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नलिन विलोचन शर्मा : शताब्दी स्मरण- अजय आनंद

नलिन विलोचन शर्मा : शताब्दी स्मरण- अजय आनंद 



आचार्य नलिन विलोचन शर्मा का जन्म 18फरवरी 1916 को बदरघाट, पटना सिटी में हुआ । उन्हें विद्वता, धीरता और गंभीरता विरासत में मिली थी । जर्मन विद्वान विंटरनित्स ने जिस भारतीय मनीषी को ‘आधुनिक बृहस्पति’ कहा था, वे उसी दर्शन और संस्कृत के प्रख्यात मनीषी महामहोपाध्याय पं. रामावतार शर्मा के ज्येष्ठ पुत्र थे । उनकी माता का नाम रत्नावती था । बचपन में इन्हें प्यार से ‘बबुआ’बुलाया जाता था । बचपन से ही नलिन जी की शिक्षा-दीक्षा पिता के देख-रेख में हुयी । पिता के निधन के बाद वे पहली बार स्कूल(पटना कॉलेजिएट) में दाखिल हुए, उस समय उनकी उम्र तेरह वर्ष थी । 1931 में यही से उन्होंने मैट्रिक परीक्षा पास की । उच्च शिक्षा पटना विश्वविद्यालय में पूरी हुयी ।1938 में इन्होंने संस्कृत से एम. ए. किया । एम. ए. करने के बाद प्रो. अनंत प्रसाद बनर्जी के निर्देशन में ‘कौटिल्य के अर्थशास्त्र में दंड-विधान’ विषय पर शोध-कार्य शुरू किया लेकिन यह शोध-कार्य पूरा नहीं हो सका ।

नलिन जी आइ. सी. एस. की परीक्षा में भी शामिल हुए थे, उनका ध्येय अधिकारी बनना नहीं, व्यापक अध्ययन करना भर था । डॉ. नगेन्द्र ने अपने संस्मरण में लिखा है, “आई. सी. एस. के योग्य व्यक्तित्व–संपत्ति उन्हें सहज ही प्राप्त थी । किन्तु, उनके पास कुछ ऐसा भी था, जो आई. सी. एस. के लिए अपेक्षित योग्यता की परिधि में नहीं समा पाता था—पांडित्य का आत्मगौरव और स्वाधीनचेतना कलाकार के मन की मस्ती । थाड़े से ही परिचय के बाद परीक्षा के प्रति उनका उपेक्षा-भाव मुझपर अनायास ही व्यक्त हो गया—परीक्षा केवल व्यापक अध्ययन के लिए व्याज-मात्र थी ।’’


1942 ई. में नलिन जी की नियुक्ति आरा( बिहार) के हरप्रसाद जैन, कॉलेज के संस्कृत विभाग में हुयी । यहाँ अध्यापन- कार्य करते हुए उन्होंने हिन्दी में एम. ए. किया । एक बार फिर उन्होंने ‘रंगमंच तथा नाटक’ विषय पर शोध-कार्य शुरू किया, लेकिन यह शोध-प्रबंध भी पूरा नहीं हुआ । 24 सितंबर 1946 को पटना कॉलेज में इनकी नियुक्ति हिन्दी के अध्यापक के रूप में हुयी । अक्तूबर,1947को इनका ट्रांसफर राँची कॉलेज में हो गया । अप्रैल,1948में पुनः पटना कॉलेज आ गये । 1959 में पटना विश्वविद्यालय के अध्यक्ष नियुक्त हुए और ताउम्र यहीं रहे । 

जून 1941 में नलिन जी ने श्रीमती कुमुद शर्मा के साथ प्रेम विवाह किया, जो नवोदित चित्रकार थीं । कहते हैं वे जितनी रूपवती थीं, उतनी ही सुरुचि-सम्पन्न भी थीं । नलिन जी की विकास में उनकी बड़ी भूमिका है ।नलिन जी उनके लिए ‘गृहिणी-सचिव-सखी’ जैसे सम्बोधन प्रयुक्त करते हैं । नलिन जी के असमय निधन (12सितंबर 1961) के पश्चात इन्हीं की सजगता के कारण उनका अधिकांश साहित्य बच सका । राजीव शर्मा ( कुग्गू) इनके एक मात्र पुत्र थे ।

