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मंगलवार, 30 जनवरी 2018

इक्कीसवीं दशक का मध्यवर्ग: डॉ. अरविन्द कुमार उपाध्याय


इक्कीसवीं दशक का मध्यवर्ग
डॉ. अरविन्द कुमार उपाध्याय*

इक्कीसवीं सदी के मध्यवर्ग को समझने के लिए हमें सर्वप्रथम नब्बे के दशक की परिस्थितियों का अवलोकन करना पड़ेगा। भारत में नब्बे के बाद हुए उदारीकरण ने मध्यवर्ग के विकास के लिए अनेक मार्ग प्रशस्त किए। कृषि और उद्योग क्षेत्र में उच्च दर से विकास हुआ। भारतीय अर्थ-व्यवस्था में इन दोनों क्षेत्रों का काफी हिस्सा है। नई शताब्दी में प्रौद्योगिक क्षेत्रों का काफी तीव्र गति से विकास हुआ। मेडिकल, कॉल-सेंटर इत्यादि ये संस्थान हजारों-लाखों युवकों के लिए लाभकारी सिद्ध हुए। सरकारी नौकरी की अपेक्षा यह पढ़ा-लिखा वर्ग निजी कामों को ज्यादा महत्त्व दे रहा है। कारण स्पष्ट है कि निजी कंपनियाँ इन्हें मोटे पैकेज पर काम दे रही हैं, जो सार्वजनिक क्षेत्रों में काम कर रहे लोगों के लिए संभव नहीं है।
            पवन कुमार वर्मा ने 21वीं दशक के मध्यवर्ग (यहाँ 21वीं दशक के मध्यवर्ग से तात्पर्य युवा-वर्ग से है न कि स्वतंत्रता के बाद के मध्यवर्ग से। जो आज भी एक हद तक परंपरावादी एवं जातीय संक्रमण से ऊपर उठ न सका है। यह युवा मध्यवर्ग कम-से-कम इन मुद्दों पर अपना खुलकर विचार रखने लगा है। वह जानता है कि समय तीव्र गति से बदल रहा है। समय की रफ्तार के साथ जो चीजें चल सकने में असमर्थ है उसे छोड़ने में ही भलाई है। आज का यह नया मध्यवर्ग इसी सोच का पक्षपाती है।) पर गंभीर विचार करते हुए ऐसे कुल छह कारण बताएँ हैं, जिससे इस नये मध्यवर्ग को विस्तृत रूप से समझा जा सकता है। पहला, मध्यवर्ग संख्या में उस हद तक पहुँच चुका है कि वह देश के चुनावी अंकगणित में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। दूसरे, संख्या में इस बढ़त ने इस वर्ग की आरंभिक एकरूपता पर फिर से काफी हद तक बल दिया है। इतिहास में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। इसने विशिष्ट पहचान वाले एक ऐसे वर्ग का गठन किया है जो महत्त्वपूर्ण ढंग से जातीय निष्ठाओं के परे जाता हुआ दिखाई देता है। तीसरा, बड़ी संख्या वाले इस वर्ग ने पहली बार वह पहचान अर्जित की है जिसकी प्रकृति अखिल भारतीय है। जिसका मतलब यह हुआ कि यह देश भर में एक पहचान योग्य इकाई की बड़ी तादाद का प्रतिनिधित्व करता है, जो पहले से अधिक है। चौथा, यह मध्यवर्ग कभी भी इतना युवा नहीं रहा है। बड़ी संख्या में इसके सदस्य 25 वर्ष की आयु के आस-पास हैं। पाँचवाँ, सूचना एवं संचार, साथ ही मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और 24 घण्टे के समाचार चैनलों की वजह से इस वर्ग की शक्ति में सच्चे अर्थों में क्रांतिकारी फर्क पड़ा है। छठा, पहले जहाँ इस वर्ग में अलग-थलग रहने की प्रवृत्ति थी अब उसमें फर्क आया है और ऐसे संकेत मिलने लगे हैं, हालांकि इसके उदाहरण अभी गिने-चुने ही हैं। इस वर्ग ने ऐसे मुद्दों के प्रति संलग्नता दिखाई है जो इसके तात्कालिक हितों तक ही सीमित नहीं है। और आखिर में पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि शासन की असफलता को लेकर, अर्थ-व्यवस्था के कु-प्रबंधन को लेकर तथा भ्रष्टाचार, नकारात्मकता, आदर्शवाद की कमी एवं राजनीतिक वर्ग तथा उससे साँठ-गाँठ रखने वालों के नैतिक दिवालिएपन को लेकर भारतीय मध्यवर्ग इतने गुस्से में रहा हो। ये छह कारण मध्यवर्ग के चरित्र, प्रभाव, भूमिका एवं संभावनाओं में गुणात्मक बदलाव को दर्शाते हैं।” (पवन के. वर्मा, प्रभात रंजन (अनु.), भारत का नया मध्य-वर्ग, पृ. 12) निश्चित् रूप से ये छह कारण आज के मध्यवर्ग को समझने के लिए काफी अहम और पर्याप्त है।
