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“पतनशील पत्नियों के नोट्स”:नीलिमा चौहान (दाम्पत्य संबंधों में सहमित्रता/ विश्वास और सहभागिता की संभावनाओं की पड़ताल का एक मैग्नीफाइंग ग्लास) : कंडवाल मोहन मदन


“पतनशील पत्नियों के नोट्स” – नीलिमा चौहान (दाम्पत्य संबंधों में सहमित्रता/ विश्वास और सहभागिता की संभावनाओं की पड़ताल का एक मैग्नीफाइंग ग्लास) : कंडवाल मोहन मदन


“जब पत्नियों को अपना पति हाथ से निकलता दिखाई देता है, पण्डित जी के पास पत्री दिखाना उनकी आखिरी कोशिश होती है. जबकि यदि पति को पत्नी हाथ से निकलती दिखाई देती है, तो उस पर हाथ उठा देना पतियों के पास सबसे पहला कारगर तरीका होता है”...... (इसी किताब से ).....
“पतनशील पत्नियों के नोट्स”, डायरी शैली में लिखा, सुश्री नीलिमा चौहान जी की कलम से निकला, दुनिया की आधी आबादी का अनुभवनामा (व्यष्टि में समष्टि और समष्टि में व्यष्टि को) समाहित करता हुआ मैग्नीफाइंग ग्लास है, जिसे दाम्पत्य जीवन के दोनों ध्रुव, आत्मावलोकन हेतु प्रयोग में ला सकते हैं....यह उपदेशात्मक शैली में ना होकर स्वयं पर हंसा-हंसाकर रूलाने वाली शैली में लिखा गया है, जिसे कुछ लोग व्याजस्तुति शैली भी कहते हैं .....
पहले –पहल फेसबुक पर कुछ प्रसंग पढ़ने को मिले थे मुझे, और जब इसे १५ जनवरी २०१७ में विश्व पुस्तक मेले दिल्ली में किताब रूप में देखा, वाणी प्रकाशन के स्टाल पर, तो पहले उत्सुकता जगी, फिर पन्ने सरसरी तौर पे पलटकर लगा कुछ ख़ास नहीं है, पर काफी कुछ चर्चित/ मनपसंद किताबों को लेने के बाद भी, न जाने क्यों फिर कदम बरबस बार-बार दो किताबों की मुड़ते रहे, और मेले की आखिरी दिन की समयावधि समाप्ति की आशंका संग, पाठक मन को लगता रहा, कि कुछ महत्वपूर्ण छूटा जा रहा है. पहली किताब थी आदरणीया मैत्रेयी जी की लिखी संस्मरणात्मक किताब स्वर्गीय राजेंद्र यादव जी के बारे में और दूसरी किताब यही नीलिमा जी कि लिखी हुयी.....(जिसे अब तीन बार पढ़ा जा चुका है दो लगातार रविवारों को और खरीदने की सार्थकता स्वयमेव सिद्ध हो चुकी है).
यह दूसरी किताब पेपरबैक संस्करण में उपलब्ध हो ही गयी, पर मैत्रेयी जी कि किताब पेपरबैक संस्करण में ख़तम हो चुकी थी और हार्ड बाउंड प्रति अपनी ज्यादा कीमत से मुहं चिढा रही थी, (क्योंकि तब तक बारह–पंद्रह किताबों के स्वागत खर्चों से जेब कुछ रूठ सी रही थी यह कहते हुए कि पहले पिछली किताबों को तो पढ़ डालो महाशय, सो लोभ छोड़ना ही पडा हार्ड बाउंड के प्रति, यद्यपि उस किताब न ले पाने का मलाल अब भी शेष है अभी भी).
बिना कोई लाग-लपेट, आमुख या भूमिका के यह किताब लेखिका ने संभवतया अपनी जननी और तनुजा को समर्पित की है ..दो सौ पन्नों की इस किताब की कीमत भी दो सौ में एक कम है. और अंत में ‘शुक्राने की घड़ी’ में लेखिका ने अपने हमसफ़र विजेंद्र जी को वैचारिक स्वतंत्रता हेतु और सुश्रीद्वय अदिति माहेश्वरी-गोयल तथा अपराजिता शर्मा को किताब की संभावनाओं तथा प्रासंगिक-सटीक चित्रों हेतु आभार व्यक्त किया है.... साथ ही हिदी उर्दू सहोदरी का पुट डालने वाले खालिक जी, चोखेरबाली मिष्टी, प्रभव्, समूचे वाणी प्रकाशन संग तमाम (तथाकथित) पतनशील साथियों और हमचश्म पुरुषों का भी आभार प्रदर्शन किया है.