“नलिनजी हिन्दी की वर्तमान पीढ़ी के सर्वतोमुखी (All-rounder) लेखक थे । विज्ञान और दर्शन के मिलन विंदु के विरल कवि थे, दुर्लभ मनोवैज्ञानिक उपलब्धि के कहानीकार थे,प्रत्येक रचना के भीतर से ही उसके मूल्यांकन का निष्कर्ष निकालने वाले और इस प्रकार अपनी उद्भभावनाओं से रचनात्मक संभावनाओं के विकसित स्तर के उपजीव्य बनाते हुए आलोचना को सर्जनात्मक स्थापत्य देनेवाले समीक्षा-शिल्पी थे, वेश्मनाट्य के व्याख्याता और सर्वतोभावेन गीतिनाट्य के एक मात्र अधिकारी प्रणेता थे, व्यंजक गद्य के निर्माता थे और एक ऐसे सुधी साहित्यिक संपादक थे, जिन्हें विषय से लेकर लतीफे एवं आवरणसज्जा पर कुछ-न-कुछ बिलकुल नया और बहुत महत्त्वपूर्ण कहना था । पर, बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कुशल चित्रकार भी थे ।” नलिन जी के कृतित्व पर उनके सहयोगी केसरी कुमार की टिप्पणी कहीं से अतियुक्ति नहीं है । उन्होंने कुल 45 वर्ष और 6 माह खर्च करके विपुल साहित्य लिखा है । इनके व्यक्तित्व पर पर यदि ध्यान दें तो आश्चर्य होता है कि एक व्यक्ति जो सफ़ल अध्यापक हो, बिहार साहित्य सम्मेलन का प्रधानमंत्री हो, बिहार राष्ट् भाषा परिषद का शोध –निर्देशक हो,‘साहित्य’,‘दृष्टिकोण’ और ‘कविता’ का यशस्वी संपादक भी हो— वह एक साथ इतना काम कैसे करता थे !


19वीं शती के अंतिम दशक और 20वीं शती के आरंभिक तीन दशकों में काशी नागरी प्रचारणी सभा में जैसा योगदान श्यामसुंदर दास और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का है, वही योग पाँचवें और छठे दशक में आचार्य शिवपूजन सहाय और आचार्य नलिन विलोचन शर्मा का है, कहना असंगत नहीं है । हिन्दी में तात्त्विक शोध का आज भी अभाव है, नलिन जी पहले आलोचक हैं, जिन्होंने ‘तात्त्विक शोध’ के प्रति लोगों का ध्यान दिलाया । सिर्फ़ दिलाया ही नहीं, किया भी । सूफी कवि किफायत की रचना, लालचन्द्र–कृत हरिचरित्र गोस्वामी, लोककथा कोश(1959), लोककथा परिचय(1959), प्राचीन हस्तलिखित पोथियों का विवरण, छः खंडों में(1959), सदलमिश्र ग्रंथावली(1960),तुलसीदास(1961), संत परंपरा और साहित्य (1960), अयोध्या प्रसाद खत्री–स्मारक ग्रंथ(1960),‘भारतीय साहित्य परिशीलन तथा अन्वेषण’,‘हिन्दी साहित्य परिशीलन तथा अन्वेषण’—आदि ग्रन्थों का सम्पादन, जो तात्त्विक शोध ही है ।अपने आप में उपलब्धि है । इस कार्य के फलस्वरूप बिहार के कई प्राचीन और गुमनाम साहित्यकार प्रकाश में आये । 

शोध में पाठानुसंधान और भाषा-विज्ञान विशेषकर भाषा की बोलियों के अध्ययन में भी नलिनजी की रुचि थी, बोलियों के भाषा वैज्ञानिक महत्त्व पर वे ‘साहित्य’ के संपादकीय में समय-समय पर लिखा करते थे,उन्होंने कुछ टिप्पणियाँ पद्मराग नाम से भी लिखीं हैं । इनकी पुस्तक-समीक्षाएँभी आधुनिक दृष्टि से लैश होती थीं । अपनी आधुनिक-दृष्टि और प्रयोगशीलता के कारण ही वे‘मैला आँचल’,‘बाणभट्ट की आत्मकथा’,‘सुनीता’ और ‘घेरे के बाहर’जैसे उपन्यासों के पक्ष में डटे रहे जो कथ्य और शिल्प दोनों में लीक से अलग थे । फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ के ऐतिहासिक उपन्यास मैला आँचल’ पर पहली समीक्षा इन्होंने ही लिखी, जिसके कारण हिन्दी संसार का ध्यान ‘मैला आँचल’ की तरफ गया ।

