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बाजारवाद के दौर में हिंदी पत्रकारिता: एक मूल्यांकन: शैलेन्द्र कुमार शुक्ल



यह भूमंडलीकरण का दौर है जहां बाजारवाद अपनी चरम अवस्था में परचम लहरा रहा है। मानवीय मूल्यों का व्याकरण बराबर बदल रहा है। इस बदलने की गति में जब जीवन के उद्येश्य भी बदले हैं तो उथल-पुथल तो स्वाभाविक है, इसका फायदा लगातार बाजारवाद उठा रहा है। बाजार और बाजारवाद में घनीभूत अंतर है। बाजारवाद एक वृति है जो जीवन को मूल्यों से अलग करने का काम करती है। जहां भ्रांति ही एक पराकाष्ठा बन गई हो वहाँ निश्चित तौर पर विकल्पों की भीड़ दिखाई देगी। यह भीड़ सम्पूर्ण जीवन के पारंपरिक वितान को भाड़ में झोकने के लिए व्यापक भूमिका का निर्वहन करती है। ऐसे में मानवीय मूल्यों को बचाने के लिए व्यक्ति की सामाजिक लोकवादी चेतना को जागृत करना बहुत जरूरी काम है। यह काम पत्रकारिता अपने युगानुरूप करती आई है। पत्रकारिता को जिस पक्षधरता की जमीनी ताकत मिलती है उसी के साथ खिलवाड़ करना कहाँ तक जायज है यह सोचने का विषय है। 

भारतीय पत्रकारीय मूल्य अपनी आधुनिकता के अतीत में अधिक मूल्यवान थे। स्वतन्त्रता आंदोलन का इतिहास इसकी गवाही के लिए काफी है। आज पत्रकारिता अपनी ईमानदारी से दूर एक ठगी हुई समझदारी बन कर रह गई है। यह पत्रकारिता के पुरोधाओं को सोचना चाहिए था लेकिन बौद्धिकता की नीलामी जब पत्रकारिता की आवश्यकता बन गई हो तब यह सोचना कम खतरनाक नहीं है। इस तरह आज के समय में पत्रकारिता को बाजारवाद की जड़ों में परखना बहुत जरूरी काम है। इसका मूल्यांकन होना चाहिए। 

पत्रकारीय मूल्य समाजपरक होने चाहिए। यह बात आज याद दिलाई जा सकती है। जब पूंजीवादी दौर में भूमंडलीकरण की चपेट से चरमराई हुई दुनिया हमारे सामने हो तब ऐसी बात कही जा सकती है। यह बात उस समय सोची भी नहीं जा सकती थी जब पत्रकारिता अपने आधुनिकीकरण के दौर से गुजर रही थी। आधुनिकता एक बड़ा जीवन मूल्य है। समय में जीवन्तता का विराट स्वर आधुनिकता की गहनता से आता है। यह गहनता प्रगति के पथ पर नैसर्गिक चेतना से आती है। पत्रकारिता भारतीय परिदृश्य में एक अदम्य जीवटता के साथ उभरी थी। इसके प्रश्न मनुष्यता के हित मे स्वतन्त्रता की लड़ाई में सामील थे। यहाँ स्वतन्त्रता से आशय सिर्फ आजादी की लड़ाई से नहीं, उस लड़ाई से भी था जो मनुष्यता को रूढ़ियों की जटिल संरचना से मुक्ति दिलाये। यह लड़ाई सिर्फ देश हित की नहीं मानवीय मूल्यों की पक्षधरता की भी थी। अपने शुरुआती दौर में जनमाध्यमों के अभाव में भी भारतीय पत्रकारिता ने वह सब किया जिसे आज याद किया जा सकता है। तब मीडिया निजीकरण का शिकार नहीं थी, विद्वानों की निजता समाजिकता की आकांक्षी हुआ करती थी। 

