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“आपातकालीन संकट में हिन्दी उपन्यास के स्वर”: -अभिषेक कुमार गौड़


“आपातकालीन संकट में हिन्दी उपन्यास के स्वर”

-अभिषेक कुमार गौड़


“अधिनायकवादी व्यवस्था में दायित्व बोध नहीं, डर रहता है जबकि दायित्व की असली भावना केवल मनुष्य की स्वतंत्रता से उत्प्रेरित होती है। स्वतंत्रता की यह अद्भुत विषेशता हे कि वह अपने में कोई मूल्य नहीं है वह मनुष्य की जैविक जरूरत है, जो मानवीय मूल्यों को जन्म देती है। न्याय, लोकतंत्र, सौन्दर्य की भावना, प्रेम ये सब मूल्य हैं, जो केवल मनुष्य सन्निहित स्वतंत्रता के कारण जीवित हैं और उसके न रहने पर मुरझा जाते हैं।”1 -निर्मल वर्मा

लोकतंत्र के उदय और उसकी सफलता का मूल कारण था-उसमें निहित मनुष्य की आंतरिक स्वतंत्रता। स्वतंत्रता के प्रति अधिकार प्रदान करना और उन अधिकारों की रक्षा करने का दायित्वबोध लोकतंत्र के आने से शुरू हुआ। विष्व पटल पर फ्रांसीसी क्रान्ति (1749) से लोकतंत्र की विधिवत शुरूआत मानी जा सकती है; किन्तु इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि इसके पूर्व लोकतंत्र को स्वरूप नहीं था। आंषिक रूप में ही सही पर लोकतंत्र की झलक हमें प्राचीन काल से ही मिलती आ रही है। बौद्ध धर्म में विहानों का गठन लोकतंत्र का एक ऐसा ही प्रमाण है। 

अपनी अब तक की विकास यात्रा में लोकतंत्र का महत्वपूर्ण योगदान यह रहा कि उसने अधिकारों के प्रति जूझने का साहस प्रदान किया। यही वह कारक था कि समाज के सबसे शोषित तबके-दलित, आदिवासी, एवं स्त्री ने अपने अधिकारों को महसूस किया और उसको पाने का प्रयत्‍न पूरी शिद्दत से किया। जैसा कि समाज का एक वर्ग मानता है कि लोकतंत्र सिर्फ वोट देने का अधिकार है; किन्तु हकीकत में यह उससे बहुत ही व्यापक अर्थ रखता है। स्त्री पक्ष को लेकर इन्हीं अधिकारों की व्याख्या करते हुए रघुवीर सहाय लिखते हैं-

‘‘लोकतंत्र सिर्फ वोट देने के अधिकार से नहीं बनता। सबसे पहले वह अपने अधिकार के लिए लड़ने से बनता है। औरत को वोट देने का अधिकार देकर हमने लोकतंत्र नहीं बना लिया। औरत का सबसे पहला अधिकार यह बताने का है कि वह अपनी देह का क्या करती है। वही तय कर सकती है कि वह कब और किस पुरूष को देह का संग देगी और वही तय कर सकती है कि वह कब माँ बनेगी।”2

अपने अधिकारों को अपने तरीके से उपयोग करने की शक्ति लोकतंत्र से मिली है। इसलिए समाज संचालन के अब तक की अन्य व्यवस्थाओं से यह कहीं ज्यादा सफल और पारदर्शी व्यवस्था थी। किन्तु इसे सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था मान लिया जाये, यह कहना जल्दबाजी होगी। कई मौकों पर लोकतंत्र भी प्रभावित हुआ है जिससे आम जनमानस के अधिकार खतरे में पड़ गये। ऐसे ही मौकों पर साहित्य- जिसे समाज का प्रहरी कहा जाता है, ने लोकतंत्र को कमजोर करने वाले खतरों की ओर ध्यान आकर्षित करवाया है। साथ ही साथ उसका विकल्प भी देने का प्रयास किया है। साहित्य द्वारा समाज को आत्मसात करने को नरेष मेहता उसकी प्रतिसृष्टि मानते हैं और लिखते हैं-

“साहित्य में समाज का मात्र चित्रण नहीं हुआ करता बल्कि उसका सृजन हुआ करता है इसलिए समाज के समानान्तर वह भी एक सृष्टि होता है जिसे प्रति सृष्टि कहा जायेगा।”3 

भारत में भी लोकतंत्र पर संकट घिर आया जब 25 जून 1975 को देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया। आपातकाल ने बड़ी निर्ममता से लोकतंत्र का गला घोंटा और अभिव्यक्ति पर पाबंदी लगा दी। ऐसे संकटकाल में साहित्य का दायित्व बढ़ गया और उससे अपेक्षा भी थी कि इस भयावह समय से समाज के मूल्यों की रक्षा और लोकतंत्र की पुर्नस्थापना करने में वह अपना सार्थक वक्तव्य दे। किन्तु अगर साहित्य ऐसे समय में चुप रहे तो यह उसकी सार्थकता पर प्रश्‍न चिन्ह है। प्रेमचन्द ने साहित्यकार के इस दायित्व का बोध कराते हुए लिखा है- 

“साहित्यकार बहुधा अपने देशकाल से प्रभावित होता है। जब कोई लहर देश में उठती है तो साहित्यकार के लिए उससे अविचलित होना असंभव हो जाता है। उसकी विशाल आत्मा अपने देश बंधुओं के कष्टों से विकल हो उठती है और इस तीव्र विकलता में वह रो उठता है पर उसके रुदन में व्यापकता होती है। वह स्वदेश का होकर भी सार्वभौमिक होता है।”4 

लोकतंत्र के प्रति हुई इस दुर्घटना पर साहित्य की विभिन्न विधाओं ने अपने-अपने तरीकों से प्रतिरोध किया। समाज के सबसे करीब रहने वाले ‘उपन्यास’ ने इस समूचे समय को कैसे समझा? यह महत्वपूर्ण है। चूँकि उपन्यास में समाज की सारी गतिविधियाँ अपनी पूरी जटिलता के साथ प्रकट होती है अतः आपातकाल में उपन्यास के प्रतिरोध की पड़ताल जरूरी हो जाती है- उपन्यास के बुनियादी स्वरूप को स्पष्ट करते हुए परमानंद श्रीवास्तव लिखते हैं-

“हमारे समय में एक महत्वपूर्ण उपन्यास की पहचान ही यह है कि वह कथा फलक विराट विस्तृत रखे या संक्षिप्त और सीमित, हमारे अस्तित्व के बारे में, पास-पड़ोस के बारे में, हमारी दुनिया के बारे में कुछ बुनियादी सवाल जरूर उठाता हो। उत्तर वह दे, न दे, पाठ के अन्त तक आते-आते कुछ सवाल जरूर छोड़ जाता हो।”5 

आपातकाल की समूची पृष्ठभूमि को आधार बनाकर लिखे गये प्रमुख उपन्यास-कटरा बी आर्जू (राही मासूम रज़ा 78), शांतिभंग (मुद्राराक्षस, 82) समय साक्षी है (हिमांशु जोशी, 82), प्रजाराम (यादवेन्द्र शर्मा, 83), रात का रिपोर्टर (निर्मल वर्मा, 89), जवाहरनगर (रवीन्द्र वर्मा, 95), पहर ढलते (मंजूर एहतेशाम, 2000), जंगल तंत्रम (श्रवण कुमार गोस्वामी, 79), आपातनामा (मनोहरपुरी, 2014), अधबुनी रस्सी (सच्चिदानन्द चतुर्वेदी, 2009), छठा तंत्र (बदीउज्जमा) सत्यमेव जयते (श्री गोपाल व्यास, 2012) आदि हैं। आपातकाल एक ऐसी घटना थी जिसने लोकतंत्र के माथे पर कलंक लगा दिया था और इससे पूरी जनता प्रभावित हुई थी। उपन्यासों को देखे तो कुछ गिने चुने नाम ही है जिन्होंने इस समूचे समय को रेखांकित किया। उपन्यासकारों की यह चुप्पी सहज स्वीकारने योग्य नहीं लगती है। धूमिल के शब्दों में-

“मैं कारण नहीं पूंछता

उसका इस तरह बोलना 

खामोशी को और गहराता है।”6 

साहित्यकारों की यह खामोशी सत्ता की ताकत की ओर भी इशारा करती है। सत्ता का ही आंतक था कि जिन साहित्यकारों ने आपनी कलम आपातकाल में चलाई उन्हें या तो जेल जाना पड़ा या भूमिगत होना पड़ा। इन सबके बीच एक लंबी फेहरिस्त उन लेखकों की भी थी जिन्होंने आपातकाल का समर्थन भी किया। समाज के सजग प्रहरी कहलाने वाले साहित्यकारों की यह स्थिति उस गहरे सन्नाटे का प्रतीक है, जो पूरे समाज में फैला हुआ है निर्मल वर्मा ने ‘कला का जोखिम’ में इस सत्य को उद्घाटित करते हुए लिखा है कि- 

“मुझे लगता है समूचे राजनीतिक कोलाहल, शोर और नारों के बीच कहीं हमारी आत्मा के बीच गहरा सन्नाटा है। आज जिनके पास शब्द है उनके पास सत्य नहीं है, और जिनके पास अपने भीषण असहनीय अनुभवों का सत्य है शब्दों पर उनका कोई अधिकार नहीं है।”7 

आपातकाल की पृष्ठभूमि पर पहला उपन्यास कटरा बी आर्जू (1978) राही मासूम रज़ा ने लिखा। इस उपन्यास का लेखन आपातकाल के प्रारंभिक वर्षों में ही शुरू हुआ; किन्तु इसका समापन आपातकाल की समाप्ति के साथ ही हुआ। इस तरह से इसमें लोकतांत्रिक सरकार द्वारा लोकतंत्र के हनन की पूरी सच्चाई वर्णित है। यह उपन्यास “कटरा” मुहल्ले की कहानी है जिसने आर्जुओं के सब्जबाग पाल रखे थे। वास्तव में ये सारे देश की कहानी है जिसने 15 अगस्त 1947 की आजादी के बाद बहुत सारे सपने देखे थे, बहुत सारी आकांक्षाएं पाल रखी थी। आपातकाल ने उन सारे सपनों को रौंदकर सत्ता को निरंकुषता की ओर ढकेल दिया। प्र.ग. सहस्त्रबुद्धे एवं माणिकचन्द्र वाजपेयी ने ‘आपातकालीन संघर्ष गाथा’ में उस काली रात का जिक्र करते हुए लिखा है- 

“उसी रात संपूर्ण देश में गणतंत्र की वासंतिक बयार बंद हो गयी और एकाधिकारवादी सत्ता की ठिकुराने वाली, जलाने वाली, विषम हवाएं बहने लगी। कालचक्र उलटा घूमने लगा।”8 

