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बुधवार, 8 नवंबर 2017

भारतीय हिन्‍दी चित्रपट गीतिकाव्‍य : आवश्‍यकता और उद्‌भव- अतुल्‍यकीर्ति व्‍यास



"भारतीय हिन्‍दी चित्रपट गीतिकाव्‍य : आवश्‍यकता और उद्‌भव"
ब्रह्माण्‍ड में निरन्‍तरता, गतिशीलता अथवा चिरन्‍तनता का जो एक तत्त्व व्‍याप्‍त है, उस तत्त्व की अभिव्‍यक्ति के लिये भाषा द्वारा जिस शब्‍द का आविष्‍कार किया गया है वह है ‘‘लय’’
जब इस ‘‘लय’’ में क्रमबद्धता को संयोजित किया जाता है तो उसका जो रूप बनता है वह है ‘‘ताल’’‘‘ताल’’, ‘‘लय’’ का वह स्‍वरूप है जो लय को अधिक रसयुक्त आधार प्रदान कर देता है। लय और ताल का यह गठजोड़ जिस अदृश्‍य परन्‍तु रसवान ‘‘पदार्थ’’ का सृजन करता है, उसे ‘‘संगीत’’ के नाम से जाना जाता है। अर्थात्‌ ‘‘संगीत’’ ब्रह्माण्‍ड में व्‍याप्‍त वह तत्त्व है जो स्‍थूल रूप में अभिव्‍यक्त न भी हो, परन्‍तु वह हर क्षण, हर पल, हर जगह मौजूद तो रहता ही है।

अतः जो तत्त्व ब्रह्माण्‍ड में व्‍याप्‍त है, निश्‍चित ही वह हमारे तन, मन, मस्‍तिष्‍क, बुद्धि, चित्त, आत्‍मा, और संवेदना से कैसे विलग रह सकता है, अर्थात्‌ सामान्‍य शब्‍दों में कहें तो संगीत हमारे जीवन का अभिन्‍न अंग है। ज़ाहिर तौर पर कोई उसे चाहे या ना चाहे, माने या ना माने, परन्‍तु वह स्‍वयं को संगीतमय होने से नहीं बचा सकता, अर्थात्‌ संगीत जीवन के लिये आवश्‍यक नहीं अपितु अनिवार्य है।

1 भारतीय हिन्‍दी चित्रपट में गीतिकाव्‍य की आवश्‍यकता -

भरतमुनि नाट्‌यमें गीति और वाद्य की आवश्‍यकता को प्रतिपादित करते हुए अपने ग्रंथ नाट्‌यशास्‍त्रमें कहते हैं कि गीतवाद्य नाट्‌य की शैय्‍या है, इनके समुचित प्रयोग होने से नाट्‌य-प्रयोग विपत्तिग्रस्‍त नहीं होता है। 01

(अ) भावों के सरल-सरस सम्‍प्रेषण हेतु - भारतीय चित्रपट मूलरूप से भारतीय नाट्‌य-परंपरा का ही विस्‍तार है जिसमें समय के साथ बदलती हुई तकनीक का भी भरपूर समावेश हुआ है। चित्रपट-तकनीक ने ही नाट्‌य की प्रस्‍तुति को अधिक नाटकीय, प्रभावशाली, वास्‍तविक, मनमोहक, ऐन्‍द्रजालिक और कल्‍पनातीत रूप प्रदान किया है, परन्‍तु इसके मूल तत्त्व वही हैं प्राचीन नाट्‌यशास्‍त्र द्वारा अनुमोदित।

यह सहज और सर्वस्‍वीकार्य तथ्‍य है कि संगीत प्रकृति के तत्त्वों में एक महत्त्वपूर्ण स्‍थान रखता है, और इसी कारण से यह हमारे (मानव) जीवन का भी एक अनिवार्य व अभिन्‍न अंग है, या यूँ कहें कि जहाँ कहीं भी जीवन को परिभाषित किया जाता है, संगीत स्‍वयमेव वहाँ अपनी प्रस्‍तुत या अप्रस्‍तुत उपस्‍थिति दर्ज़ करा ही देता है। जगत्‌ में शायद ही ऐसी कोई संस्‍कृति होगी जिसमें जन्‍म से लेकर मृत्‍यु तक की संपूर्ण यात्रा संगीत के बग़ैर पूरी होती हो।

