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[रंग समीक्षा] अमीर निजार जुआबी का नाटक और मोहित ताकलकर का निर्देशन: समीक्षक प्रज्ञा


गोलियां रोटी पर तिलों सी फैलती हैं। कैसा लगता है जब कोई रोटी आधी बांटने के लिये कदम बढ़ाता है?कभी भूख के लिये लड़ने का जज़्बा जागता है तो सब चुकने के बाद भूख ही मर जाती है। कैसा महसूस हो जब कोई आपसे आपका एक सीधा हाथ और उल्टा पाँव मांगने लगे ?जैसे कोई मिट्टी बाँट रहा हो। कैसा लगे जब जड़ों से उखड़ने के दुःख को आप अपने कांधे पर लाद चलें। अपने उगाये सींचे पेड़ का बोझ ढोते चलें? ऐसे बहुत से प्रतीकों को घटनाओं में गुम्फित करके नाटक में देख पाना एक साथ बहुत से आक्रोश, उत्तेजना और सिसकियों में ढलता जाता है। जब मंच का आधा भूभाग अतीत और आधा वर्तमान में डूबा हो और धीरे धीरे दूरी पाट कर अतीत वर्तमान में ढल जाए। ऐसा वर्तमान जो ठिठक गया हो , ऐसा अतीत जो मौत के मुहाने पर खड़ा हो। फिलिस्तीन की धरती और उसका रक्तरंजित इतिहास लिये नाटक मैं हूँ युसूफ और ये है मेरा भाई देखना इन्हीं एहसासों से गुजरना था। अतीत और वर्तमान को एक सूत्र में पिरोती दो भाइयों की इस कहानी ने प्रेम,राजनीति,जड़ों से उखड़ने की दिल चीरती पीड़ा थी और साथ ही मंच पर डेढ़ घण्टे के कड़े आंगिक संचालन और भाव मुद्राओं के पल पल परिवर्तित रूप की सशक्त अदायगी। गजब की फुर्ती में दो भाइयों की लाड भरी तरंग पूरे मंच पर बिछ जाती है। एक कोलाहल और उसके बीच से उठती युसूफ के भाई अली और उसकी प्रेमिका नदा की प्रेम कहानी। बहुत कम किरदार और बहुत सारी कहानियां। तबाह फिलिस्तीन के दुःख की पूरी लहर मंच से तैरती हम सबके इर्द गिर्द छाती गयी। हम डूब रहे थे। प्रेक्षागृह फिलिस्तीन लगने लगा था। बहुत सी फिलिस्तीनी कविताएं चारों और बिखर रही थीं उन्हें किसी अनुवाद की जरूरत न थी। पीड़ा की ध्वनि और अर्थ हर जगह एक से हैं। मंच से एक लंबी कविता कानो से उतरकर सांसों संग धड़कने लगती है। बचपन में अनजाने ही अपने भाई युसूफ को कुंए में धकेलने वाले बडे भाई का मौत की अंतिम घड़ी में कन्फेशन और उसके बेहरकत जिस्म को जिलाये रखने वाले युसूफ का रोना और उसे माफ़ करना। दोनों का गहरा प्यार और मौत की बना दी गयी दूरी। ऐसी दूरी जहाँ न प्रेमिका नदा है न प्यारा भाई युसूफ मंच पर काले सफेद कपड़ों में ढके कुछ गिद्ध नाच रहे हैं जो अली के निस्पंद होने की राह तकते हैं। अपने चन्द सिक्कों से बेइंतहा मोहब्बत रखने वाला युसूफ भाई के लिये सिक्के भी कुर्बान करता है। पर उसकी मौत को रोक नहीं पाता। बचपन में कुएं से अर्धविक्षिप्त होकर निकला युसूफ ,अली के बाद एक और बड़े कुएं में गिरता है। दुनिया की नज़र में वह अहमक, पागल इंसान खोज लेता है नदा को। अली की प्रेमिका नदा को दो साल तक केम्प में ढूंढता है। सालों साल का एक रिश्ता है युसूफ,नदा का। ऐसी औरत जो कभी अपने शौहर संग न रही उसके भाई की देखभाल उसके जीवन का पहला निर्णय बन जाता है। एक औरत के जीवन का ठोस निर्णय।एक वादा अपने अली सेे -" मैं और तुम साथ रहेंगे पूरी जिंदगी।" यूसुफ़ के संग ज़िन्दगी बिताना , उसे बच्चों सा पालना, उसकी जिद्द मानना नदा को खलता ही नहीं। अली कहीं नहीं है पर अली को नदा और युसूफ जिन्दा रखते हैं। मंच पर एक टेबल पर सिर्फ रौशनी नहीं उतरती तीन प्यारी जिंदगियों का खूबसूरत रिश्ता उतरता है। ज़िंदा युसूफ को अपनी गोद में सुलाती नदा मन के सामने बैठे अली से कहती है "सो जाओ मेरी जान" .....रात घिरती है, अँधेरा बढ़ता है और सारे दर्शक खड़े होकर बस तालियों और बहती आँखों सेअपने जज़्बात निकालकर रख देते हैं। एक दर्शक का सर मंच पर झुका ही रह गया, ये प्रस्तुति कभी भुलाई न जा सकेगी। (अमीर निजार जुआबी का नाटक और मोहित ताकलकर का निर्देशन)
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