उपन्यास उन छोटे-छोटे लोगों की कहानी कहता है जिन्होंने आजादी के साथ ही बहुत सी उम्मीदे जी रखी थी, बहुत से सपने पाल रखे थे। उपन्यास की शुरूआत उनके धुंधले सपने के साथ होती है और इसकी समाप्ति सपनों के क्रूर दमन के साथ। 19 महीने के सरकारी आतंक ने यह सिद्ध कर दिया था कि आमजनमानस के हिस्से सपने देखने का हक भी नहीं आया था। कहने को हम लोकतांत्रिक हो गये थे पर अपनी क्रूरता और बर्बरता में अंग्रेजों को भी मात देते नजर आ रहे थे। आम जनता के लिए लोकतंत्र एक छलावा भर था। इसमें उनकी सहभागिता पाँच वर्ष में एक बार ‘वोट’ के समय ही होती थी। मशहूर कथाकार वंदना राग अपनी कहानी ‘विरासत’ में इस आशय को सिद्ध करते हुए लिखती हैं- “सच तो यह है कि इस देश के अधिकांश नागरिकों की तरह सरकार से मेरा नाता चुनाव के दौरान ही प्रकट होता है और वोट देने के साथ समाप्त हो जाता है।”9 

राही मासूम रज़ा ने इस उपन्यासकार में उस अंधेरे को दिखाया है जो कटरा के पूरे मुहल्ले में फैल गया था। अंधेरे के बावजूद बीच-बीच में रोशनी की हल्की सी किरण फूटती थी। इसी अँधेरे के बीच फज्जू धोबी, शम्सू मियाँ, भोले पहलवान, आषाराम, बिल्लो और देशराज ने सपने देख रखे थे- किसी को घर बनाना था, किसी को बेटी का ब्याह, किसी को जमीन तो किसी को ट्राजिस्टर। इमरजेंसी ने इनके सपनों पर भी बुलडोजर चला दिया था। राही मासूम रज़ा लिखते हैं- 

“वह इसीलिए बड़े-बड़े सपने नहीं देखती थी जि पूरा करना संभव न हो। वह अपनी आँख के नाप के सपने देखती थी और इसीलिए अब कोई उससे शादी की बात नहीं करता था। सब जानते थे कि घर बनवाए बिना वह शादी नहीं करेगी। और इस घर के सपने ने उसे ऐसा जकड़ रखा था कि वह किसी और बात के बारे में सोचती भी नहीं थी।”10 

आपातकाल ने राजनीति के प्रति आमजन की आस्था का खात्मा कर दिया। इमरजेंसी के शुरूआती दिनों में आम आदमी ने इसकी खुशी मनाई और समझा कि अब उनके सारे सपने पूरे हो जायेंगे। और इमरजेंसी का सबसे ज्यादा शिकार भी यही आम जनता हुई। इस सबके बीच यह प्रश्‍न उठना स्वाभाविक है कि शुरू में आपातकाल का समर्थन करने वाली जनता क्यों इसके विरोध में हो गई। बिल्लों ने धुलाई में 10 पैसे और इस्तिरी में 20 पैसे की कमी कर दी, देश ने मजदूरी चैथाई कर दी वहीं पहलवान की चाय की दुकान में भीड़ बढ़ गई थी। उपन्यास में लेखक ने यही दिखाया कि आम समाज ने शुरूआत में इसका समर्थन किया और इसे अपने सपनों को पूरा करने की गारंटी के तौर पर देखा। कटरा बी-आर्जू में लेखक ने लिखा भी है-

“लोगों ने इत्मीनान का साँस लिया और सोचा कि इमरजेंसी बड़ी अच्छी चीज है। चीनी का भाव दो रुपये किलो नीचे आ गया। डालडा का भाव गिर गया। सूजी मिलने लगी। सिनेमा के टिकटों का ब्लैक बंद हो गया। ....लगभग सवा दो सौ बरस के बाद जिंदगी पहली बार खुले बाजार की सैर करने निकल आई।11 

दो सौ साल के लंबे इतजार के बाद उम्मीदों के पर लग आये थे। शुरूआती समय में शासन के प्रति कृतज्ञता उनकी उस बेचैनी की उपज थी जो इतने लंबे समय तक अच्छे दिनों के इंजतार से पैदा हुई थी।

उपन्यास ने सरकार द्वारा चलाये गये अमानवीय कार्यक्रम ‘परिवार नियोजन’ का भी पूरा चिट्ठा खोलकर रखा है। इस कार्यक्रम से लोगों की जबरन नसबंदी कर दी गई। सरकारी कर्मचारियो को नसबंदी के केस लाने पर मजबूर किया गया। लक्ष्य पूरा न कर पाने वाले कर्मचारियों का वेतन रोका गया उनका ट्रांसफर किया गया। अभियान को पूरा करने का जूनून इस कदर था कि अपात्रों की नसबंदी कर दी गई। भ्रष्टाचार इस कदर था कि एक ही व्यक्ति का नसबंदी केस कई कर्मचारियों ने अलग-अलग दिखा दिया। स्कूल जाने की बजाय शिक्षक नसबंदी के केस ढूढ़ा करते थे। उपन्यास में ‘बदर’ और ‘शहनाज’ के प्रेम सम्बन्ध को इस कार्यक्रम में संतान सुख से वंचित कर दिया। इसीलिए बदर सुहागरात को अपनी पत्नी शहनाज से कहता है-“रनुमाई में तुम्हें अपना वोट देता हूँ” बदर ने कहा “उसे काँग्रेस के खिलाफ दे आना।”12

इमरजेंसी को जायज ठहराने के लिए सरकार ने सरकारी अमले का भरपूर उपयोग किया। लोकतंत्र के चौथे खंभे का भी बखूबी इस्तेमाल आपातकाल के पक्ष में किया गया। अखबार, दूरदर्शन एवं आकाशवाणी रटी-रटाई भाषा बोल रहे थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री के द्वारा प्रेस निवेशकों को खुली चेतावनी भी दी गई थी। इसा समूची कवायद का मतलब था- सरकार द्वारा किये जा रहे जायज-नाजायज कार्यो की किसी भी प्रकार की अलोचना न की जाये, उसे जायज ठहराया जा सके जिसके लिए प्रेस, दूरदर्शन एवं आकाशवाणी सबसे उपर्युक्त माध्यम थे। जबकि आलोचनाविहीन समाज में तानाशाही की प्रवृत्ति जन्म ले लेती है। अरूण कमल के शब्दों में समझे तो-

“जो समाज आलोचना बर्दाश्त नही कर सकता असहमति या विरोध मत का अस्तित्व बर्दाश्त नहीं कर सकता, वह देर सवेर एकाधिकारवादी सत्ता का गुलाम बन जाता है।”13

कटरा बी आर्जू में लेखक ने जनसंचार माध्यमों पर से लोगों के विश्वास के टूटने का भी जिक्र किया है। सरकारी दबाव या अन्य कारण जो भी रहे हो, किन्तु रिकार्ड वही बजते थे जो सरकार चाहती थी। कटरा मुहल्ले के लोगों को आकाशवाणी स्टूडियों में बुलाना और इमरजेंसी के पक्ष में वक्तव्य दिलाना आकाशवाणी की मंशा पर सवाल उठाते है। लेखक इसे वर्णित करते हुए लिखता है-“आकाशवाणी से आदमी नहीं रिकार्ड बजते थे। आवाजें अलग हुआ करती थी पर बात नम्बर एक सफदरगंज करता था.......... मिसेज गाँधी को आवाज बदलने में कैसा कमाल हासिल था। और जब कोई आवाज ज़रा इधर-उधर होती, बन्द कर दी जाती ।”14

उल्लेखनीय है कि आपातकाल के दौरान सरकार द्वारा चलाये गये सरकारी दमनचक्र को पूरी शिद्दत से उभारने में लेखक सफल रहा है। उपन्यास की नाटकीयता यह है कि बीच-बीच में लेखक स्वयं उपस्थित होकर अपनी बात कह देता है और फिर नेपथ्य में चला जाता है। लेखक की यह उपस्थिति उपन्यास की यथार्थता को बढ़ाने का काम करती है। उपन्यास का मूल्यांकन करते हुए उन्मेष सिन्हा ने लिखा है “यह उपन्यास चुनावी राजनीति के प्रति आम आदमी के भरोसे की मृत्यु पर लिखा गया एक शोकगीत है।”15

यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ के उपन्यास ‘प्रजाराम’ में आपातकाल तथा जनता पार्टी के शासन को रेखांकित करने का प्रयास हुआ है। उपन्यास ने आपातकाल के कारणों, जनता का दर्द, पुलिस की बर्बरता तथा संजय गांधी के प्रभाव की बारीकी से पड़ताल की है; साथ ही जनता पार्टी के शासन का भी पूरा लेखा जोखा बटोरने का प्रयास किया गया है। उपन्यास की पद्धति फैंटेसी पर आधारित है। ‘प्रजाराम’ नामक का मुख्य पात्र पूरी कथा को जोड़ने का काम करता है। वास्तव में इस पात्र के माध्यम से ही लेखक पूरे सच को सामने लाने का प्रयास करता है यही कारण है कि कथात्मकता की राजनीति के दोगले चरित्र को उजागर करने में उपन्यास की भूमिका प्रशंसनीय है। राजनीति का सच उपन्यास के शब्दों में- “और राजनीति अब छिनाल हो गयी है।...... इमर्जेंसी में यह छिनाल राजनीति कितनी चादरें बदलेगी इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।”16 

देश के नेता का सच बयान करते हुए लेखक ने उपन्यास के हवाले से लिखा है- “तुम पागल हो। हम इस देश के राजनीतिज्ञ हैं। हमारा वास्तव में तो कोई सत्य, धर्म, आचरण नहीं होता। ऐसे नाटक तो दिन के चौबीस घंटों में हम पच्चीस बार करते हैं। इस पर ज्यादा मत सोचा करो डार्लिंग।”17 

यह अनायास नहीं है कि लेखक ने राजनीति को ‘छिनाल’ जैसे शब्दों से संबोधित किया है। इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी के समय नेताओं ने अपनी केंचुल बदल ली थी। काँग्रेसी नेता अब जनता पार्टी के नेता बन गये थे। इन सबके बीच जनता असहाय, लाचार सी खड़ी थी। सत्य के इस मर्म का वर्णन उपन्यास ने कुछ यूं किया है-“इसे अवसरवादिता की राजनीति कहते हैं। प्रजाराम, कल के काँग्रेसी आज जनता पार्टी के महारथी बन सकते हैं तो कल का अवसरवादी आज इनका भोंपू क्यों नहीं बन सकता? जरा पीछे की ओर देखो तो। इनमें कितने ऐसे चेहरे हैं जो पहले इनके साथ नहीं थे।”18 

