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बादल सरकार : युगांतकारी रंगकर्मी और उनकी त्रासदी: मुकेश बर्णवाल



बादल सरकार : युगांतकारी रंगकर्मी और उनकी त्रासदी

                                                                                                                                     मुकेश बर्णवाल

किसी भी विशेष क्षेत्र समूह की सांस्कृतिक गतिविधि अपने स्तनीय राजनीतिक, सामाजिक हलचलों से प्रभावित होती है। भारतीय समाज में मौजूद विविधतापूर्ण सांस्कृतिक धाराएँ इस बात की बेहतर ढंग से तसदीक़ करती हैं। भारतीय संस्कृति में निहित इन विविधताओं के बावजूद सत्तर-अस्सी के दशक में भारत के विभिन्न प्रदेशों ने रंगकर्म में ऐसी संभावनाओं को विकसित होते देखा जिसमें ‘भारतीयता’ की गंध‘भारतीय’ रंगमंच जैसी अवधारणों को संभव बनाने की कुव्वत थी। इस दशक ने देश की सभी दिशाओं से ऐसे अव्वल दर्जे के रंग-व्यक्तित्व दिये जिनकी उपलब्धियां उस समय के रांगमंच में धूमकेतु की तरह चमकती हैं। उत्तर से मोहन राकेश, दक्षिण से गिरीश करनाद, पश्चिम से विजय तेंदुलकर, मध्य से हबीब तनवीर; इस सूची में पूर्व से बादल सरकार को शामिल कर लेने से हम सहज ही तब के ‘भारतीय’ रंगमंचीय परिवेश और हलचल की सम्पूर्ण रूप में जान और महसूस कर सकते हैं।

हालांकि उक्त पांचों कलाकार भारतीय रंगकर्म में बहुत महत्त्व रखते हैं लेकिन यदि हम प्रवृति के आधार पर अलगाना चाहें तो हबीब तनवीर और बादल सरकार दोनों का विशिष्ट कारणों से अपना विशिष्ट महत्त्व है। ये दोनों रंगकर्मी न सिर्फ कई अर्थों में समान हैं बल्कि दोनों ने रंगमंच को नई संभावनाएं भी दिखाईं। दोनों अपने शुरुआती काल से अंत तक रंगकर्म से जुड़े रहे; एक सम्पूर्ण रंगकर्मी के रूप में – नाटककार, रंगचिंतक, निर्देशक, अभिनेता के रूप में। हालांकि दोनों के रंगकर्म की अपनी –अपनी सीमाएं थीं जिनकी वजह से उनका प्रयोग उनके बाद आगे नहीं बढ़ सका लेकिन महत्त्वपूर्ण बात ये है की दोनों के रंगकर्म के केंद्र में जनभागीदारी ही थी। 


बादल सरकार को भारतीय जनवादी रंगमंच का सबसे बड़ा वाहक कहा जा सकता है। वे ऐसे रंगकर्मी के तौर पर स्वीकार किए जाते हैं जो विषजमतापूर्ण स्थिति के शिकार ग्रामीण किसान, मजदूर, आदिवासियों के सरोकार को हाशिये से उठाकर लोगों के सामने लाने के लिए रंगकर्म को माध्यम बनाते हैं। वे रंगकर्म को एक जरूरी हस्तक्षेप के रूप में देखते हैं जिसके माध्यम से समाज में स्थित द्विभाजन की स्थिति को, जो औप्नोवेशिक इतिहास और उसके प्रभाव में ढले मानस का नतीजा है परिवर्तित किया जा सकता है, जिसके माध्यम से उपेक्षित वर्गों को अर्थिक, सामाजिक, सान्सकृतिक मुक्ति मिल सकती है। यह मक़सद न तो लोकप्रिय ग्रामीण स्थूल रंगमंच निहित था और न ‘आयातित’ शहरी और सूक्ष्म रंगमंच में, इसलिए रंगद्वारी रंगमंच से अपने रंगजीवन की शुरुआत करने वाले बादल सरकार ने पहले ‘आँगन रंगमंच’ और अंततः ‘तीसरा रंगमंच’ की संकल्पना को जन्म दिया।

