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संतोष चतुर्वेदी की कविता 'मोछू नेटुआ': समीर कुमार पाण्डेय




समकालीन कविता का कैनवास काफी विस्तृत है। समकालीन कवियों ने अपनी कविता में केवल प्रेम, सौंदर्य और प्रकृति को ही महत्त्व नहीं दिया है बल्कि उन्होंने समय के अनुरूप आम जन की स्थिति को भी परखने का पूरा-पूरा प्रयत्न किया है। प्राचीन काल से ही उच्चवर्गीय समाज द्वारा दलित एवं पिछड़े हुए समाज का शोषण होता आया है। साहित्य के अन्तर्गत दलित यथार्थ का सत्य, आदिवासी का जीवन और वनों-जंगलों में घुमकर अपना जीवन बिताने वाली घुमंतू जैसी जनजातियों का चित्रण उस मात्रा में नहीं है जितना होना चाहिए।

संतोष चतुर्वेदी की कविता 'मोछू नेटुआ' पढ़ते वक्त उस कर्मठ घुमन्तु व्यक्तित्व से मिलना हुआ जो हमारे बीच रहते हुए भी ठीक से हमारे समाज का हिस्सा नही बन पाया था। इस कविता में सांप पकड़ने वाली जनजाति के चरित्र की अदम्य साहस तथा उपेक्षित चरित्र को कविता का विषय बनाया गया है। यह कविता अपने कथ्य के साथ-साथ लोक, समयबोध और सामाजिक यथार्थ के नए पहलुओं को उजागर करते हुए संवेदना का सम्यक चित्र प्रस्तुत तो करती ही है ग्रामीण जीवन के श्रम-सौंदर्य का आख्यान भी रचती है। संतोष चतुर्वेदी की कविताओं का सौन्दर्यशास्त्र लोक दृष्टि की चेतना से व्याप्त है। यह कविता लोक जीवन से संपृक्त कविता है। जिसे कवि ने अपने समय यानि आज के जनजीवन में इस लुप्तप्राय वंचित चरित्र को कविता में उतारा है।

ग्रामीण जीवन में मोछू नेटुआ जैसे चरित्र अत्यंत जीवंत तथा प्राणवान होते हैं। वे अभावों और कष्टों में जीते हुए तमाम कठिनाइयों को झेलकर कुंदन सा निखरते हुए भी सामाजिक जीवन जीते हैं। मोछू नेटुआ जो सदियों से हमारे समाज में जितना उपेक्षित है उतना ही वह साहित्य में भी है। जिसको कविता में उतार कर संतोष चतुर्वेदी ने साहित्य के उस खाली जगह को भरने का सफल प्रयास किया है। इस अर्थ युग को ध्यान में रखते हुए यह कविता यह इशारा करती है कि हमारे समस्त सामाजिक संबंधों का आधार भी आर्थिक है। इसीलिए हुनरमंद मोछू भी सजगता से अपना काम निपटाने के पहले ही मोल-भाव कर लेता है। मोछू को पता है कि यह सुविधाभोगी समाज इतना डरपोक है कि उसे और खींचा और झुकाया जा सकता है। यही इस कविता की ताकत है और मूल उद्देश्य भी-

'सौ रुपये और एक धोती से कम न लूँगा
मोल तोल के बाद आखिर मामला फिर
बीस कम सौ पर पट जाता

वह कविता में कहता है कि कुलीन वर्ग ने ही हमें अपराधी घोषित किया है तथा सरकार उसकी पुष्टि करने वाली एक मजबूत संस्था है। जब वह अपना सर उठाने की कोशिश करता है तो उसे प्रतिबंधित संगठन का गुर्गा बता कर उसपर अत्याचार शुरू कर दिया जाता है-

'हाँ मालिक यह ससुरी सरकार तो
कभी हमें आतंकवादी बताती है
तो कभी घोषित कर देती है नक्सलवादी'

यह परम्परागत बोझ मोछू सदियों से ढो रहा है। वह देश के उन तमाम गरीब तबके का प्रतिनिधित्व करता है जो इस लोकतंत्र में आज भी वह अछूत और उपेक्षित है। उसके ईमानदार कर्तव्यों में भी सभ्य समाज कुछ न कुछ खमियाँ ढूंढ कर इतिहास से च्युत करता आया है। जो इस देश की सबसे बड़ी त्रासदी है। मोछू नेटुआ सही ही कहता है कि -

'आज के समय में सबसे बड़ा अपराध है गरीबी'

