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बुधवार, 1 नवंबर 2017

विकास के आईने में बेरोजगारी व् समाधान: प्रवीण पाठक



विकास के आईने में बेरोजगारी  व्  समाधान

प्रवीण पाठक

उदारीकरण से देश का आर्थिक और औद्योगिक विकास तेज़ी से हुआ है, लेकिन इस विकास का लाभ देश के आम आदमी को नहीं मिल पाया है एक ओर हम कहते हैं कि हमारा लक्ष्य देश के प्रत्येक नागरिक के लिए भोजन,पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास व रोजगार की व्यवस्था करना है, वहीं दूसरी ओर हम ऐसी आर्थिक और औद्योगिक नीतियां अपनाते हैं, जिससे आर्थिक विकास का समूचा लाभ देश के 5 प्रतिशत अभिज्यात वर्ग को मिलता है। सरकारी नीतियों का यह विरोधाभास समाज में असंतोष को जन्म दे रहा है। देश के गरीबों का जीवन स्तर सुधारना और बेरोजगारी को दूर करना, सचमुच सरकार की प्राथमिकता है तो उसे इस दिशा में गंभीर और ईमानदार कदम उठाने होंगे भारत में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है इतनी बड़ी समस्या कि यह आजादी के समय भी थी और आज भी वृद्धिक्रम में विद्यमान है।ऐसा क्यों है कि हम इस पर काबू पाना तो दूर; इसके वृद्धि क्रम को भी नहीं रोक पाए । बड़े-बड़े महापुरुष उत्पन्न हुए, गरीबी हटाओं, बेरोजगारी दूर करने के नारे लगे पर बदले में आई खाद्य सुरक्षा योजना, बी.पी.एल. , मनरेगा जैसी योजानाएं। यह इस सिस्टम का एक भद्दा मजाक है रोजगार की कमी श्रमजीवियों को नहीं है। किसी गाँव में भी चले जाईये, तो मनरेगा से ऊँचे पारिश्रमिक पर श्रमिक नहीं मिलते सरकारी राशन की दूकानें, F.D.I. का गोदाम मैनेजर, ग्राम-प्रधान, निगरानी समिति, इन दुकानों के इंस्पेक्टरों के बीच सरकार द्वारा भेजे गये, गेहूं-तेल भी बाजार में बिक जाते है। फर्जी डिस्ट्रीब्यूशन रजिस्टर बनता है । जाली अंगूठे के निशान और फर्जी दस्तखत। ये राशनकार्ड ही कलेक्ट कर लेते है । जब देश में कार्य करनेवाली जनशक्ति अधिक होती है किंतु काम करने के लिए राजी होते हुए भी बहुतों को प्रचलित मजदूरी पर कार्य नहीं मिलता, तो उस विशेष अवस्था को 'बेरोजगारी' की संज्ञा दी जाती है। ऐसे व्यक्तियों का जो मानसिक एवं शारीरिक दृष्टि से कार्य करने के योग्य और इच्छुक हैं परंतु जिन्हें प्रचलित मजदूरी पर कार्य नहीं मिलता, उन्हें 'बेकार' कहा जाता है । बेरोजगारी का अस्तित्व श्रम की माँग और उसकी आपूर्ति के बीच स्थिर अनुपात पर निर्भर करता है। बेरोजगारी के दो भेद हैं - असंतुलनात्मक तथा ऐच्छिक असंतुलनात्मक बेरोजगारी श्रम की माँग में परिवर्तन के कारण होती है। ऐच्छिक बेरोजगारी का प्रभाव उस समय होता है जब मजदूर अपनी वास्तविक मजदूरी में कटौती को स्वीकार नहीं करता। समग्रत: बेरोजगारी श्रम की माँग और पूर्ति के बीच असंतुलित स्थिति का प्रतिफल है।प्रोफेसर जे.एम. कीन्स "अनैच्छिक बेरोजगारी" को भी बेरोजगारी का भेद मानते हैं। "अनैच्छिक बेरोजगारी" की परिभाषा करते हुए उन्होंने लिखा है -'जब कोई व्यक्ति प्रचलित वास्तविक मजदूरी से कम वास्तविक मजदूरी पर कार्य करने के लिए तैयार हो जाता है, चाहे वह कम नकद मजदूरी स्वीकार करने के लिए तैयार न हो, तब इस अवस्था को अनैच्छिक बेरोजगारी कहते हैं।'यदि कोई व्यक्ति किसी उत्पादक व्यवसाय में कार्य करता है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वह बेकार नहीं है । ऐसे व्यक्तियों को पूर्णरूपेण रोजगार में लगा हुआ नहीं माना जाता जो आंशिक रूप से ही कार्य में लगे हैं अथवा उच्च कार्य की क्षमता रखते हुए भी निम्न प्रकार के लाभकारी व्यवसायों में कार्य करते हैं सन् 1919 ई. में अंतरराष्ट्रीय श्रमसम्मेलन के वाशिंगटन अधिवेशन ने बेरोजगारी अभिसमय (Unemployment convention) संबंधी एक प्रस्ताव स्वीकार किया था जिसमें कहा गया था कि केंद्रीय सत्ता के नियंत्रण में प्रत्येक देश में सरकारी कामदिलाऊ अभिकरण स्थापित किए जाएँ । सन् 1931 ई. में भारत राजकीय श्रम के आयोग ने बेरोजगारी की समस्या पर विचार किया और निष्कर्ष रूप में कहा कि बेरोजगारी की समस्या विकट रूप धारण कर चुकी है यद्यपि भारत ने अंतर्राष्ट्रीय श्रमसंघ का "बेरोजगारी संबंधी" समझौता सन् 1921 ई. में स्वीकार कर लिया था परंतु इसके कार्यान्वयन में उसे दो दशक से भी अधिक का समय लग गया।सन् 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट में बेरोजगारी (बेरोजगारी) प्रांतीय विषय के रूप में ग्रहण की गई। परंतु द्वितीय महायुद्ध समाप्त होने के बाद युद्धरत तथा फैक्टरियों में काम करनेवाले कामगारों को फिर से काम पर लगाने की समस्या उठ खड़ी हुई 1942-1944 में देश के विभिन्न भागों में कामदिलाऊ कार्यालय खोले गए परंतु कामदिलाऊ कार्यालयों की व्यवस्था के बारे में केंद्रीकरण तथा समन्वय का अनुभव किया गया । अत: एक पुनर्वास तथा नियोजन निदेशालय की स्थापना की गई है अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनी रिपोर्ट में विश्व में रोजगार की स्थिति पर गहरी चिंता जताई है. रिपोर्ट के मुताबिक अगर अगले दशक में बेरोजगारों की संख्या और बढ़ने से बचना है तो 60 करोड़ से ज्यादा नई नौकरियों की जरूरत है. वित्त मंत्रालय द्वारा प्रकाशित इकानोमिक सर्वे के अनुसार वर्ष 2009 से 2012 में प्रति वर्ष संगठित क्षेत्र में मात्र 5 लाख रोजगार का सृजन हुआ है हमारे श्रम बाजार में प्रति वर्ष एक करोड़ युवा प्रवेश कर रहे हैं । पुराना बैकलाग कम से कम 6 करोड़ का है ।

