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संगणकीय साक्षरता, मीडिया और हिंदी साहित्य

संगणकीय साक्षरता, मीडिया और हिंदी साहित्य

- डॉ.साताप्पा लहू चव्हाण

सारांश(Abstract) :

                  संगणकीय साक्षरता,मीडिया और हिंदी साहित्य का संबंध एक-दूसरे को पूरक रहा है.हिंदी साहित्य का वैश्विक विकास ही संगणक के कारण गतिशील हो रहा है. विश्व का वर्तमान संगणक से जुडा है,अर्थात आज संगणक युग है.संगणकीय मीडिया का युग है.संगणक का उपयोग सभी जगह हो रहा है.संगणक की सहायता से अनेक कार्य शीघ्रतापूर्वक किए जा रहें हैं, इस बात को हमें मानना होगा. संगणक ने देखते ही देखते हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रवेश कर लिया.इस बात को हम नकार नही सकते.वैज्ञानिक चिंतन परिणाम ही संगणक है. स्वचालित इलेक्ट्रोनिक यंत्र के माध्यम से हिंदी साहित्य को विश्वभर में पहुँचाया जा सकता है,इस विचार को आज भी हिंदी साहित्यविश्व के अनेक विद्वान स्वीकार नहीं करते. मेरी अपनी मान्यता यह है कि 14 सितंबर को “हिंदी दिवस समारोह” की जगह “हिंदी संगणक साक्षरता दिवस समारोह” मनाना चाहिए.

हिंदी भाषा और साहित्य का संबंध संगणक से जोड़ने से ही हिंदी साहित्य वैश्विक रूप धारण करेगा,इस में दो राय नहीं. हिंदी टूल्स के संदर्भ में विश्व व्यापी वेब पर अनेक प्रकार की जानकारी उपलब्ध है. इस जानकारी का उपयोग कर संगणक निरक्षरता को जड़ से उखाड़ फेंकने का वक्त आ चूका है. संगणक निरक्षर हिंदी साहित्यिक,अनुसंधाताओं को खुद को संगणक साक्षर बनाने की आवश्यकता है.तभी हिंदी साहित्य संगणक के माध्यम से वैश्विक मंच पर अपना अलग स्थान बना पायेगा.इस तथ्यगत सत्य को हमें मानना होगा.

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 विषय संकेत(Key words) :

कंप्यूटर,संगणक, शब्द ,साहित्य, हिंदी साहित्य, साहित्यकार,भाषा,भाषा विज्ञान,शोध और संगणक,सूचना प्रौद्योगिकी, संगणक वर्गीकरण, हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, वर्ड लेंथ, विविधता, सूचना भण्डारण,संगणक विकास और भाषा, साहित्य और समाज,विचार-विमर्श,संगणकीय शब्दावली,पारंपरिक हिंदी साहित्य का संगणकीय परिदृश्य,वेब साहित्य और संगणकीय व्यवस्था, इतिहास, हिंदी साहित्यिक,साहित्य और वर्तमान.

शोध विस्तार : ( Research Expansion)

भारत में संगणक का इतिहास 

विश्व का वर्तमान संगणक से जुडा है,अर्थात आज संगणक युग है. संगणकीय मीडिया का युग है.संगणक का उपयोग सभी जगह हो रहा है.संगणक की सहायता से अनेक कार्य शीघ्रतापूर्वक किए जा रहें हैं, इस बात को हमें मानना होगा.हमारे देश में “राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना 5 मई 1988 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने की थी। इसका उद्देश्य 2007 तक 15 से 35 आयु वर्ग के उत्पादक और पुनरुत्पादक समूह के निरक्षर लोगों को व्यावहारिक साक्षरता प्रदान करते हुए 75 प्रतिशत साक्षरता का लक्ष्य हासिल करना है। पुनर्संरचना के बाद इसके स्थान पर नया साक्ष्रर भारत कार्यक्रम सितम्बर 2009 से लागू किया गया है।1 कहना आवश्यक नहीं कि राष्ट्रीय साक्षरता का कार्य आज भी शुरू है.ऐसी स्थिति में संगणक साक्षरता का बोलबाला हुआ.संगणक ने देखते ही देखते हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रवेश कर लिया.इस बात को हम नकार नही सकते.वैज्ञानिक चिंतन परिणाम ही संगणक है.भारतीय विद्वानों द्वारा शून्य का आविष्कार करने के बाद संख्या को महत्त्व प्राप्त हुआ.अत: संगणक का विकास गतिशील बना.साक्षर होते हुए भी संगणकीय अज्ञान के कारण अनेक क्षेत्र में संगणकीय निरक्षरता दिखायी देने लगी.