संगीत की प्रभावशीलता में शब्‍दों की भूमिका अत्‍यन्‍त महत्त्वपूर्ण है, ‘शब्‍दके अभाव मेे सब कुछ होकर भी, सब कुछ शून्‍यही रहता है, इसीलिये शब्‍दको ब्रह्मकी संझा दी गई है। इस प्रकार संगीतऔर शब्‍दका समन्‍वित स्‍वरूप गीतिकाव्‍यहै। भरत के अनुसार यह गीतिनाट्‌य-प्रयोग का अभिन्‍न अंग है, उसकी सफलता का सहायक।

गीत और वाद्य नाट्‌य-प्रयोग में अलातचक्र की तरह मिले रहते हैं, 02 और इनका विधान  नाट्‌य प्रयोग के सहायक अंग के रूप में है। नाट्‌य में इनके (गीत-वाद्य के) प्रयोग से जो भाव-प्रकाशन होता है वह प्रेक्षक के अन्‍तर में रस की निष्‍पत्ति कर देता है, यही साधारणीकरण है जो उसे चरम आनन्‍द की अवस्‍था में पहुँचा देता है।

भारतीय चित्रपटों में भी गीत-संगीत के प्रयोग की परम्‍परा का आधार भरत मुनि के यही विचार रहे हैं, भले ही वे किसी भी भाषा के चित्रपट हों। एक प्रकार से भारतीय चित्रपटों में गीत-संगीत का प्रयोग एक तरफ़ जहाँ मनोवैज्ञानिक आधारों पर ख़रा उतरता है वहीं, दूसरी तरफ़ वह भारतीय नाट्‌य-परम्‍पराओं का निर्वहन भी करता है।

(ब) फ़िल्‍म निर्माता एवं अन्‍य संबंधितों (गीतकार, संगीतकार, गायक, वादक, रिकॉर्डिंग स्‍टुडियो, रिकॉर्डिस्‍ट, संगीत - कम्‍पनी आदि) के जीवनयापन एवं व्‍यावसायिक लाभ हेतु - भरतमुनि द्वारा प्रतिपादित साधारणीकरण के सिद्धान्‍त के माध्‍यम से चरम आनन्‍द की प्राप्‍ति हेतु प्रेक्षक इन नाट्‌यों, वर्तमान संदर्भ में कहें तो चित्रपटों का सहारा लेता है, जो मूल्‍य रहित तो होता नहीं है। अतः प्रेक्षकों द्वारा चुकाए गए मूल्‍य से ही नाट्‌य और चित्रपटों का निर्माण होता है और इनके सृजकों यथा - चित्रपट निर्माता, निर्देशक, गीतकार, संगीतकार, गायक-गायिकाओं के साथ वा़द्य-वादकों, रिकॉर्डिस्‍ट, रिकॉर्डिंग स्‍टुडियो आदि एवं इस संगीत के विपणन में लगे सभी व्‍यक्तियों का प्रत्‍यक्षतः जीवनयापन इसी से होता है। 03 हमारे देश में संगीत का जितना बाज़ार है उसका 72 प्रतिशत हिस्‍सा चित्रपट संगीत का ही है। 04

(स) मात्र चित्रपट की लोकप्रियता बढ़ाने हेतु - आरंभ से ही मधुर गीत-संगीत चित्रपट की लोकप्रियता का आधार रहा है। जिस किसी चित्रपट में मधुर गीत-संगीत का प्रयोग होता है, उसे दर्शक अधिक पसंद करते हैं और उसे देखनेवालों की संख्‍या में कई गुना वृद्धि होती देखी गई है जो उसके व्‍यावसायिक लाभों की मात्रा को भी दर्शकों की बढ़ती संख्‍या के अनुपात में बढ़ा देती है।

