ढोने के लिये। लेनिन ने ‘प्रोलेतकुल्त’ के विध्वंसक रुख के प्रत्युत्तर में कहा था कि मानव इतिहास में जो भी श्रेष्ठ तत्व रहे हैं, हमें उन्हें सहेजना होगा। इस ‘सहेजने’ का अर्थ यह नहीं है कि हम अजायबघर को अपना घर बना लें। मार्क्स को देखिये, वे कैसे अपनी कृति ‘जर्मन विचारधारा’ में हेगेलीय दर्शन के विघटन का जश्न मनाते हैं। ‘‘अभूतपूर्व तीव्र गति से सिद्धांत एक दूसरे को धकेल कर उनका स्थान लेते रहे, मस्तिष्कों के सूरमा एक दूसरे को उलटते चले गये और 1842-45 के बीच के तीन वर्षों में जर्मनी से अतीत का जितना सफाया हुआ उतना पहली तीन शताब्दियों के दौरान नहीं हुआ था।...यकीनन यह एक दिलचस्प घटना है - यह है परमचित्त के विघटन की प्रक्रिया।’’ जैसा कि पहले ही कहा गया है, मार्क्सवाद विचारधारा की दुनिया में कोपरनिकस क्रांति है। 
जलेस से जुड़े आलोचकों ने इतिवृत्तात्मक लेखन की सबसे बुरी प्रवृत्ति, नाम-गिनाऊ आलोचना के चरम उदाहरण पेश कियें। इस संदर्भ में दृष्टव्य है उस दौर का डा. रमेश कुंतल मेघ का लेखन, जिसके नक्शे-कदम पर आज भी ‘वागर्थ’ जैसी पत्रिकाएं और नन्द किशोर नवल जैसे आलोचक पूरे उत्साह से जुटे हुए हैं। आलोचना की यह ‘सर्वजनहिताय’ वाली बीमारी अब आनुवंशिक रोग का रूप ले चुकी दिखाई देती है। शुक्ल जी और द्विवेदी जी के प्रति श्रद्धा-भक्ति ने न सिर्फ अतीत के साथ बल्कि वर्तमान के साथ भी आलोचना में किसी प्रकार के आलोचनात्मक विवेक के रिश्तों को पनपने नहीं दिया। ‘आलोचना’, ‘वागर्थ’, ‘तद्भव’, ‘वर्तमान साहित्य’ और ‘नया पथ’ जैसी तमाम पत्रिकाएं भले वे मार्क्सवादियों द्वारा निकाली जा रही हो या गैर-मार्क्सवादियों बल्कि मार्क्सवाद-विरोधियों द्वारा, सबमें आलोचना के नाम पर शुक्ल जी की गद्य-पद्य की व्याख्या वाले छात्रोपयोगी अध्यापकीय नोट्स की परंपरा बदस्तूर जारी है। इस मामले में इनके बीच रत्ती भर फर्क करना भी नामुमकिन है। 
मार्क्सवादियों की सारी जमातें अपनी पार्टी प्रतिबद्धताओं के प्रति इतनी निष्ठावान है कि भारत में वामपंथ के उदय और अस्त की इतनी प्रकट और विस्फोटक परिघटना से भी इनके कान पर जंू तक नहीं रेंगती। गैर-मार्क्सवादियों के लिये तो वैसे ही साहित्येतर सामाजिक-राजनीतिक प्रपंच सदा के लिये वर्जित है। इसका कुल जमा परिणाम यह है कि इस चक्कर में साहित्य से तात्पर्य और उसकी उत्कृष्टता के विषय भी आज हिंदी आलोचना के दायरे के बाहर जा चुके हैं। कोलकाता से ही हिंदी में भारतीय विद्याभवन की एक पत्रिका निकलती है - ‘वैचारिकी’ । पुरातत्व से लेकर रस सिद्धांत और अलंकारशास्त्र जैसे अर्वाचीन विषयों पर अध्यापकों के आधे-अधूरे नोट्स से भरी पत्रिका। इसे देख कर ऐसे पुरानेपन की अनुभूति होती है जैसे कोई ‘पुरातत्व’ साक्षात उपस्थित हो। कहना न होगा, यही है अभी की हिंदी की तमाम पत्रिकाओं का तात्विक सच। 

