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बुकर पुरस्कार से सम्मानित ' मामूली चीजों का देवता' (The God Of Small Things): अरुंधती रॉय, पुस्तक समीक्षा: रजनीकांत मिश्रा


परिचय पाठ्यक्रम की मेहरबानी, 1997  में बुकर पुरस्कार से सम्मानित 'The God Of Small Things' को दुबारा पढ़ा.. अरुंधती रॉय से ज्यादातर समकालीन राजनितिक या सामाजिक मुद्दों पर असहमति के बाद भी, इस उपन्यास को समकालीन भारतीय साहित्य की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में रखने में कोई हिचक नहीं है.

मामूली चीजों का देवता
समाज और इसकी तमाम विसंगतियों मसलन, राजनीति का अमानवीयकरण, धर्मं और जाति का शोषक तंत्र , परिवार और विवाह जैसी संस्थाओं का निज को खोखला करते जाना; के वृहत {large}परिप्रेक्ष्य में मामूली{Small } चीजों को केंद्र में लाने का सफल प्रयासअरुंधती रॉय ने किया है .छोटे लोग और उनकी बातें ["whisper and scurry of small lives"]; वर्जित ख्यालों, रहस्यों, वायदों के भावनात्मक मनुष्यों की बात जिसे मुख्य धारा अनसुना कर देती है, उपन्यास की कथा भूमि का निर्माण करते हैं. ठुकराए  हुए इन मामूली लोगों की शरणगाह, नदी के तट या History House जैसी जगह ही बनती है. वेलुथा जिसे लेखिका ' God  Of  Small  Things ' कहती है, बिना इस बात की परवाह किये कि अछूत जाति में जन्म उसे 'जुड़वाँ बच्चों' से स्नेह और उनकी माँ को प्यार करने से वर्जता है, जीवन कि छोटी छोटी खुशियों से दामन भरता चलता है. पर इसी वेलुथा को लेखिका का ' God Of Loss' कहना मामूली चीजों और मामूली भावनाओं से चिपकी हुई त्रासदी को इंगित करता है. उपन्यास मामूली चीजों के हासिये को केद्र में लाता है पर एकाकीपन और दुःख की स्वाभाविक महागाथा में गूंथ कर ही.
मामूली चीजों को निर्भय अपनाते जुड़वां बच्चों को भी बड़ी बातें नहीं बख्सती और पच्चीस साल बाद किया निर्द्वंद प्यार , जले हुए बचपन की ताप और पापछाया से मुक्ति का ही प्रयास है.

