दलित आत्मकथाएँ और समकालीन परिदृश्य: रंजीत कुमार यादव - विश्वहिंदीजन

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मंगलवार, 30 जनवरी 2018

दलित आत्मकथाएँ और समकालीन परिदृश्य: रंजीत कुमार यादव





दलित आत्मकथाएँ और समकालीन परिदृश्य
रंजीत कुमार यादव
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय,
                     नई दिल्ली 
        मोबाइल नंबर-9793557884
   ईमेल-jeetyaduvanshi@gmail.com
               


दलित आत्मकथाओं पर जब हम बात करते हैं, तो हमारे सामने यह प्रश्न सहज ही उठ खड़ा होता है कि जब हमारे साहित्य में आत्मकथा लेखन की परंपरा मौजूद थी तब अलग से ‘दलित आत्मकथा’ लिखने की क्या जरूरत पड़ी ? यह सवाल हमारे सामने तब आता है जब हम देखते हैं कि साहित्य में जो कुछ लिखा जा रहा था वह एक विशेष जाति वर्ग के लोगों द्वारा लिखा गया साहित्य है, जिसमें एक वर्ग विशेष की बात की गई है। इन सब सवालों का जवाब मांगती दलित आत्मकथाएं हमारे सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं। कहने के लिए हमारा हिंदी साहित्य ओजपूर्ण एवं समृद्ध है लेकिन एक ऐसा  तबका भी था जिसको कहीं भी साहित्य में स्थान नहीं दिया गया, उनको साहित्य के इतिहास से बाहर कर दिया गया। इन सब प्रश्नों का जवाब मांगते हुए दलित आत्मकथाओं का जन्म हुआ। दलित आत्मकथाएं व्यक्तिगत अनुभव ही नहीं बल्कि समाज में हो रहे जातिगत भेदभाव का दस्तावेज प्रस्तुत करती हैं।
                           दलित साहित्य में स्वानुभूति और सहानुभूति का सवाल उठाया जाता है जिसके परिप्रेक्ष्य में कह सकते हैं “जाके पांव न फटी बिवाई, वह क्या जाने पीर
पराई”। कहीं ना कहीं यह सही है कि एक ऐसा समाज जो भुक्तभोगी हो और दूसरा जो सिर्फ दूसरों के अनुभवों को लिख रहा हो उसके लेखन में अंतर अवश्य होगा, ओमप्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं कि “गैर-दलितों के जीवन में दलितों का प्रवेश सिर्फ पिछले दरवाजे के बाहर तक है, ठीक वैसे ही दलितों के जीवन में गैर-दलितों का प्रवेश नहीं के बराबर है। इसलिए जब कोई गैर-दलित दलित विषयों पर लिखता है तो उसमें कल्पना अधिक होती है।”[1] यह बात सही है क्योंकि जब हम दूसरों के अनुभव को लिखते हैं तो उसमें कल्पना का ज्यादा प्रभाव दिखाई पड़ता है।
                         दलित लेखकों ने आत्मकथाओं के माध्यम से समाज में एक नई सोच और बदलाव लाने का प्रयास किया, इससे समाज में एक नई चेतना का विकास हुआ। इसमें शिक्षा का बहुत बड़ा महत्त्व है, समाज में उनको शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं था, सवर्णवादी समाज को डर था कि अगर दलित पिछड़े लोगों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिल जाएगा तो वे आवाज उठाने लगेंगे। इन सब प्रश्नों का जवाब मांगती दलित आत्मकथाएं जीवन में भोगे हुए नग्न यथार्थ को समाज के सामने लेकर आयी, जिसे तथाकथित सभ्य समाज स्वीकार नहीं करना चाहता था। जो भोगा वैसा लिखा, उन सब तथ्यों को उठाया जिसका जिक्र साहित्यिक समाज में उचित नहीं माना जाता था।