यह सचमुच इतिहास का परिहास ही है। अनेक बार ऐसे अवसर आते हैं जब राजा होता है, दरबारियों, मनसबदारों का राजकीय तामजाम भी बरकरार रहता है, लेकिन यथार्थ में ऐसे नाटकीय परिवर्तन होते हैं कि वह सारा लाव-लस्कर और साज-सज्जा रातो-रात प्राणहीन पुतलों के कल्पनालोक में बदल जाते हैं। भारत में रियासती राज्यों के भारत में विलय की घोषणा के ठीक बाद प्रत्येक रियासती राजाओं के राजदरबारों का यही दृश्य था। इसीप्रकार, जीवन की सचाई से कट कर जब विचारधाराएं निहायत अप्रासंगिक विषयों में रमी रहती है, लेकिन भान ऐसा करती है जैसे वही एक ऐसी अन्तरदृष्टि प्रदान कर रही है जिसपर मानवता का भविष्य निर्भर करता है, तो उनका पूरा स्वरूप इतिहास के विद्रूप का रूप ले लेता है। वे कोरी छायाओं का रंगमंच बन जाती हैं, जीवन की नपूंसक नकल का रंगमंच। साहित्य के प्रति पूजा भाव वाले ‘वागर्थ’ छाप लेखन का रंगमंच तैयार होता है और उसके अभिनेताओं के तौर पर गर्व के साथ ‘कलावादी’ होने के अनेक पुरस्कारों का तमगा लगाये असीम संधानी, शब्द-ब्रह्म के नाद में बावले रमेश चंद्र शाह जैसे आलोचक पैदा होते हैं। ध्यान से देखें तो नंदकिशोर नवल और रमेश चंद्र शाह में कोई फर्क नहीं दिखाई देगा, सिवाय इसके कि एक ‘प्रगतिशीलता’ का तमगा लगाये हुए हैं तो दूसरा ‘कलावाद’ का। प्रत्यक्ष को ही सच मान लेने की भौंडी कला दृष्टि दोनों में समान रूप से काम कर रही है। 

नामवर जी ने ‘कविता के नये प्रतिमान’ के प्रारंभ में ही अभिनव भारती को उद्धृत किया था :

‘‘श्रांति का अनुभव न करने वाली विवेचकों की बुद्धि ऊपर-ऊपर चढ़ते हुए अंत में जिस अर्थ-तत्व को देखती है उस तक पहुंचने वाली परिकल्पित विवेक के प्रारम्भिक सोपानों की परंपरा का क्या महत्व?

‘‘मानता हूं प्रमेय की सिद्धि का प्रथम प्रयास विचित्र और निराधार ही होता है; किंतु उस मार्ग में अग्रसर होने पर उसके ऊपर सेतुओ, नगरों आदि का निर्माण भी विस्मयकारी नहीं रह जाता। 

‘‘इसीलिये यहां प्राचीन आचार्यों के मतों का खंडन नहीं, बल्कि संशोधन किया गया है। पूर्व-प्रतिष्ठापित सिद्धांतों की योजना में भी मूल की प्रतिष्ठा का फल मिलता है।’’

क्या है यह आलोचना के पूर्वाधारों के रूप में प्राचीन आचार्यों के मतों में संशोधन का विधान? यही तो हैं सजीव मनुष्य और जीवन के यथार्थ को छोड़ कर शास्त्रों से शास्त्र की रचना का विधान, टीकाओं और भाष्यों का विधान।

मार्क्स जब अपने दर्शनशास्त्र की रचना करते हैं तो वे पारंपरिक जर्मन दर्शन के बिल्कुल विपरीत रास्ता अपनाते हैं। ‘स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरने वाले जर्मन दर्शन के विपरीत पृथ्वी से स्वर्ग पर आरोहण का मार्ग पकड़ते हैं। वे किसी पूर्व प्रतिष्ठित सिद्धांत या कल्पना या अनुमान को आधार बनाने के बजाय अपना प्रस्थान-बिंदु बनाते हैं वास्तविक सक्रिय लोगों को, उनकी वास्तविक जीवन-प्रक्रिया को और इनके आधार पर उसकी वैचारिक प्रक्रियाओं और प्रतिध्वनियों को सामने लाते हैं। 

