आधुनिक राष्ट्रवाद का छद्मवादी स्वरूप: डॉ. अरविन्द कुमार उपाध्याय - विश्वहिंदीजन

अभी अभी

अंतरराष्ट्रीय हिंदी संस्था एवं हिंदी भाषा सामग्री का ई संग्रहालय

अपील

सामग्री की रिकॉर्डिंग सुनने हेतु नीचे यूट्यूब बटन पर क्लिक करें-

समर्थक

पुस्तक प्रकाशन सूचना

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

आधुनिक राष्ट्रवाद का छद्मवादी स्वरूप: डॉ. अरविन्द कुमार उपाध्याय





आधुनिक राष्ट्रवाद का छद्मवादी स्वरूप
डॉ. अरविन्द कुमार उपाध्याय*

उत्तर आधुनिक ने ‘राष्ट्रवाद’ को भी विमर्शीय बना दिया है. राष्ट्रवाद विषय अथवा अवधारणा पर बातचीत/कार्य के माध्यम से किसी अन्य अभिलक्षित सिद्धांत या विचारधारा तक पहुँचने की प्रक्रिया का नाम है. राष्ट्रवाद सतत् चलने वाली प्रक्रिया है, जो विमर्शित विषय को कई रूपों के माध्यम से किसी लक्ष्य तक पहुँचने का कारण बनता है. इस संदर्भ में यह अपने परंपरागत स्वरूप या पहचान  से अलग एक नई पहचान की छवि को स्थापित करता रहता है. राष्ट्र का अस्तित्व, राष्ट्र में रह रहे लोगों के अधिकार और उसकी अस्मिता आदि के प्रति गंभीर तथा चिंतित होना ‘राष्ट्रवादी’ होने का परिचायक है.           
इक्कीसवीं शती में राष्ट्रवाद को लेकर पूरी दुनिया में हाय-तौबा मचा हुआ है. दक्षिणपंथ, वामपंथ से लेकर अन्य क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों ने अपने-अपने तरीके से राष्ट्रवाद को परिभाषित करने की कोशिश की है. राष्ट्रवाद को लेकर लगभग आम-सहमति होने के बावजूद भी उसके अर्थ में सहमति दिखाई नहीं देती. उसके अवधारणात्मक अर्थ को लेकर गंभीर मतभेद है. फिर भी राष्ट्रवाद आज के समय में इतना महत्त्वपूर्ण हो गया है कि हर राजनीतिक पार्टियाँ इसे अपने-अपने तरीके से परिभाषित/व्याख्यायित करने की कोशिश कर रही हैं.
राष्ट्रवाद अपने राज्यीय स्वरूप से लेकर वर्तमान राष्ट्रीय राज्य तक किसी न किसी रूप में संगठन अथवा व्यक्तियों को प्रभावित करता रहा है. फिर भी जिस राष्ट्रवाद के स्वरूप की हम आगे चर्चा करेंगे – वह आधुनिक युग की देन है. अंग्रेजी शब्द ‘NATION’ की उत्पत्ति लेटिन भाषा के ‘NESHIYON’ शब्द से हुई है. जो राष्ट्र शब्द को परिभाषित करती है. हालांकि प्रारंभिक समय में इसे एक भौगोलिक सीमा में रह रहे लोगों के रूप में परिभाषित किया गया था. इसके पीछे कारण यह रहा है कि देश विभिन्न राजा-रजवाड़ों में बँटा था. अपनी सीमा को प्रत्येक शासक एक राष्ट्र के रूप में परिभाषित करते हुए दिखाई पड़ते हैं. किंतु, ‘आधुनिक राष्ट्र’ के विषय में यह धारणा तर्क-संगत नहीं है. किसी राष्ट्र में राजनीतिक विचारधारा का तत्त्व समाहित रहता है. उसी के अनुसार राष्ट्र के अर्थ में भी परिवर्तन होता रहता है. जॉन स्टुअर्ट मिल ने राष्ट्र को परिभाषित करते हुए कहा है कि – “ राष्ट्र मनुष्य जाति का ऐसा भाग है जो एक-दुसरे के प्रति सहानुभूति से बँधा हुआ एक सरकार के अधीन रहने की प्रबल इच्छा रखता हो.” अर्थात् राष्ट्रीयता सामूहिक भावना को अभिव्यक्त करने का माध्यम है.
राष्ट्रवाद की अवधारणा में एक बात स्पष्ट है कि जो विचार राष्ट्र के हित में होता है – वह राष्ट्रवाद है. जिसका चिंतन-अनुचिंतन राष्ट्र की प्रगति के लिए हो – वह राष्ट्रवादी कहलाता है. राष्ट्रवाद किसी धर्म, जाति, संप्रदाय, वर्ग अथवा राजनैतिक आदि के लिए एक महत्त्वपूर्ण विचारधारा है. वह सवा अरब भारतीयों के अच्छे कार्यों के परिणामस्वरूप अर्जित उदात्त भावना का समेकित स्वरूप है. राष्ट्रवाद हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई आदि की धारणा को स्वीकार न कर बल्कि ‘मनुजत्व’ का दर्शन संपूर्ण भारत/लोक