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दीपक यात्री की रचनाएं



आँखें मटका कर 
निकलते जा रहे हैं दिन
मुठ्ठियों के रेत-सा
फिसलता जा रहा है - जीवन
शनै: शनै: क्षीण हो रही हैं
तुम्हारी स्मृतियाँ
पाथर होता जा रहा है - मन
प्रेम, हो सके तो मुझे माफ करना
प्रयोजन में होम हो जाने को, अब
न्योछावर कर दिया - यह जीवन। 
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सूरज ने धूप पूछकर नहीं बाँटे
हवाओं ने भी देखा नहीं चेहरा
चाँदनी हर आँगन उतरती रही
धरा ने भी सबको दिया बसेरा
फिर हमें यह किसने सिखाया
बटवरा रंग-रुप और दिलों का
ऊंच-नीच, झोपड़ी-महलों का
आओ, इंद्रधनुषी रगों की यहाँ
हम एक प्यारी नगरी बसाते हैं
एक सुर एक लय एक ताल में
हम, कोई नया तराना गाते हैं
हम प्रेम पुष्प है, प्रेम पल्लव हैं
प्रेम गुच्छ हैं चलो प्रेम लुटाते हैं।
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वह अभी सफर को निकला है और मुकाम ढूंढ़ता है
कितना पगला है, जो मिट जाऐगा वह नाम ढूंढ़ता है
यह कैसी हवस जाने कैसी दरिंदगी है उस आदमी में
हर एक घर में माँस का लोथड़ा जिस्मों-जान ढूंढ़ता है
यह रात एक दिन उसे, उस सुबह तक भी ले जाएगी
जो रास्तों में भटक गया है कदमों के निशान ढूंढ़ता है
दुनिया से भीड़कर भी अकेला खड़ा रहेगा वह आदमी
सूखी रोटी खा कर भी आज जो दीनो-ईमान ढूंढता है।
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लौट जाओ गाँव री
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ऐ गंगा 
ऐ माई
कहाँ तोहरा गाँव है री!
के हऊवे तोहर बाउ-मतारी
माई-सी नाक है का तोहरी
ई कपार बाउ सन है का री
कहाँ से खरीदी हो ई साड़ी
केतना हजार किलोमीटर में
पसरल ई तोहार अंचरा है री!
ऐ गंगा, ऐ माई कहाँ तोहरा गाँव है री!
चुप-चुप काहे बहती रहती है री
ई तोहार पाँव हअ कि विधाता के घड़ी
चलत-चलत थकती नहीं है का री
कहीं थमको, सुस्ताओ थोड़ा आराम करो
तहूँ हमार माई जैसी लगती हो
दिन हो की राती खटती ही रहती हो
ऐ बुढ़िया सुनती नहीं हो का री
ऐ गंगा, ऐ माई कहां तोहरा गाँव है री!
केहु गंध फेके, केहु थूक, केहु लाश
अब गुमसाईन-सी गंहात रहत हो
ऐ थेथर बुढ़िया तोहरा नाक नहीं का री!
काहे बहती हो ई कुत्तवन के बीच
इनका लिए माई-मौगी सब बराबर हैं
सब कसैया हैं, पाठी हैं सब छागर हैं
लौट जाओ बुढ़िया तुम अपना गाम
जहाँ रहो इज्जत से रहो, करो विसराम
ऐ बुढ़िया सुनती नहीं हो कान में तूर है का री!
मत बहो, मत बहो, लौट जाओ अपना गाँव री!
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मेरी कविताऐँ 
लाख की चूड़ियाँ हैं
दो अना दो की
उनके हाथ नहीं आए
कलाई जिनकी ढ़ाई
और माथा हाथीपाँव
क्योंकि यह माथे से 
पहनी जाती है
उभरती हैं 
चुभती हैं
कलेजे की कलाई पर
और खईंक बनकर
रह जाती है 
टनकती हुई घाव-सी
मेरी यह
लाख की चूड़ियाँ 
दो अना दो की। 
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परिंदे जहाँ से चले थे लौटकर वहीं आकर बैठ गए 
पगली आँखो का धोखा है, सफर में ऐसा होता है क्या
खंडहर कहकर जिसे हम खंडहर ही समझ लेते हैं
वहाँ भी कोई रहता है खंडहर कभी खंडहर होता है क्या
उथल-पुथल तो यहाँ हर एक घर में रहा करती है
मोहब्बत में झगड़ने का कोई और तरीका होता है क्या
किसी की सोच में कोई पले और जवान होता रहे
पगलों की किस्मत है यह, हरएक को नसीब होता है क्या। 
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गाँव से शहर के बीच की जमीं
बहुत ही दलदल हुआ करती है
भटकाव और घुप अंधरे से भरी
मैं हुँ कि यहीं कहीं भटक गया हूँ
शायद दलदल में धस गया हूँ
पर मैं बाहर आऊंगा एक दिन
क्योंकि मुझे घुटनेभर पानी में 
खेत जोतना चौकी देना 
धान रोपना आता है
मैं किसान का बेटा हूं
खून जलाकर फसल उगाना
सीखा नहीं है खून में है। 
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मैंने आज तक ऐसी पढ़ी नहीं 
पर मैं लिखना चाहता हूँ
लिखते-लिखते 
एक दिन लिखूँगा ही
छुच्छ भात-सी कविता
जीवन की सारी व्यंजनाओं से दूर
एकदम निर्वात
शून्य। 
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घास-पात, बथुआ-पटुआ, खेसारी-खेरही-मोंसरी सब लिखो
जब तक धार न आए, दाल-भात-तीमन-तरकारी सब लिखो
शब्द ना बनें तो सीलौटी पर पीस दो, खअल में रखकर कूट दो
खेत-पथारी, बोईन-पसारी, काकी-दाई, बाउ-महतारी सब लिखो।
इसलिए मत लिखो कि लिखकर नाम कमाना है, कुछ घर लाना है
लिखो कि लिखकर चैन से सोना है, मिट्टी का होना है सो सब लिखो
' पढ़कर नथुनी कहीं माने ना पुछे, जमुआरी वाली हिज्जे ही ना बुझे
सो मटियातेल में बोरकर, आँगन-पछुआर से जोड़कर- शब्द सब लिखो।
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 ब्लॉग: http://deepakyatri.blogspot.in/







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