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शुक्रवार, 2 मार्च 2018

सिसकता युवा


भारत की शिक्षा व्यवस्था भी बड़ी अजीब है । स्कूली शिक्षा में हमें जो पढ़ाया जाता है उसका उपयोग सिर्फ और सिर्फ डिग्री प्राप्त करने तक ही सीमित रह जाता है। जो लोग आगे चलकर शिक्षक बनना चाहते हैं उनके लिए तो कोई बात नहीं, क्योंकि वे जो विषय पढ़ रहे हैं उस विषय को ही आगे पढ़ानाना पड़ेगा इसलिए उनके लिए तो इसकी उपयोगिता दिखाई देती है, अन्यथा 80% छात्र जो स्नातक की डिग्री लेने के पश्चात नौकरी की तलाश में निकलते हैं उनके लिए इस शिक्षा का कोई विशेष महत्व नहीं रहा जाता है । नौकरियों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में सामान्य ज्ञान,गणित, अंग्रेजी सहित न जाने किन-किन विषयों का ज्ञान होना आवश्यक है । सिर्फ ज्ञान होने से ही काम चल जाए ऐसा नहीं है । इन विषयों में यदि आपको महारत हासिल नहीं है तो समझिए नौकरी मिलनी मुश्किल है । डिग्री हासिल करने के बाद इन विषयों में महारत हासिल करने में ही लगभग दो से तीन वर्ष का समय लग जाता है । वे छात्र विरले ही होते हैं जो अल्पावधि में ही इन विषयों में पारंगत हो कर परीक्षाओं में सफल हो जाते हैं ।  गौर करने वाली बात यहाँ यह भी है कि इन प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्नों का भावी नौकरी में भी कोई उपयोगिता नहीं रहती है। नौकरी में तो आपको कॉपी पेस्ट की परंपरा का पालन करते हुए आगे बढ़ते जाना है । बहुत कम ऐसे मौके होते हैं जहां आप अपने दिमाग का इस्तेमाल करते हैं और कुछ नया करते हैं, वर्ना बस एक लीक पर ही चलते हुए सेवानिवृत होते हैं । इस हिसाब से यह एक करुण विडंवाना ही है कि स्कूल-कालेज की पढ़ाई से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं तक की पढ़ाई का आपके सरकारी नौकरी में कोई विशेष योगदान नहीं होता है । कुछ विशेष एवं विशिष्ट कार्य जैसे राजभाषा का कार्य, लेखा(accounting) एवं रोकड़ से संबन्धित कार्य ही आपकी शिक्षा से थोड़ा बहुत संबन्धित होता है । मैं भारत के उच्च प्राथमिकता वाले काम का इसमें जिक्र नहीं कर रहा हूँ । यहाँ 80% ऐसे युवाओं का जिक्र है जो साधारण स्तर से अपनी शुरुआत करते हैं ।
अब जब युवा डिग्री पाने के बाद नौकरी के युद्ध में शामिल होले जाता है तब उसे जीवन में आने वाली परेशानियों का भान होता है । विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी विभाग अपने विभाग की आवश्यकता के अनुसार रिक्तियाँ निकालता है और आवेदन मँगवाता है । युवाओं के जीवन की बाधाएँ यहीं से प्रारम्भ हो जाती है । कई बार विभाग अपने आवेदन में कार्यानुभव की आवश्यकता डाल देती है । इस आवश्यकता के कारण आधे से अधिक लोग दौड़ से बाहर निकल जाते हैं। अब जो बच जाते हैं उनके लिए परीक्षा शुल्क के रूप में विभाग इतनी अधिक रकम तय कर देती है कि एक साधारण बेकार युवा के लिए देना मुश्किल हो जाता है इसलिए इस दौड़ से बाकी बचे लोगों में से आधे फिर बाहर हो जाते हैं । न्यूनतम पाँच सौ रुपया से लेकर पंद्रह सौ रुपया तक का शुल्क वसूला जाता है । धीरे-धीरे विभाग इस शुल्क की राशि में वर्षवार वृद्धि करते जा रहे हैं। इस वर्धित शुल्क के बारे में विभाग यह कहते हैं कि यह शुल्क परीक्षा करवाने में होने वाले खर्चों की भरपाई के लिए किया जाता है । अब बाजार से सौदा लेना है तो शुल्क तो देना ही होगा यह सोचकर युवा चाहे जैसे भी हो शुल्क अदा कर ही देता है । यह परीक्षा शुल्क करोड़ों में इकठ्ठा होता है । अबतक कर्मचारी चयन आयोग एवं रेलवे तथा एक आध सरकारी विभाग ऐसे थे जो या तो परीक्षा शुल्क नहीं लेते थे या न्यूनतम यानि कि पचास या सौ रुपया