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कश्मीर में बाबा नागार्जुन का वो दुर्लभ सानिध्य:-अग्निशेखर


कश्मीर में बाबा नागार्जुन का वो दुर्लभ सानिध्य 

-अग्निशेखर

कश्मीर में क्षमा कौल के घर में बाबा नागार्जुन का एक दुर्लभ चित्र । चित्र में नागार्जुन से मिलने और उन्हें सुनने आए जो चुनिंदा हिंदी रचनाकार दिख रहे हैं वे हैं -बाँए से उपेंद्र रैना,डाॅ त्रिलोकीनाथ गंजू ,नागार्जुन, पिछली पंक्ति में डाॅ रतन लाल शांत ,भारत भारद्वाज, संजना कौल ,क्षमा कौल तथा दाएँ से महाराज शाह और डाॅ शशि शेखर तोषखानी ।

इस बैठक में बाबा नागार्जुन का एकल काव्यपाठ और उनके साथ सब उपस्थित हिंदी रचनाकारों की बातचीत रिकार्ड हो रही है ।

कश्मीर में उनका यह लंबा प्रवास था जो कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है । विशेषकर उनकी कश्मीर में लिखी कविताओं की दृष्टि से ।

नागार्जुन अस्सी के दशक के प्रारंभिक वर्षों में कश्मीर में युवा कवयित्री क्षमा कौल के घर में रहे । उनकी स्मृतियों का एक बड़ा खजाना है क्षमा के पास। उनकी माँ, बहनों ,भाभी सहित अनेक करीबी संबंधियों के पास । उन अंतरंग विविधवर्णी स्मृतियों को क्षमा जी को कभी विस्तार से लिखना चाहिए ।

जहाँ तक मुझे याद है नागार्जुन के साथ उन दिनों श्रीनगर में कभी वरिष्ठ कवि शशिशेखर तोषखानी के यहाँ, कभी क्षमा जी के यहाँ, तो कभी रेडियो कश्मीर, श्रीनगर में रिकार्डिंग के दौरान कितनी चर्चा -गोष्ठियां ,काव्य गोष्ठियां हुईं थीं । एक उत्सवधर्मी साहित्यिक हलचल थी शहर में ।

कहते हैं कश्मीर आने की उनकी तीन शर्तें थीं ।कश्मीरी कवि दीनानाथ नादिम से भेंट करना,चिनार का पत्ता चूमना और वितस्ता के घाट पर उसके जल की आचमन करना ।

इसलिए कभी उन्हें कवि दीनानाथ नादिम के घर ले जाया जाता ।कभी प्रयाग (शादीपुर ) की यात्रा कर आते वह क्षमा की छोटी बहन गुड्डी कौल के साथ ।गुड्डी का नाम बदलकर बाबा ने हिमा कर दिया था। मूर्तिशिल्पी गुड्डी बाद में मृत्युपर्यंत कला जगत में हिमा कौल नाम से ही जानी गईं ।

यह जानकारी नागार्जुन के पाठकों, प्रशंसकों और शोधकर्ताओं के लिए रोचक हो सकती है कि इसी कश्मीर प्रवास के दौरान नागार्जुन ने चिनार, जिसे कश्मीरी भाषा में 'बूञ्य ' (भुवन व्यापिनी ) कहते हैं, पर गजब की कवताएं रचीं।जैसे 'बच्चा चिनार' आदि ।

स्व. हिमा के अनुसार हुआ यह कि जब शादीपुर प्रयाग में बाबा ने विशाल और वयोवृद्ध 'बूञ्य' ( चिनार) देखी तो उसकी भव्यता और गरिमा से अभिभूत हो गये । उसी परिसर में संगम के किनारे जब उन्हें एक डेढ दो-सौ बरस के एक चिनार के बारे में पता चला कि यह तो बाकी बड़े चिनारों की तुलना में बच्चा है तो आश्चर्यचकित रह गये बताया था हिमा ने।

