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भारत में नई कृषि प्रणाली के रूप में जैविक कृषि का पर्यावरण और कृषि उत्पादन पर प्रभाव

भारत में नई कृषि प्रणाली के रूप में जैविक कृषि का पर्यावरण और कृषि उत्पादन पर प्रभाव

चन्दन कुमार 

सारसंक्षेपः

भारत में कृषि किसानों की आजीविका के साथ-साथ विशाल जनसँख्या के लिए भोजन का मुख्य साधन भी है। भारत में परिवेशीय और राजनीतिक माँग एवं जरूरतों के हिसाब से कृषि प्रणाली के स्वरूप में बदलाव होता रहा है।  कृषि के विकास और भोजन की आपूर्ति के लिए वर्ष 1967 में हरित क्रांति के माध्यम से रासायनिक खेती का आरम्भ होता है। जिसके प्रभाव से उत्पादन बढ़ा परन्तु इसमें स्थिरता नही होने के कारण इसके नकारात्मक प्रभाव ने किसान और पर्यावरण दोनों को नुकसान पहुचाया। इसलिए नई कृषि प्रणाली के रूप में जैविक कृषि का आगमन हुआ है, जिसे जीरो बजट कृषि पद्धति भी कहा जाता है। भारत में जैविक खेती को बढ़ावा देने की लिए वर्ष 2002 में राष्ट्रीय उत्पादन जैविक कार्यक्रम को लागू किया गया।  भारत में जैविक उत्पादों की बढती माँगों के कारण जैविक खेती का क्षेत्रफल 2003-04 में 42 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 2018 में 3.56 मिलियन हेक्टेयर हो गया है। आज भारतीय किसान अपना भविष्य जैविक खेती की ओर देख रहे है। जो उत्पादन और आमदनी को बढ़ा सकें। वर्तमान में परम्परागत कृषि विकास योजना के माध्यम से सरकार द्वारा जैविक खेती को अपनाने के लिए किसानों को अनुदान दिया जा रहा है।

मुख्य शब्दः हरित क्रांति, पर्यावरणीय संकट, जैविक कृषि प्रणाली,  उत्पादन, आमदनी, संसाधन संरक्षण   

1.     1.  परिचय
2.      कृषि
3.      पारंपरिक कृषि
4.      आधुनिक कृषि
5.      जैविक कृषि
6.      भारत में जैविक कृषि

7.      निष्कर्ष

परिचय:

इस विशाल जनसँख्या वाले संसार में जीवन को कायम रखने में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की नीव रखने में कृषि की अहम भूमिका होती है। भारतीय अर्थव्यवस्था अति प्राचीन काल से कृषि आधारित रही है। भारत के पास कृषि योग्य 157.35 मिलियन हेक्टेयर भूमि है जो विश्व में दूसरा स्थान रखता है।[1] कृषि के लिए भारत में उपयोगी जलवायु स्थिति और मिट्टी की गुणवता है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने कहा था की “भारत की आत्मा गांवो में बसती है” इस प्रकार भारतीय अर्थव्यवस्था हो या भारतीय जन जीवन सभी कृषि के इर्द-गिर्द ही चक्कर काटते नजर आते है। भारत गांवो का देश है जिसके कारण भारत में कृषि को ज्यादा प्राथमिकता दिया जाता है। वर्ष 1958 में कृषि के महत्व को रेखांकित करते हुए कृषि प्रशासनिक समिति ने कहा था कि “कृषि ही सभी उधोगो की जननी है और मनुष्य को जीवन प्रदान करने वाली है।

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कृषि-

Agriculture” की उत्पति लैटिन शब्द ager या agri, जिसका मतलब soil (मिट्टी) और culture का मतलब cultivation(जोताई) से हुआ है।[2] जिसका यह अभिप्राय है कि मिट्टी की जोताई की प्रक्रिया को कृषि कहते है। यह मिट्टी के जोताई की विज्ञानं और कला है। जो कई दश्को से अनाजों की उत्पादन के लिए किया जाता रहा है। अन्न उत्पादन को बढ़ा कर पृथ्वी जगत पर मानव जीवन को कयाम रखा गया है। जिसमे कृषि का महत्वपूर्ण योगदान है। मानव जीवन के आरम्भ से ही कृषि मानव सभ्यता का पोषण कर्ता रहा है।  

इतिहासकारों का मानना ही कि कृषि का विकास मध्य पूर्व में 10000 हजार साल पहले हुआ था[3] कृषि की कला जोताई की खोज से पहले लोग निरंतर घूम घूम कर भोजन की तलाश और पशुपालन करते थे। जिस प्रकार मानव सभ्यता का इतिहास है उसी प्रकार कृषि का भी इतिहास है।  कृषि या खेती को एक प्रणाली के माध्यम से समझ सकते है इस प्रणाली में कृषि के 6 स्तम्भ है बीज, मिट्टी, जल, मौसम, औजार, किसान। मिट्टी कृषि के लिए महत्वपूर्ण तथ्य है मिट्टी की प्रकृति फसल के पैदावार को सुनिश्चित करता है कृषि के लिए जल का उचित प्रबंधन भी फसलो के लिए अच्छा होता है मौसम का भी फसलो की चुनाव में अहम भूमिका निभाता है अच्छे बीज के प्रयोग से अच्छी उत्पादन होता है यंत्र के प्रयोग मानव श्रम में मदद करता है। परन्तु यह समय के साथ साथ बदलता रहा है। डेनियल थोर्नेर (Daniel Thorner) का मानना है कि कृषि कृषको का पारम्परिक और प्राथमिक व्यवसाय है।[4] आज कृषि में ज्यादा से ज्यादा तकनीको का इस्तेमाल किया जा रहा है।  परन्तु कुछ किसान अभी भी पुराने तकनीको का इस्तेमाल कर रहे है क्योकि ये कृषि के रीढ़ है। कृषि को दो स्वरूपो के माध्यम से समझ सकते है पारम्परिक कृषि और आधुनिक कृषि।