क्या कारण है कि हम केवल 5 लाख रोजगार प्रति वर्ष सृजित कर रहे हैं? कारण है कि कंपनियों द्वारा अधिकाधिक मशीनों का उपयोग किया जा रहा है कई वर्षों तक परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े रहने के कारण भारत अपेक्षित गति से विकास कर पाने में सक्षम नहीं हो पा रहा है. जिसके परिणामस्वरूप विश्वपटल पर स्वयं को आत्म-निर्भर और सशक्त रूप से स्थापित करने के लिए हमारी सरकारों को कई बड़े इम्तिहानों और बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है. भारतीय अर्थव्यवस्था, आजादी के इतने वर्षों बाद भी पूरी तरह चरमरायी हुई ही है. भले ही हमारी सरकारें लोगों के जीवन स्तर को सुधारने और उन्हें उपयुक्त रोजगार मुहैया कराने का दम भरती हों, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि हमारी अधिकांश जनसंख्या बेरोजगारी के कारण भूखे पेट सोने और शिक्षा विहीन रहने के लिए विवश है. उसके पास किसी प्रकार की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है. ऐसी परिस्थितियों में हमारी सरकारें, जो गरीबी और बेरोजगारी को जड़ से समाप्त करने के लिए नीतियां बनाती हैं, उनकी सार्थकता कितनी है इस बात का अंदाजा तो स्वत: ही लगाया जा सकता है. बेरोजगारी का आंकड़ा बढ़ते-बढ़ते इतना विकराल और भयावह रूप धारण कर चुका है कि इसका सामना करना हमारे लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है.हालांकि नब्बे के शुरूआती दशक में निजीकरण और उदारीकरण जैसी नई आर्थिक नीतियों के भारत में प्रदार्पण करने के साथ ही भारत की रोजगार स्थिति को थोड़ा बहुत समर्थन मिला. इन्हीं नीतियों के कारण कई ऐसे उद्योगों का विकास हुआ जिनके कारण बेरोजगारी से संबंधित आंकड़े में कमी देखी गई. आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी, जिन्होंने हमारे युवाओं के जीवनस्तर को सुधारने में काफी सहायता की, भारत में अपने पांव पसारने में सफल रहीं. लेकिन यह विकास केवल शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित रहा है. असली भारत जो ग्रामों में वास करता है, के विकास को उपेक्षित ही रहने दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप गांवों में रोजगार की स्थिति अत्यंत शोचनीय है.इन हालातों के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब देश का शासन भारतीय नेताओं के हाथ में आया तो उन्होंने औद्योगीकरण और शहरों के विकास को ही अपनी प्राथमिकता समझते हुए विकास संबंधी सभी योजनाएं केवल शहरी जीवन पर ही केंद्रित रखीं. उनकी योजनाओं में ग्रामों के विकास और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए कोई महत्वपूर्ण स्थान सुनिश्चित नहीं किया गया भारत एक विशाल जनसंख्या वाला राष्ट्र है. जनसंख्या जितनी तेजी से विकास कर रही है, व्यक्तियों का आर्थिक स्तर और रोजगार के अवसर उतनी ही तेज गति से गिरते जा रहे हैं. भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के लिए यह संभव नहीं है कि वह इतनी बड़ी जनसंख्या को रोजगार दिलवा सके. रोजगार की तलाश में दिन-रात एक कर रहे व्यक्तियों की संख्या, साधनों और उपलब्ध अवसरों की संख्या से कहीं अधिक है. यही कारण है कि आज भी अधिकांश युवा बेरोजगारी में ही जीवन व्यतीत करने के लिए विवश हैं.भारत की आर्थिक प्रगति और रोजगार अवसरों के संदर्भ में इस रिपोर्ट में दिलचस्प आँकड़े सामने आए हैं.