साथ ही ‘चलते- चलते’ शीर्षक में किताब के लिखने का आशय को भी बताने की कोशिश की है. स्वयं को पतनशील कहकर जगहास्य के पीछे, जमात की काहिली, मक्कारी, दोयमता, चालूपंती, सजिश का पर्दाफाश और स्वयं के छिपे दर्द को उघाडा गया है. मुखावरण पृष्ठ के पीछे उद्धृत दोनों पैराग्राफ “चलते – चलते “ के पेज १९४ और १८५ से ही लिए गए है और जो इस किताब के मकसद को समग्रता से परिभाषित करते हैं. कुल ४७ (सैंतालिस) प्रसंगों को “सिलसिला” (अनुक्रमणिका) में ७ (सात) हिस्सों क्रमशः ‘कैद में है बुलबुल’, ‘अक्स करे सवाल’, ‘ताले जज्बातों वाले’ , ‘दर्द का नाम दवा रखा है’ , ‘बुनियादे पहने है पायल’ , ‘कुछ इश्क किया कुछ सफ़र किया’ और ‘अदब के दारोगा’ में बांटा गया है. पेज नंबर में गडबडी है “सिलसिला” में, आगे पीछे हो गए है सावधानी के बावजूद भी.... बोलचाल/ वार्तालाप की भाषा शैली गंगाजमुनी (हिन्दी – उर्दू ) मिश्रित होने से और भी प्रभावी हो गयी है और शैली व्यंग्यात्मक तथा हास्यात्मक संग संजीदा भी है, ऐंसा हास्य जो रुलाने को मजबूर करे एकांत में, जब आत्मावलोकन की बारी आये. और वह आत्मावलोकन पाठक करता चलेगा पढ़ते हुए और बाद में भी.
लेखिका के स्व-निर्मित और उर्दू के प्रचलित (महिला –पुरुषीय) शब्द-विशेषणों से भरपूर यह किताब कुछ विशेषणों को पढ़कर और समझकर (रेखाचित्र खिंच जाते स्वत:) मनोरंजन भी करती है और रचनात्मक सृजन शिल्प की दाद देने को भी बाध्य करती है. औरताना किचकिच, बेस्वाद बीवी, रसोई से बिस्तर तक का लंबा सफर, थुलथुले-लिजलिजे गोश्त सी फीलिंग का होना, बेमकसद कवायद, कसमसाती-प्यासी-मुरझाई नदी, जहरीली नागन सी रात, सलीकापसंद और शाइस्ता औरत, पलायनवादी पल्लू, जीता–जागता चाबुक, लस्ट के समंदर में स्कूबा डाइवर, सर्फिंग का खतरा, छल भरा सम्मोहन, कपट भरा शर्मीलापन, अलगाव भरा लगाव, शातिरता भरी होशियारी, उपजाऊ उभार, बस्टी ब्यूटी, जिस्मानी जवाब, सूखी रेत, बेमकसद मस्तूल वाली जर्जर किश्ती, नामुराद बदन, परकटी पतुरिया, शातिर भक्तिन, पाजी पड़ोसन, रेजर बारीक कल्पना की ताकत और जानलेवा जुबाँ का हुनर, पल्लू का परचम, शीलवती लुगाईयाँ, फनफनाती हुई बेलगाम बीवी, होली में साँस्कृतिक छेड़छाड़ की इजाजत, साड़ी एक नाजुक नीमजान कपड़ा, कंटीले कटिप्रदेश, नाभि से निकलती नाभिकीय ऊर्जा, सीने का सैलाब, हुस्नखेजी हुनर, तमाशाखानम, बैग पाइपर सा छलिया, सच्ची घरैतिन, साहित्य के लाइट हाउस, फिकरे और फिकर, तकरीर और तंज, चहक और चाहत, नौटंकी में खंडित होकर जीने की सजा... और कई अन्य शब्द-विशेषण; भाषा कि चपलता और चुलबुलेपन संग उसकी तन्जता को बचाए रखती है.