पारम्परिक कृषि

पारम्परिक कृषि के समय लोग समुदाय बनाकर गांवो में रहने लगे । जिसमे खेती, पशुपालन, मिट्टी के बर्तनो का निर्माण, अनाजों का पिसाई और कपड़े की बुनाई आरम्भ किये। पारम्परिक कृषि में यंत्रो का निर्माण किसान अपने परिवेश के अनुसार करते थे। जो किसानों की जरूरतो के अनुकूल होता था।[5] उस समय ज्यादा कार्य हाथो के माध्यम से किया जाता था। जमीन, मानसून, वर्षा के माध्यम से जो प्राकृतिक अवसर फसल के बोआई के लिए प्राप्त होता था उसी के अनुसार फसल का उत्पादन होता था। पशुओं के मल-मूत्र के माध्यम से खाद तैयार किया जाता था। जो कृषि यंत्र बनया जाता था वह गाँव में में ही बनाया जाता था। प्राय: परम्परागत कृषि में घरेलू आवश्कताओं के अनुसार ही अनाज का उत्पादन किया जाता था।[6] अनाजों का विभिन्न प्रकार के किस्मो का उत्पादन किया जाता था। अपने आवश्कयता से ज्यादा अनाज को दुसरे वस्तुओं को खरीदने में इस्तेमाल किया जाता था उस समय समाज में वस्तु विनियम प्रणाली विधमान था वस्तु के बदले लोग वस्तुओं का लेने-देन किय जाता था। लोग ग्रामीण स्तर पर ही रहते थे लोगो का विस्थापन कम था। उस समय कृषि ही अर्थव्यवस्था का मूल साधन था परन्तु कृषि से उधोग की तरह समाज अग्रसर हुआ जिसके कारण कृषि के सरचना में भी बदलाव हुआ। जिसके कारण कृषि परंपरागत कृषि से आधुनिक कृषि कि ओर अग्रसर हो गया।

आधुनिक कृषि

जिस प्रकार से जनसँख्या बढ़ता जा रहा है कृषि पर दबाव बढता जा रहा है परन्तु कृषि योग्य जमीन में बढ़ोतरी नही हो रहा है। आधुनिक कृषि का विकास विकसित देशो में हुआ था।[7]  इस लिए कृषि में तकनीक के प्रयोग के माध्यम से कृषि में उत्पादन को बढ़ाने पर बल दिया जा रहा है। आधुनिक कृषि का आरम्भ उधोगो के आगमन के बाद होता है। आधुनिक कृषि में ज्यादा से ज्यादा कृषि कार्य यंत्रो के माध्यम से किया जाता है। नये ज्यादा उत्पादन वाले बीजो का प्रयोग किया जाता है। रासायनिक खादों का प्रयोग किया जाता है। आधुनिक कृषि से अनाज की गुणवता और मात्रा दोनों बढ़ गया है। ग्रामीण भारत की भूखमरी और गरीबी को कम करने में सहायक साबित हुआ है। आधुनिक कृषि ने भूगोलिक और आर्थिक दोनों पर प्रभाव डाला है  बंजर जमीनों को उपकरणों के माध्यम से संचित बना कर कृषि योग्य बनाया जा रहा है। जिससे किसानों की आर्थिक आमदनी बढ़ गई है।[8] आज ज्यादा लोग अच्छा भोजन करना पसंद कर रहे है जिसमे आधुनिक कृषि का अहम भूमिका है।

                   परन्तु आधुनिक कृषि का नकारात्मक प्रभाव भी है। कृषि में उत्पादन को बढ़ाने के लिए ज्यादा रसायनिकी खाद, तकनीक का उपयोग किया जाता है। आधुनिक तकनीको का निर्माण किसानों के परिवेश के अनुसार नही किया जाता है जिससे पर्यावरण और मनुष्य दोनों को खतरा है।

नई कृषि पद्धति के रूप में जैविक कृषि

जैविक कृषि भविष्य के लिए उभरता हुआ एक विशिष्ट कृषि पद्धति है। जो उत्पादन में स्थिरता और पर्यावरण में संतुलन बनाये रखने के लिए बेहतर है। परम्परागत कृषि से भिन्न यह कृषि पद्धति निवेशकों के लिए लाभकारी है। इसलिए जैविक खेती में कृषक वर्ग के साथ-साथ गैर-कृषक वर्ग की भी भागीदारी है। गैर-कृषक वर्ग उत्पादन से लेकर उपभोक्ता तक जैविक उत्पाद पहुचाने में किसानों के साथ कार्य कर रहे है। एवं इस कारण से किसानों के आर्थिक स्थिति में तेजी से बदलाव हो रहा है।

