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पुस्तक समीक्षा [`बस्ती`: इंतज़ार हुसैन]: अमित कुमार



स्मृतियों में शेष जड़ों से कटने का दर्द

          भारत पाकिस्तान  सम्मिलित उर्दू कथा-साहित्य के कृश्नचन्दर और बेदी की पीढ़ी के बाद वाली पीढ़ी के प्रमुख कथाकारों मे से एक है इंतजार हुसैन। सांस्कृतिक छटपटहट उनकी रचना की पहचान है। जड़ो की तलाश मे वह मिथकों, किस्सों किंवदंतियों जातक कथाओं, और लोक कथाओं की यात्रा करते है। पाकिस्तान के सबसे बड़े साहित्यिक पुरस्कार आदमजी एवार्ड से सम्मानित एवं उनके प्रमुख उपन्यास बस्ती को अंतर्रास्त्रीय बुकर पुरस्कार हेतु नामित किया गया है।
          उपन्यास बस्ती मे बिभाजन के बाद सीमा पार के एक संवेदनशील व्यक्ति के बहाने उपन्यासकार नियति से जुड़े कई मूल सवालों से मुठभेड़ करता है। बस्ती 1979 मे लिखी गयी और कहानी की जमीन 1971के युद्ध के महौल की है। जब पाकिस्तान से बहुत उम्मीदे नहीं रह गयी थी। पूर्वी पाकिस्तान से विचलित कर देने वाली खबरे आ रही थी।  कहानी का जो नायक है पहले ही 1947 का कोलाहल और मार-काट का चश्मदीद रह चुका है एवं भारत छोड़ कर पाक जमीन पे पलायन कर चुका है। जब पाकिस्तान मे रहने लगता है तो उसे पहली रात नींद नहीं आती है। वह अपने पुराने दिनों को याद करता है। वह भारत के बस्ती और पाकिस्तान की बस्ती मे अंतर देखता है। अपने बचपन को याद करने से उपन्यास की शुरुआत होती है। जहा शांति है और हिन्दू और मुसलमान सब एक ही बस्ती मे रहते है। वह कितना सुहान दिन था-“जब दुनिया अभी नयी-नयी थी, जब आसमान ताजा था और जमीन अभी मैली नहीं हुयी थी, जब दरख्त सदियो मे सांस लेते थे, और परिंदो की आवाजों मे जुग बोलते थे, कितना हैरान होता था वह इर्द-गिर्द को देखकर की हर चीज कितनी नयी थी और कितनी पुरानी नजर आती थी।” लेकिन दुनिया मे अब वो दिन नहीं रहे जमीन का बटवारा हो गया पर हवा और आसमान नहीं बटे है। यदि यह बटवारा नहीं होता तो कितना अच्छा रहता। जो व्यक्ति कभी हवेली मे रहता हो जहा उसका जन्म हुआ हो उसे छोड़कर किसी दूसरे जगह अजनबी जगह पर किराए के घर मे रहना पड़े यह कितना दुखद होता है। लाहौर जो की उसका घर होने वाला था वो पहली रात सो नहीं पाया। वह गलियो मे घूमते हुये उसे डर नहीं था की कोई उसकी आंतों  मे चाकू घुसा देगा। नयी गंधो नयी दृष्टिओ नयी ध्वनियों का आनंद लेते हुये भी ज़ाकिर सारी रात रोता रहा अपने पुराने शहर को और लोगो को याद करता हुआ। पुरानी जिंदगी और शहर रूप नगर की यादे उसे कचोटती रही और वो इस नए शहर मे उस जिंदगी का एक हिस्सा ही हासिल कर पाया। वह अकेला नहीं था उसके जैसे और भी कई  लोग थे जो अपनी जिंदगीयां किसी नए शहर मे तलाश रहे थे। भारत का बिभाजन एक त्रासदी की तरह हुआ बिभाजन मे कई घर उजरण गए कुछ छुट गए तो कुछ मर गए। विभाजन मे ज़ाकिर का प्रेम भी बाँट गया जो बचपन से साथ बढ़ रहा था और जवानी आते-आते अलग कर दिया गया। ज़ाकिर साबीरा से मोहब्बत करता था पर देश के बिभाजन ने दोनों को ज़ुदा कर दिया। काश जिस तरह हवा को बांटा नहीं जा सकता उसे किसी सीमा मे बंधा नहीं जा सकता उसी तरह दो देशो को कोई नहीं रोकता अपनों से मिलने से। ज़ाकिर को बहुत दिन बाद भारत से एक खत मिला जो उसके दोस्त सुरेन्द्र ने भेजा था। वह रेडियो मे काम करता था वही उसकी सबीरा भी काम करती थी। सुरेन्द्र ने हाले दिल बाया किया की आ जल्दी अपने देश और प्यार से मिल। पर देश के ऐसे हालात थे की न कोई उधर जा सकता है और न ही कोई इधर आ सकता है।  लेकिन प्रोफेसर बन गए ज़ाकिर के दिल मे आज भी सबीरा के प्रति प्रेम बिद्यमान है। कहानी मे न हीं सबीरा शादी की है और न ही जाकिर शायद उसे उम्मीद है की ऐसा दिन आयेगा जिस दिन वो अपने प्रेम से मिलेगा और एक हो जाएगा।