आर्थिक अभाव के युग में मूल्यों की वैज्ञानिकता का एक इतिहास भारतीय पत्रकारिता ने रचा। पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों के माली हालात पाठकों से छिपे नहीं हैं। लेकिन उनमे मानवीय जिजीविषा का अकूत उत्साह भरा था, जो पत्रकारिता को नवजीवन देता था। स्वतन्त्रता आंदोलन के दौर में राजसत्ता के समर्थन से निकलने वाले पत्र-पत्रिकाओं की स्थिति तो आर्थिक रूप से संवृद्ध थी लेकिन स्वतंत्र पत्रकारिता के जुनूनी पत्रकारों की आए दिन आर्थिक और राजनीतिक संकट की मार उन्हें घायल करती रहती थी। यह उस समय का दौर था जब पत्रकारों को पुरस्कारों के रूप मे सजाएँ मिला करती थीं, पत्र-पत्रिकाओं पर जुर्माना ठोके जाते थे, बुद्धिजीवियों पर वारंट कटे जाते थे, रचनाएँ जप्त कर ली जाती थी। यह वह दौर था जब पत्रकारिता चंदे से चलती थी। 

पत्रकारिता के इस राष्ट्रीय आंदोलन का गढ़ कलकत्ता था। यहाँ से अंग्रेजी और बंगला के ही नहीं हिंदी के अखबारों का भी चलन शुरू होता है। इन अखबारों में भारतीय पत्रकारिता के मूल्यों का विकास दिखाई देता है। उस समय जो स्थिति थी उसी का प्रस्फुटन ही भारतीय पत्रकारिता के रूप में प्रकट हुआ। विजय दत्त श्रीधर ‘पत्रकारिता-कोश’ में इसका जिक्र कुछ इस प्रकार करते हैं-“ईस्ट इंडिया कंपनी जिसका मूल उद्देश्य व्यापार-वाणिज्य था, अंततः पोर्टगीज, डच, और फ्रेंच प्रतिस्पर्धियों के संघर्ष में विजेता बन कर उभरी और प्लासी के युद्ध में विजय के बाद उसने भारत में अपना साम्राज्य खड़ा कर लिया। बादशाह शाह आलम से सान 1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उढ़ीसा की दीवानी मंजूर होने के बाद वैधानिक स्वरूप भी प्राप्त हो गया। सान 1835 में ईस्ट इंडिया कंपनी की वाणिज्यिक गतिविधियां एक किनारे हो गईं और वह सत्ता केंद्र के रूप में स्थापित हो गई। भारत में पत्रकारिता का प्रादुर्भाव इसी पृष्ठभूमि में हुआ। प्रारम्भिक समाचार पत्रों का प्रकाशन ईस्ट इंडिया के असंतुष्ट कर्मचारियों द्वारा किया गया। समाचार पत्रों के प्रकाशन की ओर वे इसलिए प्रवृत्त हुये क्योंकि वे अपनी घुटन को अभिव्यक्ति देना चाहते थे।”1