वर्तमान में आइटम साँग05 की अवधारणा चित्रपट के व्‍यावसायिक लाभ की मात्रा को बढ़ाने के उद्देश्‍य का ही परिणाम है। पहले यह चित्रपट में, कथा के हिस्‍से के रूप में उपस्‍थित रहा करता था। परन्‍तु, आजकल तो निर्माता कथासूत्र में घुमाव की आवश्‍यकता को भी नकारकर, मात्र गीत के लिए गीत रखने लगे हैं।

 

आइटम साँगकी सहज परिभाषा देते हुए जाने माने निर्माता-निर्देशक राकेश रोशन इस संदर्भ में कहते हैं - ‘मेरे हिसाब से वह आइटम साँग होगा, जिसका फ़िल्‍म की कहानी से कोई लेना-देना नहीं होगा।‘’ 06


आइटम साँग के बारे में यही बात हिन्‍दी चित्रपट जगत्‌ के सुप्रसिद्ध नृत्‍य निर्देशक (कोरियोग्राफ़र) अहमद ख़ान कहते हैं - ‘‘जिन गानों में कोई स्‍टोरी नहीं है, कोई कैरेक्‍टर नहीं है और जिन्‍हें केवल दर्शकों को एंटरटेन करने के लिए रखा जाता है, वे आइटम साँग की कैटेगरी में आते हैं।’’ 07 ये कभी सफल तो कभी असफल हो जाता है।

(द) कथासूत्र को रोचक एवं अनुशासित बनाए रखने हेतु - जिस प्रकार जीवन संगीतमय है उसी प्रकार चित्रपट भी संगीत से गुंफित ही सृजित किये जाते हैं। चित्रपटों में भी वास्‍तविक जीवन के समान ही, किसी के जीवन की अच्‍छी-बुरी घटनाओं, संघर्षों, उपलब्‍धियों, पराजयों आदि का चित्रण होता है।

लेकिन, जीवन की कथा, अथवा यों कहें कि, गति की कोई निर्धारित समय सीमा नहीं होती, परन्‍तु चित्रपट के सामने समय का एक बंधन तो होता ही है। कारण कि इस विधा का मूल हेतु मनोरंजन ही है, जो एक निश्‍चित समयसीमा तक ही प्रभावशील हो सकता है। इस समयसीमा के पूरा हो जाने के बाद प्रेक्षक ऊबने लगता है और यह ऊब निर्माता के व्‍यावसायिक व प्रसिद्धि प्राप्‍ति के उद्देश्‍यों को नष्‍ट कर सकती है।

इस सन्‍दर्भ में, चित्रपटों में गीतों की आवश्‍यकता को प्रतिपादित करते हुए सुप्रसिद्ध चित्रपट निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा कहते हैं कि -‘‘फ़िल्‍म में गाने रोमांटिक माहौल को उभारने के लिये या किसी ड्रामेटिक सिचुएशन को उभारने के लिये रखे जाते हैं।’’ 08

कई चित्रपटों में गीतों की भूमिका एक भावनायुक्त सू़त्रधार के रूप में होती है जिनके माध्‍यम से, चित्रपट की कथा के भावनात्‍मक ताने-बाने को, प्रेक्षकों के सामने एक मधुर और रुचिकर रूप में रख जाता हैं। जिससे प्रेक्षक कथा के मूल भाव से तो परिचित हो ही जाता है साथ ही उसके प्रस्‍तुतीकरण के प्रति जिज्ञासु भी हो जाता है।

‘‘रामराज्‍य’’ (1942) में राम द्वारा सीता को त्‍यागकर वन में भेज देने, उनके विरह, वन में सीता की जीवनचर्या और लव-कुश के जन्‍मादि प्रसंगों को अनावश्‍यक विस्‍तार से बचाने के लिए, परन्‍तु उनका पूर्णरूप से चित्रण दिखाने के लिए निर्माता ने एक मधुर गीत का सहारा लिया है -

‘‘अजब विधि का लेख, किसी से पढ़ा नहीं जाए।
राजमहल की रानी, फिर से बनोवास पाए।’’ (रामराज्‍य - 1942) 09

