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आधी आबादी का आरक्षण और विवाद: राकेश कुमार



आधी आबादी का आरक्षण और विवाद
राकेश कुमार

भूमिका
महिला उत्पीडन अधिकांशतः सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना का हिस्सा है । महिला अधिकारों को मानवाधिकारों से पृथक कर देखने की प्रवृत्ति ने महिलाओं को दोयम दर्ज़े की स्थिति में ला खड़ा किया है | इस दोयम दर्ज़े की स्थिति के लिए सिर्फ़ राजनीतिक कारकों या राज्य को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है| लेकिन इन सारी समस्याओं का समाधान राजनीतिक प्रणाली में देखा जा सकता है और देखा भी जा रहा है | बावज़ूद इसके राज्य और राजनीति महिलाओं को लोकतान्त्रिक स्थान और सम्मान देने में विफल दिखाई देती है | पुरुषों के वर्चस्व से युक्त राजनीति में महिलायें अल्पमत में हैं और अल्पमत में होने के कारण महिलायें निर्णय प्रक्रिया में एक प्रभावी और सशक्त भूमिका नहीं निभा पा रही हैं |

महिलाओं का मताधिकार और संघर्ष
स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान ही मताधिकार के लिए भारतीय महिलाओं के संघर्ष की शुरुआत हो गई थी | एनी बेसेंट द्वारा चलाए गए होमरुल आन्दोलन ने महिलाओं को उनके राजनीतिक अधिकारों के लिए सचेत कर दिया था | सन् 1917 में भारतीय महिलाओं की तरफ़ से पहली मांग उठी थी कि महिलाओं को भी नागरिक का दर्ज़ा दिया जाए | सन् 1919 में साउथ बोरो कमीशन भारत आया तो मताधिकार के प्रश्न पर एनी बेसेंट के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल भारतीय महिलाओं के मताधिकार के लिए आयोग से मिला था | सन् 1920 में मद्रास विधान परिषद् ने महिलाओं को मत का अधिकार दे दिया | साइमन कमीशन के भारत दौरे में महिला मताधिकार की मांग सबसे ज़्यादा प्रबल हुई | सन् 1930 में लन्दन में पहला गोल मेज सम्मेलन हुआ | इस सम्मलेन में ऑल इंडिया विमेंस कांफ्रेंस ने आग्रह किया कि सम्मलेन में महिलाओं का भी प्रतिनिधित्त्व हो | जिसके फलस्वरूप सरकार ने श्रीमती राधाबाई सुभरयान और बेगम शाहनवाज़ को प्रतिनिधि मनोनीत किया |

राष्ट्रीय आन्दोलन और महिलाओं की राजनीतिक अधिकारों की मांग
भारतीय आन्दोलन की उदारवादी धारा का मानना था कि महिलाओं की स्थिति में सुधार तभी संभव हो सकता है जब वे अपने निर्णय स्वयं ले सकें | यह सवाल महिलाओं की सामाजिक स्थिति को लेकर उठा था | कई समूहों ने राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान महिलाओं की राष्ट्रीय आन्दोलन में भागीदारी को लेकर सवाल उठाये थे | लेकिन महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के कारण यह सोच और यह सवाल ज्यादा दिन टिक न सका |     
महिलाओं के मुद्दे उठाने में सबसे ज्यादा सक्रिय संगठन ऑल इंडिया विमेंस कांफ्रेंस (ए.आइ.डब्ल्यू.सी.) था | इस संगठन की स्थापना 1928 में मारगेरट कजिन्स ने की थी | कांग्रेस के नेतृत्व ने महिलाओं के मताधिकार की मांग को कई कारणों से स्वीकृति दी | जिसमे सबसे मज़बूत कारण था कि गाँधीवादी आन्दोलन में भारी संख्या में महिलाओं की भागीदारी के कारण उनकी राजनीतिक बराबरी और समानता की मांग को अस्वीकार करना कठिन था | “1930 के नमक सत्याग्रह आन्दोलन में कुल 80,000 जेल भेजे जाने वालों में 17,000 महिलाएं थी |”[1]
राष्ट्रीय कांग्रेस महिलाओं के अधिकारों और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बराबरी की मांग को लेकर प्रतिबद्ध हुई | कहा गया कि आज़ाद भारत में महिलाओं को काम का बराबर अधिकार, चुनाव में हिस्सा और चुने जाने का अधिकार मिलेगा | नेहरु द्वारा 1939 में ‘नियोजित अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका’ पर गठित की गई राष्ट्रीय उप-समिति ने आशा व्यक्त्त की थी कि “सारे देश के लिए एक समान नागरिक आचार संहिता, जिसमे उत्तराधिकार, विवाह और तलाक सम्बन्धी कानून भी शामिल हैं, बनाई जाएगी |शुरू में यह सबके लिए अनिवार्य नहीं होगी लेकिन एक उचित समय में यह पूरे देश में लागू की जा सकेगी |”[2]
अगस्त 1947 में आज़ादी के बाद, भारतीय जन ने एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक और संघीय संविधान को अधिनियमित आत्मसमर्पित किया |
लगभग 80 प्रतिशत निरक्षर जनसंख्या के लिए व्यस्क मतदान और आम प्रतिनिधित्व पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण करना संविधान निर्माताओं के लिए एक चुनौती थी और सबसे बड़ा सवाल यह था कि कैसे इस बराबरी के दावे को व्यवहारिक रूप देना है | गांधीजी ने कहा था कि “महिलाओं को वोट देने का अधिकार और बराबर का कानूनी दर्ज़ा मिलना चाहिए, लेकिन समस्या वही समाप्त नहीं होती | यह उस बिंदु से शुरू होती है जहाँ महिलाएँ देश की राजनीति पर प्रभाव डालना शुरू करेगी |”[3]