मार्क्स के शब्दों में, ‘‘ आदमी के दिमाग में बनने वाले काल्पनिक बिंब भी अनिवार्यत: उस भौतिक जीवन प्रक्रिया के संस्करण है, जिन्हें अनुभव द्वारा परखा जा सकता है और जो भौतिक पूर्वाधारों से संबद्ध है। नैतिकता, धर्म, तत्व मीमांसा, विचारधारा तथा चेतना के तदनुरूपी बाकी सभी रूप अब स्वतंत्रता का नकाब ओढ़े नहीं रह सकते। उनका कोई इतिहास, कोई विकास नहीं है; परंतु मनुष्य अपने भौतिक उत्पादन तथा अपने भौतिक संसर्ग के विकास से अपने इस वास्तविक अस्तित्व को और साथ ही अपने चिंतन और चिंतन के परिणामों को भी बदलता है। जीवन चेतना द्वारा निर्धारित नहीं होता बल्कि चेतना जीवन द्वारा निर्धारित होती है। निरीक्षण की पहली विधि के प्रस्थान बिंदु में चेतना को सजीव व्यक्ति मान कर चला जाता है; दूसरी विधि में स्वयं वास्तविक सजीव मनुष्य, जो वास्तविक जीवन के अनुरूप है, वही प्रस्थान बिंदु है तथा चेतना को पूरी तरह से उसकी चेतना मात्र माना जाता है। 

‘‘निरीक्षण की यह विधि पूर्वाधारों से वंचित नहीं है। वह वास्तविक पूर्वाधारों को प्रस्थान बिंदु बनाती है तथा उन्हें एक क्षण के लिये भी नहीं छोड़ती।’’

हिंदी के एक सबसे बड़े मार्क्सवादी आलोचक के पूर्वाधार और सोच की दिशा और मार्क्स की दिशा विपरीत है। मार्क्स अपने निरीक्षण में जीवन के वास्तविक पूर्वाधारों को प्रस्थान बिंदु ही नहीं बनाते, उसे एक क्षण के लिये भी छोड़ने को तैयार नहीं है। और नामवर जी का प्रस्थान बिंदु सिर्फ और सिर्फ विवेचकों का ‘परिकल्पित विवेक’ है और उनकी यात्रा का गंतव्य भी इसी विवेक में किंचित संशोधन भर है। कविता के नये प्रतिमानों की तलाश में तेजी से बदल रहे जीवन की ठोस परिस्थितियों और उसमें साहित्य की भूमिका कोई विचार का बिंदु हो सकता है, इसका कहीं से कोई संकेत नहीं मिलता। 

फिर नामवर जी का अशोक वाजपेयी से किस बात पर मतांतर है। अपने लेखन में उनका अद्यीत व्यक्तित्व शुद्ध रूप से साहित्य के स्वायत्त संसार का नागरिक ही होता है। उनकी सर्वसमावेशी दृष्टि में कविता के नये प्रतिमान विचारों की टकराहट से नहीं, ‘नये मूल्यों की खोज और प्रतिष्ठा के सहभागी प्रयास’ से हासिल होंगे। उनके अनुसार ‘मूल्य एक कमाया हुआ सत्य है’, अर्थात सबका समान सत्य! शास्त्रों की पैरवी में लिखते हैं - ‘‘कविता को सीधे अनुभव करने में हर पाठक स्वतंत्र और समर्थ होता तो काव्यानुशासन की जरूरत न पड़ती। ...जो अपने को सामान्य पाठक कहता है वह भी काव्यानुभव में अनजाने ही किसी न किसी काव्य-सिद्धांत से अनुशासित होता है।’’ 

इसप्रकार, जाहिर है कि कविता के नये प्रतिमान में उन्होंने जिस नये शास्त्र की रचना की है, उसके दायरे से शुरू में ही कविता को सीधे अनुभव करने वाले जन-साधारण को, मजदूरों और किसानों को निकाल कर अलग कर दिया गया है। 