कथावस्तु  :-
मुख्यतया दो जुड़वां बच्चों के मार्फ़त जीवन के एकाकीपन और अजनबीयत की कहानी को केरल के कस्बे एमनम [ Aymanam ] में बसे एप [ Ape ] परिवार की तीन पीढ़ियों की त्रासदी से उभारा गया है . अंग्रेजियत में रंगे पापच्ची की नाक पर सामन्ती ढोंग टंगा रहता है. उनकी पत्नी मामाच्ची का सफल व्यवसायी होना भी पति की मार से बचा नहीं पाता . मामाच्ची का हाथ व्यवसाय में जितना भी सिध्दहस्त हो , श्रमिकों के शोषण को अधिकार ही समझती हैं. बेटे चाको पर अँधा प्रेम.. कारखाने में बेटे की रासलीला को बढ़ावा देने वाली मामाच्ची, अछूत वेलुथा से अपने बेटी अम्मू के संबंधों को सहन नहीं कर सकती. 
अम्मू और चाको की बुआ बेबी कोचम्मा, बचपन के प्रेम  में मिले अभिशाप को अपने व्यक्तित्व में ढाल चुकी है. यथास्थिति को चुनौती देते जीवन के किसी भी सुन्दरता को बेबी कोचम्मा की नज़र लगती ही है. पुरे उपन्यास में बेबी कोचम्मा खलनायक की भूमिका में नज़र आती है.
परिवार द्वारा उपेक्षित अम्मू बहाने से कलकत्ता जा, चाय बगान मैनेजर से शादी कर लेती है. दो जुड़वाँ बच्चों को जन्म देती है. बच्चों पर अगाध प्रेम रखती है. पति पीटता है और अपने कैरियर की खातिर उसका शरीर बॉस को सौपने की मंशा रखता है तो अम्मू के पास  Aymanam वापस आने के अलावा कोई चारा नहीं बचता.
उपन्यास बार बार घर वापस लौटने की कहानी भी है.
अमेरिका में पढ़े और बसे चाको को जब उसकी पत्नी धोखा देती है, पत्नी को तलाक दे बेटी सोफी मोल को छोड़ चाको भी घर लौटता है. 
दुसरे पति के मरने के बाद, चाको से आमंत्रण पा मार्गरेट सोफी मोल के साथ  Aymanam आती है. उनके आने को परिवार घर वापसी ही मानता है. सोफी मोल के आने के साथ ही नाटकीय परिवर्तन शुरु होते है. हवाई अड्डे  जाते वक्त कम्म्युनिस्टों के दल ने बेबी कोचम्मा को नारा लगाने को मजबूर किया. उसी दल में कारखाने का नौकर अछूत वेलुथा दिखाई पड़ता है.
पहले सहमे हुए जुड़वां बच्चे राहेल और एश्था जल्द ही सोफी मोल के दोस्त हो जाते हैं. पर उनकी दोस्ती परवान चढ़ रही होती है वेलुथा के साथ. राहेल और एश्था ही नहीं, उनकी मां अम्मू भी वेलुथा की संगत में जीवन के मायने ढूढती है.  दिन में जिस नदी तट पर बच्चे मामूली चीजों से जुड़ते हैं, रात में अम्मू और वेलुथा आपसी  संसर्ग से वर्जनाओं के समाज को नकारते हैं. हर दिन अगले दिन की कामना  करता है. एक और रात  के सिवा और कोई ख्वाहिश नहीं, कोई बंधन नहीं.. केवल मामूली चीजों और मामूली भावनाओं का उल्लास .
व्यक्ति पर समाज का बंधनमामूली चीजों के लिए वर्जनाओं के नकार को त्रासदी की ओर ले जाता है. अम्मू की त्वचा की गंध को खुद में समटने के अपराध में खुद वेलुथा का पिता उसकी हत्या खुद कर देने की आकांक्षा कि हद के ग्लानिबोध के साथ, अम्मू और वेलुथा की गाथा मम्माची तक पहुंचता है. अम्मू कोठरी में बंद कर दी जाती है..जीवन की खुशियों से वंचना का दोष बच्चों के सर देती है..आहत बच्चे घर से कहीं दूर भाग निकलने को निकलते हैं..सोफी मोल भी साथ हो लेती है.. नदी में डूब मोल की मौत हो जाती है..परिवार की मर्यादा रक्षा में तत्पर बेबी कोचम्मा एन केन प्रकारेण वेलुथा को बच्चों के अपहरण और सोफी मोल की हत्या का दोष वेलुथा के सर मढ़ने में सफल रहती है. कामरेड पिल्लई ने साथ देने से मना किया तो अबोध एश्था, बेबी कोच्चम्मा के बहकावें में आ ही जाता है.पुलिस की मार से वेलुथा की मौत दर्दनाक बनती है. 
अम्मू चाह कर भी व्यवस्था के चक्र से वेलुथा, खुद को या बच्चों को बचा नहीं पाती. नौकरी को दर बदर भटकती अम्मू  गुमनाम मरती है.
सोफी मोल के आने की पूर्वसंध्या थियेटर में यौन शोषण का शिकार, एश्था मौन को अपना साथी चुन लेता है. पिता के पास भेज दिया गया एस्था, वेलुथा की हत्या में खुद की भूमिका के ग्लानि को साथ साथ जीता रहा. एश्था और रहेल का अलग किया जाना एक ही आत्मा की चीर फाड़ थी. रहेल और एश्था अगले एकतीस सालों तक अपूर्ण ही रहे. पर किसी तरह के संपर्क में भी नहीं रहे. एक हिस्सा दुसरे हिस्से को क्या लिखता , क्यूँ लिखता..    
अमेरिका में डिप्लोमा पा राहेल ने शादी और तलाक भोगा. एश्था के  Aymanam आने की खबर पा राहेल भी लौटती है. दुख, अजनबियत और एकाकी अपूर्णता के चक्र को राहेल और एश्था  एक दुसरे के शरीर में खुद को घुला कर  तोड़ते हैं. 
थियेटर में एश्था का कुचला जाना, सोफी मोल की जागती सी लाश, वेलुथा की खोपड़ी से मटमैले रक्त की लकीर और अपनी एक ही आत्मा को चीर खुद को अलग अलग किये जाने की तमाम वीभत्स व्यूहों को जुड़वाँ भाई बहन के शारीरिक संसर्ग से जोड़ने की कोशिस करता है, उपन्यास का अंत.  

