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सांस्कृतिक धरोहर के संवाहक –प्रवासी भारतीय: शशि पाधा


सांस्कृतिक धरोहर के संवाहक –प्रवासी भारतीय





शशि पाधा
Email; shashipadha@gmail.com


भारतीय संस्कृति के प्रचार और प्रसार का सर्वाधिक श्रेय उन साहसी एवं उत्साही भारतवासियों को जाता है जिन्होंने समय समय पर विदेश गमन करके विभिन्न देशों में भारतीय उपनिवेशों की स्थापना की| भारत से सुदूर उन उपनिवेशों में भारतीय संस्कृति, सभ्यता और धर्म प्रचारं को दृष्टि में रख कर कई केन्द्र स्थापित किए और अपने सम्पर्क में आने वाले विदेशियों के मन में भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रति विशेष आकर्षण जाग्रत किया| बरसों पहले सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्मं के प्रचार-प्रसार के लिए अपने पुत्र, पुत्री को श्री लंका भेजा और अपने भाई एवं अन्य दूतों को मिस्र, सीरिया, अफगानिस्तान, इण्डोनेशिया आदि देशों में भेजा| इस तरह भारतीय संस्कृति इन देशों में पहुँची और पुष्पित-पल्लवित होती रही| इसी प्रकार हमारी संस्कृति, भाषा, साहित्य और धर्म विश्व के कोने कोने में पहुँच गया| जापान, मंगोलिया, फिलीपाइन, इण्डोनेशिया, साइबेरिया, चीन, जावा, सुमात्रा आदि देशों के निवासियों ने हमारी संस्कृति को सराहा और उसके मुख्य अंशों को अपने दौनिक जीवन एवं अपनी संस्कृति में सहर्ष सम्मिलित कर लिया|

सर्व विदित है कि मौरेशियस, फिजी, त्रिनिदाद, सूरीनाम आदि देशों में जब भारतीय आजीविका कमाने के लिए गए तो वे अपने धार्मिक ग्रन्थों के साथ अपनी परम्पराएँ, रीति-रिवाज़ और संस्कृति को भी ले गए| सुना है कि उन्हें अपने धार्मिक त्योहारों को मनाने का अधिकार नहीं था किन्तु फिर भी चोरी छिपे वे लोग पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी संस्कृति की रक्षा करते रहे और इसके प्रचार में सदैव प्रयत्नरत रहे| आज जब इन देशों के लोगों से मिलना होता है इनके पास भाषा और सांस्कृतिक सम्पदा की निधियाँ देख कर सुखद आश्चर्य होता है|

इस सन्दर्भ में मेरे पास यही तर्क है कि विदेशों में जाने वाले भारतीय वहाँ केवल शारीरिक रूप से नहीं जाते, अपने भौतिक सामान के साथ वे अपने मन की गठरी में चुपचाप अपनी संस्कृति, जीवन मूल्य और परम्पराएँ बाँध के ले जाते हैं और विदेशी धरती पर बड़े यत्न से इस धरोहर के रक्षण और संवर्धन में जुटे रहते हैं|

अमेरिका जैसे विशाल देश में भी भारत के विभिन्न प्रान्तों से बुद्धिजीवी आजीविका कमाने, व्यापार के कारण अथवा उच्च शिक्षा प्राप्ति के ध्येय से आते हैं| पाश्चात्य संस्कृति भारतीय संस्कृति से बिलकुल भिन्न है| आते ही उनकी मन:स्थिति अपनी मिट्टी से उखड़े हुए और दूसरे स्थान पर आरोपित किये हुए पेड़ की तरह हो जाती है| कुछ दिन नई जगह, नये वातावरण में व्यवस्थित हो कर खोज आरम्भ हो जाती है, उन संस्थाओं, समुदायों की जहाँ वो अपने मन की गठरी को खोल कर अपनी परम्पराओं के साथ पूर्णतया जी सकें| पाँच हजार वर्ष पुरानी हमारी संस्कृति ही हम भारतीयों की आत्मा है और मैंने उस अमूर्त आत्मा का अमेरिका में शाश्वत और मूर्त रूप देखा है| चाहे कोई समुदाय हो, कोई प्रांतीय त्योहार हो, कोई धार्मिक पर्व हो, इस देश में प्रवासी भारतीय मिलजुल कर, बड़े उत्साह के साथ उसे मना कर विदेशी धरती पर “वसुधैव कुटुम्बकम” और “सर्वधर्म सद्भाव” जैसे समरसता और एकता का पाठ पढ़ाने वाली भारतीय संस्कृति की धरोहर को और समृद्ध करने में एकरूप हो जाते हैं| 