            हम देखते हैं कि स्वतंत्रता के बाद भारतीय मध्यवर्ग देश की आबादी का एक सीमित भाग था। जो यह माना जाता है कि औपनिवेशिक काल में यह वर्ग अंग्रेजों के मेल-जोल से बना था। बाद के दिनों में शिक्षा और औद्योगिक विकास के फलस्वरूप मध्यवर्ग के विकास में गति दिखाई दी। औद्योगीकरण के साथ उससे जुड़े लौह एवं इस्पात, आलौह धातुओं, भारी रसायन, भारी इंजीनियरिंग और मशीन-निर्माण उद्योगों को बढ़ावा देने तथा आत्म-निर्भर एवं स्फूर्ति अर्थ-व्यवस्था के साथ कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। पंचवर्षीय योजनाओं और राज्य की महती भूमिका से देश में विकास की गति तेज हुई। इन सारी परिस्थितियों ने मध्यवर्ग को बढ़ने और उसकी आकांक्षा की पूर्ति में एक हद तक सराहनीय योगदान दिया।
            राजनीतिक और सामाजिक हित को ध्यान में रखते हुए भारतीय राजनीतिकों ने दो सिफारिशों को लागू किया जिससे नये मध्यवर्ग को उभरने में पूरा मौका मिला। पहला - मण्डल आयोग (07 अगस्त, 1990) के लागू होने से आरक्षण का लाभ लेकर नौकरी प्राप्त एक ऐसे नव-मध्यवर्ग का उदय हुआ जो पहले के मध्यवर्ग से काफी भिन्न था। पहले के मध्यवर्ग का आदमी ज़्यादातर सवर्ण था या बना रहा। जाति और धर्म से इतर काम करने में उसके मन में संकोच था। संविधान की किताब में अनुसूचित जाति बन चुके आछूतों के प्रति मध्यवर्ग का रवैया उन्हें किसी तरह सहन करने या उनकी उपेक्षा करने के बीच झूलता रहता था। वह अनुसूचित जातियों के प्रति खुला वैरभाव इसलिए नहीं दिखा सकता था कि कहीं उनकी आधुनिकता पर प्रश्न-चिह्न न लग जाए, लेकिन निजी दुनिया में गांधी के हरिजन अब भी उसके लिए चमार से ज्यादा कुछ नहीं थे। इस प्रवृत्ति के कुछ अपवाद भी थे, पर मध्यवर्ग की संपूर्ण व्यवहार-शैली पर उनका कोई असर नहीं था। वह कुछ इस तरह से सोचता था कि महात्मा जी मध्यवर्ग के नाम पर अतिशूद्रों की भलाई के लिए पहले ही काफी कर चुके हैं, अब तो आजादी मिल चुकी है इसलिए गांधी जी के महान कार्यों की सराहना करते हुए सरकार चलाने के असली काम में जुट जाने का है। गांधी जी द्वारा डाले गए नैतिक दबाव का लाभ इतना जरूर हुआ कि उससे समाज की कठोरता थोड़ी-बहुत पिघलीं और अनुसूचित जातियों को प्रोत्साहन देने की सरकारी नीति की खुल कर निंदा से परहेज किया गया।” (पवन कुमार वर्मा, अभय कुमार दुबे (अनु.), भारत के मध्यवर्ग की अजीब दास्तान, पृ. 52-54) लेकिन यह नया मध्यवर्ग इस मानसिकता से काफी आगे बढ़ चुका है। वह जानता है कि ये पारंपरिक सोच उसकी प्रगति के लिए सबसे बड़ी बाँधा है। फिर भी जाति-व्यवस्था भारत में हजारों सालों से है। वह इतने जल्दी खत्म होने वाली नहीं है। भारतीय संविधान भले ही समानता की बात करता है लेकिन आज भी ज़्यादातर मध्यवर्ग जातीय भाव-बोध से ऊपर नहीं उठ सका है। हम देखते हैं कि प्रत्येक रविवार भारत के बड़े-बड़े अखबारों में ज़्यादातर मध्यवर्ग के वैवाहिक विज्ञापन छपता है। इस वैवाहिक विज्ञापन में बहुतायत लोगों की यह