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बुधवार, 12 अप्रैल 2017

फाँस : उपेक्षित भारतीय किसान की मूक चीख- राजश्री सिंह


फाँस : उपेक्षित भारतीय किसान की मूक चीख
राजश्री सिंह
                                                       अतिथि प्रवक्ता, हिंदी विभाग
                                                                     सेठ आनन्दराम जयपुरिया कॉलेज
                                                                      कलकत्ता विश्वविद्यालय

            देश की आजादी को 69 साल होने को है। राजनीति करवट ले रही है। विकास और तकनीक लोगों को लुभा रहे हैं। कभी-कभी तो लगता है कि सचमूच भारत मीडिया और राजनेताओं के कहे अनुसार भारत हो गया है परंतु जब-जब हम देखते हैं आत्महत्या को मजबूर किसानों को, रिक्शा चलाते मजदूरों को, मछुवारों को तो लगता है -- बदलाव और विकास की बातें राजनीति का मुद्दा भले ही हों, लोगों के जीवन को परिवर्तित नहीं कर सका।
            यह निर्विवाद सत्य है कि भारत कृषि प्रधान देश रहा है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी भारत की अर्थ-व्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर ही आधारित है, लेकिन सच्चाई तो यह है कि कृषि से जुड़ा हुआ किसान आज अपनी पूर्वावस्था से ज्यादा दयनीय अवस्था में जी रहा है। शायद ही ऐसा कोई दिन होगा जहाँ समाचार पत्रों में कृषक आत्महत्याओं का उल्लेख न हो। उत्पादन का आधार कृषक है और कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था  की रीढ़ है। सभी व्यवस्थाएँ अर्थव्यवस्था से जुड़ी हैं। हालात यह है कि सभी व्यवस्थाएँ मजबूत होती जा रही हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था के इस दौर में किसानी व्यवस्था ही हाशिए पर ढकेल दी गई है।
            भूमंडलीकरण और औद्योगिक विकास के इस भागम भाग में किसानों की सतत उपेक्षा, किसानों का किसानी से पलायन, आत्महत्याओं का भयावह आँकड़ा केवल एक समस्या नहीं है बल्कि भविष्य के लिए एक चेतावनी भी है। इस चेतावनी को प्रेमचंद के बाद किसी ने गहराई से समझा तो वे हैं --कथाकार संजीव। संजीव एक ऐसे कथाकार के रूप में पहचाने जा रहे हैं जो एक विषय पर पहले अइनुसंधान करते हैं फिर उस अनुसंधान को अपनी सृजनात्मकता के आधार पर पाठक को सौंप देते हैं। आज 70 फीसदी से ज्यादा कृषि आधारित व्यवस्था मुनाफा कमा रहे हैा लेकिन इस खाद्य  श्रृंखला में किसान ही है जिसकी स्थिति अत्यंत दयनीय है। ऐसे में कथाकार "संजीव' पाँच साल के गहन शोध एवं अथक परिश्रम से देश के किसानों की समस्याओं, आत्महत्याओं की इस सतत् त्रासदी पर "फाँस' जैसा उपन्यास लेकर हमारे सामने आते हैं एवं इस पूरे प्रकरण की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक पेंचीदगियों की सूक्ष्म पड़ताल करते हुए भारत के इस ज्वलंत और बुनियादी समस्या को सशक्त रूप से उठाते हैं।
            "फाँस' के केंद्र में है "विदर्भ' और विदर्भ के माध्यम से समूचे देश के किसानों की समस्याएँ ओर इन समस्याओं को उकेरते हुए अनेक ऐसी समस्याएँ और तथ्य जिन्हें हम जैसे लोग जो प्रत्यक्ष रूप से कृषि से जुड़े नहीं है, अनभिज्ञ हैं, सामने आए हैं, "फाँस' की कहानी आरंभ होती है विदर्भ के यवतमाल जिले के बनगाँव के एक किसान परिवार शिबू और शकून तथा उनकी दो बेटियों की अपनी दुख-तकलीफों, सपनों की दुनियाँ से और धीरे-धीरे किसानों के जीवन के कई अंधेरे-उजाले कोनों में झाँकते हुए आगे बढ़ती है। "फाँस' एक किसान, एक घर, एक खेत, एक दुस्वप्न, एक आत्महत्या से शुरू होने वाली कहानी में आशा वानखेड़े, सुनील, माधव आदि कई किसान, कई घर, कई खेत, अनगिनत नष्ट फसलें और अनगिनत टूटे सपने, अनगिनत आत्महत्याओं की कहानियाँ जुड़ते-जुड़ते यह देश-भर के लिए अन्न उपजाने वाले किसानों की हत्याओं और उनके साथ की जाने वाली साजिशों की महागाथा बन जाती है।