यह कविता ग्रामीण परिवेश का सफल चित्रण करते हुए अपने पूरे परिवेश को भी आच्छादित करती है। उसे चिंता है कि साँपों से भी अधिक जहरीला आज का मनुष्य होता चला जा रहा है। मोछू नेटुआ राजनेताओं के द्वारा ओढ़े मुखौटों को पहचान गया है। इस दुनिया का आदमी उसे साँपों से भी खतरनाक प्रतीत होता है जिस पर उसके मन्त्र का भी कोई असर नही होता। वह उनकी कुटिलता और उनके छद्म पर तीखे व्यंग्य करता है-

‘जहरीली होती जाती इस दुनिया में से 
बेज़हर लोगों को वह कैसे सामने लाये'

लोक जीवन की सच्चाई से गहरे जुड़ा कवि ही जान पाता है कि गाँवों के जीवन में निरन्तर कितना कुछ टूट-फूट-बिखर रहा है। गाँवों से किस कदर हँसती खेलती ज़िन्दगियाँ गायब होती जा रही हैं-

'जैसे खूँटों से एक-एक कर गायब होते गए बैल
गायों से खाली होते गए दुआर
अपनी सख्त कवच के बावजूद
कछुए नहीं बचा पाए खुद को
और हमारे देखते-देखते गायब हो गए
दूर तक नज़र रखने वाले गिद्ध
ठीक उसी तरीके से गायब होते जा रहे हैं
साँप’

कविता मोछू नेटुआ के माध्यम से उन जैसों के जीवन के दुख सुख, प्रताड़ना व विषाद के चित्रण के साथ साथ बाजारीकरण के इस दौर में सांपों तथा अन्य जानवरों पर हो रहे अत्याचारों का खुलासा भी इस कविता में किया गया है...

'सांपों को पकड़ कर
बड़ी बेरहमी से निकाल लिया जाता है उनका जहर
सुना है कि उस जहर से बनायी जाती हैं
एक से बढ़ कर एक महंगी दवाइयां
फिर वे अपने कहर के जहर से मार डालते हैं सांप को
महज उसकी खाल के लिए
सुना है जिससे तैयार होते है। कारखानों में
महंगे-महंगे कोट
महंगे-महंगे बैग
बाजारों में बेचने के लिए'

कविता इस विडंबनात्मक स्थिति से उपजी बेरोजगारी के कारण गाँवों से हो रहे पलायन को भी सशक्त रूप से अभिव्यंजित करती है जो वर्तमान राजनीति की असफलता को व्यक्त करती है। साथ ही ग्रामीण जीवन की विकल्पहीनता में इसके जैसे लोग कैसे अपना जीवन यापन करें यह यक्ष प्रश्न भी उठती है। आज के वैज्ञानिक युग में पूंजीवादी व्यवस्था के हावी होने से पारम्परिक श्रमसाध्य आजीविका के संकट को भी कविता मुखरता से उठाती है। भारत में विश्व व्यापार संगठन के इशारे पर विश्व बाजार के लिए खुली अर्थव्यवस्था, कारपोरेट वर्चस्ववादी भूमंडलीकृत बाजार, बाज़ारवाद व उपभोक्तावाद की मनुष्यविरोधी क्रूर स्थितियों और कठिन समय में यह कविता ग्रामीण जीवन के इस घुमन्तु चरित्र के माध्यम से उनके हाहाकार और प्रतिरोध की आवाजों को दर्ज करती है। साथ ही विकास के क्रम में उस ग्रामीण द्वंद से निर्गत नई पीढ़ी द्वारा सामाजिक विकास प्रक्रिया में अपने लिये नया रास्ता भी खोज लेती है। इसीलिऐ मोछू के बेटे अपना पुश्तैनी काम छोड़ शहर चले जाते हैं और नया विकल्प चुनते हैं...