में प्रसारित करता रहता है. यह जनतंत्र में मौजूद विकृतियों एवं असमानताओं को कम करके सामाजिक समानता को बढ़ाता है. मोहिंदर सिंह ने इस संदर्भ में लिखा है कि – “भारतीय राष्ट्रवाद ने भारत की संप्रभुता का दावा भारत के लोगों की एकता के नाम पर किया था. राष्ट्र की एकता के प्रश्न को लेकर चिंता सभी राष्ट्रवादी विचारकों और नेताओं के विमर्श के केंद्र में थी. देश की एकता से जुड़ा प्रश्न उसकी अलग पहचान का भी था. यह काम इस देश में मौजूद तमाम सामाजिक विभाजनों और सांस्कृतिक तथा धार्मिक विविधताओं के बावजूद देश की एकता को स्थापित करता था ... एक राजनीतिक समुदाय के रूप में भारतीय राष्ट्रवाद, यानि उसकी काल्पनिक एकता का सिद्धांत भारत में ‘जन’ की अवधारणा को समझने के लिए अब भी उतना ही प्रासंगिक है – जितना पहले था.” फिर भी आधुनिक समय में राष्ट्रवाद पर विविध दृष्टिकोणों से विचार-विमर्श कर इसे व्याख्यायित करने की कोशिश की जाती रही है. इसलिए इसके स्वरूप में भी भिन्नता रहता है. ‘इनमें रुढ़िवादी राष्ट्रवाद, उदारवादी राष्ट्रवाद, जनवादी राष्ट्रवाद, एकाधिकारवादी राष्ट्रवाद और मार्क्सवादी राष्ट्रवाद आदि प्रमुख हैं.’
राष्ट्रवाद का प्रारंभिक स्वरूप हमें फ्रांस की राज्य-क्रांति से दिखाई पड़ता है. राष्ट्रवादी विचारधारा यही से गतिशील होते हुए अपना स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व के रूप में अमेरिका, पोलेंड और स्वीडेन आदि देशों तक विस्तार पाता गया. गुलाम राष्ट्रों के लिए यह एक स्वाभिमान का मुद्दा बना. जिससे वे स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व के लिए संघर्षरत हुए. भारत में भी 1857 ई. की क्रांति को इसी राष्ट्रवाद के स्वाभिमान की लड़ाई माना गया. हालांकि इस लड़ाई को एक सैनिक-विद्रोह के रूप में परिभाषित करने की कोशिश की गयी थी. फिर भी आंदोलन की प्रवृत्ति को देखते हुए उसके ‘राष्ट्रीय चेतना’ से इनकार नहीं किया जा सकता.
राष्ट्र के निर्माण में जिन व्यक्तियों, संस्थाओं अथवा तत्त्वों का सहयोग होता है, वे सभी किसी न किसी रूप में राष्ट्रवाद के सहायक होते हैं. उनके आपसी सहयोग से एक बेहतर राष्ट्र की कल्पना की जा सकती है. भाषा-बोली, आचार-विचार, संस्कृति तथा भौगोलिक रूप से अलग होने के बावजूद भी ये सारे तत्त्व राष्ट्र को गति देते रहते हैं.
प्रथम विश्व-युद्ध के बाद राजनीतिक क्षेत्र में काफी बदलाव होता है. यह बदलाव राष्ट्रवाद के वर्चस्ववादी-विमर्श को चुनौती के रूप में मिलना शुरू होता है. औपनिवेशिक सरकार के विरोध के साथ सामंती-व्यवस्था की तमाम विद्रूपताएँ/विसंगतियाँ राजनीति का मुद्दा बनता गया. एक बेहतर राष्ट्र के लिए वर्ग और जाति में टकराव की स्थिति पनपने लगी. साम्यवादी, समाजवादी, दक्षिणपंथी, गांधीवादी के साथ अंबेडकरवादी राजनीति भी इस संघर्ष में भाग लिए. इन सभी ‘वाद’ में ‘राष्ट्र’ की अलग तरीके से व्याख्या की गयी. कालांतर में ‘गांधीवाद’ को छोड़कर सभी ‘वाद’ के नेता दल/संगठन के रूप में राजनीति करने लगे.
आजादी के बाद राष्ट्र की संसदीय लोकतंत्र में यह कल्पना की गयी थी कि अब देश का नेतृत्व करने वाला किसी रानी की कोख़ से नहीं, अपितु ‘जन’ द्वारा चुने हुए ‘मत’ से निकलेगा. किंतु, दुर्भाग्य रहा कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ही इस उम्मीद पर खरे नहीं उतरे. उन्होंने ही सर्वप्रथम परिवारवादी/वंशवादी राजनीति (इंदिरा गांधी के रूप में) की नींव रख दी. यही परंपरा आज भी नव-निर्वाचित कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के रूप में दिखाई पड़ता है. यही हाल देश के राज्यों का भी है. खास बात यह है कि वंशवाद