माँग होती है कि वह अपनी जाति-विशेष में ही शादी करेंगे। निश्चित् रूप से यह पढ़ा-लिखा, नौकरी-पेशे से जुड़ा हुआ वैश्वीकरण का मध्यवर्ग है जो एम. बी. ए., डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक तथा कॉल-सेंटर में चौबीसों घन्टे  काम करने वाला युवक है। एक तरफ धर्म तथा उससे जुड़े हुए संस्थान तथा बाबा की वह खुलकर निंदा करता है तो वहीं दूसरी तरफ इन जगहों पर कतार में खड़े यही वर्ग ज़्यादातर दिखाई देता है। धर्म के तथाकथित ठेकेदार इन्हें कब एक नीजि सेना के रूप में तैयार करते हैं – इसका इन्हें भान भी नहीं रहता। जब इनकी असलियत की पोल खुलने लगती है तब यही नीजि सेना (अंध भक्त) इनकी सुरक्षा का कवच बन जान देने या लेने के लिए तत्पर हो जाती है। हाल की घटनाओं में आसाराम, रामपाल और राम-राम इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है।
            हालांकि धर्म और जाति की कठोरता इनमें अब पहले जैसा नहीं है। वैश्वीकरण के बाद मध्यवर्ग के ऊपर जाति की पकड़ कमजोर हुई है। इसके पीछे कारण यह है कि काम की तलाश के लिए इस वर्ग का आवागमन एक स्थान से दूसरे स्थान को सुनिश्चित हुआ है। इसी तरह आधारभूत शिक्षा के विस्तार एवं अर्थ-व्यवस्था का हर जगह विकास से मध्यवर्ग को अपने गृह नगर से दूर जाना पड़ा। स्वाभाविक है कि जाति की पकड़ तब और मजबूत होती है जब व्यक्ति अपने स्थान-विशेष पर रहता है। किंतु जब वे बाहर रहकर सामूहिक रूप से नौकरी इत्यादि करते हैं तो उनमें जाति की कठोरता कम होती है। अपने परंपरागत चीजों के प्रति उनमें पहले की भाँति मोह दिखाई नहीं पड़ता है।
            दूसरा मध्यवर्ग के बदलाव का अहम एवं मुख्य कारण है – 1991 में हुए उदारीकरण। उदारीकरण से तात्पर्य है कि विश्व बाजार के लिए भारतीय बाजार का द्वार खोलना। कोटा-परमिट राज को सुगम बनाया गया। जिससे संपन्न देशों द्वारा भारत में बड़ी मात्रा में निवेश किया गया। वैश्वीकरण ने पूरी दुनिया को एक छोटे से ग्राम में तब्दील कर व्यक्ति को बाजार केंद्रित कर दिया है। प्रो. आनंद कुमार के अनुसार Globalization can be defined the compression of time and space beyond the nation state. It is a multidimensional process which has taken shape around market centric democracies in last two decades in the modern world system. It has economic, political and Socio cultural components, which are unevenly developed in different parts of the word. (Prof. Anand Kumar. “Globalization and Poverty: Some Notes “A Research Paper for International Seminar on Globalization & Poverty; Organized by M. G. Kashi Vidyapeeth, Varanasi, 4-6 Dec, 2004. Souvenir, edited by Ravi Prakash Pandey. वैश्वीकरण आधुनिक साधनों और ज्ञान-विज्ञान के सहारे आगे बढ़ा है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वैश्वीकरण का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। वैश्वीकरण के विस्तार में सूचना प्रौद्योगिकी की महती भूमिका रही है। कम्प्यूटर, इंटरनेट, टेलीफोन, मोबाइलफोन, मल्टीमीडिया आदि जैसी सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति की वजह से वैश्वीकरण को बल मिला। वैश्वीकरण एक नए समाज को विकसित करने का माध्यम भी है। इस नए समाज को सूचना-समाज के नाम से जाना जाता है। सूचना तकनीक से ‘लैश’ यह समाज राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए प्रयत्नशील है।    