इसी प्रकार चित्रपट आपकी क़सम’ (1974) में नायक द्वारा जीवनभर किये जानेवाले पश्‍चाताप की अवधि को निर्देशक ने मात्र एक गीत में इस कुशलता से बाँधा है कि कुछ मिनिट का यह गीत नायक द्वारा नायिका पर ग़लत संदेह करने की पीड़ा, और जीवनभर स्‍वयं को दण्‍डित करते हुए, पश्‍चाताप में जलते रहने के भाव को इतनी सहज अभिव्‍यक्ति देता है कि उसे ऐसे ही सुनना भी मन को द्रवित कर जाता है। चित्रपट के संदर्भ में वह गीत कथासूत्र को तो बाँधे रखता ही है -

‘‘ज़िन्‍दगी के सफ़र में, गुज़र जाते हैं जो मक़ाम।
वो फिर नहीं आते, वो फिर नहीं आते।’’ (आपकी क़सम - 1974) 10

इस तरह के गीत न तो कथासूत्र को खण्‍डित करते हैं और न ही कथा को अनावश्‍यक रूप से, दर्शकों की ऊब की सीमा के पार जाने देते हैं।

(य) भारतीय फ़िल्‍म सेंसर बोर्ड का अंकुश - भारतीय फ़िल्‍म सेंसर बोर्ड का अंकुश भी भारतीय चित्रपटों में गीतिकाव्‍य की आवश्‍यकता को प्रतिस्‍थापित करता रहा है। जब भी पर्दे पर प्रणयी अंतरंगता को प्रदर्शित करते दृश्‍यों को दिखाया जाता है तो देश में सभ्‍यता सँस्‍कृति मर्यादा से संदर्भित एक विवादास्‍पद माहौल का निर्माण होने लगता है। इस प्रकार की विवादित स्‍थितियों का सामना करने से बचने के लिये, भारतीय चित्रपट सेंसर बोर्ड अपनी नीतियों का अंकुश चित्रपट निर्माताओं पर लगाये रखता है। ‘‘इनसाइक्‍लोपीडिया ऑफ़ हिन्‍दी सिनेमा’’ के अपने आलेख में गुलज़ार भी इसी बात को कहते है। 11

प्रसिद्ध चित्रपट गीतकार प्रसून जोशी इस संदर्भ में कहते हैं कि - ‘‘भारत की परम्‍परा ऐसी बन गई है कि नायक-नायिका का मिलन शारीरिक संदर्भों में दिखाना सही नहीं माना जाता। समाज इस तरह की अंतरंगता के सार्वजनिक प्रदर्शन की इजाज़त नहीं देता....ऐसे में सिनेमा क्‍या करे? इस परेशानी को दूर करने का काम फ़िल्‍मी गीतों ने किया है और वह भी बहुत सहज तरीक़े से।’’ 12

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए इसी लेख में प्रसून जोशी कहते हैं -‘‘याद करिए फ़िल्‍म प्‍यासा’ (1957) का गीत, ‘‘आज सजन मोहे अंग लगा लो, जनम सफल हो जाए...हृदय की पीड़ा, देह की अग्‍नि, सब शीतल हो जाए’’ (प्‍यासा-1957)13 इससे ज़्‍यादा साफ़ बात नहीं हो सकती।’’14 ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं है हमारे हिन्‍दी चित्रपट गीतिकाव्‍यों में।

साररूप में कहा जाए तो जब काव्‍य या गीतों के माध्‍यम से गहन ऐन्‍द्रिय प्रेम की बात की जाती है तो उस प्रस्‍तुति में एक शालीनता, एक गुरुत्‍व का प्रवेश हो जाता है। तात्‍पर्य यही कि जब अंतरंगता प्रदर्शन का विषय बनती है तो उसमें कलात्‍मकता तो होनी ही चाहिए। अंतरंगता के प्रदर्शन में कलात्‍मकता की उपस्‍थिति अंतरंगता को अधिक सहज रूप से गाह्य बना देती है। चित्रपट के संदर्भ में यह काम गीतिकाव्‍य के माध्‍यम से होता है।