            हमारे देश की आधा से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है। आज भी लाखों भूमिपुत्र का जीविकोपार्जन खेती पर ही निर्भर है। विडंबना यह है कि सुबह से शाम खेती के लिए अपना जीवन होम करने वाले किसानों को पेट भरने के लिए दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती। कृषि उनके गले की फाँस बन गई है --जिसे अपनी प्रवृत्ति और मजबूरी के कारण न छोड़ पाते हैं न ही उसमें खुश रह पाते हैं। ये प्रवृत्ति और मजबूरी के कारण न छोड़ पाते हैं न ही उसमें खुश रह पाते हैं। ये प्रवृत्ति और मजबूरियाँ अनेक हैं जिन्हें हम उपन्यास में स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। किसानों के खेती न छोड़ पाने के प्रमुख दो कारण है --एक कृषि दासता तो दूसरा अन्य कोई विकल्प का न होना। शिबू अपनी इसी मजबूरी को बयां करता है --""अकेला होता तो चला भी जाता कहीं ... नागपुर, नासिक, मुंबई, दिल्ली ... लेकिन ये दो-दो मुलगियाँ, बायको इन सबको लेकर कहाँ जाऊँ।''1 इसके जवाब में कलावती कहती है --""तुम ही नहीं, इस देश के सौ में से चालीस शोतकरी आज ही खेती छोड़ दें अगर उनके पास कोई दूसरा चारा हो। 80 लाख ने तो किसानी छोड़ भी दी।''2 आगे किसानी मानसिकता को बयां करते हुए कलावती कहती है --""एक विद्वान ने कहा है कि खेती कोई धंधा नहीं, बल्कि एक लाइफ स्टाइल है जीने का तरीका, जिसे किसान अन्य किसी भी धंधे के चलते नहीं छोड़ सकता।''3
            यह कृषि मानसिकता ही है जिसने भारत में कृषि व्यवस्था को बचाए-बनाए रखा है पर सोचने की बात यह है कि तरक्की और विकास के तमाम दावों के बावजूद किसान आज विपन्न है और कर्ज के बोझ और प्रकृति की मार ने उसे आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया है और 1990 के दशक के बाद से यह आँकड़ा बढ़ता ही चला जा रहा है। राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय के आँकड़ों के अनुसार --""भारत भर में 1995 ई. से 2011 के बीच 17 वर्षों में 7 लाख, 50 हजार, 860 किसानों ने आत्महत्या की है। भारत में धनी और विकसित कहे जाने वाले महाराष्ट्र में अब तक आत्महत्याओं का आंकड़ा 50 हजार 830 तक पहुँच चुका है। 2011 में मराठवाड़ा में 435, विदर्भ में 226 और खान देश (जलगाँव क्षेत्र) में 133 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। आँकड़े बताते हैं कि 2004 के पश्चात स्थिति बद से बदतर होती चली गई। 1991 और 2001 की जनगणना के आँकड़ों को तुलनात्मक देखा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि किसानों की संख्या कम होती चली जा रही है। 2001 की जनगणना के आँकड़े बताते हैं कि पिछले दस वर्षों में 70 लाख किसानों ने खेती करना बंद कर दिया। 2011 के आँकड़े बताते हैं कि पाँच राज्यों क्रमश:  महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कुल 1534 किसान अपने प्राणों का अंत कर चुके हैं।''4
            यह तो रहा सरकारी आँकड़ा। ऐसे दर्जनों केस हैं जिन्हें वे अपनी सूची में शामिल ही नहीं करते। मरता है किसान कर्ज से ही यदि कर्ज से न भी मरे तो उसी से उत्पन्न हुए परिस्थिति से मरता है पर सरकार के नुमाइंदें उसे "पात्र-अपात्र' बनाने में लग जाते हैं। उपन्यास में महिला शेतकरी "आशा वानखेड़े' की मौत तो कर्ज के कारण हुई लेकिन उसे मुआवजा देने के बदले रिपोर्ट में यह लिखा जाता है --""लिखा गया --शराबी पति आए दिन के घरगुती के झगड़े से आजिज आकर उसने ज़हर पी लिया।''5