रिपोर्ट के मुताबिक 2004/2005 से लेकर 2009/2010 तक भारत में रोजगार अवसरों में मात्र 0.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि श्रमिक उत्पादकता 34 फीसदी बढ़ी है.श्रमिक उत्पादकता और रोजगार अवसरों के बीच इस खाई का एक बड़ा कारण मजदूर कार्यबल में महिलाओं की गिरती भागीदारी को बताया गया है.भारत की बात करें तो ग्रामीण इलाकों में 2004/2005 में महिला मजदूरों की भागीदारी 49.4 फीसदी थी जबकि 2009/2010 में ये घटकर 37.8 फीसदी रह गई है.शहरों में 2004/2005 में ये प्रतिशत 24.4 से घटकर 2009/2010 में 19.4 फीसदी रह गया.अगर आईएलओ के आँकड़ों को आधार माना जाए तो क्या वजह है कि बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था में महिला मजदूरों की संख्या घट रही है भारत को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बना देने का सपना दिखाने वालों की नींद अब टूटनी चाहिए जिस युवा जनसंख्या के बूते इक्कीसवीं शताब्दी के भारतीय युवाओं की शताब्दी होने का दंभ भरा जा रहा है, उसे उत्तर प्रदेश में खड़ी शिक्षित बेरोजगारों की फौज ने आईना दिखा दिया है, जहां विधानसभा सचिवालय में चपरासी के महज तीन सौ अड़सठ पदों के लिए तेईस लाख आवेदन प्राप्त हुए हैं। औसतन एक पद के लिए छह हजार अर्जियां! इस सच्चाई को अगर नजरअंदाज किया गया तो अराजकता के हालात बनने में देर नहीं लगेगी। किसी भी विकासशील देश के लिए यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि उसकी युवा पीढ़ी उच्चशिक्षित होने के बावजूद आत्मनिर्भरता के लिए चपरासी जैसी सबसे छोटी नौकरी के लिए लालायित है । इक्कीस करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में चपरासी के लिए जो तेईस लाख अर्जियां आई हैं, उनमें चाही गई न्यूनतम शैक्षिक योग्यता पांचवीं पास तो केवल 53,426 उम्मीदवार हैं, लेकिन छठी से बारहवीं पास उम्मीदवारों की संख्या बीस लाख के ऊपर है। - केंद्र सरकार की नौकरियों में भी कमोबेश यही स्थिति बन गई है।


