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अपर्णा अनेकवर्णा की कविताएँ




एक कवि की मौत 

समझदार समझाते रहे 
जानकार बताते रहे
रचनाकार को रचना से करके विलग ही देखना 
देखना कि शब्द-भाव-बिम्ब से ही हो रहो मुग्ध अचंभित
कवि तो फिर हाड़ मांस का पुतला ठहरा
शब्दों के शर से खूब भेदता है भाव
और छीलकर उतार फेंकता है
नाटकीय अति उत्साह का उल जलूल
पर उसके भीतर कवि अकेला नहीं
एक लालायित कलाकार
एक स्त्री-लोलुप पुरुष
एक अवसरवादी चाटुकार
एक क्रीड़ाप्रवीण कूटनीतिज्ञ
अहम् में लिथड़ाया
और परितोष की मृगया में भटका एक आखेटक
असुरक्षा से दग्ध एक ईर्ष्यालु वरिष्ट, कनिष्ट, समकक्ष 
ये सब ही घटते-बढ़ते अनुपात में
जीते हैं उस एक में..
और पाठक हर बार व्यक्ति और रचनाकार में गड्मड हो बैठता है 
आज व्यक्ति के अवसान में भी कवि अमर है 
बस फर्क इतना ही 
कवि जब भूतपूर्व हो जाता है..
तब वह इंसान भी नहीं रह जाता 
आत्मा के बगैर शरीर मृत ही तो है.. 
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1
उस दिन..
राष्ट्रीय राजमार्ग पर..
धनक मिली थी..
नीम-बारिश में उतर कर..
इस्तकबाल किया था मैंने..
सातों में से रंग धानी दे कर..
मुझको विदा किया था उसने..
पहने अब तक घूम रही हूँ
हरियाने लगा है फिर से.. अंतस मेरा..
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2
खिलने और खिलखिलाने की होड़ में
अमलतास फिर जीत गया है
गुलमोहर.. गुस्से में कुप्पा लाल खड़ा है.
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3
साहिर कहाँ बसते थे अब तक
मेरी उनसे मुलाकात तो
चंद रोज़ पहले..
बस अभी हुई है.
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4
तार जंजाल के पार
तुम थे...
या मेरा भ्रम?
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5
सुख की सिहरन
अवसाद के क्षण
शब्दों से भी रिसते हैं
सीख रही हूँ..
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हर भीड़
किसी हादसे के
बीज लिए चलती है..
एक 'सस्पेंस' भरी धुन पर गर्दन घुमाती
एक दूसरे को भेदती ताड़ती काटती
आँखों से तौलती रहती है..
हुआ..
तो हो ही गया..
नहीं तो वो डर का बीज
पहुँच कर घर
मन से उतार.. झाड़-बुहार
द्वार के बाहर ही
कहीं धर
अगली भीड़ के दिन तक
भुला दिया जाता है..
बटुआ.. छाता.. फ़ोन.. चाभियाँ.. चश्मा..
इनकी तरह हम टटोलते नहीं उसे
पर द्वार बंद करते ही फिर
उचक कर कन्धों.. ज़हन..
और आँखों में आ ही जाता है..
और ज़रा सा
उड़कर हवाओं में
उन विदा करती आँखों में
भी रेंगता, फलता, फूलता,
दिखता रहता है
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क सतत् उत्सव
धीमे-धीमे बजते रबाब की तरह
जिसे कोई बेख़्याली में बस अपने लिए बजा रहा हो
जैसे किसी को सुनाना उसे मलिन कर देगा
कोई साक्षी रहेगा छीन लेगा जादू उसका
जैसे कोई बोला ही न हो बरसों से
मुँह खोलने पर भी ध्वनि न निकले
कंठ के कंपन, आरोहण, अवरोह बेकार
कला दीर्घा मिट जाएँ चेतना से
उड़ जाए आलोचकों की स्मृति
साथी वही रहें जो भितराएं तो चप्पलें उतार कर
बाहर एक कण में भी बर्दाश्त नहीं
बस रंग उतरें नए नए
एक पुल बाँधें आत्मा से कूची तक
उतना ही बोलें
जितना ज़रुरी को भी निथार कर बचता है
चलो मन
धीरे धीरे गायतोंडे हो जाएं।
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आज का खोया-पाया
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१. भ्रम
छूना
तोड़ देगा भ्रम
बना रहे भ्रम
इसीलिए
मत छूना.
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२. खंडित
भृंग की
यौगिक आँखों से
कितनी खंडित
दिखती है दुनिया
क्या उतनी ही..
या अधिक उससे
जितनी खंडित है
हमारे लिए ?
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३. बंथन
आज ने
बीते कल को
इशारों से बुलाया
उँगलियों में गूंथ ली है
उंगलियाँ..
इन ताने-बाने से
बुन रहें हैं दोनों
उस कल को
जो अभी आने वाला है.
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४. ऋतु-रिक्त
पहली-पहली
हिम-कनिका
कविता लिख लायी
ऋतु बीती
कविता भी
अब बीत गयी...
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५. नीला
स्मृति की समाधि से
उठ उठ आता है
एक पुराना सीरियाई आकाश
नीला ऐसा कि नीलम-नीला
समाचारों का सीरियाई आकाश
अजनबी है..
वो टीवी बंद कर देते हैं.
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