मानस का वैचारिक दर्शन और तुलसी की काव्य-भाषा- डॉ.विमलेश शर्मा
मानस का वैचारिक दर्शन और
तुलसी की काव्य-भाषा
डॉ.विमलेश शर्मा
सहायक आचार्य,हिन्दी
राजकीय कन्या
महाविद्यालय,अजमेर।
9414777259, vimlesh27@gmail.com
तुलसीदास
भारतीय भक्ति-काव्यधारा की महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं और उनके द्वारा प्रणीत
रामचरितमानस हिन्दू संस्कृति का सारभूत ग्रंथ है। इस प्रबंध काव्य में भारतीय
जीवन-दृष्टि से विकसित दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण जीवन की एक पूर्ण कल्पना विकसित
हुई है। इस मानस ग्रंथ को तुलसी ने संवत् 1631 वि., चैत्र शुक्ल नवमी,मंगलवार को
प्रारम्भ की थी। रामचरितमानस को तुलसी ने प्रमुखतया दोहा और चौपाइयों में लिखा है।
तुलसी ने प्रायः चार चौपाइयों पर एक दोहा लिखा है। मानस के अंत में समस्त चौपाइयों
का संकेत करते हुए तुलसी ने लिखा है-
“सतपंच चौपाई मनोहर जानि जे नर उर धरैं।
दारून अविद्या पंच जनित विकार भी रघुबर हरैं।।”(मानस) इस संकेत से 5100
चौपाई और 10200 अर्धाली सिद्ध होती है जो कि प्रामाणिक प्रतियों के अध्ययन से सत्य
सिद्ध होती है। रामचरितमानस में यद्यपि तुलसी ने लोक-दर्शन का उल्लेख किया है
तथापि उन्होंने भ्रमरवृत्ति के आधार पर समस्त उपलब्ध ग्रंथों का प्रयोग किया है,
यथा- रामायण, अध्यात्मरामायण, प्रसन्नराघव नाटक, हनुमन्नाटक, भागवतपुराण और भगवद्गीता।
मानस वस्तुतः चरित्रप्रधान ग्रंथ है तथा विविध चरित्रों के माध्यम से ही उन्होंने
जीवन दर्शन की व्याख्या प्रस्तुत की है। मानस में उल्लिखित चरित्र यथा-भरत, लक्ष्मण, सीता, रावण, हनुमान् आदि
अलग-अलग महाकव्यों के नायक हो सकते हैं अथवा उनसे समता रख सकते हैं। गोस्वामी ने मानस
में पुराण, नाटक और महाकाव्य तीनों की ही शैलियों का समन्वय स्थापित किया है जो कि
उनकी समन्वयात्मक दृष्टि का परिचायक है।
यह समन्वय और सकारात्मकता ही है कि भारत के अनेक लोकनायक
मानस के प्रति गहरा आकर्षण रखते थे। गांधीजी मानस के संगीत पर मुग्ध थे तथा इसके द्वारा उन्हें एक विशेष स्फूर्ति और
प्रेरणा मिलती थी। आचार्य विनोबा भावे ने
इस ग्रंथ को राष्ट्रभाषा का सर्वोत्तम ग्रंथ माना है। मानस सारल्य और गांभीर्य का
अद्भुत संयोग रखता है तथा यह साहित्य का एक ग्रंथ मात्र नहीं वरन् भारतीय संस्कृति
के बौद्धिक, भावुक एवं कलात्मक समस्त उत्कृष्ट ग्रंथों के कला-वैभव को समाहित करता
हुआ एक अत्यन्त उपयोगी ग्रंथ है। गोस्वामी जी का सिद्धान्त था-
“सरल कवित्त कीरति
विमल,सोई आदरहिं सुजान।
सहज बैर बिसराय रिपु, जो सुनि करें बखान।।”(मानस)
उन्होंने सरल कविता का
निर्वाह किया है,मानस सरसता से युक्त है परन्तु इसका जीवन-दर्शन गूढ है। इस ग्रंथ में
गोस्वामी जी ने मनुष्य जाति की आध्यात्मिक और भौतिक समस्याओं को सुलझाने का
प्रयत्न किया है। जहाँ तक गूढता का प्रश्न है उन्होंने अपने काव्य-ग्रंथों में
निर्गुण, निराकार,अगोचर, परमात्मा को हमारे बीच मानवीय रूप में अवतरित किया है और
ईश्वर को हमारे अपने समाज का व्यक्ति बनाकर छोड़ा है। इनके रचना-कर्म का सामाजिक
और आध्यात्मिक दोनों रहस्यों की दृष्टि से गहन प्रभाव भारतीय जनमानस पर परिलक्षित
होता है। इस ग्रंथ की आध्यात्मिक उपादेयता तो यह है कि इन्होंने समस्त श्रद्धावान्
भक्तजन के लिए पारब्रह्म परमेश्वर के सहज दर्शन एवं मुक्ति का मार्ग उपलब्ध करवा
दिया है। काव्य का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है कि वह सर्वोपयोगी होना चाहिए , यह