पाब्लो नेरुदा के ‘ममायर्स’ में एक अध्याय है - ‘कविता एक पेशा है’। उस अध्याय के शुरू के अंश को ही यहां थोड़ा विस्तार से उद्धृत करना उचित होगा। इस अध्याय की शुरूआत वे इसप्रकार करते हैं : ‘‘युद्धों, क्रांतियों और जबर्दस्त उथल-पुथल के चलते हमारे समय की विशेषता यह रही है कि जितनी किसी ने कल्पना नहीं की होगी, उससे कहीं ज्यादा कविता के लिए जमीन तैयार हुई है।’’ 

इसमें आगे वे सांतियागो के चिले के सबसे बड़े बाजार के कुलियों के बीच कविता सुनाने के अपने अनुभव का बयान करते हैं। वे लिखते है - ‘‘ जब मैं उस हॉल में घुसा तो मेरे अन्दर जोसे असुनसियन सिल्वा की कविता ‘निशाचर’ की तरह की एक सिहरन दौड़ गई, सिर्फ इसलिए नहीं कि वहां इतनी ठंड थी, बल्कि इसलिये क्योंकि वहां के परिवेश से मैं सन्न था। लगभग पचास लोग वहां टोकरों पर अथवा कामचलाऊ बेंचों पर बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ ने अपनी कमर पर ऐप्रोन की तरह बोरा बांध रखा था, अन्य पैबंद लगी गंजियां पहने हुए थे, और बाकी लोग बिल्कुल नंगे बदन चिले की जुलाई की ठंड की मार झेल रहे थे। मैं एक छोटी सी मेज के पीछे बैठ गया जो मुझे उन असामान्य श्रोताओं से अलगा रही थी। वे सभी मुझ पर, मेरे देश के लोगों की कोयले की तरह की काली आंखों को गाड़े हुए थे। 

...मैं कैसे ऐसे श्रोताओं से निपटूं ? क्या बात करूं? मेरी जिंदगी की ऐसी कौन सी चीज है, जिसमें उनकी दिलचस्पी होगी? मैं तय नहीं कर पाया, लेकिन वहां से भाग खड़े होने की अपनी इच्छा को छिपाते हुए मैंने उनसे कहा : ‘मैं कुछ दिनों पहले स्पेन में था। वहां काफी लड़ाई और गोलाबारी चल रही है। सुनिये, उसके बारे में मैंने क्या लिखा है।

‘‘खुद मुझे मेरी किताब ‘स्पेन मेरे हृदय में’ कभी कोई सरल किताब नहीं लगी। उसमें स्पष्ट होने की कोशिश है, लेकिन वह दुर्दमनीय और वेदनादायी घटनाओं के तूफान में डूबी हुई है। 

‘‘बहरहाल, मैंने सोचा कि मैं चंद कविताएं सुनाऊंगा, कुछ बातें कहूंगा और अलविदा कहके चल दूंगा। लेकिन वैसा हुआ नहीं। एक के बाद एक कविता को पढ़ते हुए, मौन के गहरे कुएं को सुनते हुए जिसमें मेरे शब्द गिर रहे थे, मेरी कविताओं को इतनी गंभीरता से पकड़ती उन आंखों और गहरी भवों को निहारते हुए मुझे लगा कि मेरी किताब सही निशाने पर लग रही है। अपनी खुद की कविता की ध्वनि से प्रभावित, उस चुंबकीय शक्ति से मुग्ध जो मेरी कविताओं और उन परित्यक्त आत्माओं को बांधे हुए थी, मैं एक के बाद एक कविता पढ़ता चला गया। 

‘‘घंटे भर तक यह पाठ चलता रहा। जब मैं जाने वाला था, उन लोगों में से एक खड़ा हुआ। वह उनमें से एक था जिसकी कमर में बोरा लपेटा हुआ था। उसने कहा, ‘‘मैं आपको हम सबकी ओर से धन्यवाद देना चाहता हूं। मैं आपसे यह भी कहना चाहता हूं कि आज तक किसी और चीज ने हमें इतना प्रभावित नहीं किया। 