संगणक और हिंदी साहित्य 

हिंदी साहित्य क्षेत्र में भी संगणकीय निरक्षरता का प्रभाव रहा.संगणक जैसे स्वचालित इलेक्ट्रोनिक यंत्र के माध्यम से हिंदी साहित्य को विश्वभर में पहुँचाया जा सकता है,इस विचार को आज भी हिंदी साहित्यविश्व के अनेक विद्वान स्वीकार नहीं करते.अनेक विद्वान टंकण तक जानते नहीं.इनपुट, भण्डारण,प्रोसेसिग,आउटपुट,कंट्रोल इस क्रम से संगणकीय प्रणाली विकसित होकर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर को आधार बनाकर आगे चलती है.

      इस बात को हमें समझना होगा.आज संगणक हिंदी ही नहीँ सभी भाषाओं के विकास में अग्रणी रहा दृष्टिगोचर होता है.हिंदी भाषा और साहित्य का वर्तमान में संगणकीय प्रणाली से सकारात्मक संबंध रहा है.आज हिंदी साहित्यविश्व में संगणकीय साक्षरता की आवश्यकता है.संगणक साक्षरता का अर्थ जानना आवश्यक है.अंतर्जाल का विकास और भाषाओं का संबंध सही अर्थों में संगणक साक्षरता से जुडा है.“विश्व भर में संगणक साक्षरता दिवस ( Computer Literacy Day ) प्रति वर्ष 2 दिसंबर को मनाया जाता है। संगणक साक्षरता का अर्थ है - संगणक क्या कर सकता है और क्या नहीं, इसका ज्ञान होना। अगर हम आज की स्थिति में देखें तो पाएंगे कि संगणक का ज्ञान अधिकांश लोगों को है। संगणक का ज्ञान होना आज की युवा पीढ़ी के साथ साथ हर व्यक्ति के लिए आवश्यक है। भारत में तेजी से बढ़ती हुई डिजिटल तकनीक ( Digital Technology ) और डिजिटल भविष्य ( Digital Future ) को ध्यान में रखते हुए संगणक का ज्ञान होना अति आवश्यक हो गया है। आज लोगों के हाथ में मोबाइल फोन और बढ़िया फीचर्स वाले स्मार्टफोन हैं, जिनमें संगणक  जैसी खास सुविधा है।
संगणक का ज्ञान आज की ज़रूरत ही नहीं बल्कि काफी फायदेमंद भी है। संगणक का ज्ञान शिक्षा के लिए ही नहीं रोजगार के लिए भी काफी आवश्यक है। आज के आधुनिक युग में तेजी से बढ़ती हुई तकनीक और डिजिटल क्रान्ति ( Digital Revolution ) के कारण संगणक मानव जीवन का एक जरूरी हिस्सा बन गया है। संगणक से जुड़ी हुई जानकारी को प्राप्त करना आज के विद्यार्थियों के उतनी ही जरूरी है जितनी उनकी पढ़ाई। इसीलिए संगणक के विषय में अपनी जानकारी और क्षमता को बढ़ाने के लिए दुनिया भर में 2 दिसंबर को संगणक साक्षरता दिवस मनाया जाता है। ”2  