के मुखर विरोधी समाजवादी चिंतक डॉ. रामनोहर लोहिया के उत्तराधिकारी मुलायम सिंह यादव एवं लालू प्रसाद यादव ने उनकी पूरी विचारधारा के विपरीत परिवार के प्रत्येक सदस्य को राजनीति का महारथी बनाने में तूले हुए हैं. ऐसे लोग राजनीति में ‘नीति’ का क ख तक नहीं जानते. केवल ‘राज’ करने की लालच में वे किसी भी हद तक जा सकते हैं. इनका अस्तित्व अभी तक पिता के अस्तित्व से आगे बढ़ नहीं सका है. पिता की गोदी से उठ खड़े हुए अखिलेश सिंह यादव विकास की गंगा बहाने की कोशिश की. किंतु, वह भी नाकाफी सिद्ध हुआ. पिता-पुत्र का मोह और चाचा-भतीजा का टकराव चुनाव के अंत तक बना रहा. कार्यकर्ता किसके प्रति वफादारी दिखाए? जनता को अंतिम समय तक बताने में कार्यकर्ताओं और पार्टी नेताओं को दिक्कत होती रही. जिसकी वजह से चुनाव में बुरी तरह से पराजित होना पड़ा. वैसे भी अखिलेश सिंह जिस समाजवाद को गले में बाँध कर घूम रहे हैं वह मात्र अवसरवाद की राजनीति है. चाटुकारों की एक पूरी फौज अंग्रेजी के शब्द ज्ञान से मंच पर अखिलेश यादव जिंदाबाद करते हुए सुनाई पड़ते हैं. यही हाल बिहार में लालू पुत्रों की भी है. बारहवीं फेल राजनीति और अर्थशास्त्र का कैसे पंडित हो सकता है यह बिहार के बनाए नवोदित राजनीतिक-पुत्रों से सीखनी चाहिए. जहाँ प्रधानमंत्री का खाल तक उतरवा लेने की अशोभनीय बातें आम है. उनसे भला एक बेहतर राष्ट्र की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
इसके साथ ही वर्तमान में राजनीतिक धर्म निरपेक्षता के खतरे के चलते राष्ट्र की एकता के तत्त्व को ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ के रूप में आक्रामक तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है. जाहिर है कि इस विचारधारा के पीछे की राजनीति ‘राष्ट्रहित’ में न होकर ‘स्वहित’ में ज्यादा है. चूँकि, यह सर्वविदित है कि दक्षिणपंथ  का मूलाधार ‘धर्म’ में निहित है. उसके पास आधुनिक राष्ट्र के निर्माण के प्रति कोई ‘विजन’ नहीं है. वह पुरे राष्ट्र को धर्म-विशेष की तराजू पर तोलना चाहता है. जिस ‘रामराज्य’ की कल्पना वह दिखा रहा है – स्वयं ही स्पष्ट नहीं है. इस संगठन या इससे निकले राजनीतिक पार्टी के पास इस बात का भी उत्तर नहीं है कि आधुनिक राष्ट्र के लिए हिंदूवादी-व्यवस्था में जातीय समीकरण और स्त्री की स्थिति में कब परिवर्तन होगा? क्योंकि संघ के राष्ट्रवाद में महिलाओं के लिए सामाजिक तथा राजनीतिक दखल न के बराबर है. वह तो स्त्रियों को चरित्र-निर्माण का माध्यम और प्रजनन का केंद्र मानता है. संघ के प्रहरी गोलवलकर ने स्त्रियों को राजनीति में आने का विरोध किया था. यही कारण है कि संघ की स्थापना से लेकर वर्तमान समय तक सरसंघचालक सभी के सभी पुरुष ही हुए. ‘जिस तरह से राष्ट्रीय बहस बदल गयी है और राष्ट्रवाद व धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति रवैये जैसे मुद्दों पर बीजेपी की स्वीकृति बढ़ी है, वह यह बताती है कि ‘राम जन्मभूमि की मुक्ति’ का आंदोलन पीछले तीन दशकों में सबसे परिवर्तनशाली राजनैतिक अभियान रहा है. याद करने वाली बात है कि आज से तीन दशक पहले देश के एक बड़े हिस्से में अयोध्या के विवादित ढाँचे को लेकर हिंदुओं और मुसलमानों में अपने-अपने दावे के कारण अंदर ही अंदर गुस्सा पनप रहा था. वह गुस्सा अब भी बरकरार है, लेकिन मुद्दा बदल गया है : कभी वह मध्य प्रदेश के जेल से भागे कैदियों की गैर-न्यायिक हत्या के रूप में होता है ... कभी वह कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर हैदराबाद और दिल्ली में विरोध कर रहे छात्रों को लेकर मुद्दा बन जाता है. एक धर्म को दुसरे धर्म के खिलाफ, एक सामाजिक वर्ग को दुसरे सामाजिक वर्ग के खिलाफ या राष्ट्रवाद पर एक विचारधारा को दूसरी विचारधारा के खिलाफ खड़ा करने वाले ज्यादातर सामाजिक टकरावों की जड़ में राम जन्मभूमि आंदोलन का असली मकसद ही है.’ लोग यह बखूबी समझने लगे हैं कि राम अब जन-भावना का विषय न होकर बल्कि राजनैतिक मुद्दा बन चुके हैं. उन्हें यह बात भी स्वीकार करने में कोई हैरानी नहीं है कि पौराणिक महानायक राम अब राजनैतिक महानायक राम के रूप में तब्दील हो चुके हैं. राम के छवि में पिछले कुछ दशकों से जो बदलाव हुआ है उसी तरह से भारतीय राजनैतिक चरित्र में भी बदलाव हुआ है.
राष्ट्रनायक की छवि में पहले की अपेक्षा काफी अंतर दिखाई पड़ता है. नैतिकता, ईमानदारी, सुचिता तथा सिद्धांत की राजनीति की जगह पथभ्रष्ट, झूठ-फरेब, स्वार्थ-लोलुपता, हिंसा और दो मुहेपन की राजनीति शुरू हो गई है. राजनीतिक नायकत्व की भूमिका विचारधारा की नहीं बल्कि ‘राज’ की नीति में बदल चुकी है. यही वजह है कि देश की समस्या (भुखमरी, अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, हत्या, बलात्कार और कुपोषण) से इतर राजनीति करने की परंपरा चल चुकी है. विचार कीजिए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी का रास्ता तय करने के लिए उन्हें विकास से कहीं ज्यादा राम लला की कृपा चाहिए थी. ‘अगर बाल रूप में भगवान राम के मंदिर के विचार की मार्केटिंग संघ-परिवार की ओर से सफलतापूर्वक न की गई होती तो मोदी आज वहाँ नहीं होते, जहाँ वे विराजमान हैं. इस पर संदेह करने वालों को याद करना चाहिए कि गोधरा की घटना के बाद गुजरात दंगों के कारण ही राष्ट्रीय स्तर पर मोदी की पहचान बनी थी. भले ही वह किसी प्रति-नायक की रही हो. और साबरमती एक्सप्रेस की घोर निंदनीय घटना न घटी होती, अगर उत्साही कार्य-सेवक अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद् के कार्यक्रम में हिस्सा लेकर न लौट रहे होते.’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सर्वजातीय नेता के रूप में नहीं अपितु कट्टर हिंदूवादी नेता के रूप में जाने जाते हैं. जब भी वीजेपी अथवा नरेंद्र मोदी का नाम आता है अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक समुदाय के बीच एक रेखा खिंची दिखाई देती है.
केंद्रीय सत्ता का विरोध कर कई क्षेत्रीय पार्टियों का जन्म हुआ. लेकिन आज तक उनकी स्थिति  साफ और स्पष्ट नहीं है. सत्ता पक्ष का विरोध करते-करते न जाने कब उनकी गोदी में बैठ जायेंगे – यह कोई नहीं बता सकता. भारत के क्षेत्रीय और वाम-पार्टियों को यब बात समझनी होगी कि फासिज्म के कहर से वे जनता को तभी बचा सकते हैं जब वे चुनावी राजनीति और सत्ता-लोलुपता से इतर आम जनता को फासीवाद के खिलाफ जमीनी स्तर पर संगठित और तैयार करेंगे. फासीवादी ताकतों की मंशा और उनके नकाब को जनता बीच हटाने का प्रयास करें.                              
अत: समाज का ऐसा वर्ग जिसे राष्ट्रवाद की तार्किक समझ न के बराबर है – वह बात-बात पर राष्ट्रवाद की व्याख्या करता रहता है. ऐसे अबौध्दिक तथा छद्मवादी व्यक्तियों के वर्ग से भी राष्ट्रवाद की अस्मिता की रक्षा करना हर भारतीय का धर्म है. वजह साफ है कि राष्ट्रवाद के नाम पर देश की राजनीतिक पार्टियाँ या अन्य संगठन कभी भी बीभत्स खेल खेल सकते हैं. इतना ही नहीं वे राष्ट्रवाद को अपनी नीतियों की वजह से उसे अलग तरीके से परिभाषित भी कर सकते हैं. हम जब तक सांप्रदायिकता, जातीयता, क्षेत्रीयता, वंशवाद और पूँजी-आधारित राष्ट्र से परे जाकर सम-भाव की संस्कृति को नहीं अपनाएँगे, तब तक राष्ट्रवाद का छद्मवादी चेहरा हमें मानसिक गुलामी की घुट्टी पिलाते रहेंगे.