सरकार द्वारा तर्क दिया गया कि देश में फैले भ्रष्टाचार अराजकता से निपटने के लिए आपातकाल जरूरी था। उपन्यास ने इस पर प्रश्न उठाते हुए कहा है कि भ्रष्टाचार और अराजकता के लिए जनता जिम्मेदार थी या सत्ता? वास्तविकता यह थी कि बड़ी चालाकी से जनता के संकट को सत्ता का संकट बना दिया गया। इन्दिरा गाँधी के इस्तीफे के बदले देश को आपातकाल की आग में झोंक दिया गया। लेखक पूरी निर्भीकता से इस प्रश्न को उठाते हुए लिखता है-“लोकतांत्रिक, नैतिक और कानूनी परपंराओं व नियमों को ताक में रखकर प्रधानमंत्री ने केवल अपने आपको राज्य सत्ता में बनाये रखने के लिए आपात स्थिति की घोषणा करवा दी है और दोष हिंसक वातावरण तथा देश में व्याप्त अशंति, अव्यवस्था और अराजकता के माथे मढ़ दिया है।”19 

देश के संचार माध्यमों एवं बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने आपातकाल का समर्थन किया। उनका मानना था कि आपातकाल के द्वारा सभी चीजे पटरी पर लाई जा सकती हैं। अगर यह सच था तो शुरूआती समर्थन के बाद आम आदमी इसके विरोध में क्यों खड़ा हो गया? दरअसल संजय गाँधी व उनकी मंडली ने ऐसा माहौल बना दिया था कि प्रधानमंत्री को सचाई से रूबरू ही नहीं करवाया गया। चाटुकारों की बड़ी फौज उन्हें सिर्फ जनता की खुशहाली ही दिखाती रही। उनकी आँखों से पीडि़त जनता पुलिस बर्बरता का शिकार आम आदमी कोसों दूर थे। 

“वे घरों में घुस आये। औरतों पर अमानुषिक अत्याचार किये, उनके अंगों की जाँच की, उन्हें निर्ममता से दबोचा-खसोटा। चारों ओर हाहाकार मच उठा। ऐसा लगा कि किन्ही असहाय आत्माओं के यातना शिविरों में भूखे शेर-भेडि़ए छोड़ दिये गये हो।”20 

उपन्यास के माध्यम से लेखक ने संदेश दिया है कि सरकारें चाहे जितनी बदल जायें पर जनता की स्थिति वही रहेगी। काँग्रेस सरकार के अत्याचार के बाद जनता पार्टी से लोगों ने अच्छे दिनों की उम्मीदें पाल रखी थी। जनता पार्टी से भी लोगों को कोई राहत नहीं मिली बल्कि स्थिति पहले से भी बदतर हो चली और लोग एक बार फिर से आपातकाल को याद करने लगे। लेखक ने यही पर समाधान दिया है और व्यवस्था से लड़ने के लिए नेता की बजाय आम आदमी को आगे आना जरूरी है और अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ेगी। 

“सिपाहियों। तुम्हारे बर्बर अत्याचार सहते-सहते हम थक गये हैं। अब हम खुद खून का बदला खून से लेंगे और उस व्यवस्था के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ेगे जिससे देश का अशिक्षित, भूखा-नंगा और मेहनतकश इंसान एक नई जिन्दगी पाएगा। वह चंद बौद्धिक ऐय्याशों और उनके अन्यायों का सामना करेगा।”21 

चूंकि व्यवस्था से सबसे ज्यादा प्रभावित आम आदमी ही होता है अतः उसे अपने संकटों का समाधान खुद निकालना पडे़गा। आपातकाल की जनविरोधी एवं अलोकतांत्रिक राजनीति में पिसते आम आदमी का लेखा जोखा श्रवण कुमार गोस्वामी ने अपने उपन्यास ‘जंगल तंत्रम’ में किया है। जैसा कि शीर्षक से ही पता चलता है- इसमें लोकतंत्र की वास्तविक स्थिति को जंगल राज कहकर संबोधित किया गया है। यहाँ लेखक का इशारा इस ओर है कि ‘लोकतंत्र’ समाज संचालन की एक बेहतर व्यवस्था है किन्तु सर्वश्रेष्ठ नहीं जैसे ही इस व्यवस्था के साथ खिलवाड़ होगा यह जंगल तंत्र में बदल जायेगी। ऐसी ही चिंता प्रकट करते हुए योगेन्द्र यादव लिखते हैं कि- “सिद्धांत रूप में जो सत्ता यह लोकतंत्र जनता को सौंपती है, उसका इस्तेमाल असली जनता शायद ही कर पाती है। भारतीय गणराज्य के नागरिकों में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो अपने को आज भी उतना ही अधिकारहीन पाते हैं जितना वे अंग्रेजों के जमाने में थे।”22 

यह सच ही है कि लोकतंत्र का उपयोग आम जनता बड़े सीमित अर्थों में कर पाती हैं। इस पर वास्तविक अधिकार राजनेताओं, पूँजीपतियों एवं नौकरशाही का है। जंगल तंत्रम उपन्यास प्रतीकात्मक शैली में लिखा गया है। राजनेता को सिंह, प्रशासक को मोर, नाग को पूँजीपति एवं आम जनता को चूहे के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वास्तव में पात्र चयन में ही व्यंग्य की गहरी चोट की गई है। इस फैटेंसीनुमा उपन्यास में सिंह, मोर, नाग के बीच पिसते चूहे (आम आदमी) की दशा का यथार्थ अंकन हुआ है। “इस जंगल में पहले जो गरीब था, वह और भी गरीब हो गया और जो अमीर था वह और भी अमीर हो गया। जो कमजोर था वह और भी पिछड़ गया ओर जो ताकतवर था वह और भी ताकतवर हो गया आखिर ऐसा क्यों?”23 

दरअसल इसका कारण था पूँजीपति और राजनेताओं की परस्पर सहभागिता। वही योजनाओं क्रियान्वित की जाती थी जिनसे फायदा पूँजीपतियों का हो। आम आदमी इस एजेंडे में कहीं फिट नहीं बैठता है। आपातकाल का संकट वास्तव में खाद्यान्न संकट से ही पैदा हुआ था। बेतहाशा बढ़ती हुई महँगाई से आम जनता त्रस्त थी। कालाबाजारी अपने चरम थी और इस सबके बीच सरकार ने जनता के हितों की ओर से अपनी आँखें मूंद ली थी। उपन्यास ने पूँजीपतियों पर व्यंग्य करते हुए लिखा है- “इतने से संतोष न हो तो कालाबाजारी कर, चंदे उगाहकर हजम कर जा-खूब धन मिलेगा। लेकिन सबसे अच्छा तरीका हे वाणिज्य व्यापार करना। इससे जो बेशुमार धन मिलता है, वही सबसे उत्तम धन कहलाता है।”24 

उल्लेखनीय है कि मेहनत आम आदमी करता था जबकि उसके सारे संशाधनों पर अधिकार कुछ खास आदमियों का था। उपन्यास में तत्कालीन सरकार के द्वारा उठाये गये कठोर निर्णय की भी व्याख्या की है साथ ही पत्रकार, दूरदर्शन, आदि की भूमिका का भी विवेचन किया है। व्यंग्य की चाशनी में उसने इन सबकी असलियत बाहर लाने का प्रयास किया है। दरअसल आम आदमी को अपना भाग्य विधाता खुद बनना पड़ेगा। किसी चमत्कार की आशा नहीं की जा सकती और न ही सत्ता से किसी प्रकार की उम्मीद की जा सकती है इसलिए लेखक उपन्यास को समाप्त करते हुए लिखता है-

“तू सुविधाजीवी, डरपोक और भगेड़ू है। क्षण भर के सुख के लिए तू अपना भविष्य तो चौपट कर सकता है, मगर अपनी जीभ नहीं हिला सकता तू सिर्फ पीछे चलना जानता है, आगे नहीं। तू जय जयकार तो कर सकता है, मगर विरोध नहीं।”25

आपातकाल पर लिखे गये ज्यादातर उपन्यासों के मूल में यही ‘आम आदमी’ रहा है। चूंकि आपातकाल को इस वर्ग ने अपने ‘तन’ व ‘मन’ दोनों पर जिया है; अतः स्वाभाविक है कि उसी को आधार बनाकर उपन्यास लिखे गये। रघुवीर सहाय ने लिखा है कि “पत्रकार और साहित्यकार दोनों नये मानव संबंध की तलाश करते हैं।”26 अतः आपातकाल के समय पत्रकारों ने मानव मूल्यों की रक्षा कैसे की यह विचारणीय प्रश्न है। पत्रकारिता, सेंसर तथा सरकार के अलोकतांत्रिक रवैये पर निर्मल वर्मा ने ‘रात का रिपोर्टर’ उपन्यास लिखा। उपन्यास की पूरी कहानी ‘रिशी’ नामक पत्रकार व उसके इर्द-गिर्द मौजूद भय पर आधारित है। उपन्यास इस समूचे समय की तस्दीक कुछ यूं करता है- “शहर की उन काली अफवाहों की तरह जिन्हें हर आदमी सुनता था, ताकि वे उसका पीछा न कर सकें .... उन दिनों सारा शहर भागता सा दिखाई देता था, मानो हर व्यक्ति को अन्देशा हो कि एक मिनिट कहीं ठहरे नहीं, कि पीछे से आता बवंडर उस पर आ टूटेगा।”27 

चूंकि भय का वातावरण इतना गहरा हो गया था कि वह एक बवंडर की भाँति प्रतीत होता था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छिन जाने पर चौथा स्तम्भ पंगु हो गया था। आपातकाल लगने पर कई प्रेसों की बिजली तक काट दी गई थी जिससे देश की वास्तविक स्थिति से लोग अनभिज्ञ रहे। जो संचार माध्यम चल रहे थे वे सरकार की ही भाषा बोल रहे थे। पूरा का पूरा समय उसी प्रकार का हो गया था जैसे आजादी के पूर्व। इतिहास जरूर बदला था किन्तु जनता की नियति में कोई बदलाव नहीं हुआ था।“इतिहास की विपत्तियाँ इसी तरह टलती होंगी-थोड़ा सा रोने में, चुप्पी के अन्तरालों में, रात की नींद और दूसरी सुबह की प्रतीक्षा में.......जब उन्होंने सिर उठाया, तो पता नहीं, बींच में कितने युग बीत गये थे।”28 

युग परिवर्तन के साथ ही समाज भी बदलता जाता है। किन्तु सत्ता की निरंकुशता, उसकी क्रूरता प्रत्येक काल चक्र में एक समान रही है। सरकार अपने खिलाफ सच सुनने की आदी नहीं होती; और यदि ऐसा होता है तो उसकी परिणति ‘आपातकाल’ जैसी होती है। भले ही इस क्रूर कालखण्ड में पूरा देश निराशा के अँधेरे में डूबा था किन्तु तत्कालीन सत्ता पूरी तरह उजाले में थी। आकाशवाणी जो कि जनता से सीधे-सीधे जुड़ा माध्यम था; उसने भी वही दिखाया जो सत्ता ने चाहा। मिलाजुलाकर आकाशवाणी से चेहरे बदलते थे; पर भाषा सिर्फ एक थी ‘उजाले’ की भाषा – “रोशनी का चकत्ता सिर्फ टेलीविजन पर जमा था, बाकी लोगों का चेहरा अँधेरे में डूबा था।”29 