सिद्धान्त तुलसी के मानस में पूर्णरूपेण दृष्टिगत होता है;
“कीरति भनिति भूति
भलि सोई।
सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।” (मानस)
अर्थात् मनुष्य को कीर्ति प्रदान करने वाले कार्यों,
कवियों की रचनाओं तथा धनवानों की संपत्ति की अच्छाई की एक ही कसौटी है कि वह
सामाजिक कल्याण में श्रेष्ठ योगदान देने वाली हो। जो लोक-कल्याणकारी तो हो ही साथ
ही सरस और स्मरणीय भी हो-
“राम दूरि माया
बढ़ति, घटति जानि मन माँह।
भूरि होति रबि दूर लखि, सिर पर पगतरछाँ।।”(मानस)
तुलसीदास मानस में जीवन के एकांगी पक्ष का नहीं वरन्
विशदता का चित्रण करते हैं। जीवन के
सर्वांगीण चित्रण में वे विभिन्न संस्कारों, उत्सवों, रूढ़ियों एवं विश्वासों को
सँजोए हुए लोकजीवन को प्रवहमयता प्रदान करते हैं। उनका भक्ति-दर्शन भी सर्वांगीण
सामाजिक जीवन का सुंदर समंजन है। तुलसी रामभजन को जीवन का प्रशस्थ राजपथ मानते
हैं-
‘गुरु कह्यो रामभजन नीको, मोहि लगत राजडगरो सा।।’(मानस)
मनुष्य के हृदय में
भक्ति का अंकुर उग आने पर वह बुराई से दूर हो जाता है। इस मार्ग में राम के गुणों
का,सम-विषम परिस्थितियों में उनके आचार का तथा उनकी कृपा का सदैव सहारा रहता है।
तुलसीदास समन्वयवादी अवश्य थे परन्तु आदर्श का पालन करते हुए भी वे रुढ़िविरोधी थे। निर्गुण-सगुण,
शैव-वैष्णव, ज्ञान-भक्ति, निवृत्ति-प्रवृत्ति, योग-त्याग आदि के बीच
समन्वयकारी दृष्टिकोण की स्थापना कर
उन्होंने कट्टरता को दूर करने का प्रयत्न किया।
तुलसी ने वर्ग और जाति वैषम्य का कभी पोषण नहीं किया वरन् स्वयं को ही
तुच्छ सिद्ध करने का प्रयास किया। तुलसी जहाँ भावों के द्वारा समन्वय की विराट्
चेष्टा करते हैं वहीं उनकी भाषा तुलसी की श्रेष्ठता स्वयंमेव ही सिद्ध करती है।
किसी भी कवि का
महत्त्वपूर्ण गुण शब्द-शक्ति है। यही वह शक्ति है जो किसी भी भाषा के कवित्त को
मनोहर शक्ति से भर देती है। शब्द जब ध्वान्यात्मकता और व्यंग्यात्मकता से रससिक्त
होकर विशेष प्रकार की अर्थ-सरसता प्रदान करते हैं तो काव्य हृदयंगम होने का
सामर्थ्य रखता है। तुलसी ने अनेक स्थलों पर स्थान और ऋतु का चित्र दो-दो, चार-चार
शब्दों में पूर्णरूप से खींच दिया है। इन शब्दचित्रों में ध्वन्यात्मकता तुलसी ने
प्लुत् स्वरों के माध्यम से खींची है।
यथा- “चलत पुरवाई
सूम-सूम सनानानाना।”(मानस)
शब्द की ध्वन्यात्मकता
के साथ-साथ किसी भी काव्य की अन्य शक्ति चित्रशक्ति है। चित्र के माध्यम से
चित्रकार अपनी तुलिका से मनसा भावों का प्रकटीकरण कर देता है। तुलसीदास ने मानस
में ऐसे शब्द-चित्र बहुत खींचे हैं यथा-
“नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रिका,
प्रान जाहि केहि बाट।।”(मानस)
तुलसी ने जिस तन्मयता से
राम के स्मरण में तल्लीन बैठी हुई सीता की पदपृष्ठ पर आँखों की टकटकी लगी हुई दशा
का चित्र खींचा है उसे कोई सहृदय और मर्मज्ञ ही समझ सकता है। तुलसी ने
पंचज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से विशेष कार्यकर्ता कर्णेन्द्रिय, दर्शनेन्द्रिय और
स्वादेन्द्रिय को रूपक के बंदीगृह में जकड़ा है। जिह्वा पर राम-नाम का पहरा है
अतएव इस मार्ग से प्राण का निकलना अथवा मृत्यु का आना कठिन है। इसी तरह जिह्वा तो
राम-नाम में लीन है और कर्णेन्द्रिय जिह्वा से निकले हुए आध्यात्मिक आनंद से पूर्ण उस नाम को सुनने में तल्लीन है। (यह
स्मरण रहना ही चाहिए कि जिह्वा से उच्चरित शब्द चाहे कितना ही मंद क्यों न हो ,
कानों को अवश्य सुनाई पड़ता है।) आह!