            इक्कीसवीं सदी में सबसे आश्चर्य करने वाली जो बात है - वह यह कि मध्यवर्ग में अखिल भारतीय पहचानों वाला उदय हुआ है। यह राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा है न कि जाति अथवा समुदाय-विशेष का। वैसे अखिल भारतीय स्तर पर पहचान बनाने की गति धीमी रही है। किंतु आधुनिक संचार साधनों जैसे रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, समाचार चैनल (24×7), सोशल मीडिया आदि ने इस वर्ग को शक्तिशाली बनाने में काफी मदद की है। यह आधुनिक मध्यवर्ग इन चीजों से प्रभावित होकर अपने जातीय-विशेष चिन्ह के दायरे से बाहर निकल कर एक समान कपड़े अर्थात् सूट-टाई, जींस तथ टी-शर्ट में दिखाई पड़ते हैं। पवन कुमार वर्मा ने इस संदर्भ में लिखा है – “जाति की जगह दिखने वाली पहचानों की जगह अधिकांश शहरी हिंदुस्तानी और खासकर युवा एक समान भाव से सफारी सूट और सलवार कमीज या टी-शर्ट एवं औपचारिक कपड़ों में दिखाई दे जाते हैं। सबसे बढ़कर, समस्त मध्यवर्ग उपभोक्तावादी लहर की गिरफ्त में है जो जातीय शुद्धताओं को बचाने के बजाए भौतिक सफलता पर अधिक जोर देता है। लोग अपार्टमेंट में बिना इस बात को जाने फ्लैट खरीदते हैं कि बगल में कौन रहता है; बाजार में जो मिलता है वे उसे खरीदते हैं, चाहे उनको नौकरी देने वाला किसी भी जाति का हो; वे उस वस्तु का उत्पादन करते हैं जो बिकता है, बाजार में जो मिलता है वे उसे खरीदते हैं, और इस बात की परवाह नहीं करते कि उनकी जाति में किस चीज की मनाही है। यह मध्यवर्ग, जो अवसरों को देखता रहता है और ऊपर की ओर बढ़ रहा है, ऊर्जा से भरपूर इस वर्ग के पास उन पुरानी परंपराओं के लिए कोई समय नहीं है जो उसके रास्ते में हैं।” (पवन कुमार वर्मा, प्रभात रंजन (अनु.), नया मध्य-वर्ग, पृ. 15-16) दरअसल यह वर्ग अब जाति-विशेष के दायरे से बाहर निकल चुका है। उसके लिए मंदिर और मस्जिद वहीँ तक ठीक है जहाँ तक उसकी शांति और विकास में बांधक नहीं है। हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह वर्ग इस मानसिकता को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है। आज भी शहरों और कस्बों में इस तरह के लोग प्राय: मिल जायेगे जो अपनी जाति और धर्म-विशेष की बड़ाई करते थकते नहीं है। फिर भी छोटे पैमाने पर ही सही किंतु इसके खिलाफ लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया किसी-न-किसी माध्यम से देना शुरू कर दिया है। हम देखते हैं कि अयोध्या के विवादित बाबरी मस्जिद के ऊपर हाईकोर्ट के फैसले पर लोगों ने सामान्य प्रतिक्रिया दी। लोगों ने बहुतायत रूप में इस बात को स्वीकार किया है कि बाबरी विध्वंस स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे बड़ी परिघटना है। भविष्य में इस तरह की दुबारा पुनरावृत्ति न हो इसके लिए सरकार को कोई ठोस कदम उठाने चाहिए। कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कहा कि इस मंदिर-मस्जिद का विवाद कुछ चंद लोगों द्वारा अपने फायदों के लिए फैलाया जा रहा है। उनका मानना है कि इस विवादित ढाँचे की जगह सरकार को एक बड़े हॉस्पिटल का निर्माण करवा देना चाहिए। जहाँ प्रत्येक धर्म और जाति के लोगों का इलाज हो सके। हालांकि यह समस्या का समाधान नहीं है। यदि यह संभव भी है तो भविष्य में उन्हीं उन्मादियों द्वारा किसी मंदिर अथवा मस्जिद को गिराकर यह तर्क दिया जाने लगेगा कि यहाँ पर अस्पताल अथवा स्कूल खोल दिये जाएँ। इससे लोगों के मन में एक-दूसरे के प्रति फैली नफरत की आग कम नहीं होगी। फिर भी इस तरह की प्रतिक्रिया देने वाला यह नया मध्यवर्ग ही है। वह जानता है कि मनुष्य की मुख्य समस्या रोजी-रोटी है न की मंदिर-मस्जिद।        