इस तरह हम देखते हैं कि पत्रकारिता के शुरुआती दिन भारत में एक जंतांत्रिक बन कर उभरे थे। यहाँ यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सत्ता से असंतुष्ट वर्ग की एक मजबूत आवाज बन कर पत्रकारिता का विकास भारत में हुआ। इस रास्ते के कई खतरे थे लेकिन पत्रकारिता अपने मूल्यों के साथ उभरी। पहले अंग्रेजी में पत्र निकले फिर बंगला में और हिंदी में तथा अन्य भारतीय भाषाओं में पत्रकारिता कि भरपूर आवाज सुनाई पड़ने लगी। इस पत्रकारिता के साथ जनता की सत्ता के प्रति असंतुष्टता बराबर रंग लाती रही। और या अपनी जमीनी ताकत के साथ उभरी। हिंदी का प्रथम पत्र ‘उदन्त मर्तण्ड’ कलकत्ता से 1826 में पंडित युगल किशोर शुक्ल के सम्पादन में निकला। यह पत्र क्यों निकला इसका जिक्र पत्र के पहले अंक में किया गया है- “यह ‘उदन्त मर्तण्ड’ अब पहिले पहल हिंदुस्तानियों के हित के हेतु जो आज तक किसी ने नहीं चलाया पर अंगरेजी ओ फारसी ओ बंगले में जो समाचार का कागज छपता है उसका सुख उन बोलियों के जान्ने और पढ़ने वालों को ही होता है......देश के सत्य समाचार हिंदुस्तानी लोग देखकर आप पढ़ ओ समझ लेंय ओपराई अपेक्षा जो अपने भावों के उपज न छोड़े, इसलिए बड़े दयावान करुणा ओ गुणिन के निधान सबके कल्याण के विषय श्रीमान गवर्नर जेनरल बहादुर की आयस से ऐसे चाहत में चित्त लगाय के एक प्रकार से यह नया ठाट-ठाना...”2 इस तरह हिंदी का पहला पत्र अपने हितों को ध्यान में रखते हुये निकला।


हिंदी पत्रकारिता दिन प्रतिदिन अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करती हुई प्रगति के पाठ पर अग्रसर हुई। सम्पूर्ण भारत से पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशन का एक सिलसिला चल पड़ा। सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं का इतिहास आज हमारे सामने है। इन पत्र-पत्रिकाओं में भारतीय पत्रकारिता के मूल्य निहित है। आजादी कि लड़ाई में इंका अभूतपूर्व योगदान है। इस दौर के संपादक और लेखक सामाजिक, राजनीतिक, और आर्थिक स्थितियों से जनता को रूबरू करा रहे थे, धार्मिक रूढ़ियों से समाज को मुक्त करने की पक्षधरता इस दौर की बड़ी उपलब्धि है। प्रताप नारायण मिश्र के सम्पादन में निकालने वाले पत्र ‘ब्राह्मण’ में छपी एक टिप्पणी देख कर इसे समझा जा सकता है- “सरस्वती तो हमारे पेट में बसती है...जो सबका सर्वस्व हमारे पेट में ठांस-ठांस कर न भरे वही नास्तिक। जो हमारी बेसुरी तान पर वाह ! वाह ! न किए जाए वह कृश्तान और हमसे जो चूँ भी न करे वह दयानंदी।”3 इस तरह की बेबाक प्रतिक्रिया के मूल्यों के साथ हिंदी पत्रकारिता का विकास हुआ था। यह पत्र आर्थिक संकट से गुजरने के बावजूद अपनी सम्पूर्ण तत्परता से समाजिकता के पथ पर मनुष्यता के हित और अधिकारों कि लड़ाई लड़ता रहा। वर्तमान सत्ता के लगातार टकराता रहा, यह इसकी जीवटता का प्रतीक है। 

भारतीय पत्रकारिता के जीवन मूल्य क्या थे इसका एक और उदाहरण बलकृष्ण भट्ट के सम्पादन में निकलने वाले पत्र ‘हिंदी प्रदीप’ में भी देखा जा सकता है। यह पत्र भारतीयता की अटल आकांक्षाओं के लिए लड़ता हुआ जुर्माने की मार से बंद हुआ। “हिंदी प्रदीप हिंदी का एक ऐसा पत्र है जिसे एक राष्ट्रीय कविता छपने के कारण तीन हजार रुपये कि जमानत न दे पाने पर पत्र का प्रकाशन बंद कर देना पड़ा।”4 यह 31 वर्ष तक लगातार निकलता रहा।

इस तरह हम देखते हैं कि भारतीय पत्रकारिता अपने जीवंत मूल्यों में एक बड़ा वितान रचती है। आधुनिकता का यह अतीत अपना गौरवशाली इतिहास लिए हुये है। स्वतन्त्रता के बाद भारतीयता के जीवनमूल्यों में एक परिवर्तनकारी दौर की शुरुआत होती है। यह आजादी के मोहभंग के रूप में पहले कमजोर हुआ फिर जैसे जैसे देश पूंजीवादी ढांचे में अपने को तब्दील करता गया ,संचार मीडिया उनके हाथ की कठपुतली बनता चला गया। 