बादल सरकार के रंगजीवन को तीन कालों में बांटा जा सकता है। पहले में उनके उन नाटकों को लिया जाता है जिसकी शुरुआत 1956 ई॰ से मानी जाती है जिसे पश्चिमी कामदी शैली से प्रभावित माना गया है, दूसरे में उनके लोकप्रिय और अमर नाटकों को शामिल किया जाता है जो रंगद्वारि मंच पर खेले गए। ये नाटक ‘बाकी इतिहास’,‘पगला घोडा’,‘एवम इंद्रजीत’,‘सारी रात’ इत्यादि हैं जिसके माध्यम से बादल सरकार अपने पुराने प्रयोगों को छोडते हुए कहीं जटिल –जीवन, मृत्यु, अस्मिता, अस्तित्व जैसे सवालों से जूझते हैं। ये नाटक अपने कथ्य की गहराई, जटिलता, बहुआयामिता के कारण देश की सभी भाषाओं में बहुचर्चित और बहुमंचित होकर भारतीय रंगमंच पर छाए रहे। इन नाटकों में कुछ चरित्र और स्थितियाँ इतनी गंभीर और चुनौतीपूर्ण थीं की विभिन्न निर्देशकों ने इसके कई-कई अर्थों के द्वार खोले। वास्तव में नाटककार के रूप में मूल्यांकन किया जाए तो ये नाटक ही वास्तव में बादल सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

24 अक्टू॰ 1971 में कलकत्ता के ABTA हाल में ‘सगीना महतो’ नाटक के मंचन से उन्होने अपने नाट्य-काल का तीसरा दौर शुरू किया और एक नए रंग सफर की शुरुआत की। हिन्दी कविता में नकेनवादी कवियों को निरंतर नए प्रयोग करने का श्रेय दिया जाता है। उनकी कविता ‘साँझ’ में उन्होने बार-बार साँझ की नयी व्याख्या करते हुए अपने ही प्रयोगों को नकारकर नए प्रयो की ओर बढ़ते हैं। तभी तीसरे दौर में हम उनके पिछले किसी भी नाटकों की एक झलक भी नहीं देख पते हैं। इस दौर में वे न सिर्फ नाटककार के रूप में बल्कि रंगचिनतक, सिधान्तकर और कुशल निर्देशक के रूप में सामने आते हैं। यह समय ‘तीसरा रंगमंच’ के उदय का था जब उन्होने एक दूसरे से बिलकुल भिन्न शहरी और ग्रामीण रंगमंच की शक्तियों और कमजोरियों की शिनाख़्त कर ग्रोतोवस्की के ‘पुअरथिएटर’ के तर्ज़ पर नए सिद्धांत को रचा। इस अनूठे प्रयोग के लिए उन्होने लोक से जात्रा, तमाशा, कथकली, छऊ, मणिपुरी नृत्य, पश्चिम से लंदन का थिएटर-इन-राउंड, ब्राजीलियन रंगकर्मी अगस्त बोउल के ‘उत्पीड़ितों का थिएटर’, पोलिश रंगकर्मी ग्रोतोवस्की के ‘पूउर थिएटर’ की शैलियों से प्रेरणा प्राप्त की।   

दरअसल उनके रंगकर्म का सरोकार उन लोगों से था जो जिंदगी की अपनी जद्दोजहद के कारण पैसे खर्च कर सभागारों में शायद ही कभी नाटक देख पाते थे और न ही सभागारों के नाटकों में उनके सरोकार महात्व्वपूर्ण होते थे, इसलिए उन्होने वैकल्पिक रंगमंच के रूप में ‘तीसरा रंगमंच’ की संकल्पना को जन्म दियाजिसके माध्यम से कम से कम खर्च में अपने लक्ष्य दर्शकों को रंगमंच से जोड़ा जा सके, जिनमें उनकी ज़िंदगी की कहानी हो। बंगाल अपनी नियति से संघर्ष करने का स्वर्णिम इतिहास वाला राज्य है। इसी संघर्ष की अगली कड़ी में उन्होने तीसरा रंगमंच के माध्यम से हस्तक्षेप किया; ऊंटक पहुँचने के लिए जिनके लिए जानना-समझना सबसे जरूरी है – ग्रामीण, किसान, मज़दूर, महिला, आदिवासी इत्यादि। इसके लिए एक ‘कम ख़र्चीले’ और गतिशील रंगमंच की जरूरत थी। तीसरे रंगमंच के चलते गाँव-देहात के सुदूर इलाकों तक नाटक को आसानी से ले जाया जा सका जो पहले संभव नहीं था। मतलब अगर वे नाटक देखने नहीं आ सकते तो हम ही उनके पास चलें। 

मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित बादल सरकार 1972 में ‘शताब्दी’ नाम के नाट्य समूह का गठन किया जिसकी शुरुआत तब कलकत्ता के कर्ज़न पार्क में विरोध आंदोलन के दौरान लाठी चार्ज में प्रोवीर दत्ता की मृत्यु से हुई। उन्होने इस घटना के विरोधस्वरूप वहीं खुले में एक नाटक खेला और तब से कर्ज़न पार्क में आने वाले लोग इस मुहिम में अप्रत्यक्ष रूप से भागीदार बन गए, बाद में इस मुहिम ने राज्य और देश के दूसरे हिस्सों में भी पैर पसारा। बादल सरकार मानते थे की यह प्रयोग इसलिए भी महात्त्वपूर्ण है की रंगमंच सैद्धांतिक रूप में एक मानवीय क्रिया है जहां दर्शकों और अभिनेताओं को बिना किसी असहजता के अबाधित के मिलना चाहिए, जिससे उनके बीच एक मानवीय संबंध बन सके। यही राजनीतिक मंच की भी जरूरत है जिससे विचारों का प्रभाव अभिनेताओं और दर्शकों को भी सोचने और बहस करने के लिए मजबूर करें। 

बादल सरकार ‘तीसरा रंगमंच’ के नाटकों में स्वतंत्र राष्ट्र में पनप रहे औपनिवेशिक और सामंती प्रवृत्तियों को उजागर कर उसपर प्रहार करते हैं जिससे दर्शकों का दिलो-दिमाग बेचैन हो जाता है। उनका कहना था की मैं एक ऐसे अस्त-व्यस्त समय में रह रहा हूँ जो विरोधाभासों का ढेर है इसलिए उनके नाटकों में एब्सर्डिटी दिख जाती है लेकिन इन सबके बीच उनके नाटकों का मूल स्वर उन लोगों के खिलाफ अपने गुस्से को जाहीर करना है जो गरीब को गरीब, मज़बूर को मज़बूर बनाए रखते हैं। उनके नाटक किसान, आदिवासी, युवा, महिला आदि समुदायों के संघर्षरत लोगों के साथी हैं। विषम स्थिति में मध्य वर्ग की तटस्थता की नीति पर वे कहते हैं- ‘आज के लोगों का खून ठंडा/ ठंडा/ ठंडा हो गया है।’ वे उनके आंतरिक प्रतिरोध को भी सामने लाते हैं। बादल सरकार ने जनता की चेतना को क्रांतिकारी दिशा में बदलाव के लिए तैयार करने के अनिवारी उपकरण के रूप में नाटक और रंगमंच को विकसित किया, उनके संघर्ष में रंगमंच को साथी बनाया।

चूंकि तीसरा रंगमंच के लिए दर्शकों की भागीदारी सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण थी इसलिए उन्होने दर्शकों और कलाकारों को साथ-साथ बिठाकर दर्शकों को भी एक पत्र के रूप में विकसित किया। वे इस बाटके सख़्त खिलाफ़ थे की दर्शक तो चुपचाप अंधेरे में में बैठे रहें और कलाकार उजाले में प्रस्तुति देते रहें। उनके अनुसार रंगद्वारी व्यवस्था में दर्शक कलाकारों से एकदम कट जाते हैं, इसलिए उनके नाटकों में दर्शक अक्सर चारों ओर बैठे या खड़े रहकर बहुत करीब से सबकुछ देखता है। दरअसल उन्होने रंगमंच, कलाकार और दर्शकों की दूरी को फटने का काम किया। ‘तीसरा रंगमंच’ में उन्होने मंच सज्जा, वेषभूषा, कृतिम रोशनी जैसे सभी कृतिम जरूरतों को गैर अनिवार्य बना दिया। उनका मानना था कि मात्र अभिनेता के शारीरिक चेष्टाओं, देहगतियों से नाटक खेला जा सकता है। उन्होने यह साबित कर दिया कि पैसे और सभागारों से रंगमंच नहीं चलता, रंगमंच के लिए अभिनेता की देह, न्यूनतम स्पेस और दर्शकों की कल्पनाशक्ति ही काफी है। 