सूक्तिपरकता दूसरा गुण है भाषा का यहाँ, मसलन.... “लड़की कभी अकेली नहीं होती”, “अपने स्त्रीत्व को, अपने माँ बनाने की क़ाबलियत से या सुहागन होने और बहू होने की क़ाबलियत से कभी मत आंकना”, “हम माएं हो सकते है मादाएं नहीं “, “देह को अपनी नजर से देखना शुरू कर दो”, “फरेबी हुस्न से नहीं, “दुनिया चलती है हमारी मेहनतकश देह के श्रम से”, “बना लो पल्लू का परचम”, “खुद को खुशी-खुशी कष्ट और असुविधा में रखकर दूसरों की नज़रों में सुन्दर दिख पाना ही स्त्री धर्म नहीं है”, “तुम सुन्दर बनो पर दूसरों के लिए अपनी आजादी और सुख की कीमत पे नहीं”, “मौका पड़ते ही अश्क बहाने वाली ड्रामा क्वीन भली”, “जब कोई जिद्दी दर्द ना जा रहा हो तो अपनी जगह ही बदल लेनी चाहिए”, , “जो औने पौने में ही लुट जाये, ऐंसी नेकनामी, ऐंसी शराफत कमाने में जान काहे जाया करती हो, मुफ्त में बंट रहे ताउम्र रहने वाले बदनामी के तमगे लपक लो और चैन ओ अमन से जियो”, “औरतें दो तरह की होती है या तो बस मजबूर या फिर मजबूत”, “एक आजाद खुदमुख्तार औरत को अपनी छवि को डिफेंड करने की कोशिश तो कतई नहीं करनी चाहिए”, “हर स्त्री को अपने लिए आजादी का अर्थ खुद तय करना चाहिए’, ‘रसोई से लगाव और मंदिर का भय औरतों की आजादी के सबसे खतरनाक दुश्मन हैं’, वगैरह, वगैरह. और कई अन्य उदाहरण आदर्श भारतीय विवाह संस्था और ट्रैफिक लाइट को उलंघन करने पर या साहित्य के लाइट-हाउसों पर उद्धृत किये जा सकते है यहाँ, इसी पुस्तक से .
‘ट्रेफिक जाम में मुर्दागाडी’, जहाँ विषयेत्तर प्रसंग है, और जीवन मृत्यु दोनों की ट्रेफिक में फंसे होने की विवशता को दर्शाता है, वहीं ‘सयानी सासों के स्यापे’, ‘निगोड़ी होली के हवाले’, ‘झूठी बाईयों के सच्चे दुखड़े’, ‘रेड लाइट पर एक मिनट’ आदि प्रसंग सास, बाई या स्वयं के ट्रेफिक में फंसे होने से अप्रासंगिक कतई नहीं हुए हैं... ज्ञातव्य हो कि ‘रेड लाइट पर एक मिनट’ और ‘#आज रात बस औरते काम पर हैं#’ फेसबुक में भी लेखिका के काफी चर्चित पोस्ट रहे है. साथ ही नीम अँधेरे रोज उठ अनावश्यक कागज पत्तर छाँटकर जीवन को सरल सहज बनाने का प्रसँग भी अनुकरणीय है। होते हैं कुछ सुलझे लोग ऐँसे भी।
“रिश्तों को हर समय ओढ़ने बरतने की जिद छोड़कर उन्हें तहाकर दराज में रख देना चाहिए या फिर छत पर धूप लगाने छोड़ आना चाहिए ...” ...(इसी किताब से ).