            सभी जानते हैं आत्महत्या को पात्र भी तभी बनाया जा सकता है जब किसी नेता से पहचान हो या घूस दो। शिबू के मामले में यही बात है --""पोस्टमार्टम, पंचनामा ... घूस की डिमांड --पैसे दे दो इन्हें "पात्र' बना दे वरना।''6 यही नहीं मुआवजे के रुपये भी पूरे नहीं मिलते। एक किसान अपने इसी दर्द को बयां करता है --""बाप के नाम जमीन, मरा बेटा! आत्महत्या अपात्र! कारण जमीन तो उसके नाम थी ही नहीं।''7 ""सरकार कृपया हम किसानों को यह बताए कि आत्महत्या करते वक्त किन-किन बातों का ख्याल रखा जाए --कब और कैसे की जाती है आत्महत्याकिस पंडित से पूछकर ...? यह भी सिखाया जाए कि कैसे लिखी जाती है सुइसाइडल नोट!''8 यही नहीं अधिकांश आँकड़ें महिला किसान के आत्महत्या को दर्शाता ही नहीं, या यूँ कहें उन्हें किसान ही नहीं मानता जबकि महिलाएँ बड़ी संख्या में किसानी से जुड़ी हैं। यह विडंबना ही है कि देश के एक बड़े समूह के लिए जीवन जीने का विकल्प ही नहीं बचा है उनके लिए एकमात्र विकल्प मौत है। उस पर भी अधिकारियों का पात्र-अपात्र करना उनकी बदनीयति को ही व्यक्त करता है।
            आज कॉरपोरेट सेक्टर और सरकारों के बीच संबंध पहले से ज्यादा मजबूत हो गया है। 1990 के आस पास से ही बाजारवादी शक्तियों को खुली छूट मिलने लगी। इन शक्तियों का एकमात्र उद्देश्य है लाभ कमाना। "फाँस' उपन्यास बार-बार इस सत्य को उद्घाटित करता है और मनरेगा, आदर्श ग्राम योजना आदि पर सीधी चोट करते हुए सरकार की नीतियों का पर्दाफ़ाश करता है। सरकार जनता को लुभाने के लिए ढ़ेर सारी योजनाएं बनाती है पर सच्चाई तो यह है कि न तो वह जमीनी हकीकत से जुड़ी है न ही किसानों की बुनियादी समस्याओं से। प्रश्न तो यह है कि संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, मनरेगा, प्रधानमंत्री ग्रामोदय जैसी किसानोन्मुखी योजनाओं के बावजूद किसान क्यों आत्महत्या करने पर विवश है? इसका सीधा जवाब यह है कि ये योजनाएँ किसानों को ध्यान में रखकर बनाए ही नहीं गए। इसका सीधा लाभ बिचौलियों को मिलता है जिसमें कृषि के नाम पर ऋण देने वाला बैंक, सेठ, साहूकार, महाजन यहाँ तक कि पुलिस अधिकारी सभी आते हैं।
            "कृषक आत्महत्या' राजनीति का हथियार बन गई है। वास्तव में उनका भला कोई नहीं चाहता। प्रेमचंद के समय से किसानों की समस्या उठी पहले जमींदार लुटते थे अब योजनाओं के आड़ में चेहरे बदलती सरकारें। योजनाएँ तो बनती हैं पर किसानों के लिए नहीं अपने कायदे के लिए ताकि इन्हें दिखाकर वोट बटोरा जा सके और विरोधी पार्टी पर तेज कसा जा सके। "फाँस' में नाना कहता है, ""किसानों  के नाम पर अरबों रुपये लूटना है तो कृषक आत्महत्या, अपनी चीनी मिल लगाने का बहाना ढूढँना है तो कृषक आत्महत्या, विरोधी पार्टी को दागना है तो कृषक आत्महत्या बहुत कारगर है। कृषक आत्महत्या बहुत कारगर है। कृषक आत्महत्या की तोप! ... घंटे-घंटे भर ड्रेस बदलने वाले गृहमंत्री करोड़ों-अरबों में खेलने वाले राजनेता, फिल्मी लोग, दलाल, व्यापारी, क्रिकेट और बिल्डर्स इनके लिए खेल हो गई है। 3 लाख किसानों की आत्महत्या! बर्फ के गोले-सा उठा-उठाकर मारते हैं एक दूजे पर। आरोप छर्र! सफाई छर्र!''9 दिल्ली में ही बैठकर योजनाएं बना लेने वाली सरकार के कई प्रतिनिधि नेताओं को खेती के बारे में साधारण-सी बाते मालूम नहीं। "फाँस' का पात्र "विजयेंद्र' कहता है --""कई नेता तो जानते भी नहीं कि आलू ऊपर फलता है या नीचे, खेती धान की होती है, चावल की नहीं कि सरपत और गन्ने के पौधे में क्या फर्क है!''10 यही नहीं केवल लाभ कमाने की मानसिकता रखने वाली सरकार बिना परीक्षण, बिना प्रभाव जाने सीधे-साधे किसानों को लालच देकर बी टी काटन जैसे नकदी फसल बोने के लिए महँगे बीज खरीदवाया। इसके लिए ऋण भी दिया और आश्वासन दिया कि न ही बीज लेने होंगे और नहीं कीटनाशक पर समस्या घटने के बजाय विकराल रूप धारण कर लिया। दूसरी बार में ही फसल चौपट हो गई। फिर से खाद, नये जन्में कीटों के लिए और अधिक महंगे कीटनाशक, फिर से मजदूरी, फिर से कर्ज। किसान फिर लुट गया। बैंक और साहुकार