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पुस्तक प्रकाशन सूचना

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

निब के चीरे से- ओम नागर जीवन: समीक्षक- विवेक कुमार मिश्र [पुस्तक समीक्षा]


कवि ओम नागर अपनी जीवन अनुभूतियों के साथ 'नीब के चीरे से' डॉयरी में मौजूद हैं | यहां एक कवि / डॉयरीकार / व स्मृतियों का लेखाजोखाकार से एक साथ साक्षात्कार होता है | अपने समय पर लिखना एक तरह से तलवार की धार पर चलना है | कवि के पास अपना समय- अपनी प्रकृति और अपने से करीब आत्मा व मन में रची बसी अपनी धरती है - खेत खलिहान है - माटी और इस माटी में रह रहे लोग हैं जिनके बिना जिन्दगी की कल्पना भी नहीं की जा सकती | समय की धड़कन को महसूस करने के लिए जीवन की उन बारीकियों में उतरना पड़ता है जो उपर- उपर तो दिखलाई नहीं पड़ती पर बातों के क्रम में परत दर परत उघड़ती जाती हैं -
"यहां बातों की नदी बहती है अपनी मौज
यहां से ख़ुशी- ख़ुशी
निकलता है कोई मजदूर

जिन्दगी को दुरस्त करने के लिए हर चौराहे से निकलता है जीवन का मजदूर ...जो है और जो नहीं है को ठीक करने के लिए | ठीक हो जाये तो जिन्दगी भी बातों की तरह मजे से कट जाती है अन्यथा जीते हैं जिन्दगी को जिन्दगी की तरह | 
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उस्तरे की धार से कट जाती है उदासी
बालों में फिरती उँगलियों से
लग जाता है क्षणिक स्मृतियों का कुम्भ
ये वे लोग हैं
जिन्हें नहीं होना कुछ भी
नहीं कहीं जाने की हड़बड़ी में दिखते हैं ये
कत्थे में दूध ज्यादा
चूने में पानी कम हो तो भी
नहीं बिगड़ने देते
जीवन का जायका / जिन्दगी का रंग | "
जिन्दगी को जीते हुए संसार में यहां से प्रवेश करते हैं ...सब कह रहे है कि समय बहुत खाराब आ गया है , किसी पर किसी का भरोसा नहीं रहा पर अभी भी बहुत कुछ है पृथ्वी पर पृथ्वी की तरह ...जिसके सहारे जीवन का ...समय का...और मनुष्यपन का विश्वास लौटता है | 
बाजारी कृत समय में बाजार में मनुष्य की खोज ही शायद इस डॉयरी का सबसे कीमती पन्ना है | किस ओर जा रहे हैं ? बाजार किस तरह लोगों को हांक रहा है और इन सबके बीच बेफ्रिक्री व आलस्य /आरामतलबी की कीमत पर ही सही मनुष्यता लौट आती है | इससे बढ़कर क्या होगा "तीनों पड़ोसी , दुकानदार कम मनुष्य ज्यादा है , जो मनुष्य की तरह जीवन जीने की जद्दोजहद में संतोष के साथ आलस्य से भरपूर जीवन जीते हैं |" यह जीवन जीना ही तो चुनौती है जिसे एक युवा कवि व जीवन का लेखाकार बाजार में खोजता है | खोये हुए को पा जाना ही तो आज सबसे बड़ी चुनौती है | बाजार में रहते हुए - बाजार से दो चार होते हुए - इसी भूमि पर मनुष्यता का जतन मित्रता की कोंख से ...है न बुनियादी बात | यह सब कवि की आँख ही देख सकती है ...
"इन रिक्शेवालों का दम फूलने तक
गुड़कते हैं रिक्शों के पहिये
एक सनातन समय का
दूजा अपने समय का पहिया"
इन्हीं सबके बीच जिन्दगी चलती रहती है , समय के हर कड़वे सच को पीते हुए - जिसे कवि - लेखक की निगाह अपने समय के यथार्थ में उठाती रहती है | यह मूल तौर पर जीवन जीने की मंत्रणा भरी किताब है ...सुख - दुःख के किनारों पर बसी एक मानवीय बस्ती जिसमें एक कवि भी रहता है ....अपने अंदाज में और यहीं सच.... जीने की जिद् के साथ चलता रहता है |