जिस तरह साम्राज्यवाद के गर्भ से पूंजीवाद का उदय हुआ उसी तरह पूंजीवाद से भूमंडलीकरण का रास्ता खुला। दरअसल भूमंडलीकरण वैश्वीकरण की एक चाल है। यह जो पूरी दुनिया को एक गाँव में तब्दील कर देनी की एक परिभाषा भूमंडलीकरण के पुरोधाओं ने गढ़ी है, यह पूंजीवादी स्वप्न को साकार करने की एक ओछी मानसिकता है। यह विविधता के प्राकट्य भाव को प्रकृतिक मूल्यों से अलग करना चाहते हैं। यह पूरी दुनिया को एक सूत्र में छल लेने के आकांक्षी हैं। भूमंडलीकरण का स्वप्न प्रद्योगिकी और तकनीकी को एक कल्चर के रूप में समाज में ला रहा है। जहां समाज की स्वायतता और निजता पर एक रणनीति के रूप में प्रहार किया जा रहा है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि प्रद्योगिकी और तकनीकी को एक अस्त्र के रूप में प्रयोग करना खतरनाक है, इसका उपयोग मनुष्यता के हित में भी हो सकता है। लेकिन इन सब पर जिस वर्चस्वशाली वर्ग का कब्जा है, वह साम्राज्यवादी नीतियों के अनुयाई पूंजीवादी लोग हैं। आज पत्रकारिता भी इन्हीं के हाथों की कठपुतली बन कर रह गई है।

इधर कुछ वर्षों से ‘बाजारवाद’ शब्द का चलन काफी बढ़ा है। यह एक नई चाल है। अर्थशाश्स्त्र का सहारा लेकर कुछ पूंजीवादी भट्टाचार्याओं ने नई भड़न्त बकनी शुरू की है कि बाजारवाद अर्थशास्त्र के शब्दकोश में ही नहीं है। यानी ये धुरंधर इस शब्द को अर्थशास्त्र में आने से रोकने के लिए पूरी ताकत से लगे हुये हैं। दरअसल बाजारवाद एक जाल का नाम है जो इधर तेजी से फैल रहा है। यह पूंजीवाद का एक धारदार हथियार है, जो अपनी चपेट में लेकर व्यक्ति की निजता और स्वायत्तता को बेचने पर मजबूर करता है। इसका उदय दुनिया के ‘डिजिटलीकरण’ के साथ हुआ है। दुनिया तेजी से जिस कदर डीजटल हुई बाजारवाद ने उसे हथिया लिया। यहीं से पत्रकारिता के मीडिया होने की कहानी शुरू होती है। पहले मीडिया शब्द इतना प्रचलित नहीं था। आज पत्रकारिता के मूल्य जनवादी नहीं रहे, इसका बड़ा कारण ‘डिजिटलीकरण’ है। आज एक पत्रकार अपनी निजता और स्वायत्तता को बेचे बिना मीडिया की दुनिया में कुछ भी नहीं कर सकता। अब पत्र-पत्रिकाओं के जमाने लदते जा रहे हैं, यह समय टेलीविज़न और इंटरनेट पर चैनल-बाजी का है। और चैनल पूंजीपतियों के उद्योग या कारखाने। जहां खबरे हॉट करके ही बेची जाती है, वहाँ विज्ञापन प्रायोजित दौर को हमारे यहाँ बजारवाद कहा जाता है। बाजारवाद के बारे में कुछ सैद्धांतिक तथ्य भी देखने जरूरी हैं। क्योंकि यह टर्म पश्चिम से ही आया। पश्चिम के धनी देशों के लिए पूरब के विकाशशील तमाम देश बाजार का मैदान बने हुये हैं। जहां वह चीजों को बेचने में सफल हो रहे हैं। बहरहाल एक महत्वपूर्ण परिभाषा को कोड करते हैं। बेंजामिन गिंसबर्ग का कहना है कि “पश्चिमी सरकारों ने बाजार कि कार्यप्रणाली का इस्तेमाल लोकप्रिय परिप्रेक्षों और भावनाओं को नियंत्रित करने में किया। ‘विचारों का बाजार’ जो उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के दौरान बना था, वस्तुतः उच्च वर्गों के विश्वासों और विचारों का प्रचार और निचले वर्गों कि विचारधारात्मक और सांस्कृतिक स्वतन्त्रता को दबाने का काम करता है। इस बाजार के निर्माण के जरिये पश्चिमी सरकारों ने सामाजिक आर्थिक स्थिति और विचारधारात्मक शक्ति के बीच मजबूत और स्थायी कड़ियाँ निर्मित की हैं, और उच्च वर्गों को इस बात कि इजाजत दी है कि वे अपने बीच से ही किसी अन्य के पिष्टपोषण के लिए एक दूसरे का इस्तेमाल करें।...खास तौर पर तौर पर सयुंक्त राज अमेरिका में विचारों के बाजार पर छाए रहने में उच्च और उच्च-मध्यवर्गों की क्षमता ने आम तौर पर इन तबकों को इस बात की इजाजत दी है कि वे समूचे समाज के राजनीतिक यथार्थबोध को और राजनीतिक तथा सामाजिक संभावनाओं को अपने तरीके से गढ़ें। पश्चिमी लोग जहां आम तौर पर बाजार को विचारों की आम स्वतन्त्रता के बराबर मानते हैं, वहीं बाजार का गुप्त हाथ नियंत्रण के औज़ार के रूप में उतनी ही संभावनाएं लिए होता है, जितनी राज्य कि लौह भट्ठी।”5