                           दलित साहित्य के प्रेरणास्रोत डॉक्टर अंबेडकर ने अपनी आत्मकथा ‘अमी कसा झालो’ लिखकर दलित लेखकों को अपनी आत्मकथाएं लिखने के लिए प्रेरित किया। हिंदी दलित साहित्य के क्षेत्र में भगवान दास ने ‘मैं भंगी हूं’ नाम से दलित समाज की आत्मकथा लिखी, यह 1950 में प्रकाशित हुई थी, उसके बाद 1995 में मोहनदास नैमिशराय ने ‘अपने-अपने पिंजरे’ लिखा, जिसमें वे अपनी सामाजिक स्थिति और उन पर हो रहे अत्याचार का वर्णन करते हैं। गरीबी और भुखमरी की शिकार अपने जीवन और समाज के लोगों को एक प्रकार से भुक्तभोगी समाज का यथार्थ हमारे सामने लाते हैं। अपने स्कूल के दिनों को याद करते हुए लिखते हैं, जहाँ उनको जाति का विष हमेशा पीना पड़ता था, वे कहते हैं –“हमारे स्कूल को बाहर के लोग अक्सर चमारों का स्कूल कहा करते थे। जैसे चमारों का कुआँ, चमारों का नल, चमारों की गली, चमारों की पंचायत आदि-आदि; वैसे ही स्कूल के साथ जुड़ी थी हमारी जात। जात पहले आती थी स्कूल बाद में।” इसे हम आज भी इस रूप में देख सकते हैं,आज भी ग्रामीण इलाके के प्राथमिक विद्यालयों में जो बच्चे पढने जाते हैं उनमें अधिकांश निम्न तबके और शुद्र जाति के ही बच्चे होते हैं। हमारा उच्चवर्गीय तथाकथित सवर्णवादी समाज इसे हेय दृष्टि से देखता है और कन्नी काटता है। आज भी गांव में जात के नाम पर टोले बंटे हुए हैं। चमार टोली, यादव टोला आदि। जिस गरीबी और जहालत का जिक्र नैमिशराय अपनी आत्मकथा में करते हैं कमोबेश वैसी स्थिति आज भी बनी हुयी है। आज हमारे देश का एक बहुत बड़ा तबका ऐसा है जिसे पहनने को कपड़े नहीं मिलते, खाने के लिए दो जून की रोटी मयस्सर नहीं होती। कहने को हम  आज उत्तर आधुनिक दौर में जी रहे हैं, हमारा देश विकास की तमाम संभावनाओं को छू रहा है लेकिन एक तरफ किसान बहुत बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं। यदि जमीनी स्तर पर पड़ताल करें तो हम देख सकेंगे किकिसन के रूप में मरने वाला अधिकांश व्यक्ति इसी शोषित समाज से आता है जिसपर सदियों से जुल्म होते रहें हैं। कहीं किसी जमींदार के आत्महत्या की खबर नहीं आती।
                        गौरतलब है कि ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की आत्मकथा ‘जूठन’ दलित उत्पीड़न तथा आभाव के साथ-साथ समकालीन आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक  परिप्रेक्ष्य को भी हमारे सामने रखती है। जिसमें परम्परागत सामाजिक सांस्कृतिक दासता की बेड़ियों से मुक्ति की राह तलाशने की सफल कोशिश दिखाई पड़ती है। जिसका एक प्रमुख हथियार है -शिक्षा। ‘जूठन’ शीर्षक से ही अन्याय और भेदभाव की व्यवस्था जग जाहिर हो जाती है। यह एक व्यक्ति की आत्मकथा होकर भी सम्पूर्ण  दलित समाज का  कारुणिक दस्तावेज बन जाता है। जातिगत छुआ-छूत की