फिर यह तन्मयता का पहरा कितना अद्भुत है कि ‘दिवस निसि’ दिन-रात रहता है, कोई
समय खाली नहीं और इस क्रिया में आलस्य का लेश मात्र भी प्रकटीकरण नहीं। ‘लोचन निज पद जंत्रिका’ अर्थात् दृष्टि में
सूत्र की जंजीर है। पैर पर तल्लीनता की टकटकी है अर्थात् चौकसी है। तात्पर्य है कि
जब मनुष्य का ध्यान अधिक गहराई में होता है, तब बाह्येन्द्रियाँ इसी प्रकार प्रकट
रूप में एकाग्र हो जाती है। हिन्दी और इसकी बोलियों को कमतर बताने वाले अन्य
चिंतकों से यह प्रश्न सहज ही किया जा सकता है कि ऐसे मनोरम शब्द-चित्र जो दो
पंक्तियों में विशद अनुभवों को उकेरने का सामर्थ्य रखते हैं, वास्तविकता में कितने
हैं।
इसी तरह राजा जनक के
क्रोध और निराशा के ये वाक्य कि, “वीर विहीन मही मैं जानी” कहे जाने पर लक्ष्मण सरीखे स्वाभिमानी युवक के मन की दशा का चित्रण इस
प्रकार है-
“माखे लखन कुटिल भइँ भौंहें। रदपुट फरकत नयन
रिसौंहैं।”(मानस)
इस अर्धाली में लक्ष्मण
की मनोदशा और रोष को अत्यन्त कलात्मकता और सौन्दर्य के साथ तुलसी ने उकेर दिया है।
चित्रयोजना के साथ-साथ तुलसी की शब्द-योजना भी अप्रतिम है। वे प्रकृति-चित्रण में
काव्य-लिंग अलंकार का प्रयोग करते हुए विविध दृश्य नहीं उकेरते चले जाते हैं वरन्
सामासिकता एवं सांकेतिकता का प्रयोग करते हुए मार्मिक कवित्व का ऐसा अद्भुत परिचय
देते हैं कि हमारे मस्तिष्क की प्राकृतिक भावना-शक्ति उस चित्र के शेष अंगों को
अपने अनुभव एवं कल्पना के आधार पर स्वयं ही पूर्ण कर लेती है। यथा-
1.‘लागे विटप मनोहर नाना। बरन बरन बर
बेलिबिताना।’
2. ‘नव पल्लव फल सुमन सुहाए। निज संपति सुर रूख
लजाए।’(रामचरितमानस)
यह सौन्दर्य कहीं
छेकानुप्रास की सहजता से , कहीं विशिष्ट शब्द-योजना से, तो कहीं नाद योजना से
उन्होंने चित्रित की है। यथा-
प्रथम चौपाई में
वाटिका के चित्र की एक प्रतिच्छाया है, जिसमें मनोहर भावों को उत्पन्न करने का
प्रयास सांकेतिक है और हमारी चिंतना को संकेत है कि ऐसे रंग और प्रकार के वृक्षों
की चिंतना से , जिनमें मनोमुग्धकारी गुण है, आनंद उठाया जाए। यह वर्णन उस बाग में
उपस्थित राम और सीता की छवि को भूलाने के लिए नहीं वरन् बाग के आलम्बन और उद्दीपन
विभाव पक्ष को और प्रकारान्तर से उसके श्रेष्ठता बोध को उल्लेखित कर रहा है। बिटप
(तत्सम-विटप , अर्थात् बड़े पेड़ जिन पर अनेक बेलें झालर की तरह सुशोभित हो रही
हों) का वर्णन, सुंदर कुंज की प्रतिच्छाया,चिंतना शक्ति की चित्रशाला को भेंट करता
है। इसके अतिरिक्त दूसरे उदाहरण में एक ही वर्ण की आवृत्ति सौन्दर्य की सर्जना कर
रही है। यह दृश्य शृंगार रस का है जिसके प्रधान वर्ण ‘स’, ‘र’ आदि हैं अस्तु सारे
प्रसंग में इन्हीं वर्णों का आधिक्य है। यह प्रयोग सायास नहीं जान पड़ता वरन्
अनायास है ।