2. भारतीय हिन्‍दी चित्रपट में गीतिकाव्‍य का उद्‌भव  -  

नाट्‌यचित्रपट का पूर्वरूप है। इस दृष्‍टि से चित्रपट में गीतिकाव्‍य के उद्‌भव संदर्भ तलाशने से पहले नाट्‌यमें गीतिकाव्‍य की परंपरा पर दृष्‍टिपात्‌ करना समीचीन होगा।

नाट्‌य-प्रयोग की दृष्‍टि से नाट्‌य में गीत की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए नाट्‌यशास्‍त्र के प्रणेता भरतमुनि कहते हैं कि जिस प्रकार चित्र की कल्‍पना विविध वर्णों के बिना नहीं हो सकती, उसी प्रकार नाट्‌य में रागका उद्‌भव बिना गीत के नहीं हो सकता है। 15

इसी आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारतीय नाट्‌य परंपरा नाट्‌य में गीत-वाद्य के प्रयोग का पूर्णरूपेण समर्थन करती है। ‘‘नाट्‌य में राग का संचार करने के लिए गीत-वाद्य का प्रयोग न केवल आरंभ और अन्‍त में अपितु मध्‍य में भी होता रहा है।’’ 16  भरतमुनि की दृष्‍टि से गीतवाद्य नाट्‌य की शैय्‍या है, इनके समुचित प्रयोग होने पर नाट्‌य-प्रयोग विपत्तिग्रस्‍त नहीं होता।17

महाकवि कालिदास विरचित तीनों नाटकों यथा - ‘अभिज्ञान शाकुन्‍तलम्‌,’18 विक्रमोर्वशीयम्‌19 एवं मालविकाग्‍निमित्रम्‌20 में गीतों का प्रयोग किया गया है। हर्ष विरचित नाटिका रत्‍नावलीमें द्विपादिका का गायन दो नारी-पात्रों द्वारा होता है।21 शुद्रक विरचित नाटक मृच्‍छकटिकम्‌में रोमिल के सम एवं स्‍फुट गीत की मनोहारिता में चारुदत्त का मन डूब जाता है।22

इस प्रकार वैदिक युग से आरंभ होकर, मध्‍य युग और वहाँ से, उन्‍नीसवीं सदी तक विस्‍तारित पूर्वी भारत का पारंपरिक लोक-नाट्‌य हो, अथवा मध्‍य भारत की रामलीलाऔर रासलीला’, अथवा, बंगाल की जात्रा’, महाराष्‍ट्र की ‘’ललित’, गुजरात की भवईया दक्षिण का भागवतम्‌’ ‘कथकली’, और यक्षगानहो, या राजस्‍थान की गवरी’, ‘ख्‍़यालआदि हों या फिर पाश्‍चात्‍य प्रभाव में पोषित पारसी रंगमंच 23 हो, सभी नाट्‌य परंपराएँ गीतिकाव्‍य के सांगीतिक प्रयोग से सतत्‌ आप्‍लावित रहीं हैं।

नाट्‌य-स्‍वरूप में बदलाव के लिए पारसी रंगमंच का समय ही वह बदलाव का समय है जहाँ से रंगमंच ने अपने दो सार्थक स्‍वरूप समाज के समक्ष प्रस्‍तुत किए। एक रूप तो सीधे-सीधे अपनी रंगमंचीय परंपराओं का निर्वहन करता रहा, परन्‍तु दूसरे ने अपनी अभिव्‍यक्ति के माध्‍यम में नवीन तकनीक को जोड़ा और सिनेमा24 बन गया।

नाट्‌य का वह रूप जो सिनेमा नहीं बना, वह विशुद्ध रंगमंच रहा, और वर्तमान में भी रंगमंच ही है। उसका अपना एक अलग इतिहास है। लेकिन, नाट्‌य का दूसरा रूप, जो सिनेमा बना, आरंभ में तो वह मात्र तकनीकी आधार पर ही सिनेमा बन सका जबकि उसके अन्‍य तत्त्व तो अपने मूल स्‍वरूप, पारसी रंगमंच के समान ही रहे। शुरुआती दौर में सिनेमा ने अपनी कहानियाँ, अपने अभिनेता, लेखक, सेट डिज़ाइनर, गीतकार, संगीतकार के साथ प्रर्दशन की सुविधाएँ 25 तक, सब कुछ पारसी रंगमंच से ही लिया।