दरअसल राजनीति के इस ‘स्याह’ चेहरे ने ‘लोक’ समाज का सुचारू रूप से संचालन करना था किन्तु वह पूरी तरह निरंकुशता में बदल गई। इसके कारण की तलाश करते हुए रघुवीर सहाय लिखते हैं-“तानाशाही हमारे देश में किसी व्यक्ति के चरित्र कौटिल्य के कारण नहीं राजनीति को निरंतर जनविरोधी बनाये जाने के कारण आयी थी।”30 यह सत्य है कि समाज संचालन की विभिन्न व्यवस्थाओं से होकर हम लोकतंत्र तक आये थे; इसमें जन भागीदारी सबसे अधिक थी। किन्तु जन का सरकार का रिश्ता सिर्फ वोट देने तक ही रह गया था। इसीलिए आपातकाल की तुलना निर्मल वर्मा लंदन के युद्ध से करते हुए लिखते हैं- “हर रोज लंदन पर बम गिरा करते थे और वे दिन रात मकानों को जलते हुए देखा करते थे...... उनके लिए दिल्ली के ये दिन लन्दन के उन वर्षों से कम बदतर नहीं थे।”31 

उपर्युक्त पंक्तियाँ आपातकाल की पूरी विभीषिका को समझने के लिए पर्याप्त है। निर्मल वर्मा बड़े कथाकार हैं और उनका कद उपन्यास में साफ तौर पर दिखता है। डर का ऐसा माहौल उन्होंने दिखाया है कि उपन्यास अज्ञेय एवं जैनेन्द्र की परम्परा में खड़ा दिखाई देता है। इस सब के बीच उनका संदेश भी साफ है कि राजनीति आम जन की समस्याओं का हल नहीं है; सरकारें भले बदल जाये पर नीतियां, कानून वहीं रहेगे। आमजन सत्ता के लिए बहुत ही अवांछनीय थे- “साइकिल चलाता हुआ कोई क्लर्क, रेंगता हुआ ठेला, रिरियाता हुआ कोई भिखारी। इससे पहले कि आँख उन तक पहुँचे, वे अन्तर्धान हो जाते थे, कोई गली उन्हें निगल लेती........और सड़क पहले सी सुनसान और निस्पन्द पड़ी रहती, जैसे वहाँ किसी तरह की घटना या दुर्घटना होना असम्भव हो.................।”32 

तत्कालीन समय में जो भी ‘आम’था वह आपातकाल का विक्टिम था। इसीलिए आपातकाल काल पर लिखे गये ज्यादातर उपन्यासों में आम आदमी की आस्था राजनीति से टूटती दिखाई पड़ती है। लगभग सारे उपन्यासों का एक संदेश साफ है कि अब जनता को खुद ही प्रयास करने होगे। राजनीति से किसी प्रकार के सभ्य आचारण की उम्मीद नहीं की जा सकती है। सत्ता की नजर में जनता सिर्फ चुनाव जीतने का माध्यम थी उससे आगे कुछ नहीं। ‘आपातकाल में गुप्त क्रान्ति’ नामक पुस्तक में दीनानाथ मिश्र इस आशय का समर्थन कुछ यूँ करते हैं- “जब तक लोकतन्त्र श्रीमती इन्दिरा गाँधी को गद्दी पर बनाये रख गया, तब तक श्रीमती गाँधी ने लोकतन्त्र को बनाये रखा। जिस दिन लोकतन्त्र उन्हें प्रधानमंत्री बनाये रखने में नाकामयाब होने लगा, श्रीमती गाँधी ने लोकतंत्र को नाकामयाब कर दिया।”33 

दरअसल यह लोकतंत्र के साथ मजाक भर नहीं था बल्कि उस जनता के साथ छलावा भी था जिसने आजाद भारत; में कई आजाद सपने पाल रखे थे। लोकतंत्र के जो सपने और आदर्श महात्मा गाँधी ने देखे थे वे किनारे दबे पड़े थे। राजनीति से गाँधीवाद के पतन, उसके अधिनायकत्व तक पहुँचने और आपातकाल लगने को समूची घटना को उपन्यास रूप में हिमांशु जोशी ने ‘समय साक्षी है’नाम से लिखा है। 1977 में प्रकाशित यह उपन्यास अपने कथ्य से आपातकाल पर लिखा गया एक संपूर्ण उपन्यास प्रतीत होता है। तत्कालीन समय में गाँधीवाद का किस हद तक अप्रासंगिक हो गया इसकी पुष्टि करते हुए लेखक ने लिखा है- “ठीक सामने गाँधी जी का रंगीन चित्र लटक रहा था। कुछ दिन पहले यह चित्र उन्होंने हटवा दिया था, पता नहीं घर के किस सदस्य ने वह फ़िर वहाँ टांग दिया था।”34 

दरअसल यह चित्र भर नहीं हटाया गया बल्कि उसके द्वारा उनके मूल्यों और आदर्शों को भी परे ढ़केल दिया गया। इन आदर्शों की बदौलत ही 1947 में देश को अंग्रेजों से आजाद कराया जा सका था। इस स्वतंत्रता संग्राम में आम जन की हिस्सेदारी बढ़-चढ़ कर थी; यही वजह थी कि लोगों की आत्मा में गाँधीवाद के मूल्य बैठ गये थे। जैसा कि उपन्यास ने साक्ष्य प्रस्तुत किया है- “गाँधी जी के विषय में उसने पढ़ा था। नेहरू जी की महानता के विषय में भी उसने कम सुना था। इन सबसे उसके मन में खादी के कपड़े पहनने वालों के लिए विशेष सम्मान ही नही, श्रद्धा भी थी। इसलिए अपने कमरे में ले जाकर तिमिरवरन ने जब उसे बैठने का आदेश दिया, तब वह उनके चरणों के पास कालीन पर सिकुड़कर बैठ गई थी।”35 

खादी के प्रति जनता की इस आस्था का ही परिणाम था कि आपातकाल के क्रूर एवं अमानवीय अत्याचार के बावजूद जनता ने किसी भी तरह का हिंसक- अहिंसक आंदोलन सरकार के प्रति नहीं किया। उपन्यास ने यह दिखाया है कि आजादी के बाद के 25 वर्षों में सरकार से जनता का मोह भंग हो गया था। आपातकाल अचानक नहीं लगा था; बल्कि इसके लक्षण समाजवाद के नाम पर शुरू हुई ‘अवसरवादी राजनीति’ से ही दिखने लगे थे। “बहुतों के द्वार से गरीबी नंगे पाँव, बेसुध भाग रही थी। बहुतों को भीख मांगने के लिए सड़कों पर बड़ी बेरहमी से छोड़ा जा रहा था। कुछ लोग पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस रहे थे और कुछ को अथाह जल में डूब मरने के लिए धकेला जा रहा था।”36 

ये सारी कवायद उस दौर की है जब जनता भुखमरी का शिकार थी। अकाल के हालात पूरे देश में फैले थे; किन्तु इस सबके साथ-साथ जमाखोरी, कालाबाजारी, महँगाई भी अपने चरम पर थीं। हर तरफ से प्राकृतिक आपदा से जूझ रही जनता के लिए सरकार के पास किसी ठोस योजना का अभाव था। जैसा कि इन पंक्तियों में लेखक का प्रस्ताव है- “गाँव के गाँव बह गये थे। सैकड़ों आदमियों के शव अब तक न मिल पाए थे। अनाश्रितों के लिए पूरे कैम्प भी बन न पाए थे। कितने लोग शीत लहर के कारण ठन्ढ से ठिठुर-ठिठुरकर मर गए थे। दवाएं नहीं थी। भोजन नहीं था। सरकार की ओर से जो कम्बल मुफ्त में बांटने के लिए भेजे गये थे, वे मंडियों में खुलेआम बिक रहे थे।”37 

भूखे, बेरोजगार, निराश्रित लोगों पर सहानुभूति की बजाय उनसे अमानवीय व्यवहार किया गया और बलपूर्वक नसबंदी जैसा असंवेदशील कार्यक्रम चलाया गया। ये तमाम कारण थे जिससे जनता जे.पी. द्वारा चलाये जा रहे, आंदोलन के प्रति समर्पित हो गयी। उपन्यास में आपातकाल के दमन चक्र के समानांतर जे.पी. आंदोलन की पूरी कहानी है। यद्यपि हम लोकतांत्रिक हो गये थे किन्तु उपन्यास की कथाभूमि में यह दिखाने का प्रयास है कि लोकतंत्र किसी लाशकी रूह की भाँति इधर-उधर भटक रहा है। इस भटकाव का कारण है-सत्ता एवं उसका विपक्ष। लोकतंत्र जिसका आषय था जनता का तंत्र, इसने आम आदमी को चुनने की आजादी दे दी थी; किन्तु वह सिर्फ कागजी थी। यथास्थिति इससे बहुत अलग थी। रघुवीर सहाय ने इस पूरी व्यवस्था को शिनाख्त इन शब्दों में की है- “खबर यह है कि पैदल आदमी की जान का महत्व नहीं रह गया है; वह असल में इसी योग्य है कि भीड़ में कुचलकर मरे, यह बर्बर विचार उस सभ्यता का मूल स्वर है, जो हम बना रहे हैं। इस सभ्यता में पैदल आदमियों के संगठित समूह की कल्पना नहीं, भीड़ की कल्पना है।”38

स्पष्ट है कि मौजूदा राजनीति का जोर लोकतंत्र की बजाय भीड़तंत्र को बनाने का है। राजनीति का सच 1947 तक चमकदार था’ जो 1975 तक धुंधला पड़ गया था। मुद्राराक्षस ने ‘शांतिभंग’ उपन्यास में आपातकाल के मूल उद्देश्यों के साथ-साथ राजनीति के अवसरवादिता एवं संजय गाँधी की महत्वाकाँक्षा पर फोकस किया गया है। नेता जिनका जेल जाने का रास्ता अब संसद में पहुंचने की ‘गारंटी’ बन गया था वहीं इसके प्रति समर्पित लोग उपेक्षा का शिकार थे। उपन्यास के पात्र मुंशी जी ऐसे ही विरले लोगों का एक उदाहरण हैं। “बयालीस से सैंतालिस तक कितनी ही बार जेल जा चुके थे, लेकिन यह सिलसिला जहाँ सैंतालिस के बाद कुछ लोगों के लिए विधानसभा और संसद में पहुँचने की प्रक्रिया में बदल गया वहाँ मुंशी जी सैंतालीस के बाद जेल जाते रहे। कभी किसानों को लेकर, कभी मजदूरों को लेकर और कभी घर बाजार में बिखरी जिन्दगी की किसी दूसरी समस्या को लेकर।”’39 