पति- पत्नी के दाम्पत्य जीवन में हर पहलू/ क्षेत्र में (अन्तरंग क्षणों में भी) सहभागिता का अभाव और यान्त्रिकता की प्रचुरता से उत्पन्न विशाद परिवार संस्था की जड़ें खोखली कर रहा है शनै: शनै:...देह और मन की विसंगतियां पति-पत्नी संबंधों को लील रही है. अतीत से पढाया जा रहा, ‘शयनेशु रम्भा’ के पितृसत्तात्मक विचार को तिरोहित करना ही श्रेयष्कर होगा दाम्पत्य जीवन की निर्बाध वहनता हेतु. लेखिका ने मर्द-औरत के विश-लिस्ट की मनोवैज्ञानिक पहलूओं संग बारीक पड़ताल की है कई प्रसंगों में. औरतों की स्वयं को मर्दों के नजरिये से देखने की विचार की कंडीशनिंग को भी बखूबी उघेड़ा गया है, बस्टी ब्यूटीज और रसिक बलमा सन्दर्भों में. मर्दों की हवश बुझाने की नापाक हरकतों को भी खूब पकड़ा है इन प्रसंगों में लेखिका ने. साथ ही तीस घटा पांच में, ऋतुस्त्राव प्रसंग को मंदिरों में प्रवेश मनाही और पुरुष/ समाज की मानसिकता के दोयम व्यवहार को भी रेखांकित किया है लेखिका ने . सामाजिक और पारिवारिक दबावों के चलते, औरत वर्ग के मातृत्व, स्त्रीत्व, आदर्श बहू को डी जाने वाली महत्ता की विशद विवेचना कर, खुद-मुख्तारी, पढाई पर ध्यान केन्द्रित करने कि कोशिश देखें लायक है. ‘यौवन की क्षणभंगुरता’ पर दुःख मनाने के बजाय सीरत और गुणों को अर्जित करने के प्रयत्नों पर भी बल दिया है.
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‘औरत ब्रा के लिए या ब्रा औरत के लिए’ एक ज्वलंत यक्ष प्रश्न से रूबरू होते हम जब बाजारवाद की औरत के शरीर को मर्द-माफिक भुनाने की जल्दबाजी से समाज और औरत की मानसिकता को हुए नुक्सान का कोई ख्याल नहीं करता है, जिसका कोई शोध आख्यान या व्याख्यान नहीं है समाजशास्त्रियों के पास भी. पल्लू और साडी प्रसंग भी काफी रुचिकर बन पड़े है जरूरी और उपादेयता के संगम के साथ. इससे से मिलते –जुलते प्रसंग, हुस्नखेजी के हुनर में यथार्थता का पुट है, जो परिधानों की प्रासंगिकता और सहूलियतपने संग मन-तन की सहजता को भी महत्वपूर्ण मानज्यादा तरजीह देता है. पुरुषीय बोरियतपना और नारीय-व्यस्तता का खाका, नींद के ना आने के कई कारणों संग, नैसर्गिक हंसी पर लगे तालों, नारी स्वभावगत गुस्सा, आलोचना, नैगिंग, रोना-कलपना और भावों के अभिव्यक्तिकरण की महत्ता को बखूबी विवेचित किया है लेखिका ने .

पुरुषों के तथाकथित मर्दानेपन से ग्रसित डर के भाव की अभिव्यक्ति, प्रशंशा, रोने आदि गुणों की भावप्रवणता के प्रकटीकरण के महत्व को भी रेखांकित किया है लेखिका ने. औरतों के प्रति शराबखोरी सम्बंधित बेहया टैग के पूर्वाग्रहों संग उन्ही की उपस्थिति शबाब और साकी रूपों में आज के समाज को मान्य है, जो कि दोगलापन है विचार बीजों का. अपने अपने बनाये संसारों में आत्मसंतुष्टि हेतु, परम्परागत ढंग से जवाब या प्रतिक्रिया देने वाली औरतों की मन;स्थिति की पडताल बोर्नविटा मम्मी के मार्फ़त अच्छी बन पडी है. औरतों के स्वतंत्र कैरियर उड़ान आकाँक्षाओं की लक्ष्मण-रेखा के ऊपर, समग्र ज़माने की उसके हाथ –पावं बांधने की प्रवृत्ति और फेसबुक पर सेल्फी डालते ही मर्दों की कोरी प्रशंसाओं और षड्यंत्रों का कच्चा चिठ्ठा भी शामिल यहाँ एक प्रसंग में ...