कर्मचारी चयन आयोग की 2013-14 की छह परीक्षाओं में भागीदारी करने वाले अभ्यर्थियों की संख्या एक करोड़ से ज्यादा थी। निजी कंपनियों में अनिश्चितता और कम पैकेज के चलते, सरकारी नौकरी की चाहत युवाओं में इस हद तक बढ़ गई है कि पिछले पांच साल में अभ्यर्थियों की संख्या में दस गुना वृद्धि हुई है । वर्ष 2008-09 में यह परीक्षा 10.27 लाख आवेदकों ने दी । वहीं 2011-12 में यह संख्या बढ़ कर 88.65 लाख हो गई और 2012-13 में यह आंकड़ा एक करोड़ की संख्या को पार कर गया। एनएसएसओ की रिपोर्ट बताती है कि अकेले उत्तर प्रदेश में एक करोड़ बत्तीस लाख बेरोजगारों की फौज आजीविका के लिए मुंह बाए खड़ी है। जाहिर है, हमारी शिक्षा पद्धति में खोट है और वह महज डिग्रीधारी निठल्लों की संख्या बढ़ाने का काम अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के ताजा अनुमानों को लें तो इस साल भारत की बेरोजगारी दर 3.8 प्रतिशत तक रह सकती है। महिंद्रा समूह की कंपनी ब्रिस्टलकोन की उपाध्यक्ष (वैश्विक एचआर व प्रतिभा प्रबंधन) रितु मेहरोत्रा ने कहा कि लोगों के शहरों की ओर पलायन करने की वजह से ग्रामीण इलाकों में भी बेरोजगारी की दर में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है कर रही है। अनौपचारिक कृषि रोजगार में काम के लिए लोगों को बहुत कम भुगतान किया जाता है। भारत में बेरोजगार की दर में 2011 से बढ़ोतरी का रुख है।


वर्ष 2011 में यह 3.5 प्रतिशत थी जो 2012 में बढ़कर 3.6 प्रतिशत एवं पिछले साल यह 3.7 प्रतिशत पर पहुंच गई। इस साल, बेरोजगारी दर बढ़कर 3.8 प्रतिशत पहुंचने की संभावना है । भारत में बेरोजगारी की दर 9 प्रतिशत से भी ऊपर है और इस समय देश में हर 3 स्नातकों में एक व्यक्ति बेरोजगार है। देश में काम करने वाले लोगों की संख्या लगभग 75 करोड़ के करीब है जो वर्ष 2020 तक बढ़ कर 100 करोड़ तक पहुंच जाएगी। योजना आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि पिछले दशक में देश में रोजगार की संभावनाएं लगातार क्षीण हुई हैं। 1983 तक जहॉं भारत में रोजगार वृद्धि दर 2.7 प्रतिशत थी, वह अब गिरकर 1.07 प्रतिशत रह गई है। पिछले दशक में केंद्र सरकारें विश्र्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में कई सार्वजनिक उपामों को बंद कर निजी हाथों के सुपुर्द करती रही हैं । सार्वजनिक उपामों के बंद होने से देश में बेरोजगारी बढ़नी तय है । क्योंकि ये सार्वजनिक उपाम संगठित क्षेत्र के लिए रोजगार के सबसे बड़े स्रोत हैं। सरकार ने बेरोजगारी की समस्या को समय रहते नियंत्रित न किया तो देश में गरीबी और बदहाली तो बढ़ेगी ही, बल्कि इसके परिणामस्वरूप देश के युवक अपराध में भी लिप्त होंगे। सन् 2010 तक भारत की आबादी 120 करोड़ तक पहुँच जाएगी और रोजगार वृद्धि दर में तीव्र बढ़ोत्तरी न हुई तो देश में बेरोजगारों की संख्या कम से कम 10 करोड़ हो जाने का अनुमान है। आर्थिक उदारीकरण अपनाने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों का दबाव व वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। घरेलू उद्योग जो उदारीकरण लागू होने से पहले लाभ की स्थिति में थे, वे भारतीय बाजारों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश के बाद बुरी तरह लड़खड़ाते प्रतीत हो रहे हैं । बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चुनौती इतनी प्रबल है कि देश का घरेलू औद्योगिक तंत्र निरंतर पिछड़ता जा रहा है। पिछले वित्त वर्ष में देश में बेरोजगारी दर 3.8 फीसद रही. सभी राज्यों और संघशासित प्रदेशों में बेरोजगारी की सबसे कम दर गुजरात और दमन एवं व में रही.श्रम ब्यूरो के महानिदेशक डी एस कोलमाकर ने कहा, ‘हमारी बेरोजगारी दर अमेरिका, स्पेन और दक्षिण अफ्रीका जैसे अन्य देशों के मुकाबले काफी बेहतर स्थिति में है.’केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के तहत आने वाले श्रम ब्यूरो द्वारा जारी 2011-12 की ताजा रिपोर्ट में कहा गया कि दमन-दीव और गुजरात में बेरोजगारी दर क्रमश: 0.6 फीसद और एक फीसद है. कम बेरोजगारी के मामले में छत्तीसगढ़ और राजस्थान सूची में तीसरे और चौथे स्थान पर रहे.जहां तक पंजाब का सवाल है इसकी राजकोषीय स्थिति चिंताजनक हो सकती है लेकिन रोजगार प्रदान करने के मामले में यह हरियाणा, दिल्ली और महाराष्ट्र से बेहतर रहा है. पंजाब में बेरोजगारी दर 1.8 प्रतिशत रही है, जो कि अखिल भारतीय स्तर पर सभी राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में पांचवी सबसे कम दर है.कोलमाकर ने कहा कि अखिल भारतीय स्तर पर बेरोजगारी दर 3.8 फीसद रही जबकि ग्रामीण और शहरी इलाकों में बेरोजगारी दर क्रमश: 3.4 फीसद और पांच फीसद रही. यानी शहरी इलाकों के तुलना में ग्रामीण इलाकों में कम बेरोजगार हैं.



