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जावेद उस्मानी की रचनाएं



जाती है इक बार तो उस रूप में आती नही कभी
जिंदगी को हुज़ूर अब तो , जुमला बनाईये नहीं 
आप की मंज़िल ख़ास है कि अवाम है 
धोखे में सबकी जान और फंसाईये नही 
घर की ये कोई बात नही बात है मुल्क की
सच सुनिये , सच से मुँह छुपाईये नही
सोचिए जनाब भूख से मौत के मसले का कोई
छत्तीस करोड़ गुण गान पर बहाईये नही
आज कल तो भावनाओं की सौदागरी ही वोट है
लोगो के यकीन पर यूँ चोट पहुंचाइये नहीं
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जबरजस्त सियासी तड़का लगा,महका घर मारे छौंक
आश्वासन का बारह मसाला चाहा जितना दिया झोंक
समय चुनावी पर्व मनाने का , कहाँ लगी है कोई रोक 
खुद की कमियों को दूसरों पर चाहो जितना दो ठोक 
चलाओं शब्द वाण बातों का , खंजर गहरा दो भोक 
मातम क्या करना है ,जब नही किसी को कोई शोक 
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न उत्तर न दक्षिण न पूरब न पश्चिम
न मंदिर न मजिस्द न हिंदू न मुस्लिम
हम एक थे कल भी, आज भी हिंदोस्तां हम है 
तन पर कोई आंच आने लगे गर 
पासबानो की जान जाने लगे गर 
भूल हर आई बीती, हम-कदम, हमनवा, हम जुबाँ हम है 
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जान अपनी , हमारे खातिर है गवाई
शहादत को , सौ सौ सलाम मेरे भाई
सुनहरे गोलगप्पे बातों की रसमलाई
बधाई हो सरकार बहुत बहुत बधाई 
नए पुराने , सारे बयानो की है दुहाई
आगे बढ़ ,अब तो करो कुछ भरपाई 
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सियासी - योग
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शासन का , आश्वासन 
आश्वासन का , शासन 
राशन पर , भाषण 
भाषण ही , राशन 
जुमला हड्डी स्व आसन
उपलब्धि स्वर्ण सिंहासन
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शब्द बोले तो क्या बोले, किस सच के तराजू में किसे तौले 
हर ओर अजब शोर है, चुप ही रहिए कहीं जाईये नहीं
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पहले से थे बीमार हम , दर्द अब और बढ़ा है
कीमत चुका रहे जीने की, न जाने कैसी दवा है
गरीबी के आंसू वही है वक्त के अमीर कहकहे
पहले देख चुके सुन रहे अब नए किस्से अनकहे
खुशलिबास पहन चली कैसी , ये नयी सबा है
नाम जीने का ले , कर रही मरने की दुआ है
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