एक जगह कवि ओम नागर डॉयरी में लिखते हैं कि " व्यक्ति के जीवन के सारे रिश्ते - नाते भ्रम की खूँटी पर टंगे रहते हैं | असल में यह भ्रम ही होता है , जो हर रिश्ते को बिखरने से बचाये रखता है | " जिन्दगी भ्रमों के बीच अपना रास्ता बनाते - बनाते निकल जाती है | कई बार हम बस देखते रह जाते हैं ...जीवन के कारवां को , पर यहीं पर एक कवि चेताता रहता है कि यह है और इसे ऐसे जीना है |
इसी तरह स्त्री की दुनिया है जिस पर कवि की टिप्पणी को बहुत ध्यान से देखा जाना चाहिए " स्त्री जीवन भर सर्जना में अनथक जुटी रहती है | उसे पृथ्वी को सुन्दर बनाने का हुनर आता है | " यह पृथ्वी व स्त्री के लिए एक साथ सच है | पृथ्वी और स्त्री इस संसार की सुन्दरता का बिम्ब हैं | जीवन है | 
"आकाश हँसता है बारिश की हँसी " जिसमें संसार भर की खुशहाली व पृथ्वी का भविष्य छिपा होता है | तो गरीबी की चादर औढ़े किसान की आशंका भी " किसी  न किसी के दीवार ढह जाने के भय के बीच रातें गुजरती थी | आकाश में कोई बिजली चमकती तो पानी के मोटापे का पता मिलता था या फिर बाहर के चबूतरे के धसक जाने की आहट से घर भर में चोवतों की छानबीन शुरु होती थी |"
यह जीवन गांव के बासींदों की यादों में आज तक भरा पड़ा है | आज भी है | इन्ही भय आशंका के बीच हरियाली के खुशी के और जिन्दगी के अनूठे रहस्यों के गीत गांव गाते रहे हैं | बस कान लगाकर कवि की तरह कोई सुनने वाला चाहिए | पानी के कई प्राकृतिक रूप ,पानी के साथ मनुष्य के रिश्ते और पानी की दुनिया के साथ मनुष्य के सुख - दुःख से जुड़ी अनुभूतियों को एक समझ के साथ यहां उठाया गया है | आकाशीय बिजली के साथ पानी के होने का अहसास , मनुष्य के भीतर जन्मा भय व उम्मीद की तमाम रोशनी भी इसी अंधेरे रास्ते से होकर गुजरती है | 
कवि ओम नागर निर्मल मन की खोज में गांव/ कस्बे/शहर सबकी ओर देखते हैं - इस क्रम में समय की मार व जीवन से गहरा साक्षात्कार एक साथ होता है | एक जगह वे लिखते हैं " इंसान की बाहरी उज्ज्वलता तभी दमदार हो सकती है जब वह भीतर से भी निर्मल हो | मुकेश के बाऊजी निर्मल है और आप तो जानते ही हैं कि आज के इस निर्मम समय में निर्मलता का कितना अकाल सा पड़ा है | " समय की निर्मम मार में भी अपने को जतन कर लेना ही मनुष्यता की उम्मीद को उजागर करती है |  डॉयरीकार ने एक युक्ति के रूप में पुरानी पीढ़ी को सामने रखकर भविष्य की इबारत को तैयार करने की कोशिश करता है | जहां नई कविता की इबारत बच्चे में उम्मीद की किरण ढ़ूढ़ती है वहीं कवि ओम नागर अनुभव के पगे खम्भे को ढ़ूढ़ते हैं जिसके सहारे विश्वास के साथ किसी बात को सामने रखा जा सके | इसी रूप में यह कविता की विधा हमारे समय की डॉयरी बन जाती है |
यहां पर जिन्दगी की हर छोटी - बड़ी बाते हैं | गांव है , घर है , और इन सबके बीच मनुष्य का बनता अनुभव संसार .....
"कई हिस्सों में बँट गये खेत
आँगन में दीवारों का जमघट लगा है
दुःख इतने की बांटे न बँटे
सुख बाँटता रहा सदा गाँव |
बाजार में
दुःख भी बिकता है
सुख भी बिकता है
बिकना जरूरी शर्त है
बाजार के लिए | "
दुःखों की दुनिया में भी गाँव जीने भर की खुशी ढ़ूढ़ लेते हैं | यहीं गाँव का जीवन है | यहीं जीवटता | हर हाल में जीने का मंत्र जीता गाँव ही समय की उम्मीद बन उगेंगे |
चाहे जैसा भी समय हो शब्दों की फसल मनुष्यता की उम्मीद में खड़ी रहेगी | कवि/ शिल्पी/ डॉयरीकार / जीवनीकार सब के सब इस उम्मीद में ही धरती पर अपनी कलम / कूंची के साथ चल रहे हैं ....जीवन का गीत गाते हुए चल रहे हैं |