भारत एक कृषि प्रधान देश है तथापि भारतीय कृषि के पिछड़ेपन केकारण अतिरिक्त रोजगार के अवसरों का सृजन बहुत कम है। साथ ही भारत के विविधप्राकृतिक साधन अभी तक अविकसित होने से कृषि एवम् औद्योगिक विकास धीमी गति से होरहा है। पारिवारिक और सामाजिक कारणों के कारण लोग अपना निवास छोड़कर अन्यत्र जानापसंद नहीं करते जिससे भारतीय श्रम भी गतिहीनता का शिकार हो गया है। दरिद्रता औरबेरोजगारी का तो मानो चोली दामन का साथ है। एक व्यक्ति गरीब है क्योंकि वहबेरोजगार है तथा वह बेरोजगार है इसलिए गरीब है। वर्तमान दोषपूर्ण शिक्षा प्रणालीभी विद्यार्थियों को रचनात्मक कार्यौं में लगाने, स्वावलम्बी बनाने तथा आत्मविश्वास पैदा करने में असफल रही है। फलतः आज पढ़ा लिखा व्यक्ति रोजगार के लिए मारा-मारा फिर रहा है। भारत मेंमाँग व प्रशिक्षण की सुविधाओं में समन्वय के अभाव में कई विभागों में प्रशिक्षितश्रमिकों की कमी है । उक्त कारणों के अतिरिक्त भारत में विद्युत की कमी, परिवहन की असुविधा, कच्चा माल तथा औद्योगिक अशान्ति के कारण नये उद्योगस्थापित नहीं हो रहे हैं, वहींउत्पादन में तकनीकी विधियों को लागू करने से भी बेरोजगारी में वृद्धि हो रही हैहस्त व लघु उद्योगों की अवनति, त्रुटिपूर्णनियोजन, यन्त्रीकरण एवं 

अभिनवीकरण, स्त्रियों द्वारानौकरी करना, विदेशों से भारतीयोंका आगमन आदि कारण भी बेरोजगारी समस्या के लिए उत्तरदायी हैं । बेरोजगारी की समस्यासमाज में आज अत्यन्त भयंकर एवं गम्भीर समस्या बन गयी है। देश का शिक्षित एवंबेरोजगार युवक अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति हड़तालें करने, बसें जलाने एवं राष्ट्रीय सम्पत्ति को क्षति पहुँचाने में कर रहा है वहीं कई बार वह कुंठित हो आत्महत्या जैसा भयंकर कुकृत्य कर बैठता है।कहते हैं ”खाली दिमाग शैतान काघर“ कहावत को हमारे युवकचरितार्थ कर रहे हैं। सच भी है मरता क्या नहीं करता, आवश्यकता सब पापों की जड़ है, अतः वह चोरी, डकैती, अपहरण, तस्करी, आतंकवादी गतिविधियों में सक्रिय हो रहा है। देश की जनशक्ति का सदुपयोग नहीं हो रहा है, फलतः आर्थिक ढाँचा चरमरा रहा है। 

