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प्रवासी परिधि में स्वदेशी चकाचौंध (तेजेंद्र शर्मा की कहानियों के बहाने ): डॉ राजेश श्रीवास्तव, भोपाल (म०प्र०)



 प्रवासी परिधि में स्वदेशी चकाचौंध(तेजेंद्र शर्मा की कहानियों के बहाने )


-डॉ राजेश श्रीवास्तव, भोपाल (म०प्र०)



तेजेंद्र शर्मा को प्रवासी कथाकार की श्रेणी में गिनना बहुत अटपटा लगता है . लेकिन यह तो सच ही है . उनकी कहानियां भारतीय परिवेश की बारीकियों का परिचय इस प्रकार कराती हैं कि यह विश्वाश करना कठिन हो जाता है कि वे परदेश में रह रहे हैं . अनेक कहानीकारों की चर्चा में मुझे कई बार शामिल होने का अवसर मिला है किन्तु इस बार यह अवसर बिलकुल अलग है . इस समय दिमाग में कहानियां नहीं तेजेंद्र शर्मा का मुस्कुराता चेहरा भर है , जिसे मैंने केवल तस्वीरों में ही देखा है . कभी दो- चार शब्दों भर बातचीत हुई भी है तो उसके कोई माने नहीं . हां , जब तब , यहाँ –वहां , इधर-उधर , हर कहीं उनकी साहित्यिक लोकप्रियता की चर्चा का भी कम असर नहीं है . तेजेंद्र शर्मा की कहानियों से रूबरू होने के पीछे दो कारण और भी हैं .पहला तो यह कि वे प्रवासी कथाकार हैं . (प्रवासी और अप्रवासी होना एक पहेली है मेरे लिए . कालेज के दिनों में भी मैं इन दो शब्दों के बीच गच्चा खा जाता था. प्रवास एवं इसके विभिन्न स्वरूपों के साथ अनेक भ्रम हैं . इसके सही एवं व्यापक अर्थ को सीमित कर अब केवल ‘विदेश में रहने वाले को ही’ प्रवासी समझा जाने लगा है . गलत होते हुए भी, प्रवासी शब्द का, यह अर्थ अब रूढ़ हो गया है । ‘प्रवास‘ के स्थान पर ‘अप्रवास’ या ‘प्रवासी’ के स्थान पर ‘अप्रवासी’ शब्द का प्रयोग देखने में आ रहा है .) तेजेंद्र शर्मा का प्रवासी होना बड़े मायनेदार है.शायद इसी वजह से उन्होंने अधिक पाठकों ,संपादकों ,प्रकाशकों ,मित्रो और लेखकों को आकर्षित किया है . लेकिन यह एक बेहतरीन स्थिति है खासकर हिंदी के लिए. यू के , लन्दन में रहकर वे हिंदी कथा का दीपक जलाए हुए हैं. हिंदी भाषा की ज्योति जगमगा रही है. हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार का जो काम अनेक संस्थाएं और सरकार तक कर रही है उसे वे सहयोग कर रहे हैं . हिंदी का चतुर्दिक प्रचार-प्रसार हो रहा है . और हिंदी का साहित्य भी समृद्ध हो रहा है – साधुवाद . 

प्रवासी लेखन को लेकर भारतीय आलोचकों , खासकर बामपंथी आलोचकों में बहुत उपेक्षा का भाव रहा है . उसके कुछ कारण सच भी हैं . प्रवासी होने की आड़ में कई रसूकदार लोग साहित्यकार बन गए हैं . वे अन्य कारणों से लोकप्रियता प्राप्त करने में सक्षम हैं . प्रवासी लेखन के बारे में किसी ने एक सवाल किया है .मैंने कहीं पढा था – प्रवासी व्यक्ति होता है उसकी भाषा नहीं . इसलिए प्रवासी साहित्य जैसी कोई धारा की आवश्यकता नहीं है . मेरा मानना है कि प्रवासी साहित्य एक अलग ही धारा है . क्योकि उसमें जो नज़रिया है वो अलग है . एक प्रवासी लेखक कई संस्कृतियों , देशकाल की स्थितियों ,रीति-रिवाजों, प्रथाओं , परम्पराओं, खान-पान ,और साहित्यिक गुणों से जाने- अनजाने वाबस्ता होता रहता है . यही गुण उसे भारतीय लेखन परम्परा से अलग पहचान देता है .देश की राजनीति और सामाजिक सरोकारों और कला संस्कृति पर निरपेक्ष दृष्टि रखना एक प्रवासी लेखक के लिए अधिक आसान है .बशर्ते उसमें यह सब क्षमता भी हो . तो लन्दन में वर्षों से रहने वाले तेजेंद्र शर्मा और रचनाकर्म करने वाले हिंदी में कहानी लिखें , चर्चित हों , सम्मानित हों और हिंदी का गौरव बढे –यह बड़ी बात है . 