वर्तमान समय में जैविक उत्पादों के प्रति ग्राहकों की जागरूकता बढ़ने के कारण आज 100 से ज्यादा देशों में जैविक कृषि पद्धति को अपनाया जा रहा है।[9] वर्तमान समय में उपभोगता मानसिक परिवर्तन के कारण रासायनिक पदार्थो के बजाय जैविक खेती से उत्पादित भोज्य पदार्थ उच्च गुणवता और मूल्य पर स्वास्थ्य रहने के लिए खाना पसंद कर रहे है। नीति-निर्माता भी जैविक कृषि पद्दति को बढ़ावा देने के संदर्भ में कार्य कर रहे है। जिसमें ग्रामीण संरचना को मजबूती के साथ-साथ मिट्टी के स्वास्थ्य और पर्यावरण को ध्यान में रखा जाता है। भारत में दिन-प्रतिदिन जैविक खेती का क्षेत्रफल बढ़ता जा रहा है। राष्ट्रीय उत्पादन जैविक कार्यक्रम के माध्यम से जैविक खेती के लिए राष्ट्रीय मानक तय किया गया है। राष्ट्रीय जैविक कृषि केंद्र कृषि मंत्रालय के अधीन कार्य करते हुए, जैविक खेती की सुविधाओं को पुरे देश में जैविक व्यवसायी और किसानों तक पहुचा रहे है। 

जैविक कृषि का इतिहास

आज के समय में जैविक कृषि का महत्व बढ़ गया है। परन्तु इसका इतिहास 10000 साल पुराना है, क्योकि यह एक पारम्परिक खेती है। जिसका जिक्र रामायण, महाभारत, ऋग्वेद, कौटिल्य के अर्थशास्त्र आदि में मिलता है। आधुनिक समय में जैविक खेती के जनक सर अल्बर्ट होवार्ड (Sir Albert Howard) को माना जाता है। इन्होंने जैविक खेती के प्रक्रिया को विकसित किया। जो “An Agriculture Testament” (1940) पुस्तक के नाम से प्रकाशित हुआ है। जैविक खेती के संदर्भ में Rudolph Steiner जो अध्यात्मिक और दार्शनिक थे, जिन्होंने जर्मनी में जैव-गतिशील (Bio-dynamic) कृषि-क्षेत्र का स्थापना किया। इनका योगदान जैविक कृषि में महत्वपूर्ण रहा है। J.I. Rodel(1950) ने U.S.A में टिकाऊ कृषि के ढांचा और जैविक खेती के पद्धति के संदर्भ में बात किया है। International Federation of Organic Agriculture Movements (IFOAM) की स्थापना 1972 में किया गया। जो जैविक कृषि को बढ़ावा देने के लिए एक आन्दोलन के रूप में उभर कर आया। Masanobu Fukoka एक जापानी किसान और दार्शनिक द्वारा लिखित पुस्तक On Straw Revolution 1975 में प्रकृतिक खेती और भूमि को पुन: उपजाऊपन बनाने के लिए कृषि पद्धति का उल्लेख किया गया है।

                पारम्परिक खेती और जैविक खेती में अंतर है। Earlier Lampkin के अनुसार “जैविक कृषि उत्पादन की येसी प्रणाली है, जो रसायनिक खादों, कीटनाशकों को पूर्णत: नकारता है। और पशुधन के वृद्धि और इसके नियामको के आधार पर विकसित होता है।” जैविक खेती के चार स्तम्भ होते है, 1. जैविक मानक, 2. प्रमाण/नियामक तंत्र, 3. संरक्षण का तकनीक, 4. बाजार तंत्र

जैविक मानक- आधुनिक समय में जैविक कृषि का महत्वपूर्ण तथ्य प्रमाणिकता नियोजन है। जो नियम, निगरानी(प्रमाण, न्याय) पर आधारित है। इसके तहत ही जैविक कृषि अन्य कृषि पद्धतिओं से अलग माना जाता है। यह मानक का एक स्तर तय करता है, जो व्यवसाय के लिए प्रमाणित किया जाता है। इसके उत्पादक और विक्रेता का जाँच होता है। इसको एक अभिकरण के माध्यम से प्रमाणित किया जाता है। और बाजार तंत्र जैविक उत्पादों को उच्च दाम पर कृषि-क्षेत्र समुदायों से खरीदता है। इसका पहला नियम है कि आप पहले घरेलू बाजारों के लिए उपजायेंगे और बाद में निर्यात करने के लिए उगाया जायेगा। आज विश्व में सबसे ज्यादा जैविक खेती आस्ट्रेलिया में किया जाता है। भारत में परम्परागत कृषि के माध्यम से जैविक खेती को किसानों के द्वारा 1950 के मध्य तक अपनाया गया था। 1960 के दशक में हरित क्रान्ति का आगमन भारतीय कृषि के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। जो अनाज के उत्पादन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया। इस अवधि में भारतीय कृषि में अनाजों का उत्पादन 1950-51 में 50.82 मिलियन टन से बढ़कर 2003-04 में 212.05 मिलियन टन पहूँच गया। परन्तु इस काल में ज्यादा रासायनिक खादों के इस्तेमाल ने भारतीय कृषि के समक्ष चार प्रश्नों को खड़े कर दिए। प्रथम उत्पादन में स्थिरता की कमी, मिट्टी की गुणवता में गिरावट, मानव स्वास्थ्य का बिगड़ना और पर्यावरण में प्रदूषण। इससे निपटने के लिए भारतीय कृषि में जैविक खेती के अलावा कोई विकल्प नही था जो स्थिरता को कायम करे।