प्रेम  :-  
एप परिवार की उलझनों और सुलझनों के माध्यम से कही गयी कथा के केंद्र में प्रेम ही है. मम्माची का बेटे के प्रति मोह, चाको का बेटी के प्रति स्नेह बिना श्रम ही लक्षित किया जा सकता है. अम्मू का अपने अपने बच्चों को लेकर प्यार इतना प्रगाढ़ है कि तीनों एक यूनिट का ही हिस्सा लगते हैं.  रहेल और एश्था तो एक ही आत्मा के दो शरीर हैं. बिना कुछ कहे एक को दुसरे के बारे में सब पता चलता रहता है.
स्त्री पुरुष का प्रेम अपने कई आयामों में  सृजन और संहार कि श्रृष्टि करता है. अन्यथा बदचालों और षड्यंत्रों को बुनती हुई बेबी कोचम्मा ने एक पादरी के एकतरफा असफल प्रेम में सब गवाया . चाको का मार्गरेट के प्रति प्रेम प्रतिदान  कि मांग नहीं करता, मार्गरेट के धोखा देने के बाद भी चाको के दिल में नरम कोना बना रहता है.
एकाकी जीवन को अभिशप्त अम्मू के जीवन में वेलुथा का प्रेम नई प्राणवायु लेकर आता है. केवल अगले दिन कि चाहत के साथ बिदा होने से पहले अम्मू के मन कि नदी और शरीर का समंदर वेलुथा के संसर्ग से हर रात अघा जाता है. 
सामाजिक बंधनों में परिवार की मर्यादा को ढोते एप परिवार के सभी प्राणी प्रेम में वर्जनाओं को तोड़ते है. 
बेबी कोचम्मा कथोलिक पादरी के खातिर सम्प्रदाय बदल देती है. चाको शासकों की अहंकारी जाति की मार्गरेट से अपना अस्तित्व हारता है.
जाति से बड़ी भारत में कोई पहचान नहीं है, ऐसे में अम्मू का अछूत वेलुथा के साथ निःसंकोच और निर्द्वंद सम्भोग, सामाजिक वर्जनाओं को ऐसा धक्का है जिसकी तिलमिलाहट, तंत्र द्वारा वेलुथा की तल्काल और अम्मू की धीमी हत्या  से पता चलती है.
पाठक का deconstruction करते हुए अरुंधती, वर्जना के एक ऐसे क्षेत्र से गुजरती हैं जहाँ ताक झाँक भी सामान्य मानस को वितृष्णा से भर देता है. बचपन में अलग कर एकाकी कर दिए गए, रहेल और एश्था एकतीस की उम्र में फिर मिलने पर पूर्णता, अपने शरीरों के संसर्ग में ढूढ़ते हैं. जुड़वां भाई बहनों का शरीरों के माध्यम आत्मा की एकजुटता ढूढना वर्जना के अंतिम किले पर लेखिका का प्रहार है.