इस तरह हम देखते हैं कि बाजार एक राजनीतिक और आर्थिक रणनीति के तहत प्रणाली के रूप में काम कर रही है। इस टिप्पणी के बारे में प्रोफेसर नोम चोमस्की लिखते हैं- “गिंसबर्ग के इस निष्कर्ष में कुछ प्रारम्भिक सत्यभास मौजूद हैं। यह एक निर्देशित मुक्त बाजार के कामकाज को लेकर उन प्रस्थापनाओं पर आधारित है जो विशेषतया विवादास्पद नहीं हैं। संचार माध्यमों के वे हिस्से, जिनकी पहुँच एक अच्छे-खासे पाठक/श्रोता वर्ग तक हो सकती है, बड़े निगम ही हैं और वे अपने से भी कहीं ज्यादा बड़े उद्द्योग समूहों से जुड़े हुये हैं। अन्य व्यापारों की तरह ही वे एक उत्पाद ख़रीदारों को बेचते हैं। उनका बाजार है विज्ञापनदाताओं का वर्ग और उनके ‘उत्पाद’ हैं पाठक-दर्शक-श्रोता। इसमें भी उनका खास पूर्वग्रह अपेक्षाकृत धनी पाठक-दर्शक-श्रोता की ओर होता है, जिनके कारण विज्ञापन की दरें बढ़ जाती हैं।”6 