उनके तीन कहानी संग्रह अभी मैंने देखे है - ‘ढिबरी टाइट' (1994), ‘देह की कीमत' (2001) तथा “बेघर आँखें” (2007). इसके अलावा और भी बहुत से संग्रह हैं उनके . काला सागर, यह क्या हो गया, सीधी रेखा की परतें, कब्र का मुनाफा, दीवार में रास्ता, मेरी प्रिय कथाएँ, प्रतिनिधि कहानियाँ आदि संग्रहों को देखने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला . अलबत्ता छुटपुट कहानियां पत्रिकाओं में देख पाया हूँ . 

तेजेंद्र शर्मा की कहानियाँ उनके सजग साहित्यकार होने का प्रमाण है। वे अपने आसपास से ही अपने पात्र चुन लेते हैं जो बिलकुल उनके साथ कदमताल करते चलते हैं . विषय वैविध्य और विषयों की सामायिकता और कथा साहित्य में शिल्प एवं शैली के स्तर पर जो परिवर्तन हुए हैं, उनकी झलक तेजेंद्र शर्मा की कहानियों में देखने को मिलती है।

तेजेंद्र शर्मा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं .किन्तु उनकी असली पहचान उनके रचना संसार से है . (हालाकि यह भी एक सच है कि भारत की जितनी निगरानी वे रखते हैं , उतनी तो यहाँ के बहुत सारे फन्ने खां भी नहीं रख पाते ). कहानियों और कहानीकारों को स्थापित करने का काम हिंदी जगत में प्राय आलोचक जन ही करते आये हैं . और आलोचक भी एक से बढ़कर एक कद्दावर हुए है . सबके सब श्रद्धेय , पूज्यनीय , आदरणीय , लम्बे समय तक हिंदी कहानी को आलोचकों की दृष्टि ने खूब पहचाना . अब हालात बदल गए हैं आलोचकों को पूछता कौन है?(क्षमा करें) आलोचक घर की खिड़की खुली रखते हैं .आलोचकों के विकल्प भी तो बहुत हैं . अपनी पत्रिका , अपना प्रकाशन , अपने पाठक , अपना सम्मान , अपना मीडिया . आलोचक तो खुद मुश्किल में है . उन्हें कोई कवर ही नहीं करता . (क्षमा करें , मैं अब तक तेजेंद्र शर्मा की कहानियों पर नहीं , उनकी कहानी तक पहुचने की प्रक्रिया पर ही बात कर रहा हूँ . लेकिन इतना फिर भी कहना चाहता हूँ , अधिक तड़क – भड़क से बात तो बन सकती है लेकिन कहानी नहीं बनती . तेजेंद्र शर्मा की कहानी बन रही है .प्रवासी परिधि में स्वदेशी चकाचौंध का जादू चल पडा है . उनकी कहानी हिंदी की मुख्य धारा को प्रभावित कर रही है – यह भी बड़ी बात है )

तेजेंद्र शर्मा की कहानियों में जो सबसे बड़ी बात मुझे अपील करती है , वह उनकी अनगढ़ शैली है . बावजूद इसके उनकी कुछ कहानिया मुझे रोककर उनके ठेठ प्रवासी होने का अहसास भी करा जाती हैं . मैं बड़े सद्भाव के साथ यह कहना चाहता हूँ कि उनकी कुछ कहानियां जो मैंने पढ़ी हैं उनके आधार पर मैं उन्हें प्रवासी तमगे से अलग नहीं कर पाया . एकाध कहानी का उदाहरण भी दे ही दूं . जैसे – टेलीफोन लाइन . 