‘तीसरा रंगमंच’ अपने समय का एकसाथ इतना लोकप्रिय, साथ ही विवादित नाट्य प्रयोग था कि एक तरफ बंगाल में ही रंगकर्मियों ने इसका तीव्र विरोध और बहिष्कार तक किया, कई साथी प्रयोग से जुड़े फिर हटते चले गए लेकिन प्रयोग की निरंतरता नहीं थमीं। वहीं इस शैली से प्रेरणा पाकर बंगाल और देश के छोटे-छोटे कस्बों और शहरों में सैंकरों नाट्य संस्थाओं ने जन्म लिया। बाद के दिनों में बंगाल के प्रोवीर गुहा का ‘लिविंग थिएटर’, लखनऊ के शशांक बहुगुणा के समूह ‘लकरिस’ का साइको फिजिकल , अनिल भौमिक की नाट्य संस्था ‘समानान्तर’, असम का ‘थिएटर ऑन व्हील’ इत्यादि ने बादल सरकार की नाट्य परंपरा को अगले स्तर तक पहुंचाया। 

एक तरफ जहां कई रंगकर्मियों ने उनकी धैली से प्रेरणा पाई वहीं उनके प्रयोग की सीमाएं भी उजागर हुईं। अभिनेता को सर्वोपरि मानने वाले मशहूर रंगकर्मी देवेंद्रराज अंकुर मानते हैं कि जब भी कोई शैली, सिधान्त अभिनेता को पृष्ठभूमि में धकेल देगा, वह बहुत दिनों तक जिंदा नहीं रह पाएगा। वे कहते हैं कि जिस ‘पुअर थिएटर’ से प्रेरित होकर बादल सरकार ने ‘तीसरा रंगमंच’ कि संकल्पना की थी, उसके सिद्धांतकार ग्रोतोवस्की ने ही उसकी सीमाओं को समझकर उसे छोड़ दिया था। यही वजह है कि तीसरा रंगमंच एक सीमा के बाद अपनी कहमक बरकरार नहीं रख पाया। 

दरअसल तीसरा रंगमंच अभिनेता के नादार निहित ध्वनि, भाव, रंगों के माध्यम से रंगमंच कि नई भाषा तैयार करने का दावा करती थी लेकिन विडम्बना थी कि यहाँ अभिनेता मात्र एक साधन बनकर रह जाता है। इसलिए इस रूप से एक भी उल्लेखनीय अभिनेता उभरकर सामने नहीं आ पाए। यही स्थिति हम हबीब तनवीर के नाट्य रूप में भी देख सकते हैं। उनके भी ‘नया थिएटर’ कंपनी ने अपने समय में एक नए सिद्धांत और रूप के साथ सार्थक हस्तक्षेप किया और बहुत सफल भी रहा लेकिन यहाँ भी अभिनेता नहीं बल्कि रूप ही महत्त्वपूर्ण रहा था और इससे भी कोई उल्लेखनीय अभिनेता उभरकर नहीं आया। यह कहा जा सकता है कि यदि बादल सरकार और हबीब तनवीर भी आगमनात्मक शैली अपनाते हुए नाट्य सिद्धांत देते तो शायद आज वो ज्यादा व्यावहारिक हो पाता अर्थात पहले एक सिद्धांत गढ़कर उसके हिसाब से आलेख रचना करने के बनिस्पत यदि उन्होने पहले से लिखित नाटकों के माध्यम से सिद्धांत को जन्म दिया होता तो वह ज्यादा ठोस, व्यावहारिक और दूरगामी होता। 

इन सारी सीमाओं के बावजूद बादल सरकार एक युगांतकारी रंगकर्मी थे। जनवादी रंगमंच अपने स्वरूप में मार्क्सवादी विचार से प्रभावित और गली-गली, शहर-शहर खेला जाने वाला होता है। नुक्कड़ भी इस प्रकार के रंगमंच का क सशक्त रूप है। बादल सरकार का रंगकर्म इस स्वरूप के विकास और विस्तार में किस प्रकार योगदान करता है, जनवादी रंगमंच के अन्य स्वरूपों पर इसने अपने दौर में ही नहीं बल्कि बाद में भी कितना प्रभाव डाला है, इसका मूल्यांकन भी जरूरी है। 


मुकेश बर्णवाल
असि. प्रोफे., हिंदी विभाग
विवेकानंद महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय
विवेक विहार, दिल्ली-95
संपर्क- 9810418613
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