आशय यह है कि अब नेता सांसद या विधायक बन कर अपने फायदे की रोटियां सेकते हैं। जनता एवं उसकी समस्याओं से उनका कोई सरोकार नहीं रहा अब राजनीति एक ऐसा उद्योग था, जिसमें पूंजी सिर्फ एक बार लगानी थी; जबकि इसका मुनाफा बढ़ता ही जाता था। नये-नये राजनीतिक दलों का उपजना इस उद्योग के विभिन्न कारखानों की भाँति था। इसीलिए शांतिभंग उपन्यास में लेखक एक जगह कहता है कि- “उन लोगों ने राजनीति को अच्छे खासे व्यापार की तरह करना शुरू कर दिया था।”40 यह राजनीति का नया चेहरा था जिससे राजनीति में पूँजीपतियों का प्रवेश आरम्भ हुआ। 



शांतिभग उपन्यास का ट्रीटमेन्ट वैसा ही है; जैसा कि ‘कटरा बी आर्जू’ का है। आपातकाल की शुरूआत हुई थी जनता की समस्याओं के त्वरित उपचार के रूप में पर उसकी परिणति हुई भीषण अत्याचार, आतंक और क्रूरता के रूप में। आपातकाल ऐसी दवा थी जिसने मर्ज को ठीक करने की बजाये रोगी का ही नाश कर दिया। पत्रकार बबन प्रसाद मिश्र अपनी पुस्तक ‘मैं और मेरी पत्रकारिता’ में लिखते हैं- “मानवीय प्रताड़ना और मानवीय सभ्यता के अपमान का आपातकाल का वह दौर इतना क्रूर और निरंकुश था कि मानवीय संवेदनाओं तक का हनन शुरू कर दिया गया था।”41 

मानवीय संवेदना, क्रूरता में बदल गई थी; और इसका परिणाम यह था कि आम आदमी पर पूरी बेदर्दी से अत्याचार किये गये। इस समूची व्यवस्था का शिकार आम आदमी थे जिनमें-मुंशीजी, श्यामलाल, बालकृष्ण दुर्गा जैसे लोग थे। ये सभी वे आम आदमी थे जिन्होंने आपातकाल लगने पर खुशी मनाई थी। प्रश्न यह उठता है कि ऐसी क्या मजबूरी थी कि इन सबको बर्बरता झेलनी पड़ी? पुलिसिया कहर का वीभत्स वर्णन करते हुए मुद्राराक्षस ने लिखा है- “डंडा तुरंत लाया गया। लेकिन उसका उपयोग बहुत अभिनव हुआ। वह नहीं हुआ जिसकी सिपाहियों ने कल्पना की थी। उसे दोनों तरफ से दो सिपाहियों ने उसकी गरदन के पास पूरे जोर से दबाकर पकड़ा और बेलन की तरह लुढ़काकर पैर की तरफ ले चले। जाँघो तक आते-आते घटी चीख फट पड़ी।”42 

इस सब अत्याचारों के पीछे इन्दिरा गाँधी से ज्यादा संजय गाँधी और उनकी चापलूसी करने वाले लोग थे। बड़ी ही फूहड़ और अलोकतांत्रिक योजनाएं बनाकर उसे जनता पर जबरन लादा गया। संजय गाँधी का हस्तक्षेप प्रशासन में जरूरत से ज्यादा बढ़ गया। उनकी बढ़ती महत्वाकाँक्षा और अवसरवादी नेताओं की जी हुजूरी ने स्थिति को विस्फोटक बना दिया। विपन चन्द्र ने इस समूची घटना जिक्र कुछ यूं किया है- “इस प्रकार श्रीमती गाँधी उन्ही शक्तियों का शिकार बन गई जिन्हें उन्होंने स्वयं छुट्टा छोड़ा था।”43

संजय गाँधी के बढ़ते प्रभाव के कारण लोग उन्हें श्रीमती गाँधी का उत्तराधिकारी मानने लगे। उनके प्रति अपनी आस्था प्रकट करने के लिए अफसर, नेता, प्रशासन एवं व्यापारियों ने देश के उद्धार के नाम पर अमानवीय योजनाओं का अमानवीय तरीके से क्रियान्वयन किया। फील गुड के प्रयास बुरी तरह नाकामयाब हो गये। उपन्यास में मास्टर नंदकिशोर को नौकरी से सिर्फ इसलिए निकाल दिया गया क्योंकि वे अपनी नसबंदी का प्रमाण पत्र (झूठा ही सही) प्रस्तुत न कर सके। पत्रकार इंदर मल्होत्रा ने इंदिरा गाँधी का मूल्यांकन करते हुए लिखा है- “संजय गाँधी का सबसे पसंदीदा कार्यक्रम जनसंख्या नियंत्रण था। झुग्गी-झोपड़ी उजाड़ो और उससे जुड़े शहरी ‘सौन्दर्यीकरण’ अभियान दोनों को साथ मिलाकर देखे तो संजय का यही पसंदीदा कार्यक्रम उनकी माता के राजनीतिक विनाश का सबसे बड़ा, महत्वपूर्ण कारक साबित हुआ।”44 

वास्तव में यह इंदिरा गाँधी के राजनीतिक विनाश के साथ राजनीति के प्रति आम आदमी की आस्था और उसके विश्वास का खात्मा था। मंजूर एहतेशाम ने ‘पहर ढलते’ नामक उपन्यास आपातकाल पर लिखा। इसमें 1976 की एक सर्द रात की कथा है; जिसके बीच-बीच में इमरजेंसी की गर्माहट भी है। इस उपन्यास का सच यह है कि आपातकाल भी गरीबों के लिए ही था। चूँकि बड़े लोग सत्ता में हिस्सेदारी रखते थे अतः उनके लिए इसका कोई मतलब नहीं था। रात का जश्न अपने जोरों पर था जबकि शहर के हालात अन्धेरे में अन्धेरे धब्बे कि तरह थे - “तालाब के दूसरे किनारे पहाड़ पर बने मकानों की रोशनियाँ भी नजर नहीं आई थीं। धीरे-धीरे कोहरा गहरा होता जाएगा और हो सकता है कल सुबह दस बजे तक सूरज के दीदार न हो सकें। शहर के मौसम भी हालात की तरह बेतुके होकर गए हैं।”45 

तालाब के दो किनारों पर आपातकाल अलग-अलग था। एक किनारा इसका बुरी तरक शिकार था, तो दूसरे पर इसका कोई प्रभाव नहीं था। कानून भी शायद यह पहचानता था इसीलिए उसका व्यवहार भी अलग-अलग था। लेखक ने यह प्रश्न निर्भीकता से उठाया है कि अपातकाल क्या सिर्फ गरीब एवं असहाय जनता के लिए था। उच्च वर्ग इससे कहाँ तक प्रभावित था। सारे नियम, कानून आम जनता ने ही तोड़े, सारे भ्रष्टाचार गरीबों ने किये थे। उपन्यास यही प्रश्न उठाता है-“आज के जमाने में बेईमानियाँ कौन नहीं कर रहा? और कानून की सारी सख्तियों और इमर्जेंसी का खौफ अपनी जगह लेकिन उसकी तरह बेईमानी करने वाले कितने लोग आज जेलों में बन्द थे। यह तो एक मौका था कुछ लोगों के लिए मनमानी करने या पुराने बदले निकालने का।”46

दरअसल यही व्यवस्था का सच भी था, जिसमें पिसने के लिए आम आदमी आज भी अभिशप्त है। आजादी और उसके फलस्वरूप मिलने वाली बेहतर जिंदगी सब कुछ एक फैंटेसी की तरह था। यथार्थ बहुत ही क्रूर था जिससे आम आदमी को सामना करना था। इस यथार्थ का सामना करने के बाद लेखक का ‘तब्दीली’ जैसे शब्दों से भरोसा उठ गया है। लेखक ने उपन्यास के माध्यम से अपना बयान कुछ यूं दर्ज किया है- “उसे लगा जैसे सब एक फैंटेसी है। एक बेतुका ख्वाब जिसमें बरख्त चीजें, बेमौका टूटती और जुड़ती रहती है। वैसे इन लोगों का करना भी क्या है। लाख लैंड सीलिंग एक्ट्स आ जाएं, लाख तब्दीली के नारे, लेकिन इनके या इनकी औलादों के लिए कुछ कम नहीं पड़नेवाला। यही क्लास है जो हुकूमत करता आया है, लगता है यहीं आगे भी करेगा। हिन्दू मुसलमान की नहीं बात क्लास की थी।”47

एक बिडम्बना ही है कि एक ओर पूरा देश आपातकाल के अँधेरे में डूबा है, वहीं दूसरी ओर जश्न का माहौल है। यह पूँजीपतियों के चरित्र को उजागर करता है। उपन्यास में आपातकाल बहुत शोर के साथ नहीं है। सूक्ष्म रूप से उसकी कालिमा पूरे उपन्यास में फैली है। कम बातें कहकर भी लेखक ने उसकी पूरी पृष्ठभूमि बयां की है।

आपातकाल की भूमि पर सच्चिदानंद चतुर्वेदी का ताजातरीन उपन्यास ‘अधबुनी रस्सी: एक परिकथा” 2009 में प्रकाशित हुआ है। अपने कथ्य-शिल्प एवं परिवेश की वजह से यह उपन्यास मैला आँचल एवं राग दरबारी की श्रेणी में मजबूती से खड़ा नजर आता है। आपातकाल के पूरे क्रूर इतिहास को उपन्यास ने एक पंक्ति में व्यक्त करते हुए लिखा है- “आपातकाल में आदमी और कुत्ते में कोई अन्तर भी न रह गया था।”48

उल्लेखनीय है कि समूचा उपन्यास डमरूआ के गाँव की कथा है, जहाँ मनुष्य की जिन्दगी आभाव एवं लाचारी में पिसकर जानवरों जैसी हो गयी थी। आपातकाल पर यद्यपि बहुत से उपन्यास लिखे गये किन्तु यह पहला उपन्यास था, जिसने अंचल में फैले उस गाँव पर अपातालकाल का सच जाना यहाँ लोग इसका नाम भी बमुश्किल ले पाते थे। गांव के उन सीधे सादे लोगों के लिए इमरजेंसी हॉस्पिटल के उस कमरे की भाँति थी, जहाँ दुर्घटना में घायल लोग आते थे- “उन लोगों ने काशी के मुँह से इमरजेंसी की खबर सुनकर मन में कल्पना कर ली थी कि लगता है किसी कारणवश अपना देश भी मरणासन्न अवस्था में है इसलिए दुर्घटना में घायल रोगी की भाँति उसे इमरजेंसी में भर्ती कर दिया है जिन लोगों ने हैलट अस्पताल वाला ‘इमर्जेंसी ’ का कमरा नहीं देखा था उनके पास कल्पना के लिए कोई ठोस आधार न था, बस इतना ही कि अपने देश में कोई बहुत ही खतरनाक चीज लागू कर दी गई है जिसमें केवल सज्जन व्यक्तियों को गिरफ्तार किया जाता है।”45