महिलाओं के आरक्षण और अधिकारों पर संविधान सभा में चर्चा -:
संविधान सभा में महिला आरक्षण के सैद्धांतिक और व्यवहारिक सभी पक्षों पर चर्चा हुई | आर्थिक बराबरी और राजनीतिक बराबरी का सदैव एक सम्बन्ध रहा है | आर्थिक बराबरी के बिना राजनीतिक बराबरी की कल्पना भी नहीं की जा सकती | संविधान सभा ने जातीय ग़ैर बराबरी को कानूनी दृष्टि से ‘सामाजिक पिछड़ेपन’ की परिभाषा दी | उन्होंने कहा कि “कुछ व्यक्ति या समूह इसलिए पिछड़ गए हैं क्योंकि उन्हें जीवन में आगे बढने के मौक़े नहीं दिए गए | इस पिछड़ेपन का कारण उनका समाज में निम्न आर्थिक स्थान के साथ-साथ प्रचलित मूल्य और सोच भी थी |”[4]
कांग्रेसी नेताओं को स्पष्ट था कि जातीय असमानता के मुद्दे का सामना किए बिना, राजनीतिक स्थिरता संभव नहीं है | हालांकि महिलाओं की बेहतर स्थिति के लिए आरक्षण को एक कमज़ोर कदम करार देकर शुरूआती दौर में महिला नेताओं ने अस्वीकार कर दिया था | ए.आई.डब्ल्यू.सी. के अपने अध्यक्षीय भाषण में सरोजिनी नायडू ने ने कहा था, “मेरे विचार से ए.आई.डब्ल्यू.सी. के इस सम्मलेन में विश्व की महिलाओं का इतिहास लिखा जा रहा है | मैं आपके सामने यह स्वीकार करना चाहती हूँ कि मैं नारीवादी नहीं हूँ | नारीवादी होने का मतलब यह स्वीकारना है कि स्त्रियों का दमन हुआ है | अगर वे विशेष सुविधाएं चाहती हैं तो इसका मतलब है कि वे अपनी हीनता स्वीकार कर रही है | लेकिन भारत में इसकी कोई ज़रूरत नहीं है | यहाँ स्त्रियाँ राज समितियों और युद्धों में पुरुषों के साथ-साथ रही हैं, हमें घर या बहार आपसी टकराव की स्थिति पैदा नहीं करनी है | हमें राष्ट्रवाद, धर्म और लिंग से ऊपर उठना है |”[5]
राजनीति में महिलाओं के उस समय कानूनन आरक्षण के पक्ष में न होने के कई कारण थे | जिन महिलाओं ने आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी, उन्होंने समाज की रूढ़ परम्पराओं को तोड़ा था | वे अपने को पिछड़ा व कमज़ोर मानकर पुरुषों से कोई मदद नहीं मांगना चाहती थी | दूसरी तरफ़ स्त्रियों के भी दो समूह बन गए थे, एक तरफ़ पढ़ी-लिखी एवं संपन्न स्त्रियों का समूह था तो दूसरी तरफ़ छोटे तबकों की स्त्रियों का समूह था | संपन्न परिवारों की स्त्रियाँ आरक्षण के विरोध में इसलिए थीं क्योंकि वे अपने को दमनीय स्थिति में रखकर नहीं देखना चाहती थी |
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी पर बहस
आज़ादी के बाद चुनाव या विधायिका से जुड़ी राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत सीमित रही है | आज़ाद भारत की पहली लोकसभा में चुनाव के लिए 43 महिला प्रत्याशी खड़ी हुई जिनमें 14 चुनाव जीतीं | नेहरु का ध्यान इस और गया था और उन्होंने कहा था कि “मुझे अफ़सोस है कि इतनी कम महिलाएं चुनाव जीतीं हैं | इसकी जिम्मेदारी हम सब पर है, हमारे कानून, हमारे समाज में सब जगह पुरुषों का वर्चस्व है और हम सबका इसको लेकर एक तरफ़ा रवैया है |”[6]
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को यहाँ सृजनात्मकता से जोड़कर देखा जा सकता है क्योंकि राष्ट्र या देश की सारी व्यवस्थाओं का संचालन राजनीति ही करती है | हर क्षेत्र के सृजन के लिए चाहे शिक्षा हो, समाज हो, या फिर कोई अन्य व्यवस्था, राजनीति ही इनके लिए नीति निर्माण का कार्य करती है जिससे समाज का सृजन होता है और विकास होता है | समाज के इस सृजन के लिए और विकास के लिए ही महिलाओं ने राजनीतिक भागीदारी और महिला आरक्षण की मांग को प्रबल तरीक़े से उठाया | लोकप्रिय आन्दोलनों जिनमें महिला आन्दोलन भी शामिल था, एक ख़ास नज़रिय से देखा गया | महिला आन्दोलन को राज्य की बढ़ती ताक़त को रोकने के साधन की तरह देखे जाने के कारण उनकी और ख़ास ध्यान दिया गया | सन् 1975 में देश में आपातकाल घोषित किये जाने से लोगों को संवैधानिक लोकतंत्र ख़तरे में दिखाई दिया | कई संगठन नागरिक आज़दी और जनतान्त्रिक अधिकारों को लेकर सचेत हो गए और उन्होंने विकास की राजनीतिक प्रक्रिया में महिलाओं की ज्यादा भागीदारी पर ख़ास जोर दिया | सन् 1977 में जब आपातकालीन स्थिति हटी और लोगों को फिर से जनतान्त्रिक अधिकार प्राप्त हो गए तो सामाजिक आन्दोलनों में महिलाओं से जुड़े कई मुद्दे जैसे हिंसा और राजनीतिक वादा-ख़िलाफ़ी उठाए गए |इस दौरान महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी दिखती है | महिला मतदाताओं की बढ़ती संख्या, आन्दोलनों में उनकी भूमिका ने उनके राजनीतिक आरक्षण की मांग को फिर से उठाया | सन् 1993 में संविधान के 73वें और 74वें संशोधन विधेयक पारित होने से महिलाओं को ग्राम पंचायतों और नगर निगमों में 33 प्रतिशत आरक्षण का कानूनी अधिकार मिल गया | इस अधिकार से महिला समूहों में एक ज़बरदस्त उत्साह देखने को मिला और राजनीति में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया | महिलाओं की भूमिका से प्रोत्साहित होकर सन् 1996 के केन्द्रीय चुनावों से पहले महिला संगठनों ने संसद और विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग को सभी राजनीतिक पार्टियों के सामने रखा | राजनीतिक पार्टियों ने अपने चुनाव घोषणा-पत्रों में इसका समर्थन तो किया लेकिन व्यवहारिक धरातल पर यह कदम शून्य ही साबित हुआ | सन् 1996 के चुनावों में महिलाओं को 15 प्रतिशत से भी कम टिकट मिले |
सितम्बर, 1996 को तत्कालीन लोकसभा के पहले सत्र में युनाइटेड फ्रंट सरकार ने 81वां संविधान संशोधन बिल पेश किया परन्तु वह पारित नहीं हुआ | जुलाई, 1998 को संसद में यह बिल फिर पेश किया गया | विरोध के कारण यह बिल फिर पारित न हो सका | सवाल उठता है कि ऐसे क्या कारण है कि संसद में महिला आरक्षण का यह बिल पारित क्यों नहीं हो पा रहा है ? राजनीतिक पार्टियाँ जिन्होंने ग्राम-स्तर, जिला-स्तर व शहरी शासन के लिए 73वां और 74वां संविधान संशोधन बिल 24 अप्रैल 1993 को पारित किया था | आख़िर वे इसे संसदीय स्तर पर क्यों पारित नहीं कर पा रहे हैं या फिर उनकी मंशा इसे पारित न करने की है ? अगर उनकी मंशा इसे पारित न करने की भी है तो ऐसे क्या कारण हैं जो उन्हें इस मंशा के लिए बाध्य कर रहे हैं ? क्या संसद में महिलाओं के आ जाने से उनके पुरुष वर्चस्व को एक चुनौती का सामना करना पड़ेगा ?
महिलाएं आरक्षण को ‘सामाजिक न्याय’ का एक कार्यक्रम मानती हैं | महिलाओं को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए महिलाओं का नीति निर्माण की प्रक्रिया में होना ज़रूरी है | सवाल यह है कि नीतियों के निर्माण में पुरुषों का वर्चस्व है तो महिलाएँ वहाँ कैसे पहुँचें ? आरक्षण महिलाओं के लिए वह सीढ़ी है जो महिलाओं को नीति-निर्माण की मंज़िल की तरफ़ ले जाती हैं | महिला आरक्षण के विरोधी संसद और विधान सभाओं में महिला आरक्षण को शक़ की निगाह से देखते हैं | उनका कहना है कि इससे देश दो हिस्सों में बँटेगा और जेंडर-न्याय को दुसरे सामाजिक न्यायों से अलग करके देखना एक संकीर्ण सोच है | महिला आरक्षण पर बहस काफ़ी विवादास्पद भरी रही है | फ़िलहाल महिला समूहों के सामने मुख्या मुद्दा यह है कि संसदीय व स्थानीय स्तर पर अपनी भागीदारी से कैसे अपने को लाभान्वित करे |