कहना सही होगा कि संगणक साक्षरता दिवस मनाया जाना इस क्षेत्र में छिपा अज्ञान ही दर्शाता है.मेरी अपनी मान्यता यह है कि 14 सितंबर को “हिंदी दिवस समारोह” की जगह  “हिंदी संगणक साक्षरता दिवस समारोह” मनाना चाहिए.हिंदी भाषा और साहित्य का संबंध संगणक से जोड़ने से ही हिंदी साहित्य वैश्विक रूप धारण करेगा,इस में दो राय नहीं.सूचना प्रौद्योगिकी ने मानव जीवन को ही बदल दिया है.पारंपरिक काल के जितने उपकरण थे वह अब कालबाह्य हो रहें है.संगणक के कारण आज कुंजी पटल,छिद्रित कार्ड,फ्लापी डिस्क,चुम्बकीय ड्रम,चुम्बकीय फीता,सी.डी.रोम,गणितीय तार्किक इकाई, नियंत्रण इकाई,स्मृति आदि शब्द हिंदी साहित्य में प्रयोग में आना चाहिए. इन शब्दों के संदर्भ आज भी अज्ञान दृष्टिगोचर होता है.हिंदी साहित्य के साथ अन्य भाषाओं के साहित्य का विकास प्रक्रिया जोर पकड़ रहा है. “साहित्य की जिस तीव्रता के साथ वृद्धि  को रहीं है और उसी तीव्रता के साथ उपयोगकर्ताओं तक पहूँचाने हेतु अंतर्राष्ट्रीय स्तर  पर सूचना तंत्र (Information System )या नेटवर्किंग (Networking) की आवश्यकता महसूस की गई. इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु राष्ट्रीय स्तर पर अनेक नेटवर्क स्थापन हुए .युनिसिस्ट, इनिस,मेडलर्स,एग्रिस,डेवसिस,यूरोनेट,विनीति ”3 आदि नेटवर्कों के सहायता से साहित्य का संबंध संगणक से जोड़ा गया.लेखक,सरकार,समाचार पत्र, रेडियो,पुस्तकालय,फैक्स,सैटलाइट, टेलटेक्स ,वीडीयो टेक्स,ई-मेल,अंतर्जाल के कारण सूचना कम्यूनिकेशन अधिकधिक साहित्य के साथ जुड़ता गया लेकिन हिंदी साहित्यकरों ने अपनी संगणक निक्षरता को बरकरार रखा. “रिबन की पुस्तकें,मोम की पुस्तकें,चमड़े की पुस्तकें, कागज की पुस्तकें ”4 और वर्तमान में अंतर्जालीय पुस्तकें प्रकशित हो रहीं है.कहना आवश्यक नहीं की  अंतर्जालीय पुस्तकें पढ़ने के लिए और इन किताबों में लिखने के लिए संगणक साक्षर होना अत्यावश्यक बना. जो आज भी अनेक हिंदी साहित्यकार संगणक साक्षर बने नहीं हैं.संगणक के इनपुट डिवाइस की जानकारी साहित्यकार को होना चाहिए जैसे “ की-बोर्ड, माउस,प्रकाशीय पेन, ज्वॉस्टिक,स्कैनर ,बारकोड रीडर,माइकर ऑप्टिकल मार्क रीडर,डिजिटल कैमरा,टच स्क्रीन,माइक,स्पीच रिकॉगनिशन सिस्टम ”5 के साथ-साथ फॉन्ट कनवर्टर की जानकारी यदी हिंदी  साहित्य सृजनकर्ता को हो गयी तो निश्चित रूप में संगणकीय विश्व में हिंदी साहित्य का अधिक प्रचार- प्रसार होगा.