कहा जाता है कि भारत की आत्मा गॉंवों में बसती है। इस समय की भयावहता ने उनकी आत्मा को झकझोर डाला था। गाँव की बेबस मासूम जनता के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। बहुत से गॉंव ऐसे थे जिन पर सत्ता के आदेश पर अत्याचार किये गये किन्तु उनका कोई व्यौरा दर्ज नहीं किया था। अपना प्रभुत्व सबसे निचले तबके तक बनाये रखने के लिए तथा आपातकाल का खौफ बनाने के लिए निरपराध एवं मासूमों को टार्गेट किया गया। और इन्हें झूठे केसों में गिरफ्तार कर लिया गया। “ऊपर से साफ-साफ आदेश आया कि इमरजेंसी में हुई गिरफ्तारियाँ रोजनामचें में न दिखाई जाएँ। यदि किसी का नाम रोजनामचे में दिखाना ही है तो केवल चोरी-डकैती में। चोरी-डकैतियों हमेशा होती रहती हैं इमरजेंसी लगी हो या न लगी हो।”50

वाल्टर बेंजामिन ने कहा है कि कुछ लोगों के लिए हमेशा आपातकाल रहता है। कौतूहल इस बात का है कि आपातकाल में आतंरिक सुरक्षा को खतरा बताया गया था, जबकि जो लोग जेल के पीछे जा रहे थे वो कौन लोग थे? क्या उनसे देश में अशांति फैल सकती थी। या आपातकाल की ज्यादातर गिरफ्तारियां सिर्फ मौका भुनाने की कोशिश भर थी। अपने हितों को साधने के लिए थे गिरफ्तारियाँ कराई गई थी। जिन अपराधों में लोग गिरफ्तार किए गये, वे उनका तो पहले भी देश में बोलबाला था। जरूरत थी इन अपराधों पर रोक लगाने की,। हुआ इसका उलटा सरकार ने पीडि़त व्यक्तियों को ही गिरफ्तार कर अराजकता का परिचय दिया। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे सरकार ने समय को ही अपनी मुटठी में कैद कर लिया हो।“मेरा तेरा, इस देश का, सबका समय इमरजेंसी लगने के साथ ही जहाँ का तहाँ रुक गया है। घंटे-घंटे पर बजने वाला यह घंटा केवल समय की रश्म आदायगी है। हम लोग सही सलामत थाने से बाहर आ गए और देश से इमरजेंसी उठ गई तो अपने और अपने देश के समय को धो माँज कर नए सिरे से शुरू करेंगे।”51

समय के रोकने की इस कोशिश में अव्यवस्था फैल गई थी। इसी के गर्भ से अवसरवादी राजनीति ने भी पंख फैलाये। राजनीति जो कभी आस्था और देश सेवा का प्रतीक थी, आज वही केवल प्रभुता तक सीमित थी। देश सेवा समाज सेवा जैसे मूल्यों को सबने घर की पिछली कोठरी में जकड़ रखा था।अमृता प्रीतम ने अपनी कहानी ‘एक दुखान्त” मे लिखा है-“राजनीति घर के पीछे की ओर रात को खुली रह गई खिड़की की तरह थी”।* उपन्यास ने राजनीति के दोगले चरित्र पर बड़ी कठोर टिप्पणी करते हुए लिखा है- ‘‘यह राजनीति भी बड़ी रंडी चीज होती है। इसमें फँसे व्यक्ति को केवल अपने प्रभुत्व की ही चिन्ता रह जाती है। मैने अपने विद्यार्थी जीवन काल में औरगजेब के बारे में पढ़ा था कि उसने सिंहासन के लिए अपने ही भाईयों का कत्ल कर दिया था। मुझे तो लगता है, लगता ही नहीं, यही सच है कि इस देश का हर नेता एक औरंगजेब है।”52

नेताओं के इस चरित्र ने ही लोकतंत्र की चमक को फीका कर दिया। उपन्यासकार बड़े इत्मिनान से एक-एक पक्ष को गढ़ता गया है गाँवों की सादगी, सद्भाव एवं सज्जनता के बरक्स मक्कारी, लंपटता एवं क्रूरता के चित्र खींचे गये है। एक ओर पेट की मार थी तो दूसरों ओर प्रकृति वहीं यह तीसरी मार राजनीति की थी जो मार कर रोने भी न दे रहे, थी इस तिहरे संकट की ओर इशारा करते हुए बाबा नागार्जुन लिखते हैं-

“जी हाँ आप तिहरे संकट की गिरफ्त में हो .........

जी हाँ, बुरा न मानना साहब

न .. श्रीमान बुरा नहीं मान जाना

हमें तो यही लगता है हुजूर

कि हाँ, आप तिहरे संकट की गिरफ्त में हो।”53

संकट जनता का था पर शासक उसे अपना संकट बना लेते हैं क्योंकि उन्हें जनता एक भीड़ नजर आती है। सदियो से चली आ रही गुलामी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है। उनके दिमाग में यह भर दिया गया है कि वे सिर्फ भेड़-बकरी है। इसीलिए राजनीतिक कौवे इस आम जनता को अपने पीछे-पीछे देखना पंसद करते हैं। जहाँ भी यह रवायत टूटती नजर आती है, फंदा जरा सा और कस दिया जाता है। भले ही कुछ लोग इसे अत्याचार कहते हों। “निश्चिन्त रहिए लालाजी! कुछ नहीं होगा। एक भेड़ के पीछे दूसरी भेड़ चलेगी यह भारत है, यहाँ की सन्तानें पुरखों की लीक सहजता से नहीं छोड़ती उसी पर चलने में गर्व का अनुभव करती है।”55

आजादी के बाद के पच्चीस वर्षो में राजनीति की यही रीति रही है। इसलिए जनता का भरोसा धीरे-धीरे इससे उठने लगा था। पूरा समय ऊब एवं निराशा से भर गया था। लोगों के भरोसे इंतजार के बेहद निर्भम क्षणों से टकराकर टूटने लगे थे। इसीलिए पंडिताइन चाची शंकर से कहती है-“शंकर बेटा! हवा में बेकार फड़फड़ाते झंड़ो ने अभी तक यदि एक-एक घर का, एक-एक फटा भी ढका होता, शायद दुनिया में अब तक एक भी फटा न रह गया होता।”55

राजनीति पर व्यंग्यात्मक लहजे की ये पंक्तियाँ उसके पच्चीस वर्षो के विकास पर करारा तमाचा मारती हुई लगती है। उपन्यास ने उन लोगों के मर्म को समझा जिन्होंने आजादी का संघर्ष देखा था, उसमें सहभागिता की थी। उस लड़ाई में अपना बहुत कुछ न्यौछावर करके भी आज़ादी को चाहा। परन्तु आजादी का यह पारितोषक उनके लिए बाहरी वेदना लेकर आया। अब यह महसूस होने लगा था कि आजाद होने से बेहतर था परतंत्र रहना। सच्चे अर्थों में लेखक ने इनकी पीड़ा एवं द्वन्द्व को पहचाना है उसे स्वीकारा है। स्वीकार का साहस ही लेखकीय ईमानदारी एवं उसकी सफलता का सबसे बड़ा सबूत है। जैसा कि कैथरीन मेन्सफील्ड ने अपना डायरी में लिखा है-“मैं मरने से पहले यह दर्ज कर देना चाहती हूँ। प्रश्न उस पीड़ा के परे जाने का नहीं है, हमें उसे स्वीकार करना होगा उसे अपनी जिन्दगी का हिस्सा बनाना होगा।”56

इसी पीड़ा को समय-समय पर साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों ने महसूस किया है और उसे शब्द प्रदान किये है। ऐसे ही एक लेखक रवीन्द्र वर्मा ने आपातकाल को आधार बनाकर ‘जवाहरनगर’ नामक उपन्यास लिखा। यह उपन्यास आगरा की एक बस्ती जवाहनगर की कहानी बयान करता है। यद्यपि उपन्यास का वहीं समय है जिस समय देश इमरजेंसी से जूझ रहा था। कुछ प्रसंग के माध्यम से आपातकाल की ओर इशारा अवश्य रहा किन्तु सीधे-सीधे आपातकाल की मौजदूगी उपन्यास में नहीं है। उपन्यास आपातकाल की सूचना किसी बड़ी घटना को न गढकर सीधे-सीधे यू देता है- “अब सैर का वक्त नहीं रहा। घर में घुसकर सो जाओ।”57

घर में सोने की बात कहकर पुलिसवाला इशारा करता है कि समय अब कैद हो गया है। उपन्यास में सीधे-सीधे आपातकाल की घटनाएं न देकर लेखक घटनाओं को आपातकाल से जोड़ता है, और यही वजह रही कि कई जगह पर उसने तारीख और वर्ष प्रस्तुत किया। समय की भयावहता लगातार उपन्यास में महसूस हुई है। उपन्यास की यह पंक्ति उसे पूरे वातावरण का सच है जो आपातकाल ने बना रखा था- “लोगों ने वक्त को अन्दर से खींचकर कलाई पर बॉध लिया है। वक्त की अब सिर्फ नुमाइश है।; वक्त नहीं है।”59

यह सच है कि वक्त के साथ लोकतंत्र को भी बाँधने को कोशिश की गई थी। यही वजह थी कि इलाहबाद हाइकोर्ट का निर्णय मानने की बजाय प्रधानमंत्री ने असंवैधानिक रूप से आपातकाल को लागू करवाया। देश की जनता जिसने पंचवर्षीय योजना से अपने विकास के रास्ते देखे थे। उसे आपातकाल का दंश झेलना पड़ा। अगर आजादी से 25 वर्षो का ब्यौरा देखे तो जनता के लिए सरकार की ओर से दिया गया सबसे बड़ा तोहफा आपातकाल था। प्रधानमंत्री का भय इस कदर बैठा था कि लोगों ने ठाकुर जी के साथ इन्दिरा गाँधी की तस्वीरे लटका दी थी- “ठाकुरजी के दीवार पर जड़े सिंहासन के दाई ओर की खाली जगह में भी इंदिरा गाँधी की मुस्कराती तसवीर लगी थी, जिसमें उनके काले बालों में सफेद लट मुस्करा रही थी। यह तसवीर सिंहासन के बाई ओर पहले से लगी थी। अब दाई ओर भी यही तसवीर आ गई थी। ठाकुरजी का सिंहासन दोनों ओर इंदिरा गांधी से घिरा था।”59

सच यह था कि इंदिरा गांधी अपने को ईश्वर के समकक्ष मानने लगी थी। इसीलिए उनका हर फरमान मानना जरूरी थी। इसी सनक का नतीजा था कि उनके द्वारा गैरजरूरी योजनाएं बीस सूत्रीय कार्यक्रम के रूप में शुरू की गई। ऐसी ही एक अव्यवस्थित योजना ‘परिवार नियोजन कार्यक्रम’ के रूप में था। अमानवीय तरीके से आम आदमी की नसबंदी की गई, यह सोचना भी मुनासिब नहीं समझा गया कि पीडि़त व्यक्ति पात्र है या नहीं? सरकारी दफ्तरों में जनकल्याण के कार्य बन्द करके नसबंदी के लक्ष्य पूरा करने के लिए योजनाएं बनती रही। उपन्यास ने इस घटना पर अपना हस्तक्षेप कुछ इस तरह प्रस्तुत किया है- “इन्ही किस्सों में किस्सा नसबन्दी का था, जो सरकारी दफ्तर में सबसे बड़ा काम हो गया था।.......... जिस तरह भाखड़ा नंगल के बिना पंजाब पंजाब न होता, उसी तरह नसबन्दी के बिना भारत, भारत नहीं होगा। रेवा ने यह भी बताया कि जिस तरह भाखड़ा नगंल के सरकारी लक्ष्य थे, नसबन्दी के सरकारी लक्ष्य होगें।”60