टेलीफोन लाइन की शुरुआत में ही कुछ शब्द परेशान कर देते हैं . फोन , टेलीफोन और मोबाइल शब्दों के प्रयोग में थोड़ी असावधानी हुई है – 

टेलिफ़ोन की घन्टी फिर बज रही है .अवतार सिंह टेलिफ़ोन की ओर देख रहा है . सोच रहा है कि फ़ोन उठाए या नहीं . आजकल जंक फ़ोन बहुत आने लगे हैं. लगता है जैसे कि पूरी दुनियां के लोगों को बस दो ही काम रह गये हैं – मोबाईल फ़ोन ख़रीदना या फिर घर की नई खिड़कियां लगवाना . अवतार सिंह को फ़ोन उठाते हुए कोफ़्त- सी होने लगती है. सवाल एक से ही होते हैं, “हम आपके इलाके में खिड़कियां लगा रहे हैं. क्या आप डबल ग्लेज़िंग करवाना चाहेंगे ? ” या फिर “सर क्या आप मोबाइल फ़ोन इस्तेमाल करते हैं ? ” (टेलीफोन लाइन से )

लाइन शब्द प्राय लेंड लाइन के लिए ही प्रयोग में आता है . मोबाइल के लिए नेटवर्क का प्रयोग हो रहा है . टेलीफोन पर लम्बी बातचीत तो ठीक पर उसके संवादों में कहीं कुछ खटकता है , कहीं – कहीं . 

तुम्हें वो उषा याद है क्या ? ”

“कौन सी उषा ? ”

“वही जो स्कूल के बाहर ही रहती थी. आर्ट्स में थी. वो मुकेश का गाना गाया करती थी, --जियेंगे मगर मुस्कुरा न सकेंगे, कि अब ज़िन्दगी में मुहब्ब्त नहीं है. ” 

“हां जी, उस रोंदड़ को कौन भूल सकता है. बोलती थी तो लगता था कि अब रोई के तब रोई....उसने छ : साल तक बस वो एक ही गाना सुना सुना कर बोर कर दिया.....वैसे अवतार, गाती ठीक थी, ...मुझे मुस्कुराए हुए तो एक ज़माना ही बीत गया है.”

“जानती हो उसने एक दिन मुझे कहा था कि अवतार तुम कोई माडर्न नाम रख लो न ! आई विल कॉल यू ऐवी ! अवतार बहुत पुराना सा नाम लगता है. तुम में जो सेक्स अपील है, नाम भी वैसा ही होना चाहिये.... उसके बाद उसने मुझे हमेशा ऐवी कह कर ही बुलाया... मुझे पता ही नहीं चलता था कि मुझे बुला रही है.... वैसे रोंदड़ नहीं थी यार. अच्छी भली लड़की थी... सांवली भी थी. मुझे गोरे रंग के मुकाबले हमेशा सांवला रंग ज़्यादा अट्रेक्ट करता है.”

“मैने भी नोट किया था कि तुमने यह बात स्कूल में दो तीन बार दोहराई थी. तुम्हें अपर्णा सेन बहुत सुन्दर लगती थी.... गोरी चिट्टी हिरोइनें नहीं... फिर इंगलैण्ड में क्या करते हो ?.. किसी गोरी मेम से चक्कर नहीं चला क्या ? ”

“अरे हमारा क्या चक्कर चलना, एक शादी की थी, वो भी संभाली नहीं गई.... फिर से कंवारा बना बैठा हूं. ”

तेजेंद्र शर्मा की यह कहानी एक ओर नायक अवतार सिंह को फोकस करती है तो दूसरी ओर सोफिया जैसे बिंदास केरेक्टर को सामने लाती है . सोफिया का चरित्र बिलकुल अलग है . पचता नहीं है .

स्कूल में साथ पढने वाली कोई लड़की कैसे इस तरह की बात कर सकती है - “अवतार मियां तुम भूल रहे हो कि मेरी शादी हायर सेकेण्डरी पास करते ही हो गई थी. अभी तो अट्ठारह की भी नहीं हुई थी.... जब शादी होगी, तो सुहागरात भी होगी... और जब वो होती है तो पेट फूल ही जाता है. दो बार फूला और दो बार हवा निकलवा दी. वर्ना चार चार को ले कर बैठी होती. हमारे मर्द भी तो जाहिल होते हैं. उनके लिये औरत बस इसी काम के लिये होती है. हर साल एक बच्चा बाहर निकाल लो....बेग़ैरत होते हैं सब. ”

स्कूल के दिनों की घटनाओं के वर्णन में कुछ बडेपन का असर ज्यादह है . सोफ़िया का टेलीफोन पर यह कहना भी अजीब है - “जानते हो कितना जी चाहता था कि मुझे कोई सोफ़ी कह कर लिपटा ले अपने साथ. और फिर वही सोफी अचानक अपनी विधवा बेटी से विवाह का प्रस्ताव अवतार के सामने रख देती है. स्कूल की यादों में केवल लड़कियों के प्रेम , आकर्षण और फ्लर्ट के सिवा कुछ नज़र नहीं आता . हिदू- मुसलमान, सिख , आतंकवाद की घटनाओं में उलझी लपटी और टेलीफोन लाइन की लम्बी बातचीत में यह कहानी पाठक को बहुत उलझाती है . 

