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गिरमिटियाओं ने हिन्‍दी को अन्तर्राष्ट्रीय विस्तार दिया: डॉ. शुभ्रता मिश्रा


गिरमिटियाओं ने हिन्‍दी को अन्तर्राष्ट्रीय विस्तार दिया

डॉ. शुभ्रता मिश्रा (वास्को-द-गामा, गोवा,)

निजी जरुरतों के लिए, अपने परिवार के पोषण के लिए बँधुआ मजदूर बनने तक की अपनी निरीहता में स्वयं को उन तथाकथित समृद्धों के पैरों तले रौंदवाने के स्तर तक भी गिर जाता है, क्योंकि उसके देश की सीमाएं उसके बौद्धिक स्तर के हिसाब से उसके भूखे परिवार तक सिमटी होती हैं, जहाँ क्या देशभक्ति और क्या राष्ट्रभाषाॽ सिर्फ और सिर्फ रोजी-रोटी कमाने की सुध, बच्चों के पेट में अन्न के कुछ दाने डल जाने की चिंता। उनके ये मानदण्ड कहीं से उनको महान जैसे विशाल शब्द से उद्बोधित करने की चेष्टा नहीं कर सकते। पर फिर भी वे महान हैं, निःसंदेह वे गिरमिटिए महान हैं, जिन्होंने सत्रहवीं सदी में आये क्रूर अंगरेज़ों की बनाई गिरमिटिया प्रथा की यातनाओं को झेला और निःशब्द सहा भी।
इतिहास के अनुसार भारत में अंग्रेजों द्वारा गिरमिटिया प्रथा सन् 1834 में शुरु की गई थी, जिसमें वे ग़रीबी, लाचारी, बेरोजगारी और भुखमरी से बेहाल लगभग 10 से 15 हज़ार भारतीय मजदूरों को हर साल गुलाम बनने की शर्त पर एक `एग्रीमेंट'  करवाकर फिजी, ब्रिटिश गुयाना, डच गुयाना, कीनिया, मॉरिशस, ट्रिनीडाड, टोबेगा, नेटाल (दक्षिण अफ्रीका) आदि देशों में भेज दिया जाता था। चूँकि ये लोग एग्रिमेंट के तहत जाते थे और भारतीय लोग इस अँग्रेजी शब्द का उच्चारण गिरमिट करते थे, अतः शनैः शनैः अँग्रेज भी उनको गिरमिट मजदूर कहने लगे। इस तरह इन मज़दूरों को गिरमिटिया कहा जाने लगा और यह प्रथा भारत की अँग्रेजों द्वारा बनाई गई गिरमिटिया प्रथा के नाम से इतिहास में दर्ज हो गई। गिरमिटिया प्रथा बाकायदा सरकारी नियमों और सरकारी संरक्षण प्राप्त लोगों के कारोबार के तहत खूब फली फूली। जिन देशों में ये भारतीय गुलाम इस प्रथा के तहत भेजे गए, आज भी वे देश गिरमिटिया देशों के नाम से जाने जाते हैं।

उस समय भले ही गिरमिटियाओं की देशभक्ति परिवार की भेंट चढ़ने के लिए बाध्य रही होगी, अपनी जन्मभूमि को फिर कभी न देख पाने की टीस भी हृदय के कहीं अंदरुनी कोने में छिपा दी गई होगी, परन्तु उन देशों में पहुँचकर अनजाने में ही सही अपने देश की संस्कृतियों, त्योहारों और परम्पराओं को इन गिरमिटियों ने छोड़ा नहीं। वे वहां गन्ने के खेतों में काम करते हुए रामचरितमानस की चौपाइयों का गान करते थे और संकट में हनुमान चालीसा पढ़ते थे। एग्रीमेंट के कारण वे पांच साल बाद छूट तो सकते थे, लेकिन उनके पास इतना धन नहीं होता था कि वे वापस भारत लौट सकें। अतः बाध्यतावश वे अपने ही तथाकथित स्वामी के पास काम करने लगते थे या किसी और के गिरमिटिये हो जाते थे। गिरमिटिया एग्रीमेंट के तहत ये मजदूर बेचे जा सकते थे, काम न करने की स्थिति में अथवा कामचोरी करने पर बुरी तरह दण्डित भी किये जा सकते थे। यहाँ तक कि गिरमिटियाओं को विवाह करने की छूट नहीं थी और यदि कुछ गिरमिटिया विवाह कर भी लेते थे तो भी उन पर गुलामी वाले नियम ही लागू होते थे। इसके तहत उनकी स्त्रियाँ और बच्चे किसी और को बेचे जा सकते थे। शिक्षा, मनोरंजन आदि मूलभूत आवश्यकताओं से भी उनको वंचित रखा जाता था। इन सभी सख्तियों में बँधे निरीह से उन भारतीयों को किसी भी तरह से अपना हृदय कठोर बनाकर हजारों किलोमीटर दूर की उस विदेशी भूमि में ही अपनी भारतमाता को स्थापित कर लेना पड़ा। अपने और अपनी मातृभूमि, सब छूट गया था, शेष था तो सिर्फ हृदय में बसी अपनी संस्कृति, अपनी भाषा हिन्दी और अपनी परम्पराएं, जिनको गिरमिटिया मज़दूरों से किसी तरह का कोई भी एग्रीमेंट नहीं छीन सकता था।