हिंदी टूल्स Hindi tools

हिंदी टूल्स ले संदर्भ में विश्व व्यापी वेब पर अनेक प्रकार की जानकारी उपलब्ध है. “बेहतरीन और सटीक परिणाम देने वाले फॉन्ट कनवर्टर Font Converter, जिनकी सहायता से आप हिन्दी के लगभग सभी popular fonts को Unicode में और यूनीकोड से अन्य हिन्दी फॉन्ट में आसानी से परिवर्तन कर सकते हैं.यदि आपने किसी विशेष हिंदी फॉन्ट जैसे Kruti Dev 010 या किसी अन्य फॉन्ट में काम किया है और अब आपको अपनी उस फाइल या डॉक्यूमेंट को ई-मेल द्वारा कहीं भेजना है अथवा अपनी वेबसाइट या ब्लॉग पर पब्लिश करना है, तो आपको उसे किसी Unicode based font जैसे Mangal आदि में converet करना होगा. ठीक इसी प्रकार यदि आपने यूनिकोड में कोई फाइल टाइप की है और उसे प्रिंटिंग के लिए देना है तो हो सकता है आपको उसे किसी विशेष font जैसे Chanakya आदि में convert करने की आवश्यकता हो. HindieTools.com पर आपकी इन समस्याओं का समाधान है.यहाँ आप किसी भी Hindi font to Unicode और Unicode to Kruti dev आदि फॉन्ट में conversion कर सकते हैं. Kruti dev to unicode and Unicode to Kruti Dev, Shusha to unicode and Unicode to Shusha,Kundali to unicode and Unicode to Kundali,Chanakya to unicode and Unicode to Chanakya,4cgandhi to unicode and Unicode to 4cgandhi,Devlys to unicode and Unicode to Devlys,Shivaji to unicode,DV-Divyae to unicode,DV-TTSurekhEn to unicode,DV-YogeshEN to unicode,DV-TTSurekh normal to unicode,DV-Alankar to unicode,Yuvraj to unicode,ShreeLipi to unicode6 फॉन्ट कनवर्टर (Font Converter) की जानकारी न रहने के कारण अनेक हिंदी साहित्यकार फॉन्ट न मिलने का कारण देकर हिंदी के वैश्विक आयोजनों में आपना मौलिक साहित्य भेजने में असमर्थता दर्शाते है. 

यूमीकोड Unicode

सूचना क्षेत्र विशेषत:हिंदी सूचना क्षेत्र में यूनिकोड के प्रयोग से लाभ हुआ दृष्टिगोचर होता है. “यूनिकोड के प्रयोग से सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि एक कंप्यूटर पर दर्ज किया गया पाठ(टेक्स्ट ) विश्व के किसी भी अन्य यूनिकोड आधारित कंप्यूटर पर खोला जा सकता है.इसके लिए अलग से उस भाषा के फॉण्ट का इसतेमाल करने की अनिवार्यता नहीं है,क्योंकि यूनिकोड केन्द्रित हर फॉण्ट में सिद्धांतत: विश्व की हर भाषा के अक्षर मौजूद हैं. कंप्यूटर में पहले से मौजूद इस क्षमता को सिर्फ सक्रिय करने की जरूरत है.जो विंडोज,एक्सपी,विंडोज 2000,विंडोज विस्ता मैक एक्स 10,रेड हैट लिनिक्स,उबन्तु लिनिक्स,आदि... हिंदी जानने वाला व्यक्ति यूनिकोड आधारित किसी भी कंप्यूटर में टाइप कर सकता है,भले ही वह विश्व के कोने में क्यों ण हो.सिर्फ हिंदी ही क्यों,एक ही फ़ैल में,एक ही फॉण्ट का इस्तेमाल करते हुए आप विश्व की किसी भी भाषा लिख सकते है.इस प्रकिया में अंग्रेजी कहीं भी आड़ नहीं आती ”7 कहना आवश्यक नही कि विश्वभर के संगोष्ठी आयोजकों ने भी किसी विशिष्ट फॉण्ट का आग्रह छोड़कर सरल यूनिकोड का पुरस्कार करना होगा.संगणक साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए यह आवश्यक है. संगणक पर सिर्फ अंग्रेजी में ही काम किया जा सकता है,इस मानसिकता के कारण आज भी हिंदी साहित्यकार बहार नहीं आना चाहता.अंतर्जालीय साहित्य को स्वीकारने की मानसिकता पारंपरिक लेखकों की लगभग नही के सामान ही है.