अब एक और कहानी हथेलियों में कम्पन – अद्भुत कहानी . परिजनों की अस्थियाँ लेकर हरिद्वार की यात्रा . संवेदना के साथ यथार्थ के धरातल पर झकझोरने वाली अनुभूतियाँ . बहुत ईमानदारी और सच्चाई के साथ लिखी गई कहानी .नरेन् मौसा और कथानायक के बीच मित्रवत व्यवहार है .छोटे –छोटे ख्याल एक विचारvicvividvidhvidhavidhaavidhaarvidhaaravidhaaraaधारा बनकर गहरे संवेदन का साक्षात्कार कराते हैं - मृत्यु क्या केवल एक शारीरिक स्थिति है? क्या कर्मकाण्ड जीवन और मृत्यु के साथ जुड़ा रहना चाहिये? क्या किसी की मृत्यु पर रोना आवश्यक है?... मुझ जैसे अज्ञानी लोग इन सवालों से जूझते रहते हैं।

नरेन त्रिखा का अनुभव संसार बहुत बड़ा है . वे अपने पिता, चाचा, मामा, दो साढ़ुओं, एक साली, एक साले, अपने समधी और कई दोस्तों की अस्थियां हरिद्वार पहुंचा चुके हैं. उनका इन पण्डों को अच्छी तरह समझते थे. उन्हें इन सबसे बातचीत करने का एक लम्बा अनुभव है. बाऊजी की मृत्यु के झटके से भला कहां उबरा था. नरेन मौसा की एक एक बात मेरे लिये फ़रमान था. मुझे आशा थी कि किसी ऐसी जगह जाकर अस्थि विसर्जन करेंगे जैसा कि गंगा नदी को चित्रों में देखा है. मगर नहीं... एक पण्डा मिला जिसने कहा कि यहां ऊपर जो धारा बहती है यहां बेहतर अस्थि विसर्जन होता है. नरेन मौसा ने हामी भर दी. 

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था... मृत्यु सीधी और सरल क्यों नहीं हो सकती? क्यों कुछ लोग मृत्यु में भी ऑनर्स और पीएच. डी. कर लेते हैं. क्यों हम मरने के बाद उनके द्वारा लूटे जाने पर भी उफ़ नहीं करते? क्यों हर मज़हब का इन्सान मौत के सामने इतना बेचारा हो जाता है? क्यों हम मृतक की आत्मा की शान्ति के लिये बेवक़ूफ़ियों पर बेवक़ूफ़ियां करते चले जाते हैं? हम तो महानगरों में रहने के कारण पूरी तरह से धार्मिक नहीं रहे... मगर जो छोटे शहरों, कस्बों या गांव में रहते हैं... उनका शोषण ये धर्म के ठेकेदार किस तरह करते होंगे. 

कर्मकाण्डो की यह दुनिया बड़ी विचित्र है . तेजेंद्र शर्मा कितनी सरलता से वह सब कह देते हैं , जिसके बारे में सोचते हुए भी सारे बदन में झुरझुरी आ जाती है . 

चारों तरफ़ से घिरा एक स्थान है जहां एक गाय बंधी खड़ी है, एक चारपाई है, एक बिस्तर बंधा हुआ है, एक लालटेन, एक छाता, एक टाइम पीस, एक जोड़ी मर्दाना कपड़े और एक जोड़ी ज़नाना कपड़े, एक मर्दानी चप्पल और एक ज़नाना चप्पल. वहां पास एक और खटिया पर एक पण्डा सुस्ता रहा था. मैं अनायास पूछ बैठा, -ये सब क्या है?

नरेन मौसा से पहले ही पण्डा स्वयं बोल पड़ा, -देखो बेटा हम यहां क्रियाकर्म करते हैं. मरने वाले की आत्मा की शान्ति के लिये हम वे सब चीज़ें यहां रखते हैं जिनकी उसे अगली ज़िन्दगी में ज़रूरत होगी. तुम यहां मृतक के नाम से जो जो चीज़ें दान कर जाओगे, वे सब उसे स्वर्ग में मुहैय्या हो जाएंगी. यहां पांच सौ से ले कर पांच हज़ार तक के क्रियाकर्म की सुविधा मौजूद है. 

