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[पुस्तक-समीक्षा] देशज चिन्ताओं की बेचैन छवियाँ-"विज्ञप्ति भर बारिश": सवाई सिंह शेखावत


पुस्तक-समीक्षा

देशज चिन्ताओं की बेचैन छवियाँ-"विज्ञप्ति भर बारिश": सवाई सिंह शेखावत


वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने राजस्थान के उभरते और अपनी बेहतर कविताओं के जरिए राष्ट्रीय-स्तर पर अलग पहचान बनाते युवा कवि ओम नागर के नये कविता-संग्रह ‘विज्ञप्ति भर बारिश’ को लेकर लिखा हैः एक ऐसे समय में जब गाँवों की बदहाली से नज़र फेर कर सारा विमर्श और रचना-कर्म शहरों पर केन्द्रित हो गया हो, ऐसे में ओम नागर हमारे समाज की बड़ी आबादियों के जीवन पर छाये और छाते जा रहे अँधेरों की ओर हमारी आँख को मोड़ने की कोशिश करते हैं। हिन्दी और राजस्थानी में काव्य-सृजन के लिए राजस्थान साहित्य अकादमी और केन्द्रीय साहित्य अकादमी से सम्मानित कवि ओम नागर का ‘देखना एक दिन’ के बाद यह दूसरा काव्य-संग्रह है। इसमें उन्होंने गाँव और कस्बों के जीवन में फैली बेरोजगारी, विस्थापन, गडबड़ाता पर्यावरण, पाताल में समाता पानी, छिनती जमीनें, सिकुड़ती जोत, तासीर खोती मिट्टी, औंधे मुँह गिरते अनाज के दाम और गाँवों के माहौल को लगातार खराब करती राजनीति की बेचैन छवियाँ दर्ज की हैं।

इन कविताओं में आज के गाँव-कस्बों के जीवन की यथार्थ तस्वीर के साथ ही उसका व्यापक केनवास भी काबिले-गौर है। यहाँ बैंक के नोड्यूज और खाद के लिए पंक्तिबद्ध किसान, रासायनिक उर्वरकों से पश्त होती खेतों की उर्वरता, लगातार गहराता पानी का संकट किसान का क्या बोयें क्या ना बोए वाला धर्म-संकट, व्यापारिक फसलें लेने के चक्कर में धरती के पेंदे में बच रहे अमृत को निचोड़ लेेने की किसान की आतुरता, बिस्वों में सिकुड़ती जोत, किसानों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति, मनरेगा मस्टररोल में नाम तलाशते युवाओं की लम्बी कतारों के साथ ही अब गाँवों में भी धर्म, जाति, आरक्षण और वोट के नाम पर फैलते दंगे हैं। लेकिन खेद की बात है कि राष्ट्रीय खबरों में देहात के इस असली संकट को कोई जगह नहीं है, वहाँ अब भी रियलिटी शोज और चकाचैंध भरे आयोजनों को तरजीह दी जा रही है। ऐसे में कवि अपनी गहरी चिन्ता का इज़हार करते हुए लिखता हैः जितना कठिन लगता है जरा से जीवन में/उस कठिनाई भरे रिशते को ढूंढना/उससे भी कठिन होता है/जरा सी कठिनता से भिड़ना। ओम नागर इस तरह जीवन की जरूरी चिन्ताओं के साथ ही, जरूरी जीवन-संघर्ष के भी कवि हैं।

इन कविताओ में ओम नागर जीवन को बदतरी की ओर धकेलते कारकों की पड़ताल कर उन्हें लगातार प्रश्नांकित करते चलते हैं। आज और अब के सामाजिक जीवन में दिखावे के बढ़ते ढोंग को लेकर वे लिखते हैंः ‘मुखौटों से घिरा हूँ मैं इन दिनों।' उधर कभी हमारी अर्थव्यवस्था का आधार रही कृषि भूमि पर लगातार खड़े हो रहे कंकरीट के जंगलों को उन्होंने ‘जमीन और जमनालाल’ कविता में बहुत गहरे से रेखांकित किया है। ओछे राजनीतिक हथकण्डों के चलते हमारा सामाजिक ताना-बाना जिस तरह इन दिनो छिन्न-भिन्न हुआ है और लोगों के दिलों के फासले बढ़े है ऐसे में उन्हे पिछली बेहतर बातों का स्मरण आना स्वाभाविक हैं। जब हज का शवाब और पीली कनेर की मालाएं गाँव के सामाजिक माहौल को समरस बनाती थी, जिसके चलते हमारी सामाजिक सौहार्द्रता पूरी तरह सुरक्षित थी। जब पूजा और परवीन की टाटपट्टियों के बीच किसी किस्म का कोई विभाजन नहीं था। इसीलिए शहर से गाँव लौटते हुए उन्हें गाँव का सहजीवन, हथाई, खेल-तमाशे, भूले-बिसरे भजन, मंजीरों की ताल, ठिठोली और मसखरियाँ याद आते हैं। नहीं, यह अतीत का गदलश्रु भावुकता भरा स्मरण या महिमा-मण्डन नहीं है, बल्कि गाँव -कस्बों के सामाजिक जीवन की संवदेना को गहराने वाले स्रोतों की फिर से तलाश है।