14 मार्च, सन्‌ 1931 को भारत का पहला बोलता चित्रपट ‘‘आलमआरा’’ प्रदर्शित हुआ। 26 इस प्रथम बोलनेवाले चित्रपट ने अपनी वाचा खोलनेके साथ ही भारतीय नाट्‌य परंपरा का अनुसरण करते हुए गाना भी शुरु कर दिया। 27 के जाम पिला जा...’’ 7. ‘‘दाडब्‍ल्‍यू. एम. ख़ान (वज़ीर मोहम्‍मद ख़ान) के गाये गीत, ‘‘दे दे ख़ुदा के नाम पे प्‍यारे, ताक़त है गर देने की। कुछ चाहिए तो माँग ले उससे, हिम्‍मत है गर लेने की।’’ (आलमआरा - 1931) 28  से यह क्रम अनवरत रूप से जारी है।

साररूप में देखें तो वैदिक युग से वर्तमान काल तक के हज़ारों वर्षों के विस्‍तार में भारतीय रंगमंच अपनी विशिष्‍ट सांगीतिक परंपराओं के साथ फूलता-फलता रहा है। और, इसी के साथ भारतीय चित्रपट भी, इन्‍हीं नाट्‌य-परंपराओं द्वारा पल्‍लवित और पोषित रहा है, और आज भी है। यही कारण है कि वह भी अपने, कथा कहने की शैली में गीतिकाव्‍य और संगीत का अधिकारपूर्वक प्रयोग करता रहा है, कर रहा है। हमारी यही भारतीय नाट्‌य-परंपरा भारतीय चित्रपटों में गीतिकाव्‍य के प्रयोग-प्रवृति की गंगोत्री है।