मेरी आंखों में अनिश्चितता देख कर पण्डा स्वयं ही बोल पड़ा, -इसमें परेशान होने की तो कोई बात ही नहीं ना. देखिये, अगर आपका बजट पांच सौ रुपये का है तो बस आप खाट, बिस्तर और कपड़ों को हाथ लगा दीजिये. ये मृतक के नाम से दान हो जाएंगे. जैसे जैसे आप नग बढ़ाते जाएंगे, वैसे वैसे दाम बढ़ते जाएंगे. पांच हज़ार में गौदान का लाभ भी मिल जाएगा. 

मृत्यु दर्ज करवाने का दृश्य तो और भी अधिक बौराने वाला है . -

उस बहीखाते में मैंने अपने हाथों से अपने बाऊजी की मृत्यु के बारे में विवरण लिखा. ऐसा लगा जैसे बाऊजी की मृत्यु अब हुई है, इसी पल. कमरे की सीलन... बहीखातों की महक... और फ़ाउण्टेन पेन से की गई एन्ट्री... आंखों में जमे हुए आंसू... एक बार छत की तरफ़ देखा... कम से कम बीस फ़ुट ऊंची तो होगी ही... ऊपर तक बहीखाते ही बहीखाते... चारों तरफ़ से दीवारें तो दिखाई ही नहीं दे रही थीं... ट्यूब-लाइट जल रही थी... कमरा उजला था... बस लाल लाल बहीखाते... क्या कभी ये सभी नाम एक दूसरे से बातचीत करते होंगे... ये तो सभी एक ही बिरादरी, भाषा और क्षेत्र के लोग हैं... क्या उस कमरे में सरायकी भाषा सुनाई देती होगी... ये मृतक आपस में क्या बातें करते होंगे... इतनी शांति मुझे अस्थि विसर्जन करते समय नहीं मिली थी जितनी कि शकुन्तला पाठक की हवेली में मृत्यु दर्ज करवाते समय मिली. praaspraapraprp

(इस कहानी को मैंने कई दफा पढ़ा. दिल भर आया . अभी कुछ दिन पहले ही मैंने अपनी माँ को सदा के लिए खोया है . पिता भी कुछ वर्ष पहले चल बसे . माँ और पिता के अस्थि विसर्जन का एक दृश्य अभी आँखों में ही बसा है और दूसरा तेजेंद्र शर्मा की कहानी में देखता हूँ . संवेदना के स्तर पर यह कहानी बहुत बड़ी कहानी है .) 

इस कहानी का उत्तरार्द्ध और भी ख़ास है .नरेन् मौसा के तीस वर्षीय बेटे की अस्थि विसर्जन का समय है यह . आज गंगा उल्टी बहने वाली है... आज पुत्र अपने पिता की मृत्यु बहीखाते में नहीं भरेगा... आज पिता अपने पुत्र का नाम लिख कर हस्ताक्षर करेगा... ठीक उसी पन्ने में नीचे जहां उसने अपने पिता की मृत्यु का विवरण भरा था. 

इन दो कहानियों से तेजेंद्र शर्मा के कहानी के सभी पक्षों को यक़ीनन ठीक तरह से नहीं समझा जा सकता . लेकिन यह लेखक बिलकुल बेनकाब है . बेनकाब क्या, नकाब तो कभी थी ही नहीं . सब कुछ पारदर्शी .वे एक बड़े लेखक हैं. 

ख्यातिनाम व्यंग्यकार गिरीश पंकज जी ने तेजेंद्र शर्मा के बारे में कहीं लिखा है कि उन्हें अपने बड़े होने का अहसास ही नहीं. लेखक अगर अच्‍छा इंसान न बन सके, तो उसका लेखन बेमानी है. तेजेंद्र शर्मा के लेखन में गहरी करुणा है. उनकी तमाम कहानियाँ मनुष्‍य की प्रवृत्तियों की गहरी पड़ताल करते हैं और पाठक को सोचने पर विवश कर देते हैं. विदेश में रह रहे भारतवंशियों की समस्‍याओं को लेकर या फिर यहाँ से विदेश जाने की ललक रखने वाले रिश्‍तेदारों के स्‍वार्थों की कहानियाँ भी तेजेंद्र ने खूब लिखी हैं. महानगरीय त्रासदियों पर भी उनकी अनेक कहानियाँ हैं. अब तो उनकी कहानियाँ अनेक भाषाओं में भी अनूदित होने लगी हैं. लेकिन तेजेंद्र शर्मा सभी प्रभावों से परे हैं . उनकी कहानियां निजी विचार-विचारधारा तथा प्रवृत्ति को थोपती नहीं है . 