            इक्कीसवीं सदी के इस मध्यवर्ग की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति, रुचियाँ तथा व्यवहार उसकी आवश्यकताओं के आधार पर निर्धारित होते हैं। यह परंपरागत चीजों की अपेक्षा कुछ नया करने के लिए तत्पर रहता है। आचार-विचार, संस्कृति, परंपरा, धर्म और आशा उसके लिए वहीं तक सही एवं जायज है जहाँ तक उसके विकास में ये सहायक है। वरना उसके लिए ये सारी चीजें निरर्थक हैं। वह इनमें जकड़ा रहना नहीं चाहता है। क्योंकि उसे इस बात का डर भी है कि कहीं उसकी प्रगतिशीलता पर लोग प्रश्न-चिन्ह न लगा दें।
            भारतीय जनगणना 2011 ने विश्व-समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा है। क्योंकि किसी देश के विकास की ऊर्जा की शक्ति उसके नव-युवकों में अत्यधिक होती है। इस गणना के अनुसार – भारत वर्तमान में जनसंख्या के पचास प्रतिशत पच्चीस वर्ष से कम उम्र के लोगों का है। दुनिया में भारत सबसे बड़ा युवाओं वाला देश है। यह भारत के विकास के लिए बहुत बड़ी परिघटना है। क्योंकि युवा आबादी का यह अत्यधिक भाग शिक्षित और महत्त्वाकांक्षाओं से परिपूर्ण है। उसकी आवश्यकताएँ इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी स्वयं की जरूरत क्या है? न कि उसके लिए पहले से बने-बनाए नियम-कानून।
            आर्थिक सुधारों की वजह से संचार-क्रांति में काफी प्रगति हुई है। पहले जहाँ कम दरों पर लैंडलाइन के कनेक्शन दिए गए, वहीं अब टेलिकॉम कंपनियों की आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण सस्ती काल ने लोगों को मोबाइल फोन के प्रति आकर्षित किया है। रिलायंस और साफ्टवेयर प्रदाता कंपनी (शायद बिल गेट्स) की यह भविष्यवाणी आज साकार होते दिखाई दे रहा है। भारत की बहुसंख्यक जनसंख्या के पास आज मोबाइल फोन है। उसमें भी जिसकी उम्र 25-30 के करीब है (खासकर पढ़ा-लिख युवा मध्यवर्ग) वह आधुनिक तकनीक से सुसज्जित मोबाइल फोन का इस्तेमाल करता है। फोन कॉल के साथ ही साथ इंटरनेट का भी प्रयोग यह मध्यवर्ग कर रहा है। सोशल मीडिया फेसबुक, टि्वटर, जी-मेल था ह्वाट्सऐप आदि में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। संचार के इन त्वरित माध्यमों ने उस कल्पना को साकार किया है जो पहले नामुमकिन दिखाई पड़ते थे। निश्चित् रूप से सोशल मीडिया के इन माध्यमों ने भौगोलिक सीमा और समय की दूरी को कम किया है। कम समय में लोग अपनी बात या संदेश को एक से अधिक व्यक्तियों तक आसानी से चंद सेकंडों में भेज सकते हैं और फीडबैक भी प्राप्त कर सकते हैं।