स्वयं के बुढापे की सुखद प्लानिंग और पुरुषों को खालिश मित्र बनाने की कामना संग पति-पत्नी रिश्तों में तीखे नोक झोंक और जीत-हार, प्रेम-नफ़रत और परस्पर निर्भरता संग तलाक तक जाने की मर्दों की भावना की जाँच-परख भी तार्किक ढंग से निष्पादित की गयी है. औरतों के रोजमर्रा दाम्पत्य जीवन निर्वहन में प्रयुक्त जीत के मंत्र की खुशी भी देखते बनाती है आधी आबादी की. बीवी का माशूका न होने की सामाजिक पूर्वधारणा का खंडन और गीता पढ़ सीता बनने की स्त्री अवधारणा को हतोत्साहित कर स्वतंत्र होने की प्रेरणा दी गयी है. जनानापने की विशिष्टताओं संग समाज / परिवार द्वारा बहू-बेटी व्यवहार विभेदीकरण की समस्याओं की ओर इंगित करती है कुछ प्रसंगों की विषयवस्तु.
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होली के माहौल में उपजती शारीरिक मानसिक शोषण की और समुचित प्रतिकार ना कर पाने की मजबूर जनाना मनोस्थितियाँ भी मार्मिक है और समुचित प्रतिकार का आव्हान भी साथ साथ चस्पा किया है सृजिका ने. मंदिर-रसोई से मुक्ति की चाह स्त्री उत्थान में एक खासा प्रसंग है. २८ रैगरपुरा रिश्ते ही रिश्ते विज्ञापन कौन न देखा होगा बीस सालों पहले रेलवे से यात्रानशीन होते हुए, साथ ही फोटो की दुकानों में फोटो कला से गलत सही मिसमैच (कमाऊ दूल्हा और अन्नपूर्णा लड़की) फंसाने की कहानियाँ कौन न जानता होगा? मंदिर के पुजारी की मानसिकता, शराबखोरी बनाम शरीफजादियाँ, झूठे फेमिनिज्म से घर वापसी और शादी संस्था की अप्रासंगिकता संग, बाईयों के दुःख और स्वयं के दुःख के तुलना से जनित सहानुभूति लहर भी महसूसना दुखद/ सुखद है.
रोड-रेज, सड़क के अच्छे बुरे प्रसंगों को भी बखूबी कलम मिली है कुछ लघु प्रसंगों में यहाँ. जहाँ, जनकवि, शायर प्रेमप्रेतता, कवि की गृहस्थ पत्नी और साहित्य के प्रकाश-स्तंभों (मठाधीशों ) पर कसे तन्ज सटीक है. वहीं मादा लेखन को तश्तरी में परोसी जाने वाली डिश या रसोई लेखन समझने वालों के विरुद्ध, लेखिका का औरतों को खूब लिखने के लिए आह्वान भी है यहाँ.
आधी आबादी का स्वयं को समाज द्वारा दिए गए पतनशील तगमों पर हंसकर, स्वयं को पतनशील करार कर, उन्हें तार्किकता से मंद और कुंद कर, अपनी बातों को दूसरे (पुरुष और समाज) पक्ष को सहमतिपूर्वक मनवाना और समाज की खोखली मान्यताओं को कुंठित करने का यह प्रयास सुश्री नीलिमा Neelima Chauhan जी का सराहनीय प्रयास में गिना जाना बहुत जरूरी है. क्योंकि ऊपर उठाने हेतु यह तथाकथित गिरना बहुत जरूरी था. बधाई उन्हें वृहत्त सृजन फलक पर सृजाने हेतु और संजीदा सोचने और आत्मान्वेषण करने का अवसर देने के लिए हम सबको और आधी आबादी को भी.
सही कहा है उन्होंने; (निम्न कथन पुस्तक से ही) :-
“जनाब यह दुनिया एक दूसरे से नफ़रत, कुढ़न, और बदले की कामना से बदरंग हो, इससे पहले ही क्यों न इसके रंगों को सहेज लें. हम अपनी एक अलग पहचान का मिथ पैदा कर उसके लिए जान देने और जान लेने की चाहना को तजकर क्यों न एक – दूसरे को पहचानना, समझाना, सराहना सीखे. इस कदर कि कोई खाई ना रहे. एक दूसरे में दुश्मन तलाशने की बजाय दोस्त को पहचाना जाए.”

(कंडवाल मोहन मदन: चेन्नई)


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