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आदिवासी नारी के संघर्ष की जीवंत दासतां: अल्मा कबूतरी डॉ. विशाखा बिस्सा


आदिवासी नारी के संघर्ष की जीवंत दासतां: अल्मा कबूतरी
                                                                                                डॉ. विशाखा बिस्सा
Email:- bishakah.bissa@gmail.com

भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ अनेक जातियां निवासी करती है। इनमें से कुछ जातियां अभी भी विकास से कोसों दूर जंगलो, पर्वतों व पहाड़ों पर आदिम अवस्था मे रहती है। इन्हें हम आदिवासी या जनजाति नाम से संबोधित करते है।

            हिन्दी उपन्यास ने समाज के अंधरे-उजाले पक्षों से साक्षात्कार किया है, यह भी जानने का प्रयास किया है कि कविता, कहानी तथा नाटक आदि की तुलना में उपन्यास समाज के व्यापक पहल को चिन्हित करने में सफल रहा है।

            आज के उपन्यासकारों ने केवल शहरी व ग्राम्य जीवन के सत्य को ही सामने नही रखा है, वरन् दूरदराज क्षेत्रों में गुम होते उन आदिवासियों के जीवन में भी झांका है। उस समाज की विषिष्ट संस्कृति और जीवन शैली को उसकी समस्याओं, शोषण व जीवन सत्य को भी हमारे सामने रखा है। इस दृष्टि से मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास अल्मा कबूतरीविषेष उल्लेखनीय है।

            मैत्रेयी पुष्पा द्वारा रचित उपन्यास अल्मा कबूतरीएक ऐसा उपन्यास है, जिसमें बुन्देल क्षेत्र में बसने वाली कबूतरी के जीवन का कटु सत्य गहरी संवेदनषीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है इस जाति के लोग सभ्य समाज का हिस्सा बनना चाहते है। किन्तु सभ्य समाज इन्हें जंगलो में छिपन के लिए मजबूर करता है। इन्होंने यह बात प्रभु की इच्छा समझकर स्वीकार भी कर ली है। क्योंकि इनके पास न अपनी कोई जमीन है, न रहने को स्थाई घर। औपनिवेषिक शासन ने इन्हें जरायमपेषाजाति घोषित कर न केवल तथा कथित सभ्यसमाज की नजरों में अपेक्षा और घृणा का पात्र और पुलिस की नजरों में अत्याचार का सबसे नरम चारा भी बना दिया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अल्मा कबूतरीउपन्यास का पात्र रामसिंह है। रामसिंह पढ़ा-लिखा होकर भी कबूतरा होने का अभिषाप का तिलक लेकर झेल रहा है। पुलिस की मांगे पूरी करना मानों रामसिंह की नियति बन गयी है। वहीं पुलिस के लिए भी उन्हें अपराधी करार देकर हर छोट-बड़े हादसे के लिए जिम्मेदार ठहराकर सजा देना आम बात बन गयी है। पुलिस रामसिंह को कहता है कि ’’ साले तेरा टाईम खराब हो रहा है? ऐं? अम्मा की छातियाँ देखी है, समय खाए लटक गई हैं। बहन न हो तो बदले में कोई और ही दिला। हम भी जोरू-बच्चों को छोड़कर यहाँ पड़े है।’’1

            आदिवासी जनजाति के पुरूष एवं औरतों की ओर सभ्य समाज के लोग हीन दृष्टिकोण से देखते है। लम्बी गुलामी के बाद देषवासियों को आजादी मिली है। पर आदिवासी उससे आज भी महरूम है। जनजाति की स्त्रियाँ या तो शराब की भट्टियों पर या किसी के बिस्तरों पर मिलती है। अल्मा कबूतरीउपन्यास में अल्मानामक युवती के माध्यम से इस समाज से जुड़ी स्त्रियों को उन्हें किस मोड़ पर लाया जाता है, इस उपन्यास के माध्यम से बताया गया है।