            यह मध्यवर्ग इलेक्ट्रानिक मीडिया तथा सोशल मीडिया को चौबीस घंटे में कम से कम एक बार उपयोग करता है। यही कारण है कि देश-दुनिया की घटनाओं, समस्याओं तथा जन-सैलाब की तस्वीर या सूचनाओं की जानकारी आसानी से प्राप्त कर लेता है। इस तरह की घटनाओं आदि पर वह अपनी प्रतिक्रिया अथवा विरोध दर्ज भी करा सकता या कर रहा है। हाल ही के वर्षों में दो महत्त्वपूर्ण घटनाओं (निर्भया काण्ड और अन्ना-आंदोलन) में भारी मात्रा में जन-सैलाब के उभार में इन माध्यमों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। निर्भया काण्ड – जो मध्यवर्ग से जुड़ा हुआ मामला था पूरे मध्यवर्ग की अंतश्चेतना को झकझोर कर रख दिया। यही वजह है कि दिल्ली में दिसंबर के सर्द महीने में लोगों ने इस घटना के विरोध में अपने घर से निकल पड़े। इसका विरोध दिल्ली में ही नहीं अपितु पूरे भारत में यहाँ तक कि विश्व-समुदाय ने भी इस अमानवीय घटना पर दुख और विरोध प्रकट किया।
            इसी तरह अन्ना द्वारा चलाए गए भ्रष्टाचार मुक्त भारत और लोकपाल बिल के लिए किए गए आंदोलन में सोशल मीडिया का सराहनीय योगदान रहा है। इस आंदोलन की जो सबसे बड़ी खासियत थी वह यह कि इसमें लगभग समान रूप से नौजवान लड़के-लड़कियों की सहभागिता रही है। आंदोलन के पक्ष में इलेक्ट्रानिक मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक काफी गंभीर बहसें हुई। लोकप्रिय सोशल साइटों जैसे फेसबुक, टि्वटर और ह्वाट्सऐप पर लोगों ने आंदोलन को जायज मानते हुए व्यवस्था को दोषी ठहराया। आंदोलन के पीछे इतने व्यापक पैमाने पर लोगों का इकट्ठा होने और वह भी देश की राजनीतिक सत्ता केन्द्रों (संसद भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय और इंडिया गेट आदि) पर अपने गुस्से तथा विरोध का इजहार करना दरअसल मध्यवर्ग की स्वार्थ की लड़ाई थी। हम देखते हैं कि निर्भया-कांड से लेकर अन्न्ना-आंदोलन तक जो भीड़ सरकार तथा व्यवस्था के खिलाफ इकट्ठा हुई उसमें ज़्यादातर पढ़े-लिखे नौजवान थे। जिनकी उम्र 25-30 के करीब थी। यह वर्ग जिस तरह से सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुटता दिखाई है उससे भारतीय राजनीति में काफी प्रभाव पड़ा है। लोगों ने लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी से इतर एक ऐसी पार्टी को अपना बहुमत दिया जिस पर सांप्रदायिकता के आरोप-प्रत्यारोप लगते रहे हैं। एक ऐसी पार्टी जिसका वजूद संघ के नेतृत्व से जुड़ा हुआ है। वही संघ महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे का पैरोकार भी रहा है. किंतु यह जो नया मध्यवर्ग है उसे विकास चाहिए। वह अतीत की घटनाओं से सबक तो लेता है लेकिन उसे सिर पर रख कर ढोने के खिलाफ है। यही कारण है तात्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के मॉडल से यह वर्ग अवीभूत था। गुजरात की तरह उसे पूरे भारत में विकास चाहिए। भाजपा इस मनोविज्ञान को भलीभाँति समझ रही थी। उसे यह पता था कि भारत युवाओं वाला देश है। इस युवा मध्यवर्ग की जरूरत रोजगार है। वह जानता है कि गुजरात में आधारभूत संरचना के विकास में मोदी की सराहनीय भूमिका रही है। इसलिए भाजपा ने अटल और आडवाणी के विकल्प के रूप में नरेंद्र मोदी को अपना नेता मानकर चुनाव मैदान में उतारा। नरेंद्र मोदी चुनाव के दौरान अपने भाषण में वर्तमान सरकार की नीतियों और भ्रष्टाचार और रोजगार को प्रमुख मुद्दा बनाया। उन्हें यह बात पहले से ही पता था कि जनता को चाहिए क्या?  नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव के दौरान पंद्रह लाख देने, एक सैनिक के बदले दस पाकिस्तानी सैनिक का सिर काट लेने और चीनी सामान के मुद्दे पर जनता को जो सब्जबाग दिखाया - परिणामस्वरूप कांग्रेस पार्टी के इतिहास में इतनी बुरी हार कभी नहीं हुई थी जितनी 2014 के लोकसभा के चुनाव में।