          बटवारे के शिकार व्यक्ति को अपनी जड़ो से जुड़ने की बेचैनी हमेसा सताती रहती है। बिभाजन की त्रदासी को देखे तो हमे यसपाल का झूठा सच याद आता है और खुसवंत सिंह, कुर्र्तुल ऐन हैदर की उपन्यासों की याद आती है। बिभाजन केवक दो देशों और ज़मीनों  का  होता बल्कि बिभाजन व्यक्तियों का भी होता है। किस तरह लोग बेघर होकर एक जगह से दूसरे जगह जाने पर मजबूर हो जाते है अपने घरो को छोड़ कर तंबुओ मे रहने को बिवश होना पड़ता है मार-काट गदर मची रहती है और जो बच गए उन्हे नित  नए कष्टों  से  गुजरना पड़ता है। वही उपन्यास मे भारत-पाक बिभाजन के साथ-साथ बांग्लादेश की भी बात होती है जब पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान का बटवारा होता  है। उस दौरान उस समय के दौर मे दिन मे सड़के सुनी और रात मे अंधेरा कर रहना और डरे सहमे लोगो की स्थिति यह अत्यंत भयावह स्थिति होती है। ज़ाकिर उन सारी चीजों का गवाह है और इंतज़ार हुसैन जाकिर के माध्यम से अपनी बातों को बताते है। आज भी देश के सीमा वालो इलाकों का कमोबेश यही हाल है।
अपना घर आखिर अपना होता है उसे कोई नहीं छोड़ना चाहता यह तो राजनीतिक कारण है जो लोग आज भी बर्बाद हो रहे है। सुरेन्द्र जब व्यासपुर के कोटला वाले हाकिम जिसे पूछता है- “हाकिम जी!अप पाकिस्तान नहीं गये?”
                       “नहीं लाला”
                          कारण ?
“लाला!कारण मालूम करते हो? तुमने हमारा कब्रिस्तान देखा है?”
                             “नहीं।
                               जरा कभी जाके देखो। एक से एक घाना पेड़ है। पाकिस्तान मे मेरी कब्र को ऐसी सी छाव कहाँ मिलेगी?
जबकि हकीम जी के सारे परिवार पाकिस्तान जा चुके है पर वे नहीं जाना चाहते है। उसी तरह अफ़जाल की नानी अपनी जमीन नहीं छोड़ना चाहती थी तो उन्हे बाढ़ का बहाना बना कर पाकिस्तान लाया गया था पर वह आज भी कहती है की “बढ़ उतार गयी होगी मैनु वापीस ले चल।” अपनी जमीन से लगाव जो है। पर बाढ़ तो उधर उतर ही गयी होगी पर इधर चढ़ गयी जाने का रास्ता कहाँ है?। एक बाढ़ जिसने हमेसा के लिए  दोनो देशों के लोगो का रास्ता बंद कर दिया।
           धीरे-धीरे उस नए शहर की अच्छाई को भ्रष्टाचार, असहिष्णुता, और लालच ने निगल लिया और एक नया राष्ट्र बनाने की शक्ति कम होती गयी। लोगों मे अब बस  लड़ना-झगड़ना और बिना मतलब के कई कार्य होने लगे। दहस का भावीसी उन लोगो के हाथ मे आ गया जहा चलाने का काबिलियत तो है ही नहीं भ्रष्टाचार और धार्मिक कट्टरता उन्हे बर्बाद कर रही है। तभी तो मौलवी साहब के पुछने पर कि “क्या ये अच्छा नहीं हुआ की पाकिस्तान बनाया गया?” ज़ाकिर का जवाब होता है कि  अच्छी चिजे भी बुरे हाथों मे अच्छी नहीं रहती।” यानि लोग सिर्फ राजनीतिक करणों को देखकते है। शिक्षा को हेय दृष्टि से देखते है यह तमाम कारण है जो उसे देश चलाने लायक नहीं