            अल्मा अध्यापक रामसिंह की इकलौती बेटी है। लेकिन रामसिंह अध्यापक होने के बावजूद भी कबूतराहोने के अभिषाप को भोग रहा है। रामसिंह के द्वारा सूरजभान से कर्ज को चुकाने के लिए अल्मा को सूरजभान के यहां गिरवी रखा जाता है। रामसिंह अपनी बेटी अल्मा को कहता है कि ’’अम्ला तू गिरवी धारी है, समझे रहना। इसमें बुराई भी नहीं। हम कबूतराओं में यह चलन रहा है। जेवर-गहना-बासन और बेटी मुसीबत के समय काम आते है।’’2 लता के कर्ज को चुकाने के लिए अल्मा को सूरजभान के हाथों बेच दिया जाता है। सूरजभान अल्माके देह के साथ व्यापार करना चाहता है और बड़े-बड़े लोगों को खुष करना चाहता है। लेकिन अल्मा को अपने साथ हो रहे अत्याचार स्वीकार नही है। वो विरोध करती है लेकिन उसके इस विरोध को दबाने के लिए सूरजभान उसके बाह पर अल्मा कबूतरीगुदवा देता है। क्योंकि सूरजभान अपने आदमियों को कहता है कि ’’गुदने से कई मसले हल हो गए। लड़की होने के नाते जो इस पर गुजरेगा, यह सहना नही चाहेगी तो कबूतरी होने के लिए झेलना पड़ेगा।’’3 सूरजभान की कैद में अल्म हर रोज बलात्कार की षिकार होती है। लेकिन एक दिन धीरज की मदद से अल्मा सूरजभान के चंगुल से भाग निकलने में सफल हो जाती है। लेकिन भाग्य का विधाता उसे फिर से दूसरे चक्र में पहॅुचा देता है। अल्मा बार-बार सभ्य समाज द्वारा शोषित होती है, पशुओं से भी बदतर जीवन जीती है, परन्तु हार नहीं मानती है और न साहस खोती है। अतः डाकू से नेता बने समाज-कल्याण मंत्री श्रीराम शास्त्री के यहां पहॅुचती है, वहां भी उसका भरपूर यौन शोषण होता है। मंत्री श्रीराम शास्त्री को खुष करने के लिए उसे परोसा जाता है। अल्मा जब इसका विरोध करती है तो उसे मारा-पीटा जाता है। और उसे बलिष्ठ के हाथों सौफ अल्मा के कपड़ों को फाड़कर मंत्री के सामने वस्त्रहीन खड़ा करवा दिया जाता है। हर रोज हर राज अल्मा अपने वस्त्रहीन होने से अब कोई शर्म महसूस नहीं होती है। क्योंकि अल्मा सोचती है कि ’’सूरजभान तलाषी लेने के बहाने इस देह का रोम-रोम नाप चुका था। उसका दोस्त परसराम ने शरीर का अंग-अंग टटोला था। नंगापन पहली बार लगता है, बार-बार नही, इस बात को हर औरत जानती है। अल्मा खड़ी की गयी। समझ रही थी खड़े होकर ज्यादा नंगी हो जाती है देह..................। जो अंग छिपाने चाहिए वे उधड़े पड़े है तो सिर झुकाकर भी क्या होगा? .............’’4

            मंत्री श्रीराम शास्त्री के यहा हर रोज हो रहे अत्याचार से अल्मा उन परिस्थितियों से समझौता करना सीख जाती है। अल्मा को यह अच्छे से समझ में आ जाता है कि यहाँ-वहां भागना व्यर्थ है। किसी-न-किसी रास्ते पर चलन कर आगे बढ़ना ही है, तो इस रास्ते का चुनाव क्यों न किया जाए। अल्मा म नही मन सोचती है कि ’’भागकर भी कहाॅ तक जाएगी? फिर कोई ऐसा ही खतरनाक हाथ आएगा, नए सिरे से नंगा करेगा।’’5

            श्रीराम शास्त्री अपने चुनाव प्रचार के लिए अल्मा का इस्तेमाल करते है। वोटों को ध्यान में रखकर उसके साथ विवाह कर लेता है। अल्मा मंत्री जी को हर तरह से अपना मोहताज बना देती है। ’’अल्मा परामर्ष में मंत्री-सी और सेवा में दासी-सी, खिलाने पीलाने में माता-सी, सेज पर रम्भा-सी। श्रीराम शास्त्री के यहाँ का हर तौर तरीका अल्मा को सलीके का मोहताज हो उठा’’6

            चुनाव प्रचार कार्य के दौरान मंत्री जी की कोई गलियों से मार कर हत्या कर देता है। इसका सामना भी अल्मा बड़ी वीरता से करती है। श्रीराम शास्त्री की चिता को मुखाग्नि का कार्य भी स्वयं करती है। लेखिका कहती है कि ’’ अल्मा ने आहिस्ता-आहिस्ता अग्निमुख उठा लिया और अनवरत गूँजती मंत्रध्वनि के बीच श्रीराम शास्त्री की चंदन चिता को अग्नि समर्पित कर दी।‘‘7

            श्रीराम शास्त्री की मृत्यु के बाद राजनीति में एक नया मोड़ आता है। बबीन विधानसभा की खाली सीट के लिए अल्मा का नाम तय किया जाता है। अल्मा भी राजनीति में अनेक दाव-पेंच से गुजर कर राजनीति के सिंहासन पर बैठती।’’8 अल्मा राजनीतिक, अपराध और प्रषासन के मिले जुले रूप को स्वीकार करती है।

अंततः निष्कर्ष में हम यह कह सकते है कि मैत्रेयी पुष्पा ने किस प्रकार अल्मा कबूतरीउपन्यास के माध्यम से आदिवासी जीवन शैली का सभ्य समाज द्वारा शोषित, घृणित एवं अपराधिक पृष्ठभूमि को प्रकाषित किया है, साथ ही घृणित सत्ता, राजनीति पर भी करारा व्यंग्य किया है। अल्मा के चरित्र के माध्यम से नारी की सहनषक्ति, बुद्धिमता एवं विवेकषीलता का भी परिचय दिया है। शोषण कैसा भी हो शोषण ही है और शोषण का सामना करने का हर एक मार्ग अलग-अलग है। यही सारांष है मैत्रेयी-पुष्पाकृत ’’आदिवासी नारी की जीवंत दासतां: अल्मा कबूतरी

संदर्भ:-
1.         अल्मा कबूतरी     मैत्रेयी पुष्पा                           पृष्ठ 239
2.             ,,                                  ,,                              पृष्ठ 244
3.             ,,                                  ,,                              पृष्ठ 281
4.             ,,                                  ,,                              पृष्ठ 361
5.             ,,                                  ,,                              पृष्ठ 365
6.             ,,                                  ,,                              पृष्ठ 372
7.             ,,                                  ,,                              पृष्ठ 389

8.             ,,                                  ,,                              पृष्ठ 390

[जनकृति पत्रिका के अंक 23 में प्रकाशित आलेख]
[चित्र साभार: संपर्क हिंदी]
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