‘‘उसने जब अपनी बात खत्म की, वह अपनी सुबकियां रोक नहीं पाया। और भी कईं रो रहे थे। मैं नम आंखों और खुरदरी हथेलियों के बीच से बाहर सड़क पर आया।’’

नेरुदा टिप्पणी करते हैं - ‘‘ आग और बर्फ की ऐसी परीक्षाओं से गुजरने के बाद भी क्या कोई कवि पहले जैसा ही रह सकता है।’’

कहने का मतलब सिर्फ इतना ही है कि कविता की यह जमीन किसी काव्यानुशासन या काव्यशास्त्र से तैयार नहीं हुई थी। इसे तैयार किया था जीवन की ठोस सचाइयों ने, सजीव मनुष्यों की अनुभूतियों ने। कवि को बदलने वाली ‘आग और बर्फ’ की यह परीक्षा भी कोई काव्यशास्त्र का पारायण नहीं हैं। इसीलिये अचरज नहीं होता, आम पाठक और श्रोता को कविता के क्षेत्र के हाशिये पर ढकेल कर कविता को अभिजनों की चीज बनाने के लिये रचे गये ‘कविता के नये प्रतिमान’ वाले काव्यशास्त्र में नामवर जी बार-बार अपने लिये वर्णवादी शुक्ल जी की सेवा लेने से जरा भी परहेज नहीं करते। 

इसमें शक नहीं कि साहित्य कोई प्रयोजनमूलक वस्तु नहीं है। न यह किसी संधि का दस्तावेज है, न संपत्ति का रेकर्ड और न कानूनी कागजात या रेलवे की समय सारिणी। आदमी इसे मुख्यत: अपने आत्मिक जरूरतों के लिये रचता है और बिना किसी बाहरी मजबूरी के पढ़ता भी है। लेकिन किसी भी स्थिति में यह कोई क्रासवर्ड पजल, या सुकोडू भी नहीं है, कोरे मानसिक आरोग्य का साधन। जो अगोचर शक्तियां हमारे भौतिक संसार को घेरे रखती है, उसमें पाठों के ताने-बाने से बुने गये साहित्य के संसार का बड़ा स्थान है। यह हमारे सामूहिक भाषाई संस्कार का एक प्रमुख साधन है। भाषा यदि राजनीतिज्ञों के आदेशों का गुलाम नहीं तो आलोचकों के आदेशों की भी गुलाम नहीं होती। लाख कोशिशें भी डा.रघुवंश के तमाम गढ़े गये पदों को कोरा मजाक का विषय बनने से नहीं रोक पायी हैं। भाषा सबसे अधिक संवेदनशील होती है साहित्य के प्रति और साहित्य निर्मित होता है सजीव मनुष्य के जीवन के चित्रों और बिंबों से। जब जीवन नहीं, कृत्रिम भाषाई प्रयोगों से साहित्य रचा जाता है, उसकी वही दशा होती है, जैसी आज हिंदी के लगभग पूरे अध्यापक-वर्गीय लेखन की है - व्यापक समाज में अप्रासंगिक लेकिन अध्यापकीय मस्तिष्कों के लिये बूझों तो जाने की पहेलियां बुझाने वाला ‘मानसिक आरोग्य’ का साधन। असली हिंदी बनी हुई है टेलिविजन के लोकप्रिय बाजारू सीरियलों की भाषा में। 

बहरहाल, नामवर जी ने हाल में यह खुले आम स्वीकार कर अपने बड़प्पन का परिचय दिया है कि ‘कविता के नये प्रतिमान’ किसी पुरस्कार को लपक लेने के लिये जल्दबाजी में लिखी गयी किताब थी। लेकिन पुरस्कार पाने की हड़बड़ी में ही उन्होंने डा. शर्मा की डाली गयी लीक को कुछ ऐसा गाढ़ा कर दिया कि इस जगत के दूसरे सभी सात्विक सूरमाओं (पवित्र सीताओं) के लिये लक्ष्मण की लकीर बन गयी। 