सूद वसुलने के लिए सिर पर सवार हो गये। धरती बंजर हो गई। कई किसान आत्महत्या करते, कई आंदोलन में अपना जीवन बर्बाद। जोशी जैसे नेता आंदोलन के दम पर नेता बन जाते हैं और फिर अपने भाई-बंधुओं को नहीं पूछते। सरकारें दबाव में या यूँ कहें चुनाव के बदले कर्ज माफ करने की घोषणा भी करती है पर अफसोस यह कर्ज माफी भी एक छलावा ही है क्योंकि पहली बात तो बैंक ऋण बहुत कम देता है। खेती के लिए लोन लेना है तो पहले अपना सबकुछ बेचकर बीज खरीदो, खेती से संबंधित व्यवस्था करो तब कहीं लोन की आशा रखो। जाधव बैंक की नीति को उजागर करते हुए कहता है --""हम लोग सभी जगह गये थे, कहीं से लोन-वोन नहीं मिला। बोले, हीरो होंडा लेना है तो बोलो। खेती के लिए कितना लोन मिलेगा?''11 तो दूसरी बात यह है कि किसान इन पचड़ों से बचने के लिए प्राइवेट एजेंसियों और देसी बनियों से ऋण लेते हैं जिसका अर्थ यह हुआ कि सरकार ने तो सरकारी बैंकों से लिया हुआ कर्ज माफ किया और सरकारी कर्ज तो सभी को मिलें ही नहीं। अत: बात यह हुई कि सरकार  ने पुन: किसानों के बहाने बैंकों का ही उद्धार किया।
            भारतीय किसान कर्ज में ही जन्म लेता है, कर्ज में ही मरता है। हरियाणा आदि के कुछ बड़े किसानों को छोड़ दें तो पूरे भारत के अन्य राज्यों चाहे वह तेलगांना हो या विदर्भ या यू.पी या मध्यप्रदेश सभी किसानों की समस्या लगभग एक है। सभी कर्ज के फाँस में फंसे है। जो धीरे-धीरे उन्हें आत्महत्या की ओर ले जाती है पर अफसोस की बात है कि आई. एम. एफ. के इशारे पर चलने वाली सरकार कृषक विरोधी है। यही कारण है कि खेती में सब्सिडी देने के बदले कर्ज का मकड़जाल फैलाती है, जिसमें बेचारा किसान फँसता चला जाता है। संजीव ने उपन्यास में कई बार अन्य देशों का उदाहरण देकर यह स्पष्ट किया है कि किसानों को सब्सिडी मिलनी ही चाहिए। "खेतिहर संकट' लेख में भी यही बात कही गई है --""सुविधाएं भी उन्हें नहीं मिल रही। भारत में किसानों को सब्सिडी  दी जाती है लेकिन आर्गनाइजेशन फॉर योरोपीयन इकॉनॉमिक को ऑपरेशन के देशों में किसानों को जितनी सब्सिडी हासिल है उससे तुलना करें तो पता चलेगा कि भारत के किसान को मिलने वाली सब्सिडी इन देशों के किसानों को मिलने वाली सब्सिडी के  सतांश भी नहीं है। (भारत के प्रति किसान सब्सिडी 66 डॉलर है जबकि जापान में 26 हजार उालर, अमेरिका में 21 हजार डॉलर और आर्गनाइजेशन फॉर योरोपीयन इकॉनॉमिक को ऑपरेशन के देशों में 11 हजार डॉलर)।''12
            सब्सिडी देने की बात तो दूर उपजाऊ भूमि पर भी कारपोरेट वाले, बिल्डर्स, दूसरे सेठ, फिल्म वालों का कब्जा होने लगा है। कृषि योग्य भूमि छिनती चली जा रही है। "फाँस' में मोहन जब नाना से कहता है कि उसे कोई काम चाहिए तब नाना कहता है --""बालू, मिट्टी र्इंट या खाद की ढुलाई। सड़कों के किनारे सारी खेती वाली जमीनें बिक चुकी हैं। मकान बन रहे हैं। आने वाले दिनों में सिर्फ बिÏल्डगें होंगी, चमचमाती सड़के होंगी और चमचमाती गाडियाँ। न हमारे तुम्हारे जैसे लोग होंगे, न खेती, न हमारी-तुम्हारी बैलगाडि़याँ।''13 इस तरह भूमि अधिग्रहण के मुद्दा को भी संजीव ने "फाँस' में उठाया है।
            लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया भी आज सफलता व लाभ के भँवर में ऐसा फँसा है कि उसे किसानों की आत्महत्या की खबरें महज एक हेडलाइन से ज्यादा कुछ नहीं लगती। किसान, मजदूर, कभी खबर के केंद्र में नहीं हैं। केंद्र में है तो राजनीति, नेता, कलाकार आदि की खबरें। संजीव ने अपने उपन्यास में जगह-जगह ये बातें उठाई है --""मीडिया की हजार-हजार आत्महत्याएं कोई खबर नहीं बन पाती। खबर बनती है मुंबई में चल रही लक्में फैशन वीक की प्रतियोगिता। 512 खबरिया चैनल जुटे हैं उसे कवर करने को। मात्र 512 ...''14