चूँकि अमेरिका में भारत की तरह हर भारतीय त्योहार पर छुट्टी नहीं होती, इसीलिए हर त्योहार शनिवार या रविवार को मनाया जाता है| लोग अधिकतर मन्दिरों के प्रांगण, किसी कम्युनिटी सेंटर, स्थानीय चर्च या स्कूल के खेल-मैदान में एकत्रित होते हैं| सभी परिवार पूरी भारतीय वेशभूषा में सजधज कर आते हैं और त्योहार का आनन्द लेते हैं| यहाँ भारतीय पोशाकें और मिठाइयाँ प्रचुर मात्रा में बिकती हैं, यहाँ तक कि पूजा की सामग्री और व्रत में खाई जाने वाली चीज़ें हर भारतीय स्टाल में आसानी से उपलब्ध हो जाती है| होली, दीवाली, गणेश चतुर्थी, उगाधि, बीहू, कृष्ण जन्माष्टमी, दुर्गा पूजा, ईद, गुरपूरब आदि भारतीय त्योहार मनाने की तैयारी कई सप्ताह पहले ही बड़े जोर शोर के साथ हो जाती है| 

अमेरिका में गुजराती समुदाय के लोग बहुत मात्रा में बसे हुए हैं| नवरात्रि इस समुदाय का महत्वपूर्ण त्योहार है| इस अवसर पर पूरे सात दिन लोग संध्या के समय एकत्रित होकर डांडिया और गरबा नृत्य का आयोजन करते हैं| केवल गुजराती ही नहीं, अन्य प्रान्तों के लोगों के साथ यहाँ के निवासी भी इस मनमोहक नृत्य में भाग लेते हैं| ऐसे भव्य आयोजनों को देख कर लगता है कि जैसे छोटा सा भारत कुछ दिनों के लिए अतिथि रूप में अमेरिका में आ बसा हो|

होली के दिनों में तो अधिकतर अमेरिका के राज्यों में हिमपात हो रहा होता है, फिर भी हिम की शीतलता प्रवासी भारतीयों के उत्साह को ठंडा नहीं कर पाती और लोग स्वेटर–जैकेट पहन कर भी सामूहिक रूप से अबीर-गुलाल के रंगों में रंग जाते हैं| यहाँ के बहुत से राज्यों में “हरे रामा हरे कृष्णा” समुदाय के मंदिर बने हुए हैं| इन मंदिरों में गौशालाएँ भी बनी हुई हैं| ऐसे पवित्र स्थान पर भारतीय और इस धर्म को मानने वाले अमेरिकी भी पीली धोती और कुरते में सजे हुए सर पर चोटी रखे हुए कृष्ण लीलाएँ करते दिखाई देते हैं| ऐसे समारोहों में जाकर लगता है मानों हम गोकुल-वृन्दावन की गलियों में घूम रहे हों|