प्रवासी भारतीय साहित्यकारों का साहित्य अंतर्जाल पर अधिकता से उपलब्ध है.लेकिन पारंपरिक मुद्रित व्यवस्था पर विश्वास करने वाले अनेक लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार अंतर्जाल पर उपलब्ध प्रवासी साहित्य को साहित्य मानाने के लिए तैयार नहीं. वर्तमान में चिट्ठाकारी के माध्यम से हिंदी का विश्व भाषा के रूप में विकास हो रहा है,इस बात से हमें सहमत होना होगा.

हिंदी चिट्ठाकारी के इतिहास का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि 2011 साल से सही अर्थों में यूनीकोड के अवतरण से ही हिंदी का विश्व रूप हमारे सामने प्रस्तुत हुआ.भारतीय तथा भारतीयतर साहित्यकारों में चिट्ठाकारी के माध्यम से वर्तमान में हिंदी का वैश्विक रूप दृष्टिगोचर होता है. हिंदी का विकास ही हिंदी साहित्य का विकास है.हिंदी चिट्ठाकारी अंतर्जाल के कारण ही विकसित हुई,इस बात को हमें मानना होगा. जो हिंदी साहित्यिक संगणक साक्षर है,वह जानते है कि अंतर्जालीय चिट्ठाकारी से अपना साहित्य वैश्विकमंच पर प्रकशित हो रहा है.अनेक साहित्यकार संगणक का ज्ञान प्राप्त कर रहें हैं.वर्तमान काल में लेखक को अपनी किताब विश्व के सभी हिंदी  पाठकों तक पहुँचानी है हो अंतर्जाल का ही सहारा लेना पड़ रहा है. कहना आवश्यक नहीं कि संगणक साक्षरता के आभाव में यह संभव नहीं. 

अंतर्जाल पर उपलब्ध साहित्यिक पत्रिकाएँ नियमित रूप से स्तरीय हिंदी साहित्य प्रकाशित करने में व्यस्त दिखायी देती है.“ हिंदी नेस्ट, सृजन गाथा, अभिव्यक्ति, शब्दांजलि, साहित्यकुंज, छाया, गर्भनाल, भारत दर्शन, वेब दुनिया, ताप्तीलोक, कृत्या, रचनाकार, कलायन और इंद्रधनुष्य... मुद्रित पत्रिकाओं में हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, अन्यथा, मधुमती ”8 आदि अंतर्जाल पर संपूर्ण रूप से प्रकाशित हो रहीं हैं.

श्रीकान्त सिंह, 428, रोहित नगर, फ़ेस प्रथम, भोपाल से प्रकाशित ‘मीडिया-विमर्श’ (ISSN Number-22490590) से लेकर Historical International Reserach Journal(ISSN Number- 23938906), कुमार गौरव मिश्रा द्वारा संपादित विश्व की दस से अधिक रिसर्च इंडेक्स में शामिल ‘जनकृति’अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका (ISSN 2454-2725 ) कुल 240 हिंदी अनुसंधान पत्रिकाओं की सूची विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (U.G.C.) ने दिनांक 1 जनवरी 2018 तक प्रकाशित की है.इन में से अनेक पत्रिकाएँ संगणक साक्षर व्यक्ति ही पढ़ सकता है. 