समाधान 

अब प्रश्न यह उठता है, कि बेकारी के इस भूत से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है भारत जैसे विकासशील देश को अपनीबेरोजगारी के उन्मूलन हेतु सर्वप्रथम जनसंख्या नियन्त्रण कार्यक्रम को हाथ मेंलेकर परिवार नियोजन, महिलाशिक्षा, शिशु स्वास्थ्य के कार्यअपनाने होंगे। कृषि विकास के लिए शोध गति से विस्तार एवं कृषि में उन्नत बीजों कोअपनाना होगा। नियोजन की प्रभावी नीति, पिछड़े क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना, कुटीर एवं लघु उद्योगों का विकास किया 188 जाना चाहिए तथा उन्हें कच्चा माल, औजार,लाइस स व अन्य आधार भूत सुविधाएँ उपलब्धकरानी चाहिए । सरकार द्वारा विद्युत आपूर्ति, परिवहन सम्बन्धी अड़चन द र करने का प्रयत्न किया जाय।वर्तमान शिक्षा पद्धति को रोजगारोन्मुख बनाए जाने की महती आवश्यकता है। यदि माध्यमिक शिक्षा के बाद औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं तथा अन्य तकनीकी संस्थाओं कीअधिकाधिक स्थापना कर युवकों को प्रशिक्षित कर वित्त, कच्च माल व विपणन की सुविधा देकर स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित किया जाय तो इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता साथ ही प्राकृतिक साधना का सर्वेक्षण, गाँवोंमें रा जगारोन्मुख नियोजन, युवाशक्ति का उपयोग किया जाना चाहिए । वैस सरकार की आ र स इस दिशा में प्रयत्न हेतु एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। इस विश्व व्यापी समस्या केसमाधान हेतु उपाय अपने अपने देश की परिस्थितियों के अनुसार ही सार्थक, प्रभावशाली एवं उचित सिद्ध होगे। केवल सरकारी योजनाओं से इसका निराकरण सभव नहीं होगा । आवश्यकता है- इस हेतु युवको को ही आगे आकर अपने लिए मार्ग का निर्धारण करना हा गा। हाथ पर हाथ धरे बैठे रहन से कुछ होने का नहीं। नौकरी के लिए भटकने की अपेक्षा अपनी रुचि उद्या गा क प्रतिजाग्रत करनी होगी, तभी इसका कोई स्थायी समाधान हो सकेगा, अन्यथानहीं गरीबी हटाने और रोजगार पैदा करने के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर हमारे पास सिर्फ और सिर्फ योजनाएं हैं समाधान यही है कि पूरा पैसा सीधे गांव में भेज दिया जाए और लोग अपनी आवश्यकताओं के अनुरुप उन पैसों को खर्च करें । लोग खुद ये निर्णय लें कि पैसों को किस तरह खर्च करना है। हरेक गांव के भूखे और बेघर लोगों की एक सूची तैयार कर ली जाए। ऐसे लोगों की तत्काल मदद की जा सकती है। मुफ्रत बांटने के बजाए ऐसे लोगों पंचायत कार्य करवाए जा सकते हैं। इसके अलावा ग्राम सभा ऐसे लोगों को रोजगार उपलब्ध् कराने के लिए भी प्रयास कर सकती है। अगर ग्राम सभा को पर्याप्त फंड मिले तो ग्राम सभा लोगों को छोटे मोटे धंधे करने के लिए लघु कर्ज उपलब्ध् कराने का भी निर्णय ले सकती है । बेकारी का एक और बहुत बड़ा कारण है, परम्परागत घरेलू काम-धंधे को छोड़कर कल-कारखाने में नौकरी की इच्छा;जिसका परिणाम हो रहा है कि आज परम्परागत गृह- उद्योग खत्म होने लगे हैं इसलिए शिक्षा ऐसी होनी चाहिये, जो व्यक्ति के मन में मात्र बाबूगिरि के काम की प्रेरणा ही नहीं; बल्कि कर्मठ औरसुखी जीवन-यापन की प्रेरणा मिले सरकार की गलत औद्योगिक नीति और योजना भी बेकारी समस्या बढ़ा रही है । बड़े-बड़े