तक लेते थे । यह शुल्क देने में अभ्यर्थियों को कोई विशेष दिक्कत नहीं होती। पर अब उनमें भी बाकी विभागों को देखकर परिवर्तन आने लगा है। यदि हम जोड़े तो अमूमन एक वर्ष में न्यूनतक दस प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक अभ्यर्थी आवेदन करता है । यदि एक विभाग एक हजार रुपया का शुल्क लेता है तो वर्ष में लगभग दस हजार रुपया खर्च हुआ, इस प्रकार उसे नौकरी लगने तक जितने वर्ष लगे उतने दस हजार जोड़ लीजिये । यहाँ तक तो कोई विशेष समस्या नहीं दिखाई देती है पर मुख्य समस्या इसके आगे आती है । यह देखा गया है कि कई विभागों ने परीक्षा शुल्क तो ले लिया पर तीन वर्ष से अधिक होने जा रहा है, सम्बद्ध विभाग ने परीक्षा ही नहीं लिया । कर्मचारी राज्य बीमा निगम ऐसे ही एक विभाग में आता है जिसने कुछ वर्ष पूर्व सामाजिक सुरक्षा अधिकारी के चयन के लिए विज्ञापन दिया था । इस भर्ती प्रक्रिया के लिए विभाग ने करोड़ो रुपया अभ्यर्थियों से इकठ्ठा किया पर अबतक न तो परीक्षा ली गई न ही उक्त परीक्षा के निरस्तीकरण एवं अभ्यर्थियों से वसूली गई रकम की वापसी की  कोई प्रक्रिया की । खैर इसे भी यदि यह मानकर इसे नजरंदाज करें कि देर सबेर विभाग परीक्षा का आयोजन करेगी ही तो अभ्यर्थियों के दिल को थोड़ा सुकून मिलेगा, पर कई विभाग तो हद ही कर देते हैं । भर्ती विज्ञप्ति देते हैं, परीक्षा का आयोजन करते हैं पर परिणाम कभी भी घोषित नहीं करते । यदि अभ्यर्थी थोड़ा सा समझदार निकाला और सूचना का अधिकार अधिनियम के उपबंधों का प्रयोग कर जानकारी मांगता है तो विभाग पीछा छुड़ाने के लिए कोई न कोई बहाना कर देती है या फिर पेपर लीक होने या फिर कोई अन्य बहाना बनाकर अनिश्चित काल के लिए परीक्षा को निरस्त कर देत है। केंद्रीय विद्यालय संगठन इसका ताजा उदाहरण है जिसके पूर्व में आयोजित क्लार्क की परीक्षा में इस प्रकार का चमत्कार देखा गया था । इसके अतिरिक्त भारतीय रेल, कर्मचारी चयन आयोग आदि भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं । अब इसे विभागों द्वारा अपनी आय बढ़ाने का एक उपक्रम माना जाए या फिर कोई और उपादान यह तो सम्बद्ध विभाग ही बता पाएगा पर, इन प्रक्रियाओं में छात्र ही लूटे जाते हैं । या यूं कहें कि सरकारी विभाग पढे लिखे बेरोजगार युवाओं का शोषण कर धन इकठ्ठा करने का एक सशक्त माध्यम बना लेते थाई इन भर्ती प्रक्रियाओं को । सरकारी विभागों की देखादेखी कुछ ठग प्रवृति के लोग भी फर्जी भर्ती विज्ञापनों के माध्यम से युवाओं से फीस के रूप में लाखों की समेकित रकम लपेटने के चक्कर में व्यस्त हैं । गाहे-बगाहे युवा विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर अपनी व्यथा व्यक्त एवं शेयर करते रहते हैं पर आजतक उनकी इस व्यथा का विवरण लेकर किसी भी सक्षम विभाग या व्यक्ति ने कुछ भी करने का प्रयास नहीं किया । कर्मचारी चयन आयोग की एक विडंवाना यह भी है कि सफल अभ्यर्थी को जब डाक्यूमेंट वेरिफिकेशन के लिए बुलाते है तो वहाँ उनका अलग ही नजारा होता है । देखा गया है कि कागजातों की जांच करने वाले अधिकारी विज्ञापन में दिये गए विवरण का ध्यान रखे बिना ही अपने मन से अलग प्रकार से पात्रता तय कर डालते हैं । इस क्रम में  ढेरों अभ्यर्थी वहाँ से भी छांट दिये जाते हैं । अभी हाल में ही अनुवादक की चयन परीक्षा में यह बात देखी गई । अभ्यर्थी विज्ञापन के अनुसार तो परीक्षा एवं चयन के पात्र होते हैं पर आयोग द्वारा उन्हें संबद्ध पद के लिए उनकी शैक्षिक योगयाता के आधार पर अयोग्य करार दिया जाता है तथा उनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई । ढेरों ऐसे अभ्यर्थी आयोग की इस नीति का शिकार हुए । कुछ हल्कों से तो