इस लक्ष्य का परिणाम था कि लोगों को पकड़कर, मारकर, डराकर उनकी नसबंदी कर दी गई। इस समूचे समय की विभीषिका ने पूरे देश को हतोत्साहित कर दिया। राजनीतिक के इस चेहरे ने देष को अधेंरे में भर दिया। प्रधानमंत्री के चाटुकारों ने उन्हें बढ़ा चढ़ाकर आँकड़े प्रस्तुत किया जिससे वो निरन्तर सच से दूर होती रही। उनकी सच से दूरी जितनी बढ़ी जनता के इर्द गिर्द अंधेरा उतना ही सघन होता गया। इन्हीं चाटुकारों की तुलना कौवे से करता हुआ उपन्यास अपना बयान देता है कि –“कौवे शहर का भूगोल बदल सकते है”।अमर ने कहा –“यदि वे सिर्फ शहर पर छा जाएँ। वे सूरज को अपने पंखों पर रोक लेंगे और दिन में रात हो जाएगी।”61

सूरज को रोककर उसे काला करने की असफल कोशिश आपातकाल की घटना थी। 19 महीने के क्रूर अंधेरे के बाद लोकतंत्र का सूरज फिर से चमकने लगा और इसने सारे अंधेरे को अपनी उजली किरणों में जब्त कर लिया। आपातकाल पर मनोहरपुरी ने 2014 में आपातनामा उपन्यास लिखा। आपताकाल के हर तिलस्म को रेखांकित करता यह उपन्यास प्रशंसनीय है। आपातकाल के जितने पक्ष थे उन सभी का जिक्र उपन्यास में बड़े इत्मीनान से हुआ है। उपन्यास का सबसे महत्वूपर्ण पक्ष जेल में बंद कैदियों पर फोकस करना है। जेल में दी जाने वाली अमानवीय यातना पर इसमें विचार हुआ है। जेल की यातना बयान करती ये पंक्तिया मौजू हैं- “किसी भी प्रकार के साधारण-से- साधारण विरोध का दंड ‘पगली घंटी’ बजाकर दिया जाता है। पगली घंटी बजते ही सारा जेल प्रशासन फौज की तरह चाक चैबंद हो जाता है और उस व्यक्ति पर पिल पड़ता है जिसने भी प्रशासन की किसी भी मामूली से मामूली कड़ी की शान में गुस्ताखी की हो।”62

जेल में आम आदमी के साथ यह सुलूक तानाशाही की पराकाष्ठा ही थी। सत्ता की प्रवृत्ति तानाशाही में क्यों बदल गई यह कौतूहल का विषय रहा है। लेखक के मन में ये प्रश्न अवश्य रहे होंगे। यही वजह है कि उसने अपने तरीके से इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास किया। न्याय एवं पत्रकारिता के सजग पहरियों की स्वार्थपरता इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार रही है। लेखक अपनी कलम से इसे लिखता है- “देश में तानाशाही प्रवृत्तियों ने जो जड़े जमाई है उसके लिए यदि कोई वर्ग सबसे अधिक दोषी है तो वह वर्ग है पत्रकारों एवं वकीलों का, किसी भी देश में यही दो वर्ग होते है जो स्वतंत्र रूप में किसी आंदोलन का नेतृत्व करते है और यहाँ जब इन्होंने ही घुटने टेक दिये तो क्या नौकरशाही से यह अपेक्षा की जाए कि वह उठ खड़ी होगी। नौकरशाही का तो सीधा-सादा स्वार्थ जुड़ा है तानाशाही से।”63

यह रोचक बात है कि तानाशाही को पोषित करने वाले पत्रकार एवं वकीलों पर ही इसने प्रथम आघात भी किया। न्यायपालिका का आदेश मानने से माननीय प्रधानमंत्री ने इन्कार कर दिया और प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी। यद्यपि सेंसरषिप लागू कर दी गई किन्तु आपातकाल की गुप्त क्रांति ने काफी हद तक पत्रकारिता को जीवित रखा। जोखिम के बावजूद विभिन्न माध्यमों से खबरे यहाँ से वहाँ भेजी जाती रही। आपातकाल की इस गुप्त पत्रकारिता ने चौथे स्तम्भ को जीवित रखा। उपन्यास ने इस ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए लिखा है। “कभी-कभी वह भी अनेक सूचनाओं के आधार पर मुझसे विशेष प्रकार की सामग्री लिखवाता। वह सामग्री कहाँ जाकर छपती इसका मुझे ज्ञान नहीं था न ही कभी मैंने यह सब जानने की कोशिष की थी।......... पागलों की तरह हम इस कार्य में जुट गये थे पर हर पग सतर्क एवं चौकन्ने। ”64

गुप्त क्रांन्ति स्वतंत्रता संग्राम के कान्तिकारियों की बरबस याद दिलाती है। समय बदला था प्रतिद्वन्दी बदला था किन्तु अत्याचार और तानाशाही उसी समय के तरह थी। यह सत्य है कि इस क्रांति ने काफी हद तक महत्वपूर्ण सूचनाएँ लोगों तक पहुंचाई सरकार ने प्रचार माध्यमों का अन्धाधुंध प्रयोग किया, किन्तु लोगों तक सच्चाई फिर भी पहुंची तो उसके लिए यही गुप्त आंदोलन जिम्मेदार था।

यद्यपि गुप्त रूप से तथा प्रत्यक्ष रूप से कुछ साहित्यकारों ने आपातकाल का विरोध किया और फलस्वरूप जेल भी गये। समाज को दिशा देने का कार्य साहित्य का होता है, अतः ऐसे क्रूर समय में साहित्य की जिम्मेदारी बढ़ गई थी। जनता के आक्रोश को सही रास्ते पर बढ़ाना; साहित्य को कार्य था। जैसा श्यामसुन्दर व्यास ने लिखा है- “निरा आक्रोश मात्र नारा होता है और साहित्य नारा नहीं साधना है। साधना सूझ -बूझ को दिशा देती है।”65

किन्तु साहित्यकारों की साधना टूटती नजर आई थी। साहित्य में ऐसा सन्नाटा पहले कभी नहीं था। उनकी यह चुप्पी अखरने वाली थी। यही वजह थी कि उपन्यास में लेखक ने साहित्यिक बिरादरी को आड़े हाँथो लेते हुए लिखा है- “हमारे बुद्विजीवी वर्ग का हाल यही है। किसी काफी हाउस या कमरे में बैठकर देश की समस्याओं पर चिंता व्यक्त करते हुए लंबी-लंबी बहसे करेंगे। कभी न अमल में लाये जाने वाले निर्णय करेंगे और फिर उठकर चल देंगे कही उसी सुविधा की तलाश में जिसकी निंदा अभी-अभी करके आए होंगें।”66

इस सुविधाभोगी प्रवृत्ति ने बुद्विजीवी वर्ग को आपाकाल के पक्ष में खड़ा कर दिया। साहित्य के सामाजिक सारोकार के बदले सत्ता का गुणगान करना, ज्यादा रुचिकर लगा। यद्यपि कुछ साहित्यकार ऐसे थे जिन्होंने अपनी आत्मा को जिंदा रखा और इसका पुरजोर विरोध किया। ऐसे ही लोग थे जिनकी लालिमा देखकर लेखक यह लिखने का साहस कर सका-

“मेरे दोस्त

कोहरा कफन नहीं होता है।

सूरज दफन नहीं होता है।”67

सूरज की दीप्ति हमेशा कायम रहती है इसी आशय से राज्यसभा सदस्य रहे श्री गोपाल व्यास ने ‘सत्यमेव जयते’ नामक उपन्यास लिखा। यह उपन्यास भी आपातकाल पर केन्द्रित था। इसमें नेहरू युग से लेकर जनता पार्टी की सरकार बनने तक का जिक्र है। यह उपन्यास जेल में लिखा गया और संभवतः पहला उपन्यास होगा जो किसी आपातकाल बंदी के द्वारा लिखा गया। यही वजह रही की लेखक ने उस पीड़ा को स्वयं महसूस किया। जेल की हालत का लेखा जोखा बयान करते हुए गोपाल व्यास ने लिखा है- “छोटी सी कोठरियों में जिनमें पहले ही उसकी क्षमता से 4-5 गुना अधिक कैदी होते थे, वहीं उन्हें भी ठूंसकर रात भर रखा जाता। शौच, मूत्र की व्यवस्था भी इसी कोठरी में होती, जहाँ सोना तो दूर खड़े रहना भी कठिन था।”68 

चूंकि जेल में रहने के दौरान ही यह उपन्यास लिखा गया अतः यह भी कौतूहल का विषय है, कि इन परिस्थितियों में रहते हुए भी उपन्यास कैसे पूर्ण हुआ होगा। यही एक वजह भी थी कि उपन्यास के सारे पात्रों के नाम बदल दिए गये थे। काल्पनिक नाम होने की वजह से पकड़े जाने पर कोई खतरा नहीं था। शासन ने विपक्ष को सबसे पहले लक्ष्य किया और उनके नेताओं की गिरफ्तारी करा ली। ऐसे ही जनसंघ के साथ हुआ। आंतरिक अशांति के नाम पर सरकार ने जो गिरफ्तारी करवाई वे ज्यादातर एकतरफा और अप्रासंगिक थी। सरकार के द्वारा फर्जी केस में गिरफ्तारी का जिक्र लेखक ने कुछ यूं किया है- “राष्ट्रीय पुनरुत्थान संघ के कार्यालयों से व्यायाम व खेलकूद के साधन जप्त किये जा रहे थे, उन्हें हिंसा के उपकरण बताया गया और रेडियो, टेलीविजन व अखबारों में उन्हें बताया व दिखाया जा रहा था।”69 

यह पूरा भागीरथ प्रयास सिर्फ इसलिए था कि सरकार द्वारा लागू किये गये आपातकाल को जायज ठहराया जा सके। जिस कानून की रक्षार्थ इमरजेंसी की घोषणा हुई थी, उसका सबसे ज्यादा दुरुपयोग ही इस कालखण्ड में किया गया। यद्यपि स्वरूप में यह उपन्यास छोटा है और मात्र 100 पेज में समय की पूरी क्रूरता बयां कर गया है; किन्तु अपने ट्रीटमेंट में यह खासा सफल रहा है। समय के संकट पर आपातकाल का समाधान लेखक के शब्दों में समझें तो सरकार ने जनता से रोने का बुनियादी हक भी छीन लिया था। जबकि रोने का हक तो गरीबों की किस्मत के साथ ही ताउम्र उनके साथ पूरी मुस्तैदी से रहता है। बेखबरी का आलम कुछ यूं था कि लेखन उसके जिक्र का मोह नहीं छोड़ पाया- 