उद्यो्गों के सामने छोटे कुटीर उद्योगों की तरफ़ ध्यान नहीं दिया जाता । छोटे धंधे से जुड़े लोग ,सामान्य शिक्षा प्राप्त नवयुवक लड़के, घरेलू कारीगर आदि धीरे-धीरे बेकारी की पंक्ति में आ खड़े हो गये । गाँव के किसान,जिसका मकसद था खेती द्वारा अन्न उपजाना; अपना और देश वासियों का पेट पालना ; आज वे खेती-बाड़ी को छोड़कर , शहरों में नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं । परिणाम स्वरूप यह समस्या ,विकट से विकटतम की ओर बढ़ती चली जा रही है यहीं तक, यह समस्या सीमित नहीं रही, अब तो बेकारी, सामाजिक समस्याओं को भी जनम देने लगी है । बेकार युवक चिड़चिड़ा,हिंसक और उद्दंड होते जा रहे हैं । इच्छाओं और जरूरी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अनैतिक मार्ग पर चलने से भी परहेज़ नहीं करते हैं मेरी समझ से लूट-पाट, हत्या, छीना-झपटी, आदि बेकारी का ही एक हिस्सा है ।सबसे पहले बढ़ती जनसंख्या के सैलाब को रोकना होगा बिना इस पर नियंत्रण किये, किसी भी प्रकार की नीति सफ़ल नहीं होगी, कारण जो नीतियाँ/ योजनाएँ, आज 120 करोड़ के लिए बनती हैं; इनके लागू होते-होते जनसंख्या, 20 करोड़ और बढ़ जाती है ऐसी हालत में कोई भी योजना सफ़ल नहीं हो सकती--- इच्छाओं का विस्तार भी बेकारी का एक कारण है , जो मानवता के अर्थ तथा मानव-मूल्यों तक को व्यर्थ कर देता है । जब तक सरकार छोटे-छोटे कुटीर –उद्योगों को फ़लने-फ़ूलने में आर्थिक मदद से दूर रखेगी , बेकारी की आग फ़ैलती जायगी । साथ ही परम्परागत धंधों को उचित संरक्षण और सम्मान नहीं मिला तो ,बेकारी बनी रहेगी; उन्हें यह भी समझना होगा,कि कोई भी काम ओछा नहीं होता । काम ,काम है और पूजा भी ।अक्षर और साहित्य ग्यान के साथ-साथ, विद्यार्थियों को औद्योगिक ग्यान की भी शिक्षा देनी चाहिये भारत की तत्काल शिक्षा –पद्धति जैसी है, उससे उँची-ऊँची डिग्रियाँ तो मिलती हैं ,लेकिन पेट भरने के लिए रोटियाँ नहीं मिलतीं इसलिए यह आवश्यक है कि गाँव के धंधे, खेती और व्यापार के साथ ,शिक्षा का भी मेल बना रहे । प्रारंभिक एवं माध्यमिक अवस्थाओं में भी, विद्यार्थियों को उनके अपने घरेलू धंधे से वे अलग न हों, इसका ख्याल रखना चाहिये । प्रत्येक नागरिक का यह हक बनता है कि उन्हें दो जून की रोटी के साथ रहने का एक घर ,और तन ढ़ँकने के लिए वस्त्र उपलब्ध हो 

प्रवीण पाठक 
पी-एच.डी. विकास एवं शांति अध्ययन2015-2016 
praveenpthak@gmail.com 
Mob. 8975035409 
महात्मा गान्धी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा, महाराष्ट्र



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19. http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A4%B2 

20. http://socialissues.jagranjunction.com/2011/09/27/increasing-rate-of-unemployment-in-india 

21. http://hi.tradingeconomics.com/india/unemployment-rate 

22. http://dainiktribuneonline.com/2015/10/%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8 

23. https://kashivishvavidyalay.wordpress.com/2012/11/02/liberalisation_two_decades_sunil

[चित्र साभार: परफोर्म इण्डिया]
[आलेख साभार: जनकृति पत्रिका]
  

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