इन तथ्यों के आधार पर हम देखते हैं की संचार माध्यम किस तरह बिकी हुई प्रणाली का प्रतिरूप है। आज उच्च वर्ग के पास एक अपना मध्य वर्ग है जो उसके इसरे पर नाचता है। निम्न मध्यावरग और निम्न वर्ग इन दोनों वर्गों को लगातार शिकार होता राहत है। यह ठगी का एक तंत्र है। आज प्रिंट मीडिया धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोती जा रही है, और इसमे जो दिखाई दे रहा है वह एक किस्म का चमकीला मुलम्मा बन कर रह गया है। समाचार पत्रों की जगह दिन-रात एक कर न्यूज गरम करने वाले टी वी चैनलों ने छीन ली है। इधर डी.टी.एच/डीटूएच जैसे उपकरणों ने निम्न-मध्य वर्ग पर अपना पूरा रुतबा जमा लिया है। इन पर चेनलों की पूंजीवादी दुकानों का एक अंबार लगा हुआ है जिस पर लगातार बाजारू नाटकीयता अपनी छाप इस वर्ग पर डाल कर जीवन-मूल्यों में एक भ्रम पैदा कर रही है। यह भ्रम इतना भयानक है कि इसके अगोस में एक भरी-पूरी पीढ़ी निरापद विचारशून्यता में जी रही है। और यही पीढ़ी अपने पूरे वर्ग के साथ देश के चुनाओं में बड़ा हिस्सा बन कर उभरती है। आज वार्ड मेम्बर से लेकर प्रधानमंत्री तक का चुनाव यही जनता कर रही है, जो निरापद विचारशून्यता के भयावह रोग से ग्रसित है। यह रोग जनता के बीच पैदा करने का काम हमारे उच्च-वर्ग की पूंजीवादी आकांक्षाओं का सफल परिणाम है। अब चुनावी माहौल चेनल बनाते हैं। भारत के 2014 के लोक सभा चुनाव इन्हीं टीवी चैनलों द्वारा लड़े गए। जहां इसी तैयार की गई जनता ने पक्ष के प्रतिपक्ष के लिए विपक्ष की जगह ही नहीं छोड़ी। यह सब एक बनी बनाई रणनीति के तहत हो रहा है। चैनलों का कोई भी जनपक्षधर मूल्य नहीं। एक जनता को उनके मतलब की चीजें न दिखाकर अपने प्रयोजन की सामाग्री लगातार परोसते हैं। यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि इनके समाचारों में जनांदोलनों पर समाचार देने के लिए वक्ता नहीं लेकिन एक राजनेता के अंतिम संस्कार का लाइवकास्ट लगातार दिखते हैं। यह है हमारी मीडिया, यानी आज की मीडिया का दोगला चरित्र।

निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि हमारे सामने बदले हुये दौर का एक विशाल ऊसर मैदान पड़ा है। अब हम इसमे कहाँ तक भारतीयता के जीवन मूल्यों को तलाशें इसकी भी एक सीमा है। जो भी हो हम अखिलेश अखिल के शब्दों में कह सकते हैं- “शायद आप को यकीन न हो, लेकिन सच्चाई यही है कि पत्रकारिता वेश्या बन गई है और पत्रकार बन गए हैं दलाल। वेश्या बनी पत्रकारिता खूब बिक रही है। लोगों के बीच इसकी काफी मांग है। ऐसी पत्रकारिता के दलालों की खूब चल रही है। पाठकों के बीच इन दलालों की इज्जत है। समाज में इनकी प्रतिष्ठा है, रौब है।”7 



संदर्भ-सूची 

1. श्रीधर,विजय.(2010).भारतीय पत्रकारिता कोश.नई दिल्ली, वाणी प्रकाशन. पृष्ठ 11 

2. वहीं. पृष्ठ 55

3. वहीं. पृष्ठ 337

4. वहीं. पृष्ठ 258 

5. नोम चोमस्की (2006). जन माध्यमों का मायालोक.दिल्ली, ग्रंथ शिल्पी. पृष्ठ सं. 17 

6. वहीं पृष्ठ 17-18 

7. अखिल,अखिलेश.(2009) मीडिया: वेश्या या दलाल.नई दिल्ली,श्री नटराज प्रकाशन, पृष्ठ 229



शोध-छात्र, हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग 
म.गां.अं.हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा 
Mob- 07057467780
 

 [साभार: जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका]
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