समकालीन भारत में जैविक कृषि

समकालीन भारत में दूसरी हरित क्रांति के माध्यम से जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। जिसके कारण भारतीय किसान अपनी भविष्य जैविक खेती की ओर देख रहे है। परम्परागत कृषि विकास योजना के माध्यम से सरकार द्वारा जैविक खेती को अपनाने के लिए किसानों को अनुदान दिया जा रहा है। जैविक खेती को बढ़ावा दने के लिए सरकारी संस्थाए और गैर-सरकारी संस्थाए किसानों के साथ मिलकर खेत से लेकर बाजार तक कार्य कर रही है। इस प्रकार से, क्या जैविक खेती एक नई कृषि प्रणाली के रूप में उभरी है। जिस प्रकार से उत्पाद को उगाने और उत्पाद को बेचने के मानक तय किये गये है, शायद यह किसानों के समझ से दूर है। इसलिए किसान गैर-सरकारी संस्थाओ के साथ मिलकर जैविक खेती को अपना रहे है। जिससे स्वास्थ्य और पर्यावरण के संरक्षण के साथ-साथ उत्पादन और अपनी आमदनी को भी टिकाऊ बना सके। 

             भारत में जैविक खेती की शुरुआत 19वी सदी में कृषि वैज्ञानिक सर अल्बर्ट होवार्ड द्वारा इंदौर में शुरू किया गया था। इन्होंने वायुजीवी खाद विकसित किया। इसके बाद भारत में वर्ष 2000 जैविक खेती के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा। इस वर्ष चार मुख्य कार्य किये गये।

प्रथम- योजन आयोग ने 10वी पंचवर्षीय योजना के माध्यम से जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए उतर-पूर्व भारत में परियोजनाओं का आरम्भ किया।

दूसरा- राष्ट्रीय कृषि नीति-2000 ने परम्परागत और जैविक खेती के ज्ञान को प्रोत्साहन देने का कार्य किया।

तीसरा- जैविक खेती के बढ़ावा देने के लिए टास्क फ़ोर्स का गठन कृषि और सहकारिता विभाग द्वारा किया गया।

चौथा- व्यवसाय मंत्रालय ने वर्ष 2000 में राष्ट्रीय जैविक परियोजना और कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण, Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority  (एपीडा) (APEDA) के  माधयम से राष्ट्रीय उत्पादन जैविक कार्यक्रम (N.P.O.P) का निर्माण किया गया।  इस प्रकार से भारत में जैविक खेती के विकास को समझ सकते है।

                  भारत में जैविक खेती के माध्यम से प्राथमिक क्षेत्र में स्थिरता को कायम करने के लिए विभिन्न कार्यो को अपनाया जा रहा है। जैविक खेती एक पद्धति के रूप में संसाधन, उर्जा और पर्यावरण के संरक्षण के लिए किसानों के अनुभवों को प्रस्तुत करता है।[10]  भारत में दो-तीन दशकों से ही जैविक खेती के उत्पादन के लिए बाजार, शोध, और नीतियों का महत्व बढ़ा है। इस अवधि में यह देखने को मिलता है कि कैसे कम लागत पर उत्पादन और आमदनी बढ़ी है। जिसने पर्यावरण और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए अच्छे गुणवता वाले उत्पादों का उत्पादन किया है। भारत में इसको योजनाबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है, ताकि घरेलू और वैश्विक स्तर पर इसका माँग बढे।

जैविक कृषि का उत्पादन और पर्यावरण पर प्रभाव

जैविक कृषि का पर्यावरण और उत्पादन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। क्योकिं विज्ञान के आधार पर जैविक खेती की समझ यह है कि जैव विज्ञान और भौतिक विज्ञान में भौतिक विज्ञान ने ज्यादा तरक्की किया है।[11]  भौतिक विज्ञान उधोग के क्षेत्रोँ में प्रयोग किया जाता है। वही जैव विज्ञान का प्रयोग कृषि क्षेत्र के लिए किया जाता है। जिसमे खेती, वनिका, मत्स्य पालन और पशुपालन शामिल है। प्राथमिक क्षेत्र के परिणाम का गुणाक करने पर यह नकारात्मक और सकारात्मक दोनों हो सकते है, और इसका प्रभाव जल्दी या विलंब से नजर आ सकता है। 1950 के अंतिम दश्क में हरित क्रांति का भारत में आरम्भ होता है। जो पूर्णत: भौतिक विज्ञान पर आधारित होता है जो विज्ञान और तकनीक के माध्यम से मिट्टी को नष्ट करना आरम्भ कर देता है। 1960-70 में भोजन की आपूर्ति के लिए युद्ध स्तर पर कार्य किया गया, इसका कोई आलोचना नही किया गया। 1970 तक हम अनाज में आत्म-निर्भर हो गये परन्तु रासायनिक खादों के इस्तेमाल ने बहुत सारे बीमारीओं को भी आमंत्रित कर दिया। उत्पादन को जल्दीबाजी में बढ़ाने के लिए जैविय प्रणाली को अनदेखा कर दिया गया था जिसके कारण 1980 के दश्क के बाद देश में पर्यावरण, सामाजिक, आर्थिक समस्या उभर आई। इसका मुख्य कारण जैव्-विज्ञान को अनदेखा करके प्राथमिक क्षेत्र में  भौतिक विज्ञान का सहारा लिया जाना था। 