उन्हीं की तरह बड़ी कहानीकार ज़किया ज़ुबैरी जी लिखती हैं -तेजेंद्र शर्मा की लेखन प्रक्रिया एक मामले में अनूठी है. वह अपने आसपास होने वाली घटनाओं को देखते हैं, महसूस करते हैं, और अपने मस्तिष्क में मथने देते हैं. जबतक कि घटना कहानी का रूप नहीं ग्रहण कर लेती. तेजेन्द्र जितने अच्छे कहानीकार हैं उतने ही अच्छे इन्सान भी हैं और बेहद अच्छे दोस्त भी. तेजेंद्र शर्मा एक ख़ुदा-तरस इन्सान है जो कि ज़मीनी हक़ीकत से जुड़ा हुआ है. दूसरों को हंसाने वाला, ख़ुश रखने वाला यह इन्सान, हज़ारों दुख अपने सीने में छिपाए दिन रात इसी कोशिश में रहता है कि कैसे किसी का भला कर दिया जाए. यह संवेदनशील व्यक्ति केवल कहानीकार ही नहीं, कवि भी है और मानव मन की दुखती रगों को पकड़ता है. तेजेंद्र की कहानियां और कविताएं उसके साहित्यिक जीवन का दर्पण हैं.

कैसर तमकीन ने तेजेंद्र शर्मा के उर्दू कहानीपुट पर लिखा है - शर्मा साहिब की कहानियों का मजमुआ (संकलन) ‘ईटों का जंगल' इस तार्रुफ़ के साथ हमारे हाथ में आता है कि यह हिंदी से उर्दू में तरजुमा (अनुवाद) है। बात ज़रा चौंका देने वाली लगती है क्योंकि हिन्दी से उर्दू या उर्दू से हिंदी तरजुमें के कोई ख़ास मायने नहीं हैं. यह तो सिर्फ़ रसमुल ख़त (लिपि) बदलने की बात होती है. दूसरी बात यह भी है कि तेजेन्द्र शर्मा की कहानियों को तो हिंदी या उर्दू की कहानी कह पाना मुश्किल है. वह इतनी आसान ज़बान लिखते हैं कि हिंदी और उर्दू पढ़ने वाले सभी लोग आसानी से समझ जाते हैं. प्रेमचन्द की तरह शर्मा साहिब की कहानियां भी उस ज़बान में हैं जो उत्तरी हिन्दुस्तान में एक कोने से दूसरे कोने तक बोली और समझी जाती है. थोड़े बहुत फ़र्क के साथ यह उन तमाम जगहों पर आम बोली की तरह इस्तेमाल होती है जहां एशियाई लोग रहते हैं . इस किताब में शर्मा साहिब की कहानियों को तरजुमा कहना अच्छा नहीं लगता. यहां तो सिर्फ़ लिपि बदली गई है. कहानी की देवी एक ही है. पहले यह सिर्फ़ साड़ी पहने हुए थी और अब यह शलवार कमीज़ पहन कर आई है - पर शलवार कमीज़ भी तो पूरे भारत का लिबास है. 
तेजेंद्र शर्मा की लोकप्रियता का यह आलम है कि बड़े – बड़े लेखक भी उनके लेखन की अवहेलना नहीं कर पाते . बहुमुखी प्रतिभा के धनी तेजेंद्र शर्मा की रचनाओं पर विस्तार से शोध किया जाना प्रतीक्षित है . प्रवासी परिधि में स्वदेशी चकाचौंध करते तेजेंद्र शर्मा हिंदी साहित्य के लिए भी एक ज़रूरी लेखक बन गए हैं . 

डॉ राजेश श्रीवास्तव 
विभागाध्यक्ष –हिंदी , शासकीय महाविद्यालय बुदनी (म०प्र०)
बी-१६ ,लेकपर्ल रेजिडेंसी , ई-८ ,अरेरा कालोनी, भोपाल(म०प्र०),भारत 
मो-9827303165 , urvashiurvashibhopal@gmail.com 
सम्पादक – उर्वशी, शोध, साहित्य एवं संस्कृति की अन्तरराष्ट्रीय त्रैमासिकी
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