यहाँ तक खबर आई कि कुछ अभ्यर्थियों ने आयोग की इस नीति के खिलाफ ज्यायले में भी आवेदन किया है । परिणाम घोषित करने में आयोग यहाँ भी अपनी ढुलमुल नीति दिखाती है और अनुवादक/प्राध्यापक चयन परीक्षा का न तो परिणाम ही घोषित किया जा रहा है न ही तो आयोग के वेबसाइट पर इसके संबंध में कोई अपडेट किया जा रहा है । आयोग के इस देर करने की नीति ने कई अभ्यर्थियों के कैरियर के लिए एक एक बड़े ही पेशोपेश की स्थिति पैदा कर दी है । अब जबतक वर्तमान परिणाम की घोषणा नहीं हो जाती, आयोग अगली परीक्षा की घोषणा नहीं करेगी और इस प्रकार चयन परीक्षा पीछे ही चलती जा रही है । चूंकि भारत सरकार के विभिन्न विभागों के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति का भार कर्मचारी चयन आयोग को ही है अतः समय पर नियुक्ति न हो पाने के इन विभागों में कर्मचारियों की कमी रह ही जा रही है । अब तो सोशल मीडिया के गलियारे से यह भी खबर आ रही है कि सरकारी विभागों में लंबी अवधि से जो पद खाली पड़े हैं उनको पूर्णतः समाप्त करने की शायद सरकार में कवायद चल रही है । अर्थात यदि खाली पदों को समाप्त कर दिया गया तो आने वाले समय में सरकारी विभागों में रिक्तियाँ होंगी ही नहीं और जब पद खाली ही नहीं होगा तो भर्ती कैसे होगी । अब इस परिस्थिति में घूम-फिर कर सारी गाज बेरोजगार युवाओं पर ही तो गिरनी है । अर्थात सरकारी नौकरी की आस लगभग समाप्त ही समझिए ।  
विगत कुछ वर्षों से जबसे ऑनलाइन कंप्यूटर आधारित परीक्षा का आयोजन होने लगा है तबसे अभ्यर्थियों की समस्याएँ कम होने की बजाय बढ़ती ही जा रही हैं । रेलवे हो या कर्मचारी चयन आयोग, हर परीक्षा का पेपर लीक हो रहा है और फिर एक ही परीक्षा का परिणाम निकाल कर सम्बद्ध चयन आयोग या बोर्ड अभ्यर्थी को दो वर्ष से पहले नियुक्ति नहीं दे रहा है । कर्मचारी चयन आयोग तो इसमें और भी तेज निकाला । इसकी हर परीक्षा में कुछ न कुछ खोट आ ही जा रहा है जिसके कारण परीक्षा के परिणाम के संबंध में अभ्यर्थियों को कोर्ट के शरण में जाना पड़ रहा है पर उसके बाद भी कुछ विशेष लाभ नहीं हो रहा है । कर्मचारी चयन आयोग द्वारा सीजीएल एवं इसी प्रकार की परीक्षाओं के बार-बार निरस्तीकरण एवं चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति प्रस्ताव न मिलने के कारण कई ऐसे अभ्यर्थी हैं जिनके आयु की सीमा खत्म होने जा रही है। बार बार अपील के पश्चात भी किसी प्रकार की राहत न मिल पाने का कारण ये युवा आज सड़कों पर उतार आए हैं । पिछले कुछ महीनों से सोशल मीडिया के गलियारे(फेसबुक, व्हाट्सप आदि) पर आक्रोश की ज्वाला प्रस्फुटित होना प्रारम्भ हुई थी जो अब चिंगारी का रूप लेना प्रारम्भ कर चुकी है । पटना की गलियों में धरना-प्रदर्शन की शुरुआत के साथ ही अब युवा विगत कुछ दिनों से दिल्ली में धारणा पर बैठे हुए हैं । उनके मन की बात को कुछ मीडिया हाउस ने दिखाना प्रारम्भ भी किया है पर उनकी बात उनके और उनके शुभचिंतकों के अतिरिक्त सुनने वाला कोई नहीं है ।
छात्र आंदोलन किसी भी देश की राजनीति के लिए सुखद नहीं होता है । गाहे बगाहे विभिन्न मुद्दों को लेकर विभिन्न शिक्षण संस्थान के छात्र विरोध प्रदर्शन का आयोजन कर राजनैतिक लाभ पाने का प्रयास कर रहे हैं पर नौकरी की आस एवं चयन प्रक्रिया में विभिन्न प्रकार के खोट एवं तथाकथित भ्रष्टाचार की बात को लेकर सड़क पर उतरने की यह पहली घटना है जो धीरे धीरे किन्तु बड़ी तेजी से प्रज्ज्वलित हो रही है । यदि आज इन युवाओं को न्याय नहीं मिल पाता है तो आने वाले समय के लिए देश के युवाओं की दशा एवं दिशा के लिए शायद बड़ा ही दुखद साबित हो ।    


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