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सन्‍दर्भ :-

01 ‘‘गीते प्रयत्‍नः प्रथमं तु कार्यः शय्‍या हि नाट्‌यस्‍य वदन्‍ति गीतिम्‌। गीते च वाद्ये च हि सुप्रयुक्ते नाट्‌य-प्रयोगो न विपत्तिमेत्ति’’/ नाट्‌यस्‍शास्‍त्र/ 22 - 441/ काव्‍यमाला-निर्णयसागर से प्रकाशित संपूर्ण नाट्‌यशास्‍त्र।
02 ‘‘एवं गीतं च वाद्यं च विविधाश्रयम्‌। अलातचक्रप्रतिमं कर्त्तव्‍यं नाट्‌योक्तृभिः’’/ नाट्‌यशास्‍त्र/ 28 - 7 काव्‍यमाला - निर्णय सागर से प्रकाशित संपूर्ण नाट्‌यशास्‍त्र।
03 In fact, before the movie rights are sold, the producers sell their music rights, and do make a lot of money on these sales/ 'hindi movie songs'/
04 fodhihfM;k&Filmi (Hindi: फ़िल्मी संगीत) is Indian popular music as written and performed for Indian cinema. Music directors make up the main body of composers; the songs are performed by playback singers and it makes up 72% of the music sales in India.[1].@
05 "An item song is a musical performance that has little to do with the film in which it appears, but is presented to showcase beautiful dancing women in very revealing clothes, to lend support to the marketability of tth film The term is commonly used in connection with Hindi, Tamil and Telegu cinema, to describe a catchy, upbeat, often sexually provocative dance sequence for a song in a movie."/ "Item Songs in Hindi cinema"/  http://en.wikipedia.org/wiki/Item_number
06 दैनिक भास्‍करके सिनेमा परिशिष्‍ट नवरंगमें दिनांक 19 अप्रेल, 2008 को प्रकाशित सुनील कुकरेती के लेख ‘‘सब आइटम है’’ से।
07 दैनिक भास्‍करके सिनेमा परिशिष्‍ट नवरंगमें दिनांक 19 अप्रेल, 2008 को प्रकाशित सुनील कुकरेती के लेख सब आइटम हैसे।
08 जाने-माने निर्माता-निर्देशक सुधीर मिश्रा के द्वारा लिये गये श्री यश चोपड़ा के साक्षात्‍कार का अंश/ यह साक्षात्‍कार दिनांक 10 जून, 2010 को रात दस बजे फ़ॉक्‍स हिस्‍ट्रीचैनल के एक कार्यक्रम मास्‍टरपीसके अन्‍तर्गत, प्रसारित हुआ था।
09 चित्रपट - तूफ़ान और दिया (1956)/ गीतकार - पं. भरत व्‍यास/ संगीतकार - वसंत देसाई/ स्‍वर - मन्‍ना डे। पूरे गीत के लिये यहाँ जाएँ - https://www.youtube.com/watch?v=up1rsSYPUf8
10 चित्रपट - आपकी क़सम (1974)/ गीतकार - आनंद बक्षी/ संगीतकार - राहुलदेव बर्मन/ गायक - किशोर कुमार। पूरे गीत के लिये यहाँ जाएँ - https://www.youtube.com/watch?v=F2LWZUjqVkU
11 "Howover in less accomplished hands, they may even when emotionally expressive , often be dregged down to the level of vulgarlized portrayals feelings and passion, especially sexual desire, which cannot be projected upfront owing to restrietions imposed by the censorhip coad and the pressures asserted prudish middle-class mores." "Encyclopaedia of Hindi Cinema"/ Under section Over view, the article is "Hindi Cinema through the Decades"/ Gulzar/ Page - 16
12 प्रसून जोशी/ ‘‘पर्दे पर क़रीबी दिखाने का ज़रिया हैं प्रेमगीत,’’/ रविवार, 14 फ़रवरी, 2010 को प्रकाशित - http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/paperweight/entry/पर-द-पर-कर-ब
13 चित्रपट - प्‍यासा (1957)/ गीतकार - साहिर लुधियानवी/ संगीतकार - सचिनदेव बर्मन/ गायिका - गीताबाली। पूरे गीत के लिये यहाँ जाएँ - http://www.youtube.com/watch?v=ziZqi-lpMaA  
14 प्रसून जोशी/ ‘‘पर्दे पर क़रीबी दिखाने का ज़रिया हैं प्रेमगीत,’’/ रविवार, 14 फ़रवरी, 2010 को http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/paperweight/entry/पर-द-पर-कर-ब  पर प्रकाशित।