कुछ वर्षों से अमेरिका के मुख्य राज्यों में दशहरे का उत्सव बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है| इस महाद्वीप के दक्षिण दिशा के टेक्सस प्रान्त में और नॉर्थ केरोलाईना राज्य में दशहरे की धूम की छटा तो कई दिनों तक लोगों के मन-मस्तिष्क में घर लेती है| नॉर्थ केरोलाईना के मुख्य नगर मोरिसविल्ल के मंदिर के भव्य हॉल में पहले राम लीला का आयोजन होता है और फिर उसी शाम को रावण और लंका दहन की रस्म निबाही जाती है| कई दिन पहले ही राम लीला के लिए तैयारियाँ होती है, रावण, मेघनाद और कुम्भकर्ण के पुतले बनाए जाते हैं| सूर्यास्त के समय स्थानीय मंदिर के विशाल पार्किंग परिसर में लंका दहन का मंचन होता है| पटाखे –आतिशबाजियों से भरे इन पुतलों को जलाया जाता है| इस आयोजन में लगभग 20 हज़ार लोग भाग लेते हैं| उत्सवों के इन सामूहिक आयोजनों से एक बात तो स्पष्ट है कि प्रवासी भारतीयों की नई पीढ़ी अपनी परम्पराओं, रीति रिवाजों से पूरी तरह परिचित हैं और आगे आने वाली पीढ़ी के लिए जीवित रखना चाहते हैं| इस प्रकार वे विदेश में रहते हुए भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हैं| 

उत्सव मेलों की तरह यहाँ शादी ब्याह भी पूरे पारम्परिक तरीके से सम्पूर्ण होते हैं| दुल्हे के लिए घोड़ी, दुल्हन के लिए डोली और बारातियों के लिए ढोल नगाड़े आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं| सम्पूर्ण भारतीय स्वादिष्ट व्यंजनों की सुगंध से भरी भारतीय थालियों में ही भोजन परोसा जाता है| प्रवासी भारतीय इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं कि शादी ब्याह पर पूरा भारतीय वातावरण ही संजोया जाए| जहाँ तक कि विवाह मंडप, वेदी, मंगल कलश आदि सजावट की सामग्री पर विशेष ध्यान दिया जाता है| 

प्रवासी भारतीयों के लिए चिंता का एक प्रमुख कारण है कि किस प्रकार राष्ट्रीय भाषा हिन्दी, मातृ भाषा और हमारी धनी भारतीय संस्कृति को विदेशी धरती पर भी अक्षुण्ण रखा जाए, उसका संवर्धन हो और इसे नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए| अगर साहित्य समाज का दर्पण होता है तो भाषा उसका माध्यम| अमेरिका में विश्व हिन्दी समिति, विश्व हिन्दी न्यास, हिन्दी यू एस ए, हिन्दी विकास मंडल, आदि अनेक स्वयंसेवी संस्थाएं हैं जो हिन्दी को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए अथक प्रयत्न करती हैं| इन संस्थाओं के द्वारा मंदिरों में शनिवार –रविवार को कक्षाएँ चलाई जाती हैं जहाँ बच्चे भाषा के साथ साथ अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों से भी जुड़े रहते हैं| विदेशियों में भारत के धर्म, संस्कृति, योग, ध्यान, आयुर्वेद और ज्योतिष विद्या को समझने की जिज्ञासा है और वे इन चीजों को भारत की मूल भाषा में ही समझना चाहते हैं। इस आकर्षण का आभास मुझे तब हुआ जब अमेरिका में ‘नार्थ केरोलाईना विश्वविध्यालय एट चैपल हिल’ के दक्षिण एशिया विभाग के हिन्दी विभाग में मेरी हिन्दी प्रोफेसर की नियुक्ति हुई| वहां भारतीय मूल के विद्यार्थियों के साथ विश्व के अन्य देशों के विद्यार्थियों को अपनी सुसंस्कृत, वैज्ञानिक भाषा को पढ़ाते हुए मुझे अत्यंत संतोष का अनुभव हुआ| कई पीढिय़ों से विदेशों में बस चुके भारतीय अपनी संस्कृति की भाषा को संरक्षित रखने का सदैव प्रयत्न करते रहते है| उनके रोजगार की भाषा चाहे जो भी हो लेकिन घर की भाषा हिंदी या, मातृ भाषा ही होती है।