जीवन की इसी तरफ़दारी में उन्हें सूरज से आँख चुरा कर पंखुड़ी में समा जाती ओस की बूँद, जीवन के ऊबड़-खाबड़ को समरस बनाती मिलन की अपनी सी राह, अपने हिस्से का प्रेम, पलकों की कोर में बँधी स्मृतियों की मिठास के साथ ही गाँवों की सड़कों के किनारे गन्ने पेर कर उसके रस का रोजगार करती ‘रसवालियाँ’ भी याद आती है। जो कृत्रिम पेयों के विरूद्ध जैसे एक सार्थक लड़ाई लड़ रही है और इस तरह जीवन की देसी मिठास को बचाने का एक महत्वपूर्ण उपक्रम कर रही है। देसज संभावनाओं की इसी तलाश में वे यह भी देख पाते हैं कि आज का कथित आधुनिक डरा हुआ आदमी सिर्फ गमलों में रचता है सौन्दर्यशास्त्र/लेकिन जीवन के असली रंगों को बचाने की बात आती है तो वह स्थानीयताओं पर ओढ़ लेता है चुप्पियाँ/दूर के सवालों पर हो जाता है वाचाल/और रचता रहता है जुमलों का छन्द शास्त्र।

कविताओं में ओम नागर जीवनानुभवों को तवज्जों देने के पक्षधर हैं। इसीलिए उनके यहाँ आज भी ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ रहे पिता शब्द बीज बोते हैं और वर्णमाला काटते हैं। कवि कहता हैः बारहखड़ी आज भी खड़ी है/हाथ बाँधे पिता के समक्ष। जीवन को तरह देती जरूरी कोमलता को हलकान होते देख ‘गिद्धों की चाँदी के दिन’ कविता में वे लिखते हैं तहखानों में कोई शैतान बसा लेता है गिद्धों की बस्ती और चुन-चुन कर खाता है आँख, नाक, कान/गुलाब की पंखुड़ियों से होंठ/दिल की धड़कन को अनसुनी कर नोंच लेते हैं/कलाइयों पर गुदे हो हरे जोड़ेदार नाम। इसी तरह भूख के अधिनियम में उन्हें भूख से बेकल अपनी ही सन्तानों को निगल चुकी कुतिया के साथ, कफन का घीसू, काल कोठरी से निकल कर आती बूढ़ी काकी के साथ ही भूख का दशक पूरा करती इरोम शर्मिला और माँ के नाराज होने से क्षण भर को ठिठकती धरती के साथ ही सैंकड़ों प्रकाश वर्ष नीचे चले गये सूरज की याद आती है। जीवन के प्रति गहरी उद्दाम आत्मीयता के चलते ही ऐसी कविताएं संभव होती है। निश्चय ही यह संकलन अपनी देशज चिन्ताओं में गहरे से जुड़ा है।

संग्रह के अंत में ‘एक गाँव की चिट्ठी शहर के नाम’ में 8 उपखण्डों में वर्णित एक ऐसी कविता है जो अलग-अलग आयामों से लगातार पिछड़ते जा रहे गाँवों, व्यवस्था द्वारा की जा रही उनकी अनदेखी, उसके दर्द-शिकवों और उसके जवाबदेह कारकों की पड़ताल करती है। लेकिन अपने कथ्य में वह लगभग उन्हीं तमाम मुद्दों को दुहराती है जो संग्रह में पहले ही बेहतर ढंग से वर्णित हो चुके हैं। इस तरह यह धूमिल की ‘पटकथा’ की तरह एक बेहतर कविता बनते-बनते रह जाती है-कविता में सब कुछ समेट लेने के ऐसे आग्रह से ओम नागर को बचना होगा।



कविता-संग्रह: विज्ञप्ति भर बारिश
कवि। : ओम नागर
प्रकाशक। : सूर्य प्रकाशन मंदिर बीकानेर ( राज )
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