15 ‘‘यथा वर्णादृते चित्रं न शोभा जननं गवेत्‌। एवमेव विना गीतं नाट्‌यं राग न गच्‍छति।’’/ नाट्‌यशास्‍त्र, 32 - 441.    
16 भरत और भारतीय नाट्‌यकला/ सुरेन्‍द्रनाथ दीक्षित, पृष्‍ठ-460.
17 ‘‘गीते प्रयत्‍नः प्रथमं तु कार्यः शय्‍या हि नाट्‌यस्‍य वदन्‍ति गीतिम्‌। गीते च वाद्ये च हि सुप्रयुक्ते नाट्‌य - प्रयोगो न विपत्तिमेत्ति’’/ नाट्‌यशास्‍त्र, 22-441/ काव्‍यमाला - निर्णयसागर से प्रकाशित संपूर्ण नाट्‌यशास्‍त्र।
18 अभिज्ञान शाकुन्‍तलम्‌/ महाकवि कालिदास/ प्रस्‍तावना में ग्रीष्‍म ऋतु को लक्ष्‍य कर नटी गीत प्रस्‍तुत करती है/ अंक 1 - 3 - 4.  
19 विकमोर्वशीयम्‌/ महाकवि कालिदास/ अंक 4 - 7.
20 मालविकाग्‍निमित्रम्‌/ महाकवि कालिदास/ अंक 2 - 4 में मालविका छलिक का प्रयोग गीतों माध्‍यम से ही करती है।
21 रत्‍नावली/ हर्ष/ अंक 3 - 13 - 15.
22 ‘‘रक्तं च तारमधुरं च समं स्‍फुटं च’’/ मृच्‍छकटिकम्‌/ शुद्रक/ अंक 3-1-4.
23 पारसी रंगमंच की शुरुआत सन्‌ 1854 से मानी जाती है। 05 मई, 1854 को बबंई गज़टऔर 06 मई को बॉम्‍बे टाइम्‍समें पहला विज्ञापन प्रकाशित हुआ था, जिसमें दो नाटकों श्‍यावक्ष की पैदाइशऔर तीख़े ़ाँके मंचन की सूचना थी/ दैनिक भास्‍करके रविवारीय परिशिष्‍ट रसरंग’ (22 नवंबर, 2009) में प्रकाशित सुप्रसिद्ध पत्रकार श्री राजकुमार केसवानी के कॉलम आपस की बातमें प्रकाशित लेख ‘...भूल में भूल, काँटों में फूलसे।
24 CINEMA=The production of films as an art or industry. "The Compact Oxford Reference Dictionary", Edited By:Catherine Soanes.
25 मुंबई के कई सारे सिनेमाघर उस समय इन नाटकों के लिए थियेटर का काम करते थे। जैसे, रॉयल अॉपेरा हाउस, इरोज़, नावेल्‍टी और एडवर्ड। दैनिक भास्‍कररविवारीय परिशिष्‍ट रसरंग’ (22 नवंबर, 2009) में प्रकाशित सुप्रसिद्ध पत्रकार श्री राजकुमार केसवानी के कॉलम आपस की बातमें प्रकाशित लेख ‘...भूल में भूल, काँटों में फूलसे।
26 ‘‘आलमआरा’’ का प्रर्दशन वर्तमान में मुंबई के मेजिस्‍टिक सिनेमा में 14 मार्च, 1931 को हुआ था।/ ‘‘भारतीय चलचित्र का इतिहास’’/ फ़िरोज़ रंगूनवाला/ पृष्‍ठ 69,  
27 आर्देशर ईरानी द्वारा निर्मित-निर्देशित भारत की प्रथम बोलती फ़िल्‍म आलमआरामें सात गीत थे -
1.‘‘दे दे ख़ुदा के नाम पे प्‍यारे...’’
2. ‘‘बदला दिलवाएगा या रब तू सितमगरों से, मदद पर है तो क्‍या ख़ौफ़ जफ़ाकारों से…”
3. ‘‘रुठा है आस्‍माँ, गुम हो गया माहताब...’’
दे ख्‍़ाुदा के नाम पे प्‍यारे,’’ 4. ‘‘तेरी कटीली निगाहों ने मारा, अदाओं ने मारा..."
5. ‘‘दे दे दिल को आराम, साक़ी ग़ुलफ़ाम...’’
6. ‘‘भर-भर के जाम पिला जा...’’
7. ‘‘दरस बिन मोरे हैं तरसे तरसे नैना प्यारे..."’’  
इन गीतों के संगीतकार थे फ़िरोज़शाह मिस्‍त्री और बहराम ईरानी/ दैनिक भस्‍कररविवारीय परिशिष्‍ट रसरंग’ (26 जून, 2011) में प्रकाशित सुप्रसिद्ध पत्रकार श्री राजकुमार केसवानी के कॉलम आपस की बातमें प्रकाशित लेख ‘‘...80 साल पीछे...जब गूँगा बोल उठा।’’
28 दैनिक भास्‍कररविवारीय परिशिष्‍ट रसरंग’ (26 जून, 2011) में प्रकाशित सुप्रसिद्ध पत्रकार श्री राजकुमार केसवानी के कॉलम आपस की बातमें प्रकाशित लेख ‘‘...80 साल पीछे...जब गूँगा बोल उठा।’’
                                                           
अतुल्‍यकीर्ति व्‍यास (शोधार्थी)
हिन्‍दी विभाग,
माणिक्‍यलाल वर्मा श्रमजीवी महाविद्यालय
जनार्दनराय नागर राजस्‍थान विद्यापीठ विश्‍वविद्यालय, उदयपुर।

09, सूर्यमार्ग जगदीश चौक उदयपुर, (राजस्‍थान) 313001
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