            नब्बे के बाद हुए आर्थिक सुधारों की वजह से बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन हुआ। नौकरियों के नये अवसरों का इस वर्ग ने काफी लाभ उठाया। सार्वजनिक क्षेत्रों की अपेक्षा नीजि क्षेत्रों में यह मध्यवर्ग मोटे पैकेज पर काम करने लगा। किंतु अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मंदी से भारत भी अछूता नहीं रहा। भारत का विकास दर जहाँ  पाँच प्रतिशत से भी नीचे जाने की उम्मीद है, वही बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट कंपनियों से इनकी छटनी भी की जाने लगी है। हाल में लिए गए सरकार के दो अहम् फैसले (नोटबंदी और जीएसटी) मध्यवर्ग के लिए काफी कष्टकारी रहा है। नोटबंदी ने जहाँ इन्हें महीनों लाईन में खड़ा कर दिया वहीं जीएसटी ने छोटे मध्यवर्गीय कारोबारियों को लगभग बेरोजगार की श्रेणी में कर दिया है। बाज़ार के इस अर्थशास्त्र के गणित को मध्यवर्ग अभी तक समझ नहीं पाया है कि इससे देश का हित कितना हुआ है?      
            नये मध्यवर्ग के भविष्य की कार्य-योजनाओं और चिंता को लेकर पवन के. वर्मा ने लिखा है कि – “यह भविष्य में क्या दिशा लेगा? क्या इसका गुस्सा और इसकी संभावना किसी नाटकीय, क्रांतिकारी, रचनात्मक बदलाव को संभव कर पाएगी? या दिशाहीन, छिटपुट रूप से अपने गुस्से का प्रदर्शन करती रहेगी बिना किसी वैकल्पिक दृष्टिकोण के? क्या यह खेल बदलने वाला साबित होगा? ये सवाल महत्त्वपूर्ण हैं जो नये मध्यवर्ग के सामने बने हुए हैं। और यह अपने कर्तव्यों के मामले में असफल साबित होगा अगर वह रुककर, आत्मनिरीक्षण और इन सवालों पर विचार नहीं करता है।” (पवन के. वर्मा, प्रभात रंजन (अनु.), भारत का नया मध्य-वर्ग) पवन कुमार वर्मा का यह प्रश्न इस रूप में भी जायज है कि आज का यह नया मध्यवर्ग बिना किसी दिशा-निर्देश के भटकाव की स्थिति में है। यही वजह है कि राजनीतिक भ्रष्टाचार एवं असामाजिक जैसे मुद्दे को किसी व्यक्ति द्वारा उठाए जाने पर यह अपने घरों से बाहर निकल कर व्यापक रूप में विरोध करना शुरू कर देता है। लेकिन सवाल यह है कि इन समस्याओं को पहले उठाए कौन? उसके सामने ऐसा कोई विशाल व्यक्तित्व नहीं है जिसके आचरण का पालन कर वह आगे बढ़ सके। जिन व्यक्तियों ने उसके मुद्दे को आधार बनाकर कभी सड़कों पर उतरे थे वही आज भारतीय राजनीति के मुख्य अंग बनकर उन्हीं पर शासन करने लगे हैं। वरना क्या कारण था कि अन्ना के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलने वाले लोग स्वयं की पार्टी बनाकर अपने आपको अलग कर लिए। कुछ इससे भी आगे निकले। अन्ना ने जिन लोगों के साथ व्यवस्था की गलत नीतियों के खिलाफ आंदोलन किया था वही आज उन्हीं पार्टियों के झण्डा-वरदार हो गए। यह नया मध्यवर्ग इन चीजों को भलीभाँति जानता है। फिर भी विकल्पहीनता की स्थिति में यह उनका समर्थन करता है। वरना क्या कारण है कि दिल्ली की 49 दिन की सरकार को दुबारा पूर्ण बहुमत मिलता है?
सहायक प्रोफेसर
श्री गुरु माधवानंद पी.जी. कॉलेज, रूपबास
भरतपुर (राजस्थान)
ई-मेल  : arvindkumar.hindi@gmail.com
मो. : 8796729610, 9413129610
[साभार: जनकृति पत्रिका, अंक- अक्टूबर-दिसंबर 2017]


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