समस्याओं का जिक्र करते हुए वाल्मीकि जी लिखते हैं “अस्पृश्यता का ऐसा माहौल कि कुत्ते बिल्ली गाय भैंस को छूना बुरा नहीं था लेकिन यदि चुहरे का स्पर्श हो जाए तो पाप लग जाता था।” समकालीन परिदृश्य पर दृष्टिपात करें तो आज भी तमाम आधुनिकता के वाबजूद इस तरह की अस्पृश्यता हमें ग्रामीण समाज में देखने को मिल जाती है। जहाँ शादी और श्राद्ध के भोज में  निम्न जातियों के लोगों को अलग पंगत में बैठाया जाता है। इस तरह की अस्पृश्यता का जिक्र हमें हिंदी साहित्य के अनेक उपन्यासों और कहानियों में दिख जाता है, उदहारण के तौर पर हम “मैला आँचल” को देख सकते हैं। जहाँ तक मेरे व्यक्तिगत अनुभव का प्रश्न है  मैं भी कई ऐसी घटनाओं का साक्षी रहा हूँ जहाँ इस तरह का भेदभाव किया जाता है। उदहारण के तौर पर – मेरे गाँव में आज भी मुसहर टोली से आने वाले मजदूरों को खाने- पीने के लिए अलग बर्तन दिया जाता है। उन्हें चापाकल से पानी अपनी अंजुलियों में भरकर पीना पड़ता है। शिक्षकों की मानसिक पंगुता का उदहारण देते हुए वाल्मीकि जी लिखते हैं “ “चूहड़े के , तू द्रोणाचार्य से अपनी बराबरी करे है ....ले तेरे ऊपर मैं महाकाव्य लिखूंगा ....” उसने मेरी पीठ पर सटाक-सटाक छड़ी से महाकाव्य रच दिया था|”[2] आज समकालीन परिदृश्य में बदलाव तो हुये है किन्तु इस तरह की दोहरी नीति की घटनाएँ आये दिन अखबारी खबर के रूप में देखे जा सकते हैं। जाति का घेरा किस तरह प्रेम पर हावी हो जाता है इसका एक उदहारण हमें वाल्मीकि जी की आत्मकथा में मिलता है , जहाँ जाति की बात बताने पर सविता का प्रेम हवा हो जाता है, वाल्मीकि जी लिखते हैं  “वह रोने लगी थी। मेरा एस. सी. होना जैसे कोई अपराध था। वह काफी देर तक सुबकती रही। हमारे बीच अचानक फासला बढ़ गया था। हजारों साल की नफरत हमारे दिलों में भर गई थी। एक झूठ को हमने संस्कृति मान लिया था।”[3] यहाँ बात सिर्फ जातिगत प्रश्न का नहीं है , सवाल यह है कि किस तरह आने वाली पीढ़ियों को भी सवर्णवादी उसी संस्कार से पोषित करते हैं जहाँ आधुनिक कही जाने वाली पीढियां भी मानसिक रूप से पुरातन कुसंस्कारों से ग्रसित नजर आती हैं। आज भी हमारे समाज में बहुत सारे प्रेम सम्बन्ध सिर्फ जातिगत कारणों से परवान नहीं चढ़ पाते। जाति का सवाल हमेशा निम्न जाति के लोगों के लिए गाली बन जाता है , जहाँ उनकी भावनाएं घुटने टेक देती हैं।
                          इधर कुछ महत्त्वपूर्ण दलित स्त्री आत्मकथाएँ भी सामने आयी हैं, दलित स्त्री आत्मकथाओं में स्त्री का स्वरूप अलग से उभर कर सामने आता है जिसमें स्त्री का व्यक्तित्व तिहरे शोषण का शिकार है। विमल थोरात अपने एक साक्षात्कार में इस तिहरे  शोषण का ज़िक्र करते हुए कहती हैं कि “जाति के आधार पर, महिला होने के आधार पर और गरीब होने के आधार पर तीन तरह के शोषण दलित महिला झेलती है”[4] आगे विमल थोरात कौशल्या बैसंत्री के ‘दोहरा अभिशाप’ का उल्लेख करती हुई बताती हैं कि उन्होंने इस मुद्दे को शिद्दत के साथ नहीं उठाया लेकिन “इसका यह मतलब नहीं कि रचनाकार उससे वाकिफ़ नहीं है। उसमें लेखक की नहीं उसके परिवेश का प्रभाव अधिक है क्योंकि परिवेश लेखन को बहुत प्रभावित करता है। दलितों का जो परिवेश है वह लगभग सारे भारत में एक जैसा ही है।”