सचमुच, यदि हम हिंदी आलोचना के इस मायाजगत की, जो कई ईमानदार साहित्य अध्येताओं तक में एक गौरव का भाव पैदा किये हुए हैं, कोई असली कीमत तय करना चाहे, यदि हम हिंदी आलोचना की तुच्छता को, उसकी अभिजनवादी संकीर्णता को और खास तौर पर इसकी सारी उपलब्धियों के बारे में इस जगत के सारे सूरमाओं के भ्रमों और उपलब्धियों के बीच के करुण वैषम्य को स्पष्ट रूप से सामने रखना चाहे तो हमें इस जगत से पूरी तरह मुक्त होकर इसका अवलोकन करना होगा। आज तक, इसके नवीनतम प्रयास ने भी शुक्ल जी का दामन नहीं छोड़ा है। शुक्ल जी के विचारों के आधार-बिंदुओं की जांच-परख करना तो दूर, इसकी कोशिशों का पूरा ढांचा उन्हीं की इतिवृत्तात्मक, छात्रोपयोगी पद्धति पर टिका हुआ है। इस मामले में मार्क्सवादी और गैर-मार्क्सवादी सभी एक ही गोत्र के दिखाई देते हैं। भले इनमें से हरेक अपने को शुक्ल जी से आगे बढ़ने का दावा क्यों न करें, इनके उत्तरों में ही नहीं, सवालों पर भी वही शुक्लवादी रहस्यवाद आच्छादित है जो ठोस आधुनिक जीवन की चुनौतियों से उन्हें कोसों दूर रखता है। शुक्ल-द्विवेदी द्वंद्व भी उसीका एक विस्तार है। यह शुक्ल जी की पद्धति के ही किसी एक पक्ष को चुन कर उसे उनकी पूरी पद्धति के खिलाफ, और दूसरे लोगों द्वारा चुने गये किसी दूसरे पहलू के खिलाफ लक्षित करके बूंदी के किले की फतह का झंडा बुलंद करते रहते हैं। चारो ओर कोरे अंधविश्वासों और जड़सूत्रों का बोलबाला है। इसमें अन्त में विद्यानिवास मिश्र-अशोक वाजपेयी- रमेश चंद्र शाह कंपनी ने शुक्ल जी को अधिक से अधिक पवित्र बनाने के उपक्रमों के बीच से उसे पूरी तरह से पवित्र घोषित कर देने और इसप्रकार आलोचना को ही सदा के लिये ठिकाने लगा देने का महान काम संपन्न किया है। 

तमाम अवांछित दबावों से मुक्ति के प्रयत्नों के बीच से मार्क्सवादी आलोचना ने पश्चिम में उदीयमान सामाजिक यथार्थ से संगति रखते हुए जनतंत्र और स्वतंत्रता के मूल्यों के आधार पर विकास की नयी दिशा पकड़ी और उपलब्धियों के अनेक नये शिखरों को छुआ है। ग्रीस के वर्तमान वित्तमंत्री, बहुचर्चित अर्थशास्त्री यानिस वैरौफैकिस का हाल के अपने लेख “How I bacame an erratic Marxist” में मार्क्स के आर्थिक विमर्श के केंद्र में समानता और न्याय के बजाय स्वतंत्रता के विचार को रखना मार्क्सवादी वैचारिक विमर्श की इसी प्रक्रिया का अंग है। ऐसा ही है थॉमस पिकेटी का विचार। अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘21वीं सदी में पूंजी’ में वे यह कहने से नहीं चूकते कि मार्क्स ने निजी-पूंजी विहीन विश्व के सभी पक्षों पर सही ढंग से नहीं सोचा था, क्योंकि दुनिया में जो भी निजी पूंजी रहित समाज बने हैं, उन सब जगह राज्य की भूमिका बेहद दमनकारी दिखाई देती है और इसप्रकार, निजी पूंजी और नागरिक की स्वतंत्रता के संबंध के विषय को उन्होंने एक नया आयाम दिया है। 

हिंदी साहित्य जगत सजीव मनुष्य के जीवन से पैदा होने वाली चुनौतियों के बरक्स आलोचना के नये मानदंडों के विकास में ऐसी कोई नई उद्भावना के साथ सामने आने के बजाय अभी तो अध्यापकीय जकड़नों में फंसा हुआ आलोचना का एक ऐसा कब्रिस्तान है जिस पर सिर्फ मृतकों का बोलबाला और भूतों का डेरा है।







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