परम्परागत खेती- 

जैविक खेती के आगमन से पहलें उत्पादन बाहरी लागत जैसे रसायनिक खाद, बीज, सिंचाई आदि पर निर्भर था। जो उत्पादन को सही स्तर पर नही पहुचा पाता था जो मिट्टी के गुणवता को भी नष्ट कर देता था। इससे उत्पादक को कई बिमारियों का सामना करना पड़ता था। 1990 के बाद भारत में किसान आत्महत्या बढ़ गया इसका मुख्य कारण ज्यादा लागत और कम आगता या नही भी था। इस संदर्भ में एम.स.स्वामीनाथन भी हरित क्रांति की बात करते है जिसमें प्रकृति को बिना नुकसान पहुचाये उत्पादन को बढाया जा सकता है, जो पूर्णत: प्रकृति पर ही निर्भर है।

जैविक खेती- 

1970 के दश्क में रसायनिक खेती के हानिकारक परिणाम और 1990 के दश्क में ग्राहकों को बिमारियों के शिकार होने के कारण प्राथमिक क्षेत्र में एक शुद्ध और स्थिर उत्पादन प्रणाली के लिए जैविक खेती विकल्प के रूप में अपनाया गया। जैविक खेती के बहुत सारे महत्वपूर्ण पक्षों पर चर्चा किया गया। जैविक खेती प्रकृतिक उत्पादन, ग्राहक हितकर प्रणाली के साथ-साथ प्रकृति में विधमान अवशिष्टों के प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है। भारत में 17वी सदी में 9 टन प्रति हेक्टेयर उत्पदान होता था जो ब्रिटिश काल में 7 टन हो गया। आधुनिक विज्ञान का अविष्कार सिर्फ रसायनिक खादों के अविष्कार खोज के लिए नही हुआ है बल्कि इसको जैविक खादों के खोज से कृषि में सुधार किया जा सकता है।

            जैविक खेती के संदर्भ में वैचारिक महत्व पिछलें कुछ दश्को में सामाजिक और पर्यावरण के मुद्दे  से जुड़कर बढ़ी है। कृषि एक येसा क्षेत्र है जो इन दो मुद्दो के संदर्भ में अहम भूमिका निभाता है। जैविक खेती उत्पादन प्रणाली सिर्फ पर्यावरण के मुद्दे पर सहमत नही है बल्कि रोजगार, स्वास्थ्य और विस्थापन आदि के लिए महत्वपूर्ण है। IFOAM के अनुसार “जैविक कृषि एक पवित्र प्रणाली है जो पर्यावरण के स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए पारम्परिक और आधुनिक दोनों ज्ञान का प्रयोग करता है। इस जैविक प्रणाली में बाहरी तंत्र के बजाय पारिस्थितिकी तंत्र को ज्यादा महत्व दिया जाता है।” Food and Agriculture Organization (FAO) ने 2002 में “जैविक खेती एक पर्यावरणीय और सामाजिक संवेदनशीलता के आधार पर भोजन आपूर्ति की प्रणाली है। इसका प्राथमिक लक्ष्य स्वास्थ्य और उत्पादन में स्थिरता के साथ-साथ स्वतंत्र समुदायों जैसे मिट्टी, पौधें, जानवरों और लोगों के अनुकूल कार्य करना है।” जैविक उत्पाद के बढ़ते मांग के आधार पर भारत में 2020 तक 100 लाख हेक्टेयर भूमि को जैविक खेती में बदलने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए भारत में उतर-पूर्व राज्यों ने नीतियाँ बनाई है।

                जैविक खेती के माध्यम से भविष्य के चुनौतियों जैसे खादों के मांग और आपूर्ति के अनुदान से मुक्ति, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करना, खाद सुरक्षा सुनिश्चित करना, मिट्टी की गुणवता को बनाये रखना, जल संरक्षण, जैव-विविधताओ का संरक्षण, उर्जा संरक्षण से निपटा जा सकता है।

भारत में जैविक खेती को तीन स्तर पर समझ सकते है। पहला 70 प्रतिशत है इसको स्थानीय स्तर पर जैविक खेती मानते है जो कम उत्पादन करता है। जो स्थानीय स्तर पर ही उपभोग के साथ-साथ वस्तुओं और आनाज का सुरक्षा देता है। दूसरा 25 प्रतिशत है जो स्थानीय स्तर पर उत्पादन तो किया जाता है। जिसमे उच्च उत्पदान होता है, परन्तु गुणवता और नियंत्रण कम होता है। तीसरा 5 प्रतिशत है जिसमे उच्च उत्पादन, उच्च गुणवता और नियंत्रण के साथ किया जाता है।  जो स्थानीय स्तर से उठकर जैविक खेती कहलाता है। जैविक खेती की तैयारी चार स्तर पर किया जा रहा है। शोध, नीति, उत्पादन और बाजार जिसके माध्यम से इसको धरातल और बाजार में उतरा जा सके। भारतीय कृषि अनुसंधान ने 13 राज्यों में राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना (NPOF) का आरम्भ किया। जो जैविक खेती को बढावा देने में मददगार साबित हुआ है। भारत में तीन स्तर पर शोध किया जा रहा है पहला परंपरागत प्रणाली को पुन: महत्व, पर्यावरण अनुकूल लागत विकास, और जैविक प्रणाली शोध जिसमे सरकारी अभिकरणों के साथ-साथ गैर-सरकारी संस्थाओ की भूमिका है। जैसे- Navdany, ASA, Nature Land Organic आदि। भारत में दूसरी हरित क्रांति में जैविक खेती को ही महत्व दिया गया है।