यह सब देखने के क्रम में जीवन जीने की प्रक्रिया का हिस्सा बन कर आती हैं .....कवि का जीवन और जीना इसी तरह संभव होता है |  समय में बहुत कुछ ऐसा होता है जिस पर किसी की निगाह नहीं पड़ती कम से कम उस तरह नहीं पड़ती जैसे कवि की पड़ती है | कवि की दुनिया में चीजें एक क्रम से नहीं आती हर बात यहां एक अलग संदर्भ व जादू लेकर आती है | मनुष्यता की खोज में मानों किसी गहरी बावड़ी के अथाह नीले जल में कवि धीरे- धीरे उतर रहा हो , सच की थाह लेने के लिए कोई हड़बड़ी नहीं और न ही कहीं जाने की जल्दी है | बस बात को पकड़ लेने की जिद् ही युवा कवि को अपने नजदीकी संसार में घुमाती रहती है....जहां बाजार है , बाजारे में छोटी - छोटी दुकाने हैं , फुरसत के आदमी हैं तो गांव संसार की वह दुनिया है जिसमें हंसी खुशी के बीच जीवन की हिलोरों में दुःख की चादरें हैं जो हर संघर्ष में लड़ना / जीना सीखलाती हैं | इस तरह एक जीवित संसार में डॉयरी के पन्नों के साथ हम सब जीवन के अपने - अपने हिस्से के करीब आते रहते हैं | 'नीब के चीरे' से जिन्दगी के उस यथार्थ को लेकर है जहां हमारा क्रूर समय है , भोले- भाले ग्रामीण समाज , कस्बे , नगर व महानगर की वह दुनिया है जिसमें जिन्दगी की जद्दोजहद के साथ जी रहे इंसान को उसके सुख- दुःख के साथ न केवल देखा गया है वल्कि किन हालातों की वजह से ये दुःख है कि जाता नहीं ....जिसे बदलने के लिए जिद् की तरह से एक इंसान जो कवि है , अपनी सीमा में मनुष्य बना रहना चाहता है और मनुष्यता के लिए वह सब कुछ जतन करना चाहता है जिससे जिन्दगी की लड़ाई को बेहतर तरीके से लड़ा जा सके | जीवन की घटनाएं कभी भी इतनी बड़ी नहीं होती कि उनके आगे जीवन हार जाये | यह डॉयरी अपने समय में जीवन की जंग को बहुत मासुमियत से लड़ती रहती है जीवन है ही मासूम ...जिसे न जाने कितने जतन के बाद कविता कहानी बचा कर रखती है | कविता - कहानी- किस्से - स्मृति मानवीय संरक्षण की वे सारी तकनीकें जिनमें जीवन की गाथा सुरक्षित रहती है के दिन- दिन के इतिहास को कविता / डॉयरी के सहारे यहां जीया गया है | जो है और जो नहीं है और इस क्रम में जो कुछ छुट रहा है उसे ही मनुष्यता के संघर्ष में यहां जतन करने का क्रम किया गया है |
पुस्तक:   ' निब के चीरे से'( डायरी )नवलेखन
               पुरस्कार-2015 से पुरस्कृत
विधा      :   डायरी
प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ,नयी दिल्ली।

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F-9, समृद्धि नगर स्पेशल , बारां रोड, कोटा - 324001 
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