प्रेम को खाचों में बाधना लेखिका को मंज़ूर नहीं. हिंदी के प्रख्यात सहित्यकार अज्ञेय के उपन्यास ' शेखर- एक  जीवनी का मुख्य पात्र शेखर प्रेम को रिश्तों के बंधन से परिचायित करने को तैयार नहीं होता. 'मिडनाईट चिल्ड्रेन' में रुश्दी ने भी भाई बहन के प्रेम को स्त्री पुरुष के आदिम प्रेम तक जाने का संकेत किया है परन्तु भाई बहन के मध्य स्त्री पुरुष के incestuous जैविक प्रेम को बेहद स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करने का साहस किया है लेखिका ने. परन्तु उपन्यास के अंत तक आते आते लेखिका अपने पाठक को अपनी कथा वस्तु से इस तरह संपृक्त कर देती है कि ताबू का तोडा जाना वितृष्णा कि लहर लेकर नहीं आता. यही लेखिका कि सबसे बड़ी उपलब्धि है. 

त्रासदी 
मामूली चीजों और भावनाओं में जीते पात्र प्रेम में वर्जनाओं का संसार तोड़ते है. पर साथ ही उसकी कीमत भी चुकाते हैं. चाको को छोड़ मार्गरेट किसी और से शादी कर लेती है.
बेबी कोचम्मा स्वयं में अपूर्ण रहती है और बचपन का घाव टीसते टीसते उसके पुरे व्यक्तित्व को तिक्त कर देता है. 
वेलुथा अछूत हो भी अम्मू से प्यार करने दर्दनाक सजा भुगतता है. फटी खोपड़ी से बहती रक्त कि मटमैली लकीर 'God of Small Things' के 'God Of Loss' रह जाने कि गाथा है. अम्मू न केवल अपने बच्चों से विछोह सहती है, बसंत की बयार लाए वेलुथा की मौत की गवाह बनती है, खुद विस्थापन और अंत में गुमनामी की असमय मृत्यु पा त्रासदी को घनीभूत करती है. 
पर समय के आगे पीछे जाते हुए राहेल और एश्था की लगातार जारी विछोह,त्राण और एकाकीपन की मुख्या कथा पूरे उपन्यास को त्रासदी के रंग में लगातार रंगे रहती है. एक ही आत्मा की दो आकारें राहेल और एश्था बचपन से महरूम होते हैं. बाप का प्यार कभी था नहीं. वेलुथा जैसे दोस्त की मौत और उसकी मौत में एश्था का ट्रिक किया जाना उनका जीवन भर पीछा नहीं छोड़ता. दूर देश से आई सोफी मोल उनके साथ घर से भागते हुए डूब जाती है पर उसकी लाश से ज़िन्दगी की झलक उनका पीछा नहीं छोड़ता. राहेल कभी भूल नहीं पाती की अम्मू उसे थोडा कम ही चाहती है तो वेलुथा प्रसंग उजागर होने के बाद अम्मू का अपने दुखों के लिए बच्चों को कोसना, उनकी निर्दोष दुनिया को झझकोर देता है. lemondrinking man के हाथों एस्था का यौन शोषण उसे mute कर देता है.
पर सबसे त्रासद है, राहेल और एश्था का बिछड़ना. एक दुसरे से दूर हो दोनों अपनी जड़ों से उखड जाते है. 