            ऐसे में जब किसान का कोई शुभेच्छु नजर नहीं आता तो हम उसकी स्थिति का सहज अनुमान लगा सकते हैं। जितनी उपज मिलती है उसके अनुपात में लागत ओर मेहनत का आकलन किया जाए तो उससे ऊपर ही होती है। यानी किसान को कुछ नहीं मिलता। आलम यह है कि 1970 में मजदूरी और टीचर का वेतन लगभग एक समान था आज शिक्षकों का वेतन बढ़ गया है। यही नहीं राजनेताओं की भी तनख्वाह की बात कहीं जाए तो वह आसमान छू रही है पर अफसोस की बात है कि किसान, मजदूर की स्थिति वैसी ही रह गई। यह अंतर भयावह है। उपन्यास में इसी सत्य को उद्घाटित करते हुए आंध्र का एक किसान प्रतिनिधि कहता है --""नये मुख्यमंत्री को कृषक आत्महत्याओं की कोई चिंता नहीं, जबकि एम. एल. एज. की तनख्वाह 95,000 से बढ़ाकर दो लाख करने जा रहे हैं, किसान तो हर तरफ से ठगे गये।''15 यूँ कहे तो किसानों से बेहतर मजदूरों की स्थिति है। कम से कम उन्हें रुपया हाथ में मिलता है और किसानों को नकदी तुरंत मिलने की आशा भी नहीं रहती। यही नहीं यदि वे अपने जीविकोपार्जन के लिए जंगल पर निर्भर करते हैं तो सरकारी कारिंदे सरकार का डर दिखाकर उन पर अत्याचार करते हैं। विकास के नाम पर आदिवासियों का उनसे सब कुछ छीन लिया गया है। यह विडंबना ही है कि जंगल के फल, फूल जानवरों के लिए तो हैं पर मनुष्यों के लिए नहीं। वे अपनी स्थिति से मुक्ति पाने के लिए अपने बच्चे को सब कुछ बेचकर पढ़ाते हैं। पर शिक्षा उन्हें इस हद तक संस्कृतिविहिन बना देती है कि वे पढ़-लिखकर खेतों में काम करना नहीं चाहते। शिक्षाविद् भी इस ओर ध्यान नहीं देते पर संजीव ने विजयेंद्र के माध्यम से इस समस्या को भी सामने रखा है --""देयर इज नो सब्स्टीच्यूट ऑफ हाई वर्क! कड़ी मेहनत करके तुम्हें डॉक्टर बनना है, इंजीनियर, साइंटिस्ट, इकोनोमिस्ट, इडस्ट्रियलिस्ट बनना है ...।''16 तब एक स्टुडेंट धीरे से उठा --""एंड ह्वाई नॉट ए फारमर, एन एग्रिकल्चरिस्ट सर?''17 यह प्रश्न अपने आप में बहुत बड़ा है शिक्षा में भी जमीनी हकीकत की उपेक्षा मिलती है। किसान को वहाँ भी जगह नहीं। यदि बच्चे पढ़ लिख गये तो भी रि·ात के बिना नौकरी नहीं और यदि नौकरी मिल गई तो, वे घर छोड़कर चले जाते हैं और नगरों, महानगरों का आकर्षण उन्हें गाँव लौटने नहीं देता। इन सब परिस्थितियों ने किसान को लाचार बना दिया है। उनके लिए अपने परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में मौसम की मार और कर्ज उसे ऐसी स्थिति में लाता है कि वे आत्महत्या करने को बाध्य हो जाते हैं। "सेवासदन' के चेतू से लेकर "गोदान' के होरी की मृत्यु स्वाभाविक नहीं बल्कि एक हत्या है, जिसकी जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ हमारी व्यवस्था है। ""सरकारी नीतियाँ, बैकों की पॉलिसी, उद्योगपतियों की स्वार्थभावना, मौसम की प्रतिकूलता आदि ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से किसानों के जीवन में दुखों का अंबार टूट पड़ता है और वे आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाते हैं।''18 गाँवों में मूलभूत सुविधाएँ आजादी के इतने वर्षों बाद भी नहीं पहुँची। आश्चर्य की बात है कि कलावती के पास फोन है पर गाँव में बिजली नहीं। गन्ने के खेतों के लिए सभी सामग्री है पर पानी नहीं। ऐसे में किसान या तो नक्सलाइट बनते हैं या आत्महत्या कर लेते हैं। बाजारीकरण का ऐसा प्रभाव है जिसने सच्चाई पर पर्दे डाल झूठ को बेचना शूरू किया है। यही कारण है कि राम जी दादा जी द्वारा खोजे एच. एम. टी. धान के बीज को विश्वविद्यालय ने अपना कहकर ऊँचे दामों पर बेचना शुरू कर दिया। पेटेंट मिलना तो दूर सरकार ने जो सोने का मेडल दिया वह भी नकली निकला जबकि मंदिरों में असली सोना चढ़ाया जाता है। उदारीकरण के फलस्वरूप कृषि क्षेत्र की स्थिति क्या होगी? राजकिशोर द्वारा संपादित "विनाश को निमंत्रण : नई अर्थनीति' में देख सकते हैं --""किसानों की स्वायत्तता समाप्त होगी। वह सिर्फ अपने परिवार के श्रम के पारिश्रमिक का हकदार होगा। अंग्रेजों के जमाने में नील की खेती निलहों के आदेश से होती थी, आने वाले दिनों में उसी प्रकार की व्यवस्था बाजार की शक्तियों द्वारा की जाएगी। दोनों का अंजाम एक-सा होगा।''19