बाबा ने कहा था," इस डेढ़ दो-सौ साल के बच्चे चिनार को मैं आशीर्वाद भी नहीं दे सकता । यह तो मुझसे इतना बड़ा है।"

बाबा ने एक गोष्ठी में हमें चिनार कविताएँ ही नहीं सुनाई थीं बल्कि संस्कृत मे भी ताजा रची कई अद्भुत कविताएँ चाव से सुनाई थीं । ऐसी एक कविता में पार्वती का एक मौलिक बिंब विस्मयकारी था।यह गोष्ठी डाॅ शशि शेखर तोषखानी के इंदिरा नगर निवास पर हुई थी।

मुझे याद है वह कल्हण की राजतरंगिणी के जिक्र आने पर एक वरिष्ठ साहित्यिक मनीषी के ज़रा सा टोके जाने पर उनपर कुपित हो गये थे। देर तक शांत नहीं हुए थे।

" यह तुम कह रहे हो ? और कश्मीरी हो ?" वह नाराज़ होकर वहाँ से चलने को हुए ।तब शायद हमारे सब आदरणीयों ने उन्हें क्षमा भाव से मना लिया था।बोले थे ," मैंने कल्हण को पी डाला है ..."

तब उन्होंने संस्कृत कविताओं का भी पाठ किया था।

नागार्जुन ने कश्मीर की धरती के नीचे पनप रही साम्प्रदायिक और अलगाववादी धीमी धीमी आँच उन्हीं दिनों महसूस की थी।यह बात 1990 में हुए हमारे सामूहिक विस्थापन के बाद एकबार भारत भारद्वाज ने भी बताई थी -" मैं उन्हीं दिनों जान गया था 1981-82 में ही जब मेरी पोस्टिंग बारामुला में थी कि कश्मीर अब आपके रहने लायक नहीं रहा..आपको नहीं रहने देंगे वहाँ।"

क्षमा विस्थापन के जानलेवा आरंभिक दिनों में इलाहाबाद के बाद जब दिल्ली के शकरपुर मुहल्ले में एक छोटे से कमरे में गुज़र-बसर कर रही थीं तो एकदिन कहीं से पता जुटाकर बाबा नागार्जुन उनके पास आए थे। खुमि ( क्षमा को बाबा इसी नाम से बुलाते थे) और बच्चों का हाल जानने ।

मुझे भी खूब खूब ढूँढने रहे ।यह बात मुझे कहानीकार हरिकृष्ण कौल ने बताई थी कि बारबार पूछते थे मेरे बारे में ।कहां है ।क्या कर रहा है ।

और एक दिन कवि वीरेन डंगवाल को दिए जाने वाले रघुवीर सहाय पुरस्कार समारोह में बाबा मुझे अत्यंत वात्सल्य से मिले। यह कार्यक्रम 'कान्स्टिट्यूशन क्लब ,नई दिल्ली में था। समारोह के अंत में मैं उनके पास गया ।वह मंच से उतर रहे थे।मैंने अभिवादन के साथ ही उन्हें अपना परिचय दिया, " बाबा, मैं अग्निशेखर हूँ! "

उनके आंखे एक चमक उठीं। खींचकर गले से लगा लगाकर जिस तिस से कहते रहे, "यह अग्निशेखर है..अग्निशेखर है यह...यह है अग्निशेखर ..."

मेरे लिए उस पल का वह अनिर्वचनीय अनुभव है।वह मेरी बाँह को पकड़े रहे और खींच खींच कर अपने सीने से लगाते रहे। बारबार मुझे निहारते। मैं स्तब्ध था। निःशब्द । तभी आयोजक उन्हें अपने साथ ले गये ।मैं उन्हें देखता रहा और आज भी इतने बरसों के बाद इन शब्दों में जैसे उन्हें साफ देख रहा हूँ सामने ।
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