सदियों पहले अपने देश छोड़ हजारों किलोमीटर दूर गए भारतीय गिरमिटिया लोगों को एक दूसरे से जोड़े रखने की डोर एक ही थी वह थी उनकी अपनी भाषा हिंदी, जिसके माध्यम से वे आपस में अपनी संवेदनाएं बाँट लेते थे।  हिंदी ने ही गिरमिटियों को अपनेपन और आत्मीयता के साथ एक दूसरे से जोड़े रखा। गिरमिटियों ने इन देशों में हिंदी को जीवित रखकर एक अनूठा स्थान दिया है, क्योंकि पीढ़ी दर पीढ़ी हिन्दी इन देशों में पुष्पित पल्लवित होती रही है। वैसे तो सन् 1917 में ब्रिटिश सरकार ने इस गिरमिटिया एग्रीमेंट को महात्मा गांधी, गोपाल कृष्ण गोखले के साथ साथ ब्रिटिश सीएफ एंड्रयूज और हेनरी पोलाक सहित अनगिनत भारतीयों के इस अमानवीय प्रथा को समाप्त करने की मुहिम छेड़ने के चलते निषिद्ध घोषित कर दिया था। पर जो भारतीय उन देशों से कभी नहीं आ पाए वे वहीं बस गए। इनमें से अधिकांश गिरमिटों ने वहाँ पर या तो स्वतंत्र मज़दूर बनकर या छोटे-मोटे व्यापारी बनकर जीविकोपार्जन आरम्भ कर दिया। कुछ देशों में तो इन भारतीय गिरमिटियों की संतानें प्रधानमंत्री से लेकर बड़े बड़े अधिकारी बने। मॉरीशस के भूतपूर्व प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम इनमें से ही एक हैं। वर्तमान में एक गिरमिटिया देश फिजी का उदाहरण लें, तो हम पाते हैं कि वहां की जनसँख्या 9 लाख है और उसमें से साढ़े तीन लाख से अधिक लोग भारतीय मूल के हैं, जो फिजियन हिंदी बोलते हैं। वर्तमान गिरमिटिया पीढ़ी के लोगों का हिंदी से आत्मीय संबंध आज भी अपने पूर्वजों की तरह ही है। वे उन भारतीयों की तरह तो कदापि नहीं हैं जो हिन्दी की बात तो बहुत करते हैं किन्तु हिन्दी में बात नहीं कर सकते। गिरमिटियाओं ने इस दुराग्रह से स्वयं को मुक्त रखते हुए उन देशों में भारत की संस्‍कृति के साथ साथ हिन्दी भाषा को जीवित रखा और लगातार समृद्ध किया। गिरमिटिया अपने ऊपर हो रहे अन्‍यायों और समस्त दुख-दर्द के बावजूद भी भारतीय त्‍योहारों को पूरे उत्‍साह के साथ मनाते थे और वही परम्परा आज भी उनके बच्चे निर्वहन करते आ रहे हैं। वैश्‍वीकरण के दौर में भारतीय नई पीढ़ी जहाँ हिन्दी भाषा और संस्‍कृति से दूर होती जा रही है, वहीं आज भी गिरमिटियाओं की नयी पीढियां आपस में हिन्दी में बात करते हुए दादा, नाना, चाचा, मामा, मौसा-मौसी आदि भारतीय संबोधनों को का ही उपयोग करती हैं। यहाँ तक कि बाद में गिरमिटियाओं द्वारा मॉरीशस में भारत की संस्‍कृति पर आधारित बसाये गॉंवों में वे आज भी पूर्ण भारतीयता के साथ रह रहे हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्‍दी को स्थापित करने में गिरमिटिया देशों में रहने वाले भारतीय लोगों के व्यापक योगदान से इंकार नहीं किया जा सकता है। आज कहने को तो विश्व के 132 देशों में विस्तारित हिन्दी को तीन करोड़ अप्रवासी भारतीयों ने फैलाया है, लेकिन सच यह है कि इनमें वे अप्रवासी भारतीय कदापि शामिल नहीं हैं, जिनको हिन्दी बोलने में हीनता महसूस होती है, अपितु इनमें वे गिरमिटिये शामिल हैं, जिन्होंने हिन्दी में बोलना अपनी शान समझा और उसका वैश्विक स्तर पर विस्तार करना अपना धर्म। उन्होंने सही मायनों में विश्व के समक्ष इस बात को प्रस्तुत किया कि अभिव्यक्ति, सामर्थ्य और साहित्य की दृष्टि से हिन्दी ही सर्वाधिक समर्थ भाषा है। गिरमिटियों ने हिन्दी की वैश्विक स्थिति को बाजार की भाषा के रुप में निरुपित कर एक नया ही स्वरुप दिया है। इस तरह गिरमिटियों ने शताब्दियों पूर्व मजबूरी में ही सही वैश्विक परिवेश में भारत की उपस्थिति दर्ज कराकर हिंदी की हैसियत में भी उन्नयन किया और भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों के बीच खाड़ी देशों, मध्य एशियाई देशों, रूस, समूचे यूरोप, कनाडा, अमेरिका तथा मैक्सिको जैसे प्रभावशाली देशों में रागात्मक जुड़ाव तथा विचार-विनिमय का सबल माध्यम बनाया है। गिरमिटियों द्वारा हिन्दी के प्रचार व प्रसार में इतने अधिक कार्य किए गए हैं कि इसी को दृष्टिगत रखते हुए भारत ने हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में संवर्द्धित करने के लिए विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना हेतु गिरमिटिया देश मॉरीशस को चुना। मॉरीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री सर शिवसागर रामगुलाम ने विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना का प्रस्ताव 1975 में नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान रखा था। भारत और मॉरीशस की सरकारों के बीच एक समझौते के तहत 11 फरवरी 2008 को गिरमिटियों द्वारा बसाए गए मोका गाँव में विश्व हिन्दी सचिवालय स्थापित किया। यह सचिवालय तब से आज तक अनवरत विश्व हिन्दी सम्मेलनों के आयोजन को एक संस्थागत व्यवस्था के तहत आयोजित करता आ रहा है।