निष्कर्ष
केंद्रीय प्रतिनिधि संस्थाओं में महिलाओं के आरक्षण पर बहस न केवल भारतीय राजनीति के इतिहास में बल्कि भारतीय महिला आन्दोलन में भी एक विशिष्ट अवसर पर सामने आई है | महिला आन्दोलन के उभार ने मज़बूत राजनीतिक संरचना के अंतर्गत उच्च जातियों और वर्गों के प्रभाव को चुनौती दी है | राजनीतिक तंत्र में छोटे-छोटे अलग बंटे समूहों में काम करने की बहुत-सी मुश्किलें होती हैं जिसके कारण उन समूहों को राजनीतिक महत्व नहीं मिल पाता है | राजनीति में महिलाओं की मौज़ूदगी को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है | राजनीति में महिलाओं की मौज़ूदगी का अहसास होना बेहद ज़रुरी है | महिलाओं के आरक्षण को लेकर एक बार फिर सन् 2008 में 108वां संशोधन बिल पेश किया गया | राज्यसभा ने इस बिल को 9 मार्च 2010 को पारित किया गया लेकिन लोकसभा में इसे पुनः गिरा दिया गया | आरक्षण बिल को कैसे पारित करना है, कैसे लागू करना है, कैसे कारगर बनाना है यह उस राजनीतिक तंत्र पर भी निर्भर करता है जिसके भीतर उसे लागू किया जाना है | किसी भी राजनीतिक व्यवस्था को लोकतान्त्रिक बनाने में समय लगता है | भारत में महिला आन्दोलन का राजनीतिक व्यवस्था पर काफ़ी दबाव रहा है | विचारधाराओं से हटकर सभी महिला समूह महिला आरक्षण को लेकर एकमत हैं |



सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
1.       Jayawerdena, kumari,1987, Feminism and nationalism in the third world London : Zed press
2.      Chaudhuri,Maitrayii,1996,citizens workers  and emblems of culture : An analysis of the first plan document of women, in Patricia Oberoi (ed.),  social reform, sexuality and the state, New Delhi; Sage
3.      Gandhi, M.K., 1929 in Young India, 17th October,
4.      Shah, Gayanendra, 1991, “Social backwardness and reservation politics”, Economic and political weekly.
5.      All India women’s conference, Sarojini Naidu’s presidential address to the fourth session of all India women’s conference, Bombay, 1930.
6.      Rai, Shrin, 1997, ‘gender and representation: women MPs in India, in Anne-Marie Goetz (ed.), Getting institutions right for women: London: Zed books.
7.      शीरीन एम. राय एवं कुमुद शर्मा, भारतीय संसद का लोकतंत्रीकरण: ‘महिलाओं के लिए आरक्षण’ विवाद, 2011


राकेश कुमार
विभाग- म.गां. फ्युज़ी गुरूजी समाज कार्य अध्ययन केंद्र
म.गां.अं.हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
संपर्क सूत्र- 7503518676
ईमेल- mr.rakeshkumar11@gmail.com





[1]Feminism and nationalism in the third world London, page no. 100
[2] Citizens workers and emblems of culture : An analysis of the first plan document of women, page no. 217
[3] Gandhi, M.K., 1929 in young India, 17th October,
[4] Social backwardness and reservation politics, page no. 601
[5] All India women’s conference, Sarojini Naidu’s presidential address to the fourth session of all India women’s conference, Bombay, 1930.
[6]Rai, Shrin, 1997, Gender and representation: women MPs in India, in Anne-Marie Goetz(ed.), Getting institutions right for women: London: Zed books.

[जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के अंक 23 में प्रकाशित लेख]
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