'अपनी फाँकाकशी में भटकते-फिरते हम
सोच ही नहीं पाते कोई फितूर
और होते रहते हैं लगातार दर-बदर
घूमते फिरते हैं रोज इधर उधर
यही देख समझ कर आखिर एक दिन
अपना काँवर अपनी झॅंपोली फेंक-फाँक कर
भाग गए हमारे दोनों बेटुए
बाहर कहीं मेहनत मजूरी करने'

अपने जड़ों से उखड़ने की इस त्रासद स्थिति को भी मोछू वर्तमान भयंकर संकट के हल के रूप में देखते हुए मारक व्यंग्य प्रस्तुत करता है। कविता में इसे आजीविका के संकट से मुक्ति के रूप में देखना उसकी व्यंजना को और बढ़ा देता है। यह एक बहुआयामी कविता है। कविता में विकास के नाम पर हो रहे विस्थापन और मशीनीकरण के चलते परंपरागत पेशों पर मंडरा रहे खतरे की चिंता स्प्ष्ट झलकती है। वह खुद की चिंता इसीलिए नही करता क्योंकि उसे संतुष्टि है कि उसका बुढ़ापा जैसे-तैसे कट ही जायेगा। शायद यह कर्तव्यबोध उसके भविष्य के प्रति चिंता को दर्शाता है...

'ठीक ही तो किया उन दोनों ने
दर-दर भटकना तो नहीं पड़ेगा उन्हें हमारी तरह
दो जून की रोटी जुटाने के लिए
और हम बूढ़ा-बूढ़ी की जिनगी ही कितनी बची है
कट ही जाएगी जैसे-तैसे'

लौकिकता पर गहरा विश्वास और जीवन के खुरदुरेपन के प्रति मोह कविता को बेहद पठनीय और रोचक बना देता है। जमीन से जुड़े कवि का जीवन के यर्थाथ से विषय उठाना ही कविता में एक नये सौंदर्यशास्त्र की रचना करता है। हाशिये की आवाज को उठाने वाली पूरी की पूरी कविता इस वंचित और अछूते चरित्र की त्रासदी को अभिव्यंजित करते हुए मनुष्यों में आयी गिरावट और राजनितिक विडम्बनाओं का चित्रण तो करती ही है साथ ही साथ आज की कुलीन संवेदना और सामाजिक जड़ता के क्षद्म सौंदर्य पर तीखा प्रहार भी है।
अनगढ़ शिल्पगत सौंदर्य, सुघड़ आंचलिक रचाव , अनुकूल देशी ठसक, भोजपुरी के शब्दों का सहज, सरल और सटीक प्रयोग से कविता बहुत ही शानदार बन पड़ी है। साथ ही इसमें ग्रामीण परिवेश के चाक्षुष और ऐंद्रिक बिंब बहुत ही प्रभावी बन पड़े हैं जो इस कविता की मूल शक्ति है। कविता में सीधे, सपाट लहजे और बोलचाल की भाषा में कही गयी बात एकदम से पाठक तक पहुँचती है। 
तो आइए देखते हैं कवि संतोष कुमार चतुर्वेदी जी की यह लोकधर्मी कालजयी रचना....

मोछू नेटुआ 
**********
हरखम दरखम गोने नाझा मारे फू
परेछेत केलस कोता जेनेमेजा घाते छू
अलकम बलकम बिल कतेरा नारे कू
मेरेस नाते घोर कराते छाड़े छू

अबूझ भाषा के इस
साँप पकड़ने वाले मंत्र को बुदबुदाने के बाद
एक रसम जैसे वह किरिया खाता था
माई किरिया, बाप किरिया, बेटा किरिया
बेटी किरिया, दामाद किरिया

गाँव किरिया, सीवान किरिया
डीह किरिया, डिहवार किरिया...
और तब एक सधे अंदाज में डंडा नचाते
घुस जाता वह घर में साँप पकड़ने
साँप से बाहर निकलने की गुहार करते हुए
मान-मनुहार करते हुए
कि निकलि आओ जहाँ भी छुपे बैठे हो वहाँ से
निकलि आओ कोने से अँतरे से
धरनि से, सरदर से, कोरो से, मलिकथम से
निकलि आओ पटनी से, डेहर से, दियरखा से
खपरा से, नरिया से
बिल से, बिलवार से
निकलि आओ जहाँ कहीं छुपे हुए हो
वहीं से जल्दी से जल्दी

भरे गलमुच्छों वाले मोछू नेटुआ के करतब के स्थापत्य को
हम आश्चर्य के शिल्प की तरह निहारते
कुछ ही देर में हम तब वाकई
अपने पास ही मोछू नेटुआ के डंडा फटकारने
और साँप के फुँफकार की आवाज साथ-साथ सुनते
और तब मोछू के हथेलियों के कसाव में
अपने फन को और चौड़ा करने की नाकाम कोशिश करते
आँखें लाल-पीला करते बेवश पड़े साँप को पाते
जिसे ला कर रख देता वह सुरक्षित अपनी झँपोली में
अपने वादे के मुताबिक जंगल में छोड़ने के लिए