वृहत यातनाओं का क्रूर तंत्र  
मामूली चीजों को उनका स्थान देते हुए उपन्यासकार की दृष्टि समाज के सनातनी और समकालीन अमानवीय व्यवस्थाओं को  नज़रअंदाज़ नहीं करती. सामाजिक व्यवस्थाएं, अकेले के सपनों, नकार को निषेधति निजी आकाँक्षाओं को त्रासद अंत की और ले जाती हैं और पाठक की मनोचेतना पर उनकी क्रूरता का गहरा प्रिंट छोड़ती हैं . 
कथा की मुख्यभूमि पर विस्तार दिए बिना देश की राजनितिक व्यवस्था का खोखलापन अपनी नग्नता में उभर आता है. भारत में साम्यवाद भी psychology of caste से लिप्त ही रह जाता है. ऊंची जाति की मर्यादा पर आंच आने पर कामरेड पिल्लई निष्ठ कार्यकर्ता वेलुथा से पल्ला झाड़ लेते हैं. 

जाति की पहचान अन्य किसी भी पहचान से बड़ी है. अछूत होना वेलुथा की सनातनी नियति है, भले ही इसाई समाज मानव की समानता को गाता फिरे. अछूत होकर जाति की देहरी लांघने की कीमत वेलुथा को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है. जाति मानस में इस कदर समाई है की वेलुथा का अपना बाप, वर्जित संबंधों को नकारने पर उसकी जान अपने ही हाथों लेने की बात करता है.

चाको कारखाने में कम करने वाली स्त्रियों का यौन शोषण कर भी अपने ख्यालों में कम्युनिस्ट है. भारत में वर्ग विभेद का नया चेहरा  शोषण के तंत्र की एक और धूरी बनता साफ़ दिखता है. 

सांस्कृतिक विभेद , जाति भेद की तरह ही स्तर दर स्तर की मापी न जाने वाली पिरामिड में समाज का अमानवीयकरण करती चलता है.  वर्ग भेद और सांस्कृतिक भेद का तनाव उपन्यास में लगातार बना रहता है. स्थानीय समाज में आदरणीय एप परिवार का ही चाको विदेश में पढ़ लिख कर भी मार्गरेट और उसके परिवार के बनाम सहमा रहता है. जुड़वाँ बच्चों और सोफी मोल का रिश्ता अपनी बुनियाद में सांस्कृतिक विभेद के पायदान पर ही टिका है. 

वातावरण, संरचना ,तकनीक और भाषा     
उपन्यास की मुख्य कथा केरल के Ayemenem में सेट की गयी है. कोट्टायम जिला लेखिका का अपना गृह जनपद है और इस मामले में उल्लेखनीय है कि हिन्दू मुस्लिम और इसाई समुदाय एक ही ज़मीन से अपनी उर्वरा पाते हैं. अलग धर्म विज्ञानों के रहते भी समाज का स्तरीकरण हर समुदाय कि खासियत है. विशेषकर सीरियन ईसाई समाज का चरित्र और इसके अंतर्विरोध कोट्टायम के ईसाई बहुल जनाख्या में कायदे से लक्षित होता है.  1979 का समय वह समय है जब कम्म्युनिस्ट आन्दोलन अपने जोर पर है और जाति का बंधन शिथिल नहीं हुआ है. उच्च वर्ग अंग्रेजी और अंग्रेजियत में ही पोषण पाता है.  
ऐसा वातावरण कथा को विश्वसनीयता प्रदान करता है. 

इक्कीस अध्यायों में बटी कथा, अपनी अरेखीय शैली के नाते उल्लेखनीय है. पूरी कहानी समय में कभी भूत तो कभी वर्तमान में आगे पीछे चलती है. घटना का ज़िक्र किसी अध्याय में आता है तो घटना किसी और अध्याय में विस्तार पाती है.ऐसी शैली का कुशल उपयोग उपन्यास की साहित्यिक सुन्दरता में बढ़ोत्तरी तो करता है पर सामान्य पाठक को समय की अरेखीय चाल से सामंजस्य बिठाने में दिक्कत जरुर होती है. उपन्यास अपने पाठन में लगातार सावधानी की मांग करता है.


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