                            भारत के संदर्भ में जैविक खेती को टिकाऊ कृषि का लक्ष्य प्राप्त करने का महत्वपूर्ण उपागम मानते है। इस पद्धति में रसायनिक खेती को  पूर्णत: हम नकार देते है। जैविक खेती वैज्ञानिक ज्ञान से जुड़ा है, जो आधुनिक और परंपरागत दोनों तकनीकों का इस्तेमाल खेती में किया जाता है।[12]  1940 में Northboune ने Look to the land में जैविक खेती के संदर्भ में यह तर्क दिया कि इस पद्धति में पूर्ण रूप से खेत में जैविक खेती होना चाहिए, जो अपने भीतर पूर्णत: जैविक होना चाहिए।  डॉ. अब्दुल कलाम “जैविक खेती को खेती का एक पवित्र प्रणाली मानते है”, जो मिट्टी की गुणवता को महत्व देने के साथ-साथ स्थानीय लागत और स्थानीय श्रम के प्रयोग से सूखे क्षेत्रोँ के लिए लाभकारी साबित हुआ है। जिसको सुविधा जनक तरीके से लागु कर सकते है। जैविक खेती का इतिहास नवपषाण काल से रहा है। रामायण में यह उल्लेखित है कि जो हम पृथ्वी पर कार्य करेगें वही पृथ्वी से प्राप्त होगा। महाभारत् में कामधेनु का चर्चा किया गया जो मिट्टी के गुणवता के लिए सही था। आधुनिक काल में राष्ट्रीय और अंतर राष्ट्रीय स्तर पर इसको बढ़ावा देने के लिए विद्द्वानो और सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों ने अहम भूमिका निभाया है। जैविक खेती में कानूनी पहल वर्ष 1900 में सर अल्बर्ट होवार्ड के द्वारा आरम्भ होता है। इसके बाद सरकार वर्ष 2000 में राष्ट्रीय कृषि नीति लेकर आती है। NPOP और एपीडा (कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण) के माध्यम से निर्यात के लिए प्राथमिकता दिया जाता है। National Accreditation Body (NAB) के द्वारा अभिकरणों को वैधता, और प्रमाणिकता दिया जाता है। इस प्रकार से भारत में जैविक खेती ने स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर को बढ़ावा दिया है। भारत में यह ज्यादा सफल इसलिए नही हो पा रहा है क्योकि उसका क्रियान्वयन सरकार द्वारा सही से नही किया जा रहा है।

                         भारत में लगभग 142 मिलियन हेक्टेयर भूमि संचित है जिसपर खेती और खेती प्रणाली सामान्य है।[13] परन्तु इसमें विवधता है इन क्षेत्रोँ में दाल, तेलहन और सूत जैसे प्रमुख फसल उगाये जाते है। इन क्षेत्रोँ में किसानों के जीवनयापन में पशुधन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। परंपरागत समय में संचित भूमि पर किसान खेती, वनिका और पशुपालन करते थे। 1970 के दश्क में खेती में रासायनिक प्रणाली के आगमन से इन सभी चीजों में हरास हुआ। भारत सरकार ने इसको बढ़ावा देने के लिए बहुत सारे नीतियों के निर्माण किया जिसके माधयम से रासायनिक खादों का इस्तेमाल बढ़ गया। बहुत सारे संचित क्षेत्रों में किसान कम लागत और बाहरी चीजों का प्रयोग नही करके उत्पदान करते है जो उनके लिए लाभदायक होता है। संचित भूमि के अपेक्षा गैर-संचित क्षेत्रों में ज्यादा रासायनिक खादों का प्रयोग किया जाता है। सर्वेक्षण में यह पाया गया है कि बहुत सारे संचित क्षेत्रों के किसान रसायनिक खादों इस्तेमाल नही करते है। इसलिए गरीब किसान जैविक खेती प्रणाली के तहत ही खेती करते है। भारतीय टास्क फ़ोर्स और अन्य रिपोर्ट में यह दर्शया गया है कि भारत में जैविक खेती टिकाऊ खेती प्रणाली है जिसमें संचित भूमि और उतर-पूर्व के राज्य शामिल है। इस लेख में यह दर्शया गया है कि महाराष्ट्र के किसानों ने जैविक खेती के माध्यम से कपास की खेती किया तो कम लागत लगा। वर्मी कम्पोस्ट के प्रयोग से संचित भूमि क्षेत्रों में किसानों के लिए लाभकारी साबित हुआ है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व व्यापार संगठन जैविक खेती उत्पाद को कर मुक्त व्यापार के लिए प्रोत्साहन दे रहा है, जो उत्पादन और मुनाफा के लिए बेहतर है। 

               पर्यावरण और स्वास्थ्य के प्रति लोगों में जागरूकता ने जैविक खेती को बढ़ावा दिया है। जो विश्व में खेती के एक विकल्प के रूप में जैविक खेती के प्रति लोगों का रुझान बढ़ता जा रहा है।[14] जैविक भोज्य पदार्थो की माँग विकसित और विकासशील देशों में साल दर साल 20-25 प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। जैविक खेती के संदर्भ में बहुत सारे महत्वपूर्ण प्रश्न उभर कर आते है, जैसे क्या जैविक खेती से इतना उत्पादन हो सकता है कि सभी को भोजन उपलब्ध हो जाये?, क्या कोई महत्वपूर्ण विकास पर्यावरण के संदर्भ में जैविक खेती से हो रहा है?, क्या जैविक खेती से उत्पादित अनाज की गुणवता बेहतर है?, क्या यह आर्थिक रूप से सही है? इन सभी प्रश्नों के संदर्भ में इस लेख में चर्चा करेगे।