“बचाओ, 

मरा रे, 

क्या कर रहे हो, 

हमने क्या बिगाड़ा है। पर कौन सुनता”70 

न सुनने की इस प्रवृत्ति ने ही देश को अराजकता की आग में झोंक दिया था। इन्दिरा गाँधी जिनके कार्यकाल में ही 1971 का भारत-पाक युद्ध हुआ। इस युद्ध में भारत ने पाक को बुरी तरह पराजित किया था। किन्तु जब हाईकोर्ट ने इनका निर्वाचन ही रदद् कर दिया तो यह बात उन्हें बहुत नागवार गुजरी क्योंकि उन्होंने समझा था कि देश का मान उन्होंने बढ़ाया था। वास्तविकता यह थी कि देश का मान बढ़ाया था भारतीय सेना ने क्योंकि युद्ध उसी ने किया था। जनता भी युद्ध के उत्साह से निकलकर भूख की कुलबुलाहट से गुजर रही थी। भ्रष्टाचार, जमाखोरी, कमीशन, बेरोजगारी ये कुछ ऐसे मुद्दे थे जिनका समाधान युद्ध की वीरता से नहीं बल्कि प्रशासन की सुदृढ़ता से खोजा जाना चाहिए था। 

इसके उलट जब जनता की माँगे और विपक्ष का विरोध बढ़ गया तो सरकार ने प्रतिक्रिया आपातकाल के चाबुक से दी। इस पूरी आग को चिंगारी इलाहाबाद हाइकोर्ट के 12 जून 1975 के निर्णय ने दी। आलोच्य उपन्यासों में आपातकाल के उस सच के मूल्याँकन का प्रयास है जो उस समय जेल में और सरकार के डंडे में छिप गया था। सत्ता की धमक इतनी ज्यादी थी कि लोकतंत्र मलीन होकर रह गया था। अधिनायकवादी सत्ता के स्वरूप को व्यक्त करते हुए रघुवीर सहाय अपनी कविता में कहते हैं- 

“कौन - कौन है वह जन-गण-मन

अधिनायक वह महाबली 

डरा हुआ मन बेमन जिसका 

बाजा रोज बजाता है।”71

उपन्यासों ने जन-गण-मन तीनों की आत्मा बचाने का प्रयास किया। उपन्यास साहित्य की ऐसी विधा है जो मनुष्य के सर्वांगीण जीवन को चित्रित करता है। रैल्फ फाक्स का मानना था कि –“उपन्यासकार अपने देश के वर्तमान तथा अतीत दोनों के प्रति एक विशेष दायित्व होता है।”72 यह दायित्व बोध सच का साहस पैदा करते हैं। आपातकाल ने समाज की चेतना पर भय का पहरा लगा दिया। यह ऐसा समय था जिसके भविष्य में बड़े दूरगामी परिणाम होने थे। उपन्यास अगर इस समय आँख मूद लेता तो समाज रुग्ण हो जाता। 

यद्यपि सत्ता के विरोध के निजी खतरे भी थे चूँकि उपन्यासकार भी समाज का एक अंग है इसलिए उसे इन खतरों से भी जूझना पड़ सकता था। इस प्रवृत्ति ने ही उपन्यास का पलड़ा हमेशा भारी रखा है। सच को आत्मसात करने की इसकी प्रवृत्ति प्रशंसनीय रही है। आपाताकाल की पूरी पृष्ठभूमि इतनी अराजक थी कि ‘लोक’ पूरी तरह से ‘बेचारा’ बन गया। अभिव्यक्ति को कैद करके उसे निरीह बना दिया गया। आपाताकाल में आम आदमी की स्थिति पर चिंतन करते हुए रघुवीर सहाय ने लिखा है- “जून 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के और फिर सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों को इमरजेंसी के बर्बर हथियार से खत्म करते हुए इँदिरा गाँधी ने न्याय की शरण में जाने का अधिकार भी लोक से छीन लिया।”73 







संदर्भ ग्रंथ सूची –





1. संवाद की मर्यादाएं, कला का जोखिम, ले. निर्मल वर्मा, राजकमल प्रकाशन संस्करण 1984, पृ. 48

2. अर्थात, ले. रघुवीर सहाय, राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1994, पृ. 45

3. एक रचना की प्रति रचना, यह पथ बंधु था, नरेश मेहता, आधुनिक हिन्दी उपन्यास, सं. भीष्म साहनी, पृ. 152

4. साहित्य का उद्देश्य, मुंशी प्रेमचन्द, पृ. 24-25

5. उपन्यास के विरुद्ध उपन्यास, परमानन्द श्रीवास्तव, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 2012, पृ. 206

6. संकल्प कविता दशक, केदारनाथ सिंह, हिन्दी अकादमी दिल्ली, संस्करण 1992, पृ. 91

7. कला का जोखिम, राजकमल प्रकाशन संस्करण 1981, पृ. 55-56

8. आपातकाल संघर्षगाथा-प्र.ग. सहस्त्रबुद्धे एवं मणिकचन्द्र वाजपेयी, संस्करण 1990, पृ. 2

9. विरासत, वंदना राग, पक्षधर अंक 1, जन.-जून 2011, सं. विनोद तिवारी, पृ. 108

10. कटरा बी आर्जू, राही मासूम रज़ा, राजकमल प्रकाशन संस्करण 1984, पृ. 35

11. वही, पृ. 154

12. वही, पृ. 248

13. अरुण कमल, आलोचना त्रैमासिक, अंक 38, वर्ष जुलाई-सितम्बर 2010

14. कटरा बी आर्जू, राही मासूम रज़ा, राजकमल प्रकाशन संस्करण 1984, पृ. 221

15. लमही, त्रैमासिक पंत्रिका, सं. ऋत्विक राय, वर्ष 6, अंक 2, अक्टू.-दिस. 2013, पृ. 10

16. प्रजाराम, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र, नेशनल पब्लिसिंग हाऊस, संस्करण 1983, पृ. 30

17. वही, पृ. 66

18. वही, पृ. 104

19. वही, पृ. 11

20. वही, पृ. 75

21. वही, पृ. 159

22. लोकतंत्र के साथ अध्याय, सं. अभय कुमार दुबे, वाणी प्रकाशन, संस्करण 2014, पृ. 63

23. जंगल तंत्रम, श्रवण कुमार गोस्वामी, राजकमल पेपर बैक्स, संस्करण 2012, पृ. 45

24. वही, पृ. 24

25. वही, पृ. 101

26. लिखने का कारण, रघुवीर सहाय, राजपाल एण्ड सन्स, संस्करण 1978, पृ. 176

27. रात का रिपोर्टर, निर्मल वर्मा, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, द्वितीय संस्करण 2010, पृ. 45

28. वही, पृ. 90

29. वही, पृ. 101

30. ऊबे हुए सुखी, रघुवीर सहाय, नेशनल पब्लिकेशन, संस्करण 1983, पृ.114

31. रात का रिपोर्टर, निर्मल वर्मा, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, द्वितीय संस्करण 2010, पृ. 105

32. वही, पृ. 10

33. आपातकाल में गुप्त क्रान्ति, दीनानाथ मिश्र, सरस्वती बिहार, 21, दयानंद मार्ग, दरियागंज नई दिल्ली, संस्करण 1997, पृ. 11

34. समय साक्षी है, हिमांशु जोशी, राजपाल प्रकाशन, संस्करण 1977, पृ. 14

35. वही, पृ. 29

36. वही, पृ. 34 

37. वही, पृ. 52

38. रघुवीर सहायमोनोग्राफ़, ले. पंकज चतुर्वेदी, साहित्य अकादमी, प्रथम संस्करण, 2014, पृ. 124

39. शांतिभंग, मुद्राराक्षस, राधाकृष्ण प्रकाशन, संस्करण 1982, पृ. 27

40. वही, पृ. 66

41. मैं और मेरी पत्रकारिता, बबन प्रसाद मिश्र, मेघा बुक्स, संस्करण 2012, पृ.87

42. शांतिभंग, पूर्ववत, पृ. 74

43. लोकतंत्र आपातकाल और जयप्रकाश नारायण, अनामिका पब्लिशर्स, संस्करण 2007, पृ. 219-220

44. इंदिरा गाँधी, इंदर मल्होत्रा, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, संस्करण 2014, पृ. 114

45. पहर ढलते, मंजूर एहतेशाम, राजकमल प्रकाशन, संस्करण 2007, पृ. 24

46. वही, पृ. 104

47. वही, पृ. 101

48. अधबुनी रस्सी एक परिकथा, सच्चिदानन्द चतुर्वेदी, राजकमल प्रकाशन, संस्करण 2009, पृ. 270

49. वही, पृ. 200

50. वही, पृ. 208

51. वही, पृ. 211

52. वही, पृ. 217

53. आलोचना त्रैमासिक, सं. नामवर सिंह, वर्ष 25 नवांक 40, जनवरी-मार्च 1977, पृ. 1

54. अधबुनी रस्सी एक परिकथा, पूर्ववत, पृ. 178

55. वही, पृ. 162

56. दूसरी दुनिया, ले. निर्मल वर्मा, संभावना प्रकाशन हापुड़, संस्करण 1978, पृ.12

57. जवाहरनगर, रवीन्द्र वर्मा, किताबघर प्रकाशन, संस्करण 2007, पृ. 44

58. वही, पृ. 31

59. वही, पृ. 53

60. वही, पृ. 100

61. वही, पृ. 113

62. आपातनामा, मनोहर पुरी, ज्ञान गंगा प्रकाशन दिल्ली, संस्करण 2014, पृ.36

63. वही, पृ. 157

64. वही, पृ. 48

65. वीणा, द्वैमासिक पत्रिका, सं. श्याम सुंदर व्यास, वर्ष 1977, अंक फरवरी-मार्च, पृ. 1 (सं.)

66. आपातनामा, पूर्ववत, पृ. 46

67. वही, पृ. 162

68. सत्यमेव जयते, श्री गोपाल व्यास, संजीवनी प्रकाशन प्रा. लि. दिल्ली, संस्करण 2012, पृ. 72

69. वही, पृ. 71

70. वही, पृ. 81

71. रघुवीर सहाय(मोनोग्राफ), पंकज चतुर्वेदी, साहित्य अकादेमी, संस्करण 2014, पृ. 129

72. उपन्यास और लोकजीवन, रैल्फ फॉक्स, पीपुल्स पब्लिसिंग हाउस दिल्ली, सं. 2008, पृ. 13


73. ऊबे हुऐ सुखी, रघुवीर सहाय, नेशनल प्रकाशन, 1983, पृ. 80 

* मेरी प्रिय कहानियाँ,राजपाल प्रकाशन,पृ.122 



शोध छात्र, 

हिन्दी विभाग,

डॉ. हरीसिंह गौर विश्‍वविद्यालय, सागर 

मोबाइल- 09179613730, 




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