            समाज का यथार्थ ही साहित्य में बोलता है, बस उसे समझकर अभिव्यक्त करने की दृष्टि होनी चाहिए। संजीव के पास यही दृष्टि है, किसानों के आत्महत्या के कारणों को बारीकी से समझा है, उसका मनोवैज्ञानिक अध्ययन भी प्रस्तुत किया है। सरकारी नीतियों, कॉर्पोरेट जगत, अर्थ केन्द्रित अन्य पेशा तथा उससे मिलने वाली सुविधाओं का आकर्षण, किसानी समाज में उसकी प्रतिष्ठा आदि तो उन कारणों में है ही इसके अलावा शराब भी एक वजह है जिसने आशा जैसे अनेक घर बर्बाद किए हैं। शकुन जैसी स्त्रियाँ इसके विरोध में खड़ी भी होती हैं। अनेक बार शराब माफियों के लोग बुरी तरह पीटते हैं, वे पुलिस के शरण में जाती है पर उपन्यास में ऐसे तथ्य सामने आते हैं जो पाठक को सोचने पर मजबूर कर देते हैं। पुलिस छोड़ों सरकार के प्रतिनिधि भी इसमें मिले होते हैं। एक उदाहरण देखिए --""ये कितने ताकतवर हैं, इसका एक उदाहरण यहीं आपके सामने है। आपने अखबारों में पढ़ा ओर टी. वी. में देखा होगा कि हजारों मैट्रिक टन गेहूँ खुले में सड़ गया। अपने यहाँ भी यही हुआ। दरअसल वह सड़ नहीं गया, बल्कि उसे सड़ जाने दिया गया। क्यों ...? सड़े हुए गेहूँ से शराब बनती है। लग गयी बोली। उस सड़े हुए गेहूँ को सस्ते में उन्हीं लोगों ने ले लिया जिन्होंने उसे खुले में छोड़कर नष्ट किया था। पहले सड़ाया, फिर शराब बना दी --सस्ते में खरीदकर। ट्रिपल क्राइम।''20
            वर्ग, वर्ण, लिंग और धर्म के धागों से मिलकर भारतीय समाज की संरचना बनी है। बिना एक को समझे दूसरे को समझा नहीं जा सकता। अंतरजातीय प्रेम हो या ब्राह्मणवादी हिंदू आचार संहिताओं का पीढि़यों से शिकार रहे दलितों का धर्मांतरण, स्त्रियों की स्थिति हो या सामाजिक प्रतिष्ठा बचाए रखने की कवायद सभी समस्याओं का चित्रण संजीव ने बहुत बारीकी से किया है।
            संजीव ने सचमुच घटना की बुनियाद को पकड़ा है। आखिर बाबा साहेब अंबेडकर और दूसरे लोग पचास के दशक में बौद्ध धर्म की तरफ क्यों गए? पहले आजादी का इंतजार किया और हारकर धर्म छोड़ना पड़ा। बराबरी की चाह, भूख की व्याकुलता, जाति व्यवस्था से बाहर आने की बेचैनी उन्हें ले गई बौद्ध धर्म की शरण में।
            समाज में स्त्रियों की क्या दशा है? यह भी उपन्यास में पूरी सच्चाई के साथ अभिव्यक्त हुआ है। उपन्यास के आरंभ में ही समाज की एक प्रवृत्ति सामने आती है और वह है लड़कियों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाने की। यहाँ भी हिंदी प्रांतों वाली नजरिया देखने को मिलती है। शिबू की छोटी मुलगी (बेटी) सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए अपने सखी के गाँव क्या चली जाती है अफवाहों का सिलसिला चल पड़ता है। इससे परेशान शिबू स्कूल न जाने की फरमान जारी कर देता है --""और पढ़ाओ, मुलगियों को, जैसे पढ़-लिखकर बैरिस्टर बनेंगी।''21 पढ़ाई बंद करा कर यदि शादी की बात भी कोई सोचता है तो सामने आती है दहेज की समस्या। विवाह का होना "डिमांड' पर निर्भर करता है। ""मुलगे का पिता --अपनी तो कोई डिमांड नहीं लेकिन आपका इतना देखना तो फर्ज बनता है कि आपकी मुलगी जहाँ आए, सुखी रहे। रेट तो सबको मालूम है --एक हीरो होंडा, एक लाख नगद।''22 यही नहीं विवाह में जाति व्यवस्था भी अहम भूमिका निभाती है। इन सब के बावजूद विवाह हो गया तो तरह-तरह के पाबंदियाँ। चाहे बौद्ध धर्म हो या हिंदू सभी धर्मों में अशिक्षा के कारण स्त्रियों की स्थिति एक-सी है। इसके अतिरिक्त वे अंधविश्वास, भेदभाव, सामंती कहर, विदेश ले जाने वाले अनैतिक चैनलों आदि समस्याओं को भी उठाया है और साथ ही कीटनाशक आदि के प्रयोग से किस तरह प्रकृति और प्राणी दोनों प्रभावित होते हैं, इसकी भी विस्तार से चर्चा की है।