पहला प्रश्न क्या जैविक खेती से ज्यादा उत्पादन संभव है? जैविक खेती में बिना बाहरी चीजों के प्रयोग से उत्पादन बढता है। बहुत सारे अध्ययनों में यह दर्शया गया है कि परम्परागत समय के अनाज उत्पादन से ज्यादा अनाज का उत्पादन जैविक खेती से किया गया है। 208 सर्वेक्षणों में यह पाया गया कि संचित भूमि में जैविक खेती से अनाज का उत्पादन ज्यादा हुआ है। पहले एक से तीन वर्षोँ में उत्पादन थोडा कम होगा क्योकि मिट्टी को विकसित और जलवायु प्रतिक्रियाओ को अनुकूल होने में समय लगता है। जिसका प्रमाण नागपुर में कपास का उत्पादन और पंजाब में अनाज के उत्पादन से मिलता है। दूसरा प्रश्न जैविक उत्पादनों में गुणवता से तो जैवीक खेती के माध्यम से बहुत सारे अनाजों का उत्पादन किया जाता है। जैविक खेती में उत्पादों की गुणवता को कायम रखने के लिए इसको खादों का इस्तेमाल पर निर्भर करता है। तीसरा प्रश्न क्या जैविक खेती पर्यावरण के लिए हितकर है? जैविक खेती मिट्टी की गुणवता और संरक्षण के लिए, स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। मिट्टी के पोषक तत्वों को बनाये रखने में मदद करता है। चौथ प्रश्न क्या आर्थिक रूप से सही है? जैविक खेती से कम लागत पर ज्यादा आमदनी होता है। इसमें महगे कीटनाशक, खाद का इस्तेमाल नही किया जाता है। यूरोप और कनाडा का अध्ययन यह दर्शता है कि जैविक खेती में मजदूरी 40-50 प्रतिशत ज्यादा है। पांचवा प्रश्न कीटनाशकों और बिमारियों के से मुक्ति के लिए जैविक खेती में किटनाशको और बिमारियों से बचने के लिए प्रबंधन किया गया है। शोध यह दर्शता है कि जैविक उत्पाद ज्यादा समय तक टिकाऊ रहता है। खेती का प्रबंधन इस प्रकार होता है कि बहार से कीट और चिड़िया भी न आ पाए।                 जैविक खेती का भारतीय कृषि में महत्व, भारत में जैविक खेती के लिए अच्छा भूमि और संसाधन विधमान है। जिसने भी जैविक खेती को अपनाया है वह एक नई चुनौती को ज्ञान और खोज के परिपेक्ष्य में अपनाया है। इससे कृषि में ग्रामीण स्तर पर एक अलग तरह का लगाव के साथ रोजगार एवं आर्थिक उत्थान को बढ़ावा दिया है। भारत जैसे विकासशील देशों में जैविक खेती का विकास जरूरी है क्योकि इसमें कम पूंजी की जरूरत होती है। यंहा के जलवायु क्षेत्र भी प्रकृति और मानव संसाधन उपयुक्त है। भारत में किसानों की भूमि पर दखल के हिसाब से छोटे किसानो की जनसंख्या ज्यादा है। ये किसान आज भी जैविक खेती करते है, क्योकि इनके पास आधुनिक तकनीक को अपनाने की असमर्थता है।[15] किसानो की भागीदारी के आधार पर तकनीको का निर्माण किया जाना चाहिए। भारत में अभी भी छोटे किसान मानसून के ऊपर निर्भर होकर कृषि करते है भारत में खेती पूर्ण तकनीक आधारित नही किया जाता है। भारत कृषि के भविष्य के लिए आज हरित क्रांति से पुनः हरित क्रांति की ओर अग्रसर हुआ है। परन्तु छोटे किसानो के लिए आज भी यह समस्या है कि कैसे इस तकनीक को अपनाया जाये जिससे कृषि में स्थिरता और सफलता को प्राप्त किया जा सके। जो भविष्य के लिए भी टिकाऊ हो। इस संदर्भ में जैविक तकनीक और लघु तकनीक को अपनाने का जरूरत है।

 

निष्कर्ष

वर्तमान समय में भारत में कृषि संकट को देखतें हुए, जैविक कृषि पद्धति को आशा के रूप में देखा जा रहा है। जिसकों पर्यावरणीय(मिट्टी, जल, वायु, मानव स्वास्थ्य), उत्पादन (आमदनी, टिकाऊ उत्पादन, उत्पादन में विविधता(अनाजों)

