मुकेश बोहरा अमन की रचनाएँ - विश्वहिंदीजन

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सोमवार, 24 सितंबर 2018

मुकेश बोहरा अमन की रचनाएँ


मैं भी सब कुछ कर सकती हूं 


पापा, पापा सुनो गौर से,   
मैं भी सब कुछ कर सकती हूं ।
जमीं, आसमां, जल के भीतर ,  
नाम आपका कर सकती हूं ।।


धरा, गगन में जगह-जगह पर,   
बेटी के पर की आहट है ।
मैं भी जग में अच्छा कर लूं,  
ऐसी मेरी भी चाहत है ।।

भला देश का करना मकसद्,  
दुश्मन से भी लड़ सकती हूं ।
जमीं, आसमां, जल के भीतर ,
नाम आपका कर सकती हूं ।।


शासन से प्रशासन सब में ,  
कामकाज का माद्दा मुझमें ।
ज्ञान, ध्यान और कला-साहित्य,  
का कौशल है ज्यादा मुझमें ।।

नाच, गान या खेलकुद में , 
नया-नया सब रच सकती हूं ।
जमीं, आसमां, जल के भीतर , 
नाम आपका कर सकती हूं ।।


मुकेश बोहरा अमन, गीतकार
बाड़मेर राजस्थान    8104123345







एक नवगीत


कहो कबीरा


कहो कबीरा ,
इस जीवन में,
सच पर ऐसा रोना कैसा ।
                  कहो कबीरा ....................।।


किसकी चैखट, किसकी खिड़की ,
किसका यह घर डेरा है ।

मिटने वाला माटी ढ़ेला ,
न तेरा......न मेरा है ।।

आना-जाना ,
बात सनातन ,
नयन नीर भिगोना कैसा ।
                  कहो कबीरा ....................।।


पैसा, पदवी, धन, दौलत सब,
मानवता से कहीं नीचे है ।

महल-कोठियां, सुविधाएं भी,
सज्जनता से सब पीछे है ।।

फिर तो साथी ,
नश्वरता पर ,
अपना रौब जमाना कैसा ।
                  कहो कबीरा ....................।।


मुकेश बोहरा अमन
नवगीतकार
बाड़मेर राजस्थान
8104123345






1. मातृभाषा हिन्दी


खिलखिलाती हंसती जाती,
गीत गति के गढ़ती जाती ।
अनेक विधाएं अदब की इसमें,
और हमेशा बढ़ती जाती ।।
देषी-विदेशी शब्दों को भी,
उर्दु जैसे अरबों को भी,
बाहर से आये हर आखर को,
अपने अन्दर लेती जाती ।
बोलने वाले लाख करोड़ों,
मुडती चाहे जैसे मोड़ों,
सागर से भी गहरी हिन्दी,
गर्व जताते हिन्दी भाषी ।
भय नही किसी और से हमको,
दुश्मी गोरे चोर से हमको ,
नव अदब को हरपल हरक्षण,
मातृभाषा गढ़ती जाती ।
हिन्दी हमको जान से प्यारी,
जोर लगा ले दुनिया सारी,
मां के हम जो लाल खड़े है,
और खुबियां आती जाती ।
हिन्दी के संग चलना होगा,
मिली मुसीबत दलना होगा,
घर के भेदी जब तक जिन्दा,
नित्य मुसीबत आती जाती ।
जीवन की हर सांस हो हिन्दी,
जीने का अहसास हो हिन्दी,
हिन्दी पढ़ना, हिन्दी लिखना,
हिन्दी बोले हर भारतवासी ।
डोर रेशमी हिन्दी भाषा,
बढ़ती अपनेपन की आषा,
‘अमन’ जोड़ती प्रेम-सूत्र में,
हिन्दी अपनी मातृभाषा 



1. हिन्दी को सलाम



हिन्दी तो बस हिन्दी है ।
मां के सिर की बिन्दी है ।।

उर्दु, अरबी या फिर चीनी,
अंग्रेजी हो या जापानी,
सारे जग में सबसे सुन्दर,
सबसे मीठी हिन्दी है ।
हिन्दी मातृभाषा है ,
जनगणमन की आशा है,
आज खुले में, नीलगगन में,
नही किसी की बन्दी है ।
हिन्दी जैसे गंगा-जमुना,
ज्यूं सबुह का सच्चा सपना,
मुंह खुले रसधार बहे,
श्वास श्वास में हिन्दी है । 
माटी की है सौरभ इसमें,
हम सबका है गौरव इसमें,
हिन्दी से पहचाने जाते,
हर बात हमारी हिन्दी है ।


मुकेश बोहरा अमन
गीतकार
अमन भवन, 
महावीर सर्किल, बाड़मेर
राजस्थान 344001
8104123345
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