समझती। उसमे युवा वर्ग सिर्फ हड़ताल और जलसो मे नारे लगते है और सलामत जैसा व्यक्ति अपनी एक लस्कर यानि पलटन बनाता है और लोगो को लड़ने के लिए कहता है। चाय दुकान पर युवाओं को देश की लड़ाई के लिए उकसाता है। जब युवा ही ऐसे कार्यों मे संलग्न हो जाएंगे तो देश का भविष्य कहा जाएगा । पाकिस्तान आज आतंकवाद से जूझ रहा है , नयी- नयी घटनाएं सामने आती  रही है। आज देश  तो बट गया पर ज़ुदा होने का टीस कही न कही मन के कोने मे जिंदा है।
          सब डोर कति पतंग की तरह थे जो कही किसी अनजाने छत पर जा गिरे थे। इन सारे लोगो की कई कहनियों को कहते हुये इन्तज़ार हुसैन दौनिक जीवन की महत्वहीन बातों मे कई बार अपने अप्रत्यक्छ कहानी लेखन के अंदाज से चूकते है और कुछ प्रत्यक्ष बाते लिखते है। भारत-पाकिस्तान का माहौल और आम जन की प्रतिक्रियाएँ जो लोग रोज पुछते रहते थे कि अब क्या होगा लड़ाई होगी या नहीं। यहाँ प्रबुद्ध जनो की नपुंसकता भी देखी जा सकती है। उपन्यास के अंदर जो सबसे हृदय बिदारक दृश्य है वो तब है जब ज़ाकिर के मरते हुये पिता उसे अपने पुरखों के घर की चाभी सौपते है, जो घर से दूर बसे रूपनगर मे है और वह घर अब उनका नहीं रहा। उनके पिता कहते है-“ये चाभीय विश्वास है, इस विश्वास की रक्षा करना और उन लोगो की दया याद रखना जो उस दुनिया मे रहते है जो हम छोड़ आए है।” उपन्यास मे राजनीतिक मकडजाल का चित्रण बहुत ही सहज और रोचक भाषा मे किया गया है । अपनी अनूठी कथ शैली और इंसानी सरोकारों के संवेदनशील आकलन के कारण उपन्यास अपनी विशिष्ट उपस्थिती दर्ज करता है।
           विभाजन की स्थिति अत्यंत भयावह होती है चाहे वह भारत-पाक बिभाजन हो, बंगलादेशियों का पलायन हो या वर्तमान दौर मे सीरिया की स्थिति। देश कोई भी हो अपनी जड़ो से कटने का दर्द सभी को है। इंतज़ार हुसैन उसी दर्द को शब्दों मे बया करते है। उनके एक-एक पंक्ति बिभाजन की त्रासदी एवं बिखरती मानवीय सवेदनाओं का आख्यान है। बिभाजन की त्रासदी को और भी कई लेखकों ने अपनी कृतियों मे व्यक्त किया है परंतु बिभाजन के साथ अपनी जमीन से जुड़ी यादों को जिस तरह इंतज़ार वर्णित करते है। वह अन्यत्र नहीं मिलता है। संवेदनाओं की इसी धारातल पर इंतजार अन्य  लेखकों से कोसो दूर निकाल जाते है।         
          इंतज़ार हुसैन की कहानी स्थिर नहीं है वह मानवीय भावनाओं के प्रतिबिंब के रूप मे प्रवाहमान है। उनकी कहानी रेखागत नहीं बल्कि पेंडुलम की तरह आगे-पीछे करती है तो कभी पतंग की तरह गोल-गोल घूमती हुयी अपने धुरी से आगे निकाल जाती है।
          बिभाजन केवल जमीन का बटवारा मात्र नही है बल्कि यह दो व्यक्ति के मध्य ऐसी रेखाओं का निर्माण करती है जो मानवीय संवेदनाओं, संबंधो, मूल्यों सभी को बाँट देती है। अपनी जड़ो से कटते लोगो की काल्पनिक दुनिया मे उनके बिरासती घर खंडहर बन जाते है जहाँ की यादें बार-बार मन को कचोटती है और इन सब से उठी एक टीस है जो बिभाजन से प्रभावित प्रत्येक व्यक्ति के अंदर मौजूद है।
अतः कहा जाय तो बस्ती मात्र एक कथा नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं का आख्यान भी है ।
   

अमित कुमार
एम॰ फिल॰ तुलनात्मक साहित्य

महात्मा गांधी अंतररास्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा
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