एवं आर्थिक पहलू के संदर्भ में सही माना जा रहा है। जैविक कृषि के माध्यम से कृषि के उत्पादन में स्थिरता के साथ-साथ कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने का भी प्रयास किया जा रहा है। वर्तमान समय में भारत में कृषि संकट को देखतें हुए, जैविक कृषि पद्धति को आशा के रूप में देखा जा रहा है। जिसकों पर्यावरणीय(मिट्टी, जल, वायु, मानव स्वास्थ्य), उत्पादन (आमदनी, टिकाऊ उत्पादन, उत्पादन में विविधता (अनाजों) एवं आर्थिक पहलू के संदर्भ में सही माना जा रहा है। जैविक कृषि के माध्यम से कृषि के उत्पादन में स्थिरता के साथ-साथ कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने का भी प्रयास किया जा रहा है।          कृषि और किसान एक येसा विषय था जिसपर बहुत कम लोगों ने लिखा है और इसके समस्याओं को उजागर किया है। परन्तु जब खाद संकट गहराता है तो सभी को कृषि और किसान की चिंता होने लगाती है। सरकार नीतियों का निर्माण करती है। परन्तु उसके क्रियान्यवन पर कम ध्यान दिया जाता है। रोज एक नई कृषि योजना के निर्माण के बावजूद भी देश की जनसँख्या का पेट भरने वाला किसान आज भी दुखी है। आज भारतीय किसान अपना भविष्य जैविक खेती की ओर देख रहे है। जो उत्पादन और आमदनी को बढ़ा सकें। वर्तमान में परम्परागत कृषि विकास योजना के माध्यम से सरकार द्वारा जैविक खेती को अपनाने के लिए किसानों को अनुदान दिया जा रहा है।      

v खो रही मिट्टी के महक को बचाना है किसनों को खेतो तक ले जाना है।

v डॉक्टर, वकील, पूलिस की जरूरत हमे जीवन में एक बार हो सकता है परन्तु किसान की जरूरत हर दिन तीन बार होती है।

संदर्भ सूचि

1.      Bhattacharyya, P and G. Chakaraborty.(2005). Current Status of Organic Farming in India and Other Countries. Indian Journal of Fertilisers. Vol. 1 (9). December 2005, pp.111-123.

2.      Daniel, Thornier. (1956). The Agrarian Prospect in India, p.1.

3.      Dr. William and C. Motes. (2010). Modern Agriculture and Its Benefits – Trends, Implications and Outlook, p-13.

4.      Karthikeyan, C., D Veeraragavathantham, D Karpagam and S Ayisha Firdouse. (2008). Traditional Tools In Agriculture Practices, Indian Journal Of Traditional Knowledge, Vol.8 (2), April 2009, P.1.

5.      Kaul, sushila. “Historical and scientific study of development of agriculture at national agriculture science museum, Indian agricultural statistics research institute, New Delhi.

6.      Maheshwari, P and S. L. Tandon (1959).  Agriculture and Economic Development in India, Economic Botany, Vol. 13, No. 3 (Jul. - Sep., 1959), P-4.

7.      Ramesh, P, Mohan Singh and Subba Rao, A. (2005).Organic farming: Its Relevance to the Indian Context.  Current Science, Vol. 88, No.4. pp.561-568.  

8.      Seyon, R. (2016). Organic Farming and Its Legal Status in India. The World Journalo Njurisic Polity, November 2016.

9.      Sharma, Arun.(2014). Organic Agriculture Programming for Sustainability in Primary Sector of India: Action and Adoption. Productivity, Vol. 55, No.1, April-June, 2014.

10.  Traditional agriculture in India: high yields and no waste, The ecologist, vol.13, no.2/3, 1983. 08/10/2016, 10:25.

11.  Venkateswarlu, B. (2008).Organic Farming in Rain fed Agriculture: Opportunities and Constraints. Central Research Institute for Dry land Agriculture, Hyderabad.

पीएच.डी, राजनीतिक विज्ञान विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय-07
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ईमेल:. chandan.sts@gmail.com


[1] Retrieved from:  Agriculture, www.ibef.org.

[2] Retrived from: https://www.merriam-webster.com/dictionary/agriculture,5:27pm,09/29/2016.

[3] Kaul, sushila. “historical and scientific study of development of agriculture at national agriculture science museum, Indian agricultural statistics research institute, New Delhi.

[4] Daniel,Thornier. (1956). The Agrarian Prospect In India, P-1.

[5] Karthikeyan, C., D Veeraragavathantham, D Karpagam And S Ayisha Firdouse. (2008). Traditional Tools In Agriculture Practices, Indian Journal Of Traditional Knowledge, Vol.8(2), April 2009,P1.

[6] Traditional agriculture in india: high yields and no waste, The ecologist, vol.13, no.2/3,1983. 08/10/2016, 10:25.

[7] Dr. William And  C. Motes. (2010). Modern Agriculture And  Its Benefits – Trends, Implications And Outlook, p-13.

5 Maheshwari, P  And S. L. Tandon (1959).  Agriculture And Economic Development In India, Economic Botany, Vol. 13, No. 3 (Jul. - Sep., 1959), p-4.

[9] Bhattacharyya, P and G. Chakaraborty.(2005). Current Status of Organic Farming in India and Other Countries. Indian Journal of Fertilisers. Vol. 1 (9). December 2005, pp.111-123.

[10] Sharma, Arun.(2014). Organic Agriculture Programming for Sustainability in Primary Sector of India: Action and Adoption. Productivity, Vol. 55, No.1, April-June, 2014.

[11] ibid.

[12] Seyon, R. (2016). Organic Farming and Its Legal Status In India. The World Journalo Njurisic Polity, November 2016.

[13]Venkateswarlu, B. (2008).Organic Farming in Rain fed Agriculture: Opportunities and Constraints. Central Research Institute for Dry land Agriculture, Hyderabad.

[14] Ramesh, P, Mohan Singh and Subba Rao, A. (2005).Organic farming: Its Relevance to the Indian Context.  Current Science, Vol. 88, No.4. pp.561-568.  

[15] Maru,Ajit.“Agriculture, Farming, Food Nutrition And Technology: From The “Green Revolution” To The “Ever Green Revolution”: The Case of India.

 


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