            संजीव अपने कृति में सिर्फ समस्या या उसकी विडंबनाओं की ही बात नहीं करते, उसके समाधान का विकल्प या मॉडल भी प्रस्तुत करते हैं। वह "मंथन' के माध्यम से सभी कृषि विशेषज्ञों और किसानों को एक मंच पर ला खड़ा करते हैं और प्राथमिक जरूरतों को रेखांकित करते हैं --जल संरक्षण, संपूर्ण मद्य का निषेध, जी. एम. बीजों के स्थान पर देशी बीजों का प्रयोग, विदेशी खादों की जगह देशी कम्पोस्ट, कीटनाशकों के देशी विकल्प का प्रयोग ताकि मिट्टी, पानी प्रदूषित न हो और मित्र पक्षियों तथा प्रकारांतर में मानव जीवन को बचाया जा सके। यही नहीं सरकारी बैंकों से ऋण लेने देने की व्यवस्था को किसानोपयोगी बनाए जाने की बात कहते हैं। मौत को रोकने का प्रयास किया जाए और भ्रष्टाचार को कम करके मुआवजों में एकरूपता लाई जाए। किसान अपने उत्पाद की कीमत खूद लगाये कोई बिचौलिया न हो, पर यह तो संजीव ने समाधान बताया, होता है इसके ठीक उल्टा। राजकिशोर ने "उदारीकरण की राजनीति', "कृषि का भविष्य' में इसी स्थिति को अभिव्यक्त किया है --""भारतीय किसानों को छोड़कर विश्वका प्रत्येक उत्पादक अपने उत्पाद की कीमत अपनी लागत और मुनाफे को ध्यान में रखकर तय करता है। वहीं भारतीय किसानों के अनाज की कीमत या तो सरकार तय करती है या फिर इसे पूंजीपतियों या खरीददारों पर छोड़ दिया जाता है, यह किसानों की मजबूरी है कि वह अपना उत्पाद मूल्य तय किए बिना बेच रहा है, जिससे कि उनकी स्थिति भयावह हो जाती है।''23
            इसमें कोई संदेह नहीं कि संजीव ने शोध करके उपन्यास को एक सामाजिक दस्तावेज बनाया है जिसमें तथ्य पर तथ्य खूलता जाता है और पाठक नये-नये सच्चाइयों से अवगत होता चला जाता है बावजूद इसके उपन्यास पाठक को अन्य कृतियों की तरह बाँधकर नहीं रख पाता। उपन्यास के कई हिस्से अत्यधिक विवरणात्मक और सूचनात्मक हो जाते हैं जिसके कारण रचनात्मक सुंदरता बाधित होती है। हालांकि संवेदनात्मक स्तर पर यह पाठकों को उपन्यास से जोड़ती है। छोटी, सिंधु ताई, शंकुतला, अशोक,सुनील, विजयेंद्र आदि पात्र पाठ के दौरान और बाद तक भी हमारे जेहन में रह जाते हैं। कई मर्मांतक स्थल मन को भीतर से झकझोर देता है परंतु पाठक की उपन्यास के बंधाव को लेकर आकांक्षा कुछ ज्यादा की होती है। लगभग 42 अध्याय और 255 पृष्ठों में लिखे इस उपन्यास में संजीव ने पाठकों को अवसादग्रस्त होने से बचाने के लिए हैप्पी एंडिंग करने की कोशिश की है जो पाठक में एक सकारात्मक सोच पैदा करता है, जो साहित्य की दृष्टि से सकारात्मक पहलू है।
            औपन्यासिक कला या शिल्प की बात कही जाय तो हम कह सकते हैं कि संजीव ने एक कड़वे, कठोर सच को पाठकों के सामने रखने के लिए भाषा और शिल्प भी सीधा और भेद के रख देने वाला चूना है। चूँकि उपन्यास की पृष्ठभूमि महाराष्ट्र है इसलिए उपन्यास में बहुतायत मराठी शब्द प्रयुक्त हुए हैं। जैसे --मुलगा (लड़का), मुलगी (लड़की), बायको (पत्नी), नवरा (पति), हल्या (भैंस), वडील (पिता), बटाटा (आलू), कांदा (प्याज), शेत (खेत), श्ोतकरी (किसान) आदि जो धीरे-धीरे हिंदी में हिल-मिल जाते हैं और सारे शब्द परिचित जान पड़ते हैं। अंग्रेजी शब्दों के भी प्रयोग हुए हैं पर उनका प्रयोग स्वाभाविक लगता है। आजकल के प्रचलित गानें, उनका प्रयोग जैसे "आज मैं ऊपर आसमां नीचे', "यारा सीली-सीली' आदि पात्रों के कथन को अधिक स्वाभाविक बनाते हैं। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि इसके पात्र अपने कथनों से अपना अलग ही शिल्प गढ़ते हैं।
            निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि "फाँस' को पढ़ना आज के समय में देश की सबसे अवसादपूर्ण घटना से, हादसों की एक लंबी श्रृंखला से गुजरना, सामना करना है। यह एक ऐसे विषय को सामने लाता है जिसे हम लगातार अनदेखा कर देते हैं। उदारीकरण के बाद हमारी सरकारें किसके हित में काम कर रही है यह स्पष्ट हो जाता है। यह उपन्यास उन सभी आत्महत्याओं का साक्षी बनकर आता है जिनके परिवार अपने परिजन को खोने के बाद खेती से तौबा कर लेते हैं। उनके द्वारा की गई आत्महत्या स्वीटजरलैंड की मर्सी कीलिंग नहीं बल्कि उन पर लादी गई व्यवस्था की बोझ है जो आत्महत्या के नाम पर उनकी हत्या कर रही है। "फाँस' वैश्वीकरण, हमारी कृषि नीति पर, सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक ढाचें पर सवाल खड़ा करता है, आखिर क्यों बाजार में कृषि उत्पादों की दलाली करने वाले मालामाल हैं, जबकि किसानों के हाथ खाली हैं। आजादी के पहले से बनी ये समस्याएं आज राजनैतिक उपेक्षा और भ्रष्टाचार के कारण नासूर बन गई है जिनका इलाज असंभव-सा लगता है। ये सामाजिक दस्तावेज एक चेतावनी है जिससे पता चलता है कि यदि हालात न बदले तो ऐसा समय भी आएगा जब दुनिया का हर आदमी उपभोक्ता होगा, वह अपने मनपसंद उत्पाद को खरीदने की कोई भी कीमत देने को तैयार होगा, पर पैदा करने, उपजाने वाला कोई न होगा।
                        ""न तू जमीं के लिए, है न आसमां के लिए
                         तेरा वजूद है अब सिर्फ दास्तां के लिए।''24
संदर्भ-सूची
1.  संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 17
2.  संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 17
3.  संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 17
4.  Farmer's suicide rates soar above the rest द्वारा : पी. साईनाथ,द हिंदू, अभिगमन तिथि : 21 oct, 2013
5.  संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 145
6.  संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 105
7.  संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 116
8.  संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 116
9.  संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 153
10. संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 109
11. संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 47
12. http://www.imtchange.org/hindi/खेतिहर-संकट/खेतिहर-संकट-70  html
13. संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 36
14. संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 183
15. संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 247
16. संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 112
17. संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 112
18. अग्रवाल, प्रमोद कुमार, भारत के विकास की चुनौतियाँ, "भारतीय कृषि', लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्करण : 2013, पृष्ठ - 37-38
19. कृषि नाश का अचूक नुस्खा, राजकिशोर द्वारा संपादित, "विनाश को निमंत्रण : नई अर्थनीति' में संकलित, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण : 1994, पृष्ठ - 83
20. संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 200
21. संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 11
22. संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 94
23. राजकिशोर, उदारीकरण की राजनीति, "कृषि का भविष्य', वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण 1998, आवृत्ति  2009, पृष्ठ - 82

24. संजीव, फाँस, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण : 2015, पृष्ठ - 106

[जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के अंक 23 में प्रकाशित]

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