“योग” भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है| भारतीय मूल के लोगों के साथ अमेरिका के मूल निवासियोंऔर इस महाद्वीप में बसे अन्य प्रवासियों में भी “योग साधना” को ठीक तरह से सीखने का विशेष उत्साह है| अमेरिका के कई स्थानों पर भारतीयों द्वारा “योग शिक्षा” का आयोजन किया जाता है| गर्मी की छुट्टियों में यौगिक शिविर लगते हैं जहाँ शिक्षार्थी यौगिक क्रियाओं को सीखते हैं| “योग” मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बिना औषधि का इलाज है| इसके प्रति सार्वभौमिक आकर्षण को समझते हुए 11 दिसम्बर 2014 को सँयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने 21 जून का दिन “विश्व योग दिवस” के रूप में घोषित किया था । संयुक्त राष्ट्र की उस घोषणा में कहा गया था “योग व्यक्ति के तन और मन को स्वस्थ बनाता है| योग के प्रसार से दुनिया के निवासी अधिक स्वस्थ रहेंगे|”

प्रवासी अपने साथ अपना संगीत, नृत्य और अन्य ललित कलाएँ भी तो उस गठरी में बांध के लाए हैं| अगर भारत से सोफ्टवेयर इंजीनियर और चिकित्सक यहाँ जीविका कमाने आए हैं तो उनके साथ इन ललित कलाओं में पारंगत उनकी पत्नियाँ भी तो घर बसाने आई हैं| इनके द्वारा बहुत सी ऐसी शिक्षण संस्थाएँ चलाई जा रही हैं जहाँ नन्हें नन्हें बच्चों को संगीत के साथ साथ नृत्य की विभिन्न शैलियों में शिक्षा दी जाती है| विदेशों में भारतीय संस्कृति के प्रसार में संगीत एक महत्वपूर्ण कड़ी है| यहाँ के भारत-वंशी अपनी नई पीढ़ी को संगीत की शिक्षा देने में उत्साहित रहते हैं| वर्ष में कई बार भारत से भी प्रसिद्ध गायकों, नाट्यकारों और नृत्यशास्त्र में धनी कलाकारों को आमंत्रित किया जाता है| इन कार्यक्रमों में बहुत से अमेरिका में बसे अन्य देशों के निवासी भी भाग लेते हैं| बहुत से अमेरिकी युवा भारतीय वाद्य जैसे सितार, तबला, बांसुरी सीखते हैं| इस प्रकार हम भारतीयों का मधुर संगीत बहुत से अमेरिकी संस्थानों में गूंजता सुनाई देता है|

कुछ दिन पहले मैंने टीवी पर केनेडा के युवा प्रधानमंत्री को शुद्ध भारतीय परिधान में अन्य भारतीयों के साथ भांगड़ा नृत्य करते देखा| उस समय मेरे मन में विचार आया कि राजनैतिक या साम्प्रदायिक उपनिवेशवाद के दिन अब बदल रहे हैं । एक विश्व की बात सोचने के साथ ही एक संस्कृति को भी ध्यान में रखना होगा । प्रचलित अनेकानेक संस्कृतियों के उपयोगी एवं महत्वपूर्ण अंश यदि एक स्थान पर एकत्रित कर दिये जायें तो उसका स्वरूप एक देवसंस्कृति जैसा बन जाएगा| 

“वसुधैव कुटुम्बकम्” भारतीय संस्कृति का मूल मन्त्र है और वो दिन दूर नहीं कि इस महामंत्र की विश्व के हर छोर पर गूँज होगी| प्रवासी भारतीय धरती के किसी भी देश में जा बसें उनका मन अपनी सभ्यता और संस्कृति में ही रचा–बसा रहेगा| इसी सन्दर्भ में अंत में मैं अपनी रचना के कुछ अंश प्रस्तुत करना चाहूँगी ---


“तन जो हो सुदूर कहीं भी
मन तो बसता अपने देश|
तेरी माटी कुंकुम चन्दन
मस्तक रोज़ लगाऊँ मैं
जहाँ रहूँ ,जिस छोर भी जाऊँ
तुझको शीश नवाऊँ मैं|
मेरे तो मन मन्दिर बसता
देव समान मेरा देश
भक्ति वंदन का यह देश
पूजा अर्चन का यह देश|”



 


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