उसी की जुबान से तमाम बातें
तभी जाने हमने साँपों के बारे में
मसलन यह कि गेंहुवन का डॅंसा नहीं बच पाता कभी
कि अजगर तो लील लेता है हिरन तक को समूचा
कि नाग के जहर का कोई
तोड़ नहीं खोज पाया अभी तक आदमी
कि अपनी पर आ जाय तो
करैत भी कम खतरनाक नहीं होता
कि एक दोमुँहा साँप भी होता है थुत्थुर
जो छह महीने एक तरफ से साँस लेता है
तो छह महीने दूसरी तरफ से
भारी भरकम विशेषणों से सँवार कर
जितना बतलाता वह किसी साँप के बारे में
उतना ही डरावना नजर आता तब वह साँप हमें

डाक्यूमेंट्री फिल्मों से बाहर निकल कर
सरकारी दस्तावेजों से इतर
ठेठ अपनी जिंदगी जीते हुए
गाँवों की गलियों की खाक छानते हुए
जोर-जोर से आवाज लगाता मोछू नेटुआ
कोवे जैसा महक रहा है मालिक इस घर में
कोवे की इस महक को सूँघ पाता केवल मोछू नेटुआ
जिसके बारे में वह इतराते हुए बतलाता
कि जिसे साध पाते हैं
कठिनाइयों को झेलने वाले
केवल कुछ लोग ही इस दुनिया में
वही सूँघ पाते हैं कोवे की इस गंध को
कोवे की इस तथाकथित महक से घबराए घर वाले
कुछ कदम आगे बढ़ गए
मोछू नेटुआ को फौरन बुलाते फरमाते
मोछू नेटुआ तब किसी ज्योतिषी के अंदाज में बतलाता
बहुत खतरनाक है बड़ा जहरीला
बाबूजी जान की बाजी लगा कर निकालना पड़ेगा
सौ रुपये और एक धोती से कम न लूँगा
मोल तोल के बाद आखिर मामला फिर
बीस कम सौ पर पट जाता
मोछू नेटुआ तब फौरन अपने काम पर जुट जाता
अपने सिर पर पगड़ी बाँधते
कान में जड़ी खोसते
डंडा फटकारते... अबूझ सा मंत्र पढ़ते
तमाम संबंधों की कसमें खाते
वह घुस जाता तब किसी एक कमरे में
और निकाल लाता सचमुच

अपने हाथों की पकड़ में साँप
अक्सर जो उसके मुताबिक
पुराना और बहुत जहरीला हुआ करता
तब सहज ही यकीन कर लिया करते थे लोग
मोछू नेटुआ की बातों और उसके इस करतब पर
घर के लोगों को पड़ती थी उस रात चैन की नींद
और ठीक उसी दिन
मोछू नेटुआ का घर भी जगमगाता
बहुत दिनों के बाद
उसका पूरा घर जी भर खाता-पीता-सोता

ठमक जाता ठिठक जाता अक्सर भीड़ देख कर वह
फिर घर की ओर जा कर बतलाता विशेषज्ञ मुद्रा में
भीड़ से बिदक कर
पास-पड़ोस में हवा खाने कहीं निकल गए नागराज
और इस तरह बढ़ जाता वह कन्नी काट कर आगे
किसी ऐसे घर की तलाश में
जहाँ कम से कम लोगों के बीच
अपना हुनर दिखा कर
कोई साँप पकड़ सके वह

वैसे कुछ जानकार लोग यह बतलाते
कि मोछू नेटुआ के कमाई-धमाई का जरिया है यह
और जहाँ तक साँप की बात है
खोंसे रहता है उसे वह अपनी कमर
या धोती के पोछिटे में पहले से ही
कुछ लोग साँप पकड़ने के इस उपक्रम को
जाँचने-परखने के लिए
घर के जंगलों-रोशनदानों से
ताक-झाँक करने की तमाम कोशिशें करते
और फिर अपने अपने अनुभव सुनाते बतलाते
फिर भी रहस्य का एक पर्दा तना रहता
पूरी खामोशी के साथ अपनी जगह
जस का तस

कुछ लोगों का यह भी कहना था
कि साँप के बहाने घरों में घुस कर
सामानों की थाह लेता फिरता है मोछू
और फिर रात-बिरात
अपने साथियों समेत सेंध मार कर
चुरा ले जाता है सारा मालो-असबाब

एक बार जब