आधार-ग्रंथ :
1.      डॉ. इकबाल नारायण, आधुनिक राजनतिक विचारधाराएँ.
2.      बिपिन चन्द्र, भारत में उपनिवेशवाद और राष्ट्रवाद.
3.      बिपन चन्द्र, आधुनिक भारत.
4.      क्रेग कल्हून, नेशनलिज्म एंड कल्चर्स ऑफ़ डेमोक्रेसी.
5.      योसेफ शुम्पेटर, कैपिटलिज्म, सोशलिज्म एंड डेमोक्रेसी.
6.      शिवानी किंकर (अनु. मिलिंद भारद्वाज), भारत में उपनिवेशवाद स्वतंत्रता-संग्राम और राष्ट्रवाद.
7.      रजनी कोठारी (अनु. अभय कुमार दुबे), राजन्ती की किताब.
8.      देसाई, सोशल बैकग्राउंड ऑफ़ इन्डियन नेशनलिज्म.
9.      ज्ञान अलोयशियन, नेशनलिज्म विदाउट ए नेशन इन इण्डिया.
10.  अपूर्वानंद (सं.), आलोचना, जनवरी-मार्च, 2015.
11.  डॉ. अमरनाथ, हिंदी आलोचना की परिभाषिक शब्दावली.
12.  अरुण पुरी, इंडिया टुडे, 30 नवंबर, 2016.
13.  पंकज बिष्ट, समयांतर, फरवरी, 2015.


*सहायक प्रोफेसर (हिंदी साहित्य)
श्री गुरु माधवानंद पी.जी. कॉलेज, रूपबास
भरतपुर, राजस्थान – 321404
मो. 91+8796729610
ई-मेल : arvindkumar.hindi@gmail.com   
           
                
[आलेख साभार: जनकृति, 33, 2018]
एक टिप्पणी भेजें