[5] इस प्रकार हमारे समय में स्त्री दलित लेखिकाओं की भी एक छवि सामने उभर कर आती है जो दलित-विमर्श में एक नया पाठ जोड़ती जान पड़ती हैं। दलित-विमर्श को इससे वैचारिक सम्बल मिला है।
                            दलित-विमर्श का दायरा निश्चित तौर पर आज बड़ा हुआ है, अब वह मुख्यधारा के साहित्य का अभिन्न अंग है, उसके अस्वीकार के कारण कम रह गए हैं। समाज में जाति,लिंग,वर्ण और सम्प्रदाय के भेद-भाव को दलित साहित्य ने जिस रूप में चित्रित किया है उससे हमारे समाज का परिदृश्य और स्पष्ट हुआ है। आने वाले समाज में जैसे-जैसे सामाजिक विषमता का ह्रास होता जाएगा वैसे-वैसे दलित साहित्य की प्रासंगिकता बनती चली जाएगी। इस रूप में हम दलित-विमर्श को चेतना जागरण का साहित्य का सकते हैं, जो अपने समकालीन समाज को मानवीय मूल्यों की कसौटी पर परखती है। आज दलित इन्हीं मूल्यों के साथ सामाजिक परिवर्तन के आकांक्षी हुए हैं। मलखान सिंह अपनी एक कविता में ब्राह्मणवादी समाज को सम्बोधित करते हुए कहते हैं –
“हमारी दासता का सफर
तुम्हारे जन्म से शुरू होता है
और इसका अंत भी
तुम्हारे अंत के साथ होगा।”
कहना न होगा दलित-विमर्श भी अंततः समाज के उत्पीड़ित-शोषित-वंचित समुदाय की ब्राह्मणवादी मानसिकता से मुक्ति की बात ही करती है, जिसका अंत ब्राह्मणवादी संस्कृति के खात्में के साथ ही पूरा होगा। आने वाला भारतीय समाज दलित-विमर्श की वैचारिकी और अम्बेडकरवादी समाज के समतामूलक बहुजन समाजवादी उद्देश्यों से पूरित होगा, आज के दलित-विमर्शकारों की यही मानवीय आकांक्षाएं हैं।

 सहायक ग्रन्थ सूची :
    
१.      मुख्यधारा और दलित साहित्य, ओमप्रकाश वाल्मीकि, सामयिक प्रकाशन, २०१४
२.      दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र, शरणकुमार लिंबाले, वाणी प्रकाशन, २०१६
३.      दलित साहित्य की अवधारणा, कंवल भारती, बोधिसत्त्व प्रकाशन, २००६
४.      दलित साहित्य का स्त्रीवादी स्वर ,विमल थोरात ,अनामिका ,२०१०



[1] . दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, ओमप्रकाश वाल्मीकि, पृष्ठ – ३५, राधाकृष्ण ,नई दिल्ली, संस्करण – २०१४
[2] . जूठन, ओमप्रकाश वाल्मीकि, पृष्ठ- ३४-३५, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, संस्करण -२००९
[3].  वही , पृष्ठ – ११९
[4] . दलित साहित्य का स्त्रीवादी स्वर, विमल थोरात, पृष्ठ – १२४-१२५, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स(प्रा.)लि., संस्करण - २०१०
[5] . वही, पृष्ठ – १२५


[साभार: जनकृति, अक्टूबर-दिसंबर, सयुंक्त अंक 2017]
[चित्र साभार: 
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