हिंदी के अनेक अनुसंधाता संगणक निरक्षरता के कारण वर्तमान में  भी अंतर्जाल पर प्रकाशित अनुसंधान पत्रिकाओं तक पहुंच नहीं पा रहें है.इस बात को हम नकार नहीं सकते.अंतर्जालीय साहित्यिक पत्रकारिता के माध्यम से हिंदी साहित्य का संगणक साक्षरता के साथ  गहरा संबंध रहा है.हिंदी के अनेक विद्वान संगणक अर्थात कंप्यूटर प्रणाली का  क, ख,ग,घ नहीं जानते तो टंकण की बात तो दूर ही रह जाती है, संगणक निरक्षर हिंदी साहित्यिक,अनुसंधाताओं को खुद को संगणक साक्षर बनाने की आवश्यकता है. “आज स्वतंत्र सूचना व्यवस्था अपना स्थान बनाने लगी है. आने वाले समय में यह सूचना व्यवस्था सभी नागरिकों के लिए व्यापक विविधता वाले राजनीतिक विकल्पों का भी प्रतिनिधित्व करेगी और इसमें भागीदारी सभी योग्य व्यक्तियों के लिए खुली होगी.ई-सूचना व्यवस्था विचारों की अभिव्यक्ति के लिए मंच उपलब्ध कराएगी.”9 कहना उचित होगा कि ई-सूचना व्यवस्था का हिंदी  साहित्य भी अविभाज्य अंग बनेगा और इस व्यवस्था को जानने के लिए हिंदी साहित्य विश्व में सहभागी सभी को संगणक साक्षर बनाना होगा.हिंदी साहित्य के वैश्वीकरण की प्रक्रिया ही मूलतः संगणक यूनिकोडीग के साथ शुरू हुई दृष्टिगोचर होती है.

      आज अंतर्जाल के कारण “आज विश्व के 180 देशों में किसी न किसी रूपा में हिंदी की  स्वरलहरियाँ गूँज रहीं हैं. रूस , चीन, जापान, हंगेरी, अमेरिका, त्रिनीनाड, उज्बेकिस्तान, इटली, मॉरिशस, फिजी, गुयाना, नेपाल, सहित दो दर्जन से अधिक देशों  के 125 कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में हिंदी का पठन-पाठन और शोध – कार्य संपन्न हो रहें हैं.”10 सोशल मीडिया में भी  हिंदी लेखकों, कवियों, कहानीकारों आदि रचनाकारों का आना अपेक्षाकृत बाद में हुआ और यह सिलसिला अब भी पूरी तरह से गति नहीं पकड़ पाया है.अत: संगणकीय निरक्षरता का ही यह परिणाम मानना होगा.अंतरजाल पर वेब के माध्यम से सभी विधाओं में हिंदी साहित्य प्रकाशित हो रहा है.“वेब ने सूचना और समाचार के अभिजात्यवाद को दरकिनार कर उसे सार्वजनिक और आम गलियारा बना दिया है.वेब की इन विशेषताओं ने उसे एक वर्गविहीन स्वरूप भी दिया है.वो एक वर्ग से संचालित और नियंत्रित नहीं रहता,उस पर एक तरह से सबका अधिकार हो जाता है.”11 अतः कहना उचित होगा कि वेब पर प्रकाशित हिंदी साहित्य पर भी सभी पाठकों का अधिकार बन जाता है. सभी हिंदी अध्येताओं  को संगणक से संबंधित हिंदी साहित्य का अध्ययन करने के लिए पहले खुद को  संगणक साक्षर बनाना होगा.संगणकीय अज्ञान के होते हुए संगणक से संबंधित हिंदी साहित्य का अध्ययन करना किसी भी विद्वान को आसान नहीं होगा.इस बात को हमें सहमत होना होगा.     

निष्कर्ष (Conclusion)