कविता में ‘प्रपद्यवाद’ के प्रवर्तन का श्रेय इन्हीं को है । ‘प्रपदयवाद’ को ‘नकेनवाद’ भी कहा जाता है । ‘नकेन’ शब्द नलिन विलोचन शर्मा, केसरी कुमार और श्री नरेश के प्रथमाक्षरों को मिलाने से बना है । ‘नकेन के प्रपद्य’(1956) और ‘नकेन-2’ (1982) प्रपद्य के दो संकलन हैं । दोनों संकलनों में नलिन जी कुल39कविताएँ शामिल हैं । अप्रकाशित कविताओं कि संख्या 86 है । इन कविताओं में वैज्ञानिकता और बौद्धिकता की प्रधानता है , जो उस समय बिलकुल नई बात थी । कहानीकार के रूप में भी नलिनजी उपस्थिति महत्त्वपूर्ण है । यौन मनोविज्ञान पर इन्होंने अनूठी कहानियाँ लिखीं हैं ।‘विष के दाँत’ (1951),‘सत्रह असंगृहीत पूर्व छोटी कहानियाँ’(1960)इनके कहानी संग्रह हैं ।

नलिन जी का हिन्दी आलोचना में प्रवेश आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अवसान के बाद होता है । आचार्य शुक्ल की समीक्षा चौथे दशक में पूर्ण होती है और आचार्य नलिन विलोचन शर्मा की शुरुआत इसी दशक से होती है । यह दशक अनेक दृष्टियों से देश और दुनिया में महत्त्वपूर्ण था। द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका और स्वतंत्रता आंदोलन का जो स्वस्थ–अस्वस्थ प्रभाव पड़ रहाथा उससे हिन्दी साहित्य भी अछूता नहीं था।मार्क्सवाद,फ्रायडवाद, अस्तित्ववाद, गाँधीवाद और समाजवाद आदि जो देश-दुनिया के ज्ञान और दर्शन की प्रमुख धाराएँ थीं । इसका प्रभाव बुद्धिजीवियों पर पड़ना स्वाभाविक है, नलिन जी पर भी इन विचारों का प्रभाव पड़ा। भारतीय संदर्भ में देखें तो, नेहरू और नलिन—दोनों आधुनिकता के प्रबल प्रवक्ता थे, लेकिन परंपरा के भी उतने ही गहरे जानकार थे। पहले ने भारतीय राजनीति में आधुनिकता का सफ़ल प्रयोग किया, दूसरे ने साहित्य में । नलिन जी ने संस्कृत की शास्त्रीय आलोचना और पश्चिम की आलोचना पद्धति का गहन अध्ययन किया था, लेकिन उन्होंने अनुसरण करने के बजाय अपने लिए नई आलोचनात्मक पद्धति की ख़ोज की है । वे हिन्दी के पहले आधुनिक आलोचक थे । उनमें परंपरा के नाम पर जड़ विचारों का त्याग करने और नए आधुनिक विचारों को ग्रहण करने की अद्भुत क्षमता थी ।इसी कारण साहित्य में हो रहे नए प्रयोगों के साथ खड़े रह पाये ।उनका आलोचनात्मककार्यक्षेत्र का फैला हुआ है । ‘दृष्टिकोण’ (1947),‘साहित्य का इतिहास-दर्शन’ (1960),‘मानदंड’ (1963),‘हिन्दी उपन्यास : विशेषतः प्रेमचंद’ (1968),‘साहित्य: तत्त्व और आलोचना’ (1995) उनकी आलोचनात्मक पुस्तकें हैं ।हिंदी में इतिहास-दर्शन जैसे गंभीर विषय पर लिखने वाले वे पहले व्यक्ति हैं । सभी तरह के नए-पुराने विषयों और विश्व के श्रेष्ठ साहित्य पर उनकी एक समान पकड़ थी । जिस अधिकार से वे कालिदास पर लिखते थे, उसी अधिकार से अपने समकालीन अज्ञेय आदि पर भी । रूसी कथाकार तुर्गनेव,दास्ताव्स्की, फ्रांसीसी उपन्यासकार आन्द्रे जींद, इंग्लैंड के गल्पकार आर्थर कोयस्लर और टी.एस. एलियट जैसे बड़े रचनाकारों पर लिखने वालों में भी संभवतः वे हिन्दी के पहले आलोचक हैं । यहाँ हमारा उद्देश्य उनके उपलब्धियों की सूची पेश करना नहीं है, बल्कि जन्मशताब्दी वर्ष में उनकी याद दिलाना है ताकि उनकी कृतियों का पुनर्पाठ किया जा सके, उनके योगदानों पर विचार-विमर्श हो सके।

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