इसी तरह छेकानुप्रास का
पांडित्य अन्यत्र भी दर्शनीय है। कवि शब्दों का , उनके पर्यायों का प्रयोग पूर्ण
व्युत्पन्नता से किया गया है यथा-
‘बिमल सलिल सरसिज बहुरंगा। जलखग कूजत गुंजत
भृंगा।’ (रामचरितमानस)
रस-योजना के अनुरूप
वर्णों का प्रयोग (शृंगार के लिए स, व, ल,र) यहाँ भी स व र का प्रयोग आनंदातिरेक
को उत्पन्न करने के लिए प्रारंभ में तथा अंत में ल का प्रयोग इसी प्रवाहमयता को
संयत करने हेतु किया गया है, जिसे कोई काव्यमर्मज्ञ ही समझ सकता है तथा उसका आनंद
भी उठा सकता है। इसी के साथ जलखग कूजत
गुंजत भृंगा में शब्दों की विलक्षण अनुगूँज है। ‘भृंग’ शब्द के स्थान पर ‘मधुप’ रख देने से उसका
सौन्दर्य बाधित हो जाता है अतः यहाँ चातुर्य और कवित्व कौशल से तुलसी ने भृंग शब्द
का प्रयोग किया है। वस्तुतः ये अर्धालियाँ बानगी भर है ; समूचा मानस स्थल-स्थल पर
ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जहाँ धातु-रूपांन्तर, शाब्दिक योजना, कारण-कार्य
सम्बन्ध, अन्वय और आलंकारिक प्रयोग मानस
को उत्कृष्टता प्रदान करते हैं।
तुलसी के लेखन की तुलना
यदि टेनीसन और वर्डस्वर्थ की चित्र-योजना व शब्द-योजना से करें तो यह उचित ही है। “ टेनीसन के पद्यों में
भी प्रायः (यथा- One One और The Lotus Eaters) में यही दशा पाई जाती
है।
‘सर समीप गिरिजा-गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मन मोहा।’ ज्यों-ज्यों दृश्य आगे
बढ़ता जाता है, यह आनंद भी बढ़ता जाता है। यहाँ लता ओट तब सखिन लखाए और अंत में
देखन मिस मृग बिहग तरु, फिरहि बहोरी-बहोरी’ में संलग्नता भाव का
अत्यन्त स्पष्ट एवं मनोहर ढंग है। ”1 तुलसी ठेठ अवधी शब्दों का प्रयोग सरसता के
उद्देश्य से ही पूरे मनोयोग से करते हैं- यथा- बिलोकन, बहोरि, पुलक, गात, बैन, हरष
इसी तरह शब्द युग्म पुलक-गात, जल-नैन आदि अनेक शब्द पाठक को ब्रह्मानन्द सहोदर
आनंद प्रदान करते हैं। बैन के संग मृदुबैन भाव लालित्य में आत्यन्तिक वृद्धि ही
प्रदान करता है। पात्रों के अनुकूल भाषा यथा सीता व सखियों के वार्तालाप में सखी
की सामान्य भाषा उसके संस्कारों का परिचय देती है कि वह अधिक पढ़ी-लिखी नहीं है
अथवा उसे संस्कृत का ज्ञान नहीं है।
कला-पक्ष के अनन्य
प्रसंग है, अंतहीन विवेचना है जो मानस पर, उसके दर्शन पर की जा सकती है परन्तु हर
लेख , हर ग्रंथ कुछ अधूरा ही रह जाता है , इसीलिए मानस के लिए तुलसी के ही शब्द-
“गिरा अनैन नैन बिनु बानी। ”(रामचरितमानस)
संदर्भ ग्रंथ
सूची
1.तुलसी ग्रंथावली-तृतीय खंड, संपादक मंडल-वेणीशंकर झा, हरवंशलाल शर्मा,
देवेन्द्रनाथ शर्मा आदि. संवत् 2033, नागरीप्रचारिणी सभी, काशी
2. मूल रामचरितमानस ग्रंथ आधार ग्रंथ के रूप में।
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