     निष्कर्षतः स्पष्ट हो जाता है कि संगणकीय साक्षरता,मीडिया और हिंदी साहित्य का संबंध एकदूसरे को पूरक रहें हैं. हिंदी साहित्य का वैश्विक विकास ही संगणक के कारण गतिशील हो रहा है. विश्व का वर्तमान संगणक से जुडा है,अर्थात आज संगणक युग है.संगणक का उपयोग सभी जगह हो रहा है.संगणक की सहायता से अनेक कार्य शीघ्रतापूर्वक किए जा रहें हैं, इस बात को हमें मानना होगा. संगणक ने देखते ही देखते हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रवेश कर लिया.इस बात को हम नकार नही सकते.वैज्ञानिक चिंतन परिणाम ही संगणक है.भारतीय विद्वानों द्वारा शून्य का आविष्कार करने के बाद संख्या को महत्त्व प्राप्त हुआ.अत: संगणक का विकास गतिशील बना.साक्षर होते हुए भी संगणकीय अज्ञान के कारण अनेक क्षेत्र में संगणकीय निरक्षरता दिखायी देने लगी.हिंदी साहित्य क्षेत्र में भी संगणकीय निरक्षरता का प्रभाव रहा.संगणक जैसे स्वचालित इलेक्ट्रोनिक यंत्र के माध्यम से हिंदी साहित्य को विश्वभर में पहुँचाया जा सकता है,इस विचार को आज भी हिंदी साहित्यविश्व के अनेक विद्वान स्वीकार नहीं करते. मेरी अपनी मान्यता यह है कि 14 सितंबर को “हिंदी दिवस समारोह” की जगह  “हिंदी संगणक साक्षरता दिवस समारोह” मनाना चाहिए.हिंदी भाषा और साहित्य का संबंध संगणक से जोड़ने से ही हिंदी साहित्य वैश्विक रूप धारण करेगा,इस में दो राय नहीं. फॉन्ट कनवर्टर की जानकारी यदी हिंदी  साहित्य सृजनकर्ता को हो गयी तो निश्चित रूप में संगणकीय विश्व में हिंदी साहित्य का अधिक प्रचार- प्रसार होगा.हिंदी टूल्स के संदर्भ में विश्व व्यापी वेब पर अनेक प्रकार की जानकारी उपलब्ध है. इस जानकारी का उपयोग कर संगणक निरक्षरता को जड़ से उखाड़ फेंकने का वक्त आ चूका है. अनेक हिंदी साहित्यकार फॉन्ट न मिलने का कारण देकर हिंदी के वैश्विक आयोजनों में आपना मौलिक साहित्य भेजने में असमर्थता दर्शाते है. सूचना क्षेत्र विशेषत:हिंदी सूचना क्षेत्र में यूनिकोड के प्रयोग से लाभ हुआ दृष्टिगोचर होता है. विश्वभर के संगोष्ठी आयोजकों ने भी किसी विशिष्ट फॉण्ट का आग्रह छोड़कर सरल यूनिकोड का पुरस्कार करना होगा.संगणक साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए यह आवश्यक है. हिंदी के अनेक विद्वान संगणक अर्थात कंप्यूटर प्रणाली का  क, ख,ग,घ नहीं जानते तो टंकण की बात तो दूर ही रह जाती है, संगणक निरक्षर हिंदी साहित्यिक,अनुसंधाताओं को खुद को संगणक साक्षर बनाने की आवश्यकता है.हिंदी  विद्वजनों की संगणकीय साक्षरता का प्रमाण जितना अधिक होगा,उतना ही हिंदी साहित्य वैश्विक स्तर पर अपना स्थान पक्का करेगा. इस में दो राय नहीं.        

संदर्भ−निदेश (References)

1.www.wikipedia.org Dtd. 2/1/2018 Time 5 A.M.

2. www.rafftar.com Dtd. /1/2018 Time  12:45 A.M.

3. प्रहलाद शर्मा- इंटरनेट और पुस्तकालय ,पृष्ठ – 114

4.एम.आइलन- पुस्तक के जन्म और विकास की कहानी, पृष्ठ – 06

5. प्रो.हरिमोहन- सूचना प्रौद्योगिकी,कम्पूटर और अनुसंधान, पृष्ठ−98.

6. www.hindietools.com Dat.28/12/2017 Time 4:07 P.M.

7. संपादक हंसराज और एस.विक्रम – वेब पत्रकारिता, पृष्ठ−70.

8. वहीं- पृष्ठ−166.

9.सुरेश कुमार- इंटरनेट पत्रकारिता, पृष्ठ−03

10.सतीश शर्मा – संचार माध्यमों की भाषा और नई हिंदी, पृष्ठ−15

11.शालिनी जोशी,शिवप्रसाद जोशी- वेब पत्रकारिता नया मीडिया नये रूझान,पृष्ठ−102



शोध निर्देशक एवं सहायक प्राध्यापक,
स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,अहमदनगर महाविद्यालय,
अहमदनगर−414001(महाराष्ट्र) दूरभाष : 09850619074, 08149759014 
ई−मेल : satappa.chavan@aca.edu.in
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