लेखक परिचय-
डॉ. शुभ्रता मिश्रा मूलतः भारत के मध्यप्रदेश से हैं और वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं। उन्होंने डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से वनस्पतिशास्त्र में स्नातक (B.Sc.) व स्नातकोत्तर (M.Sc.) एवम् विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन से वनस्पतिशास्त्र में पीएच.डी (Ph.D.) और पोस्ट डॉक्टोरल अनुसंधान कार्य किया।
डॉ. शुभ्रता मिश्रा की अँग्रेजी भाषा में वनस्पतिशास्त्र व पर्यावरणविज्ञान से संबंधित अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। सन् 2004 से हिन्दी में सतत् वैज्ञानिक लेखन कर रही हैं। डॉ. मिश्रा के हिन्दी में वैज्ञानिक एवम् सामयिक लेख विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमितरुप से प्रकाशित होते रहते हैं। उनकी अनेक कविताएँ भी विभिन्न कविता-संग्रहों में संकलित हैं।

प्रकाशित हिन्दी पुस्तकें
भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र
धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर

सम्मान
वीरांगना सावित्रीबाई फुले राष्ट्रीय फेलोशिप सम्मान (2016)
नारी गौरव सम्मान (2016)
राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012 (2014 में प्रदत्त)
मध्यप्रदेश युवा वैज्ञानिक पुरस्कार (1999)


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