Ticker

6/recent/ticker-posts

हरकीरत हीर की कविताएँ




अभी ख़ौफज़दा हैं ज़ख़्म
………….

मैंने ....
कह दिया है ख़ामोशी से
कुछ दिन और रहे
संग मेरे ....

कि आग में जलकर
मिट गये थे जो शब्द
वहाँ जन्मी नहीं है अभी कविता
उतरती पपड़ियों को अभी तक
नहीं भूला है
जलन का अहसास
अभी ख़ौफज़दा हैं ज़ख़्म ....

कि अभी ठहरे है रंग
झील की गहरी तलहटी में
गुम गये हैं ख़्याल किसी बीहड़ बियाबान में
बिख़रे बिखरे से हैं अक्स
आइना भी फेर लेता है नज़र
इक शोर नृत्य में हैं
आठों पहर ....

कि अभी
अँधेरे के पैर डराते हैं मुझे
झड़ती हैं आवाज़े दीवारों से
रात स्याह लिबास में
खींच लेती है शब्दों की ज़ुबाँ
इक पीड़ा रह रह साँस भरती है
कि अभी एक गंध बाकी है
लकीरों में .....

मैंने
कह दिया है ख़ामोशी से
कुछ दिन और रहे संग मेरे ....

……………………………



निशान
….

कई बार चाहा
ख़ामोशी की छाती पर
उगा दूँ कुछ अक्षर मुहब्बत के ..

चुप की रस्सियाँ खोल दूँ
टांक दूँ ख़्यालों में
फिर से इक मुहब्बत का गुलाब ...

कंपकपाती रही अंगुलियाँ
अक्षरों की दहलीज़ पर
ज़ख़्म बगावत पर उतर आये
रूह पर पड़े खरोंचों के निशान
क़ब्र खोदने लगे
हवा मुकर गई मुस्कुराने से ...

मैंने पलट कर
ख़ामोशी की ओर देखा
वह बनाने लगी थी पैरों से
रेत पर निशान ...

…………………………



आग का रंग
….

ख़ामोशी की चादर ओढ़े
एकटक ..
निहारता है चाँद ..
झील की छाती में
अपनी ही झुलसी हुई
परछाई ....
..

मुहब्बत फेर लेती है नज़र
रात दर्द की झाँझर पहनेे
हौले हौले उतारती है
लिबास ......

ज़ख़्म खोल देते हैं खिड़कियाँ
साँस लेने लगती है नज़्म
रातभर चलता है पानी
आग पर नंगे पांव ...

अक्षर रंग बदलते हैं
इक उदास रात का सफ़र
करते हैं शब्द ....

धीरे धीरे
करने लगती है मुहब्बत
रंगों का क़त्ल
और फैला देती है मुट्ठी भर
सामने फैले आसमां में
आग का रंग ......

………………………



रात लिखती है नज़्म
……………..
कोई सन्नाटा नहीं पूछता
जली लकीरों से कहानी
रह रहकर उठती टीस
रात की छाती पर लिखती है नज़्म
खामोश नज़रें टकरा कर लौट आती हैं
मुहब्बत की दीवारें से ....
दर्द हौले हौले सिसकता है
रात लिखती है नज़्म ..

सहसा देह से
इक फफोला फूटता है
कंपकँपता है जिस्म
कोरों पर कसमसाती हैं बूंदें
अँधेरा डराने लगता है
दर्द हौले हौले उतारता है लिबास
रात लिखती है नज़्म .....

धीरे धीरे ज़ख़्म
उतार देते हैं हाथों से पट्टियां
झुलसी लकीरों से ख़ामोशी करती है सवाल
दर्द अपनी करवट क्यों नहीं बदलता
लकीरें खामोश हैं
वक़्त ठठाकर हँसता है
रात लिखती है नज़्म ....

…………………



अस्पताल के कमरे से

…………
वक़्त की फड़फड़ाती आग से
निकलता इक धमाका
जला जाता है हाथों के अक्षर
सपनों की तहरीरें
होंठों पर इक नाम उभरता है
रात सिसकियाँ भरती है
रह रह कर नज़रें
मुहब्बत के दरवाजे खटखटाती हैं

डराने लगता है आइना
दर्द की बेइन्तहा कराहटे
सिहर जाता है मासूम मन
जलन की असहनीय पीड़ा
फफोलों से तिलमिलाता जिस्म
देह बेंधती सुइयाँ
सफेद पोशों की चीरफाड़
ठगे से रह जाते हैं शब्द
संज्ञाशून्य हुई आँखें
एकटक निहारती हैं खामोशियों के जंगल

वक़्त धीरे धीरे मुस्कुराता है
अभी और इम्तहां बाकी है ...

…………………………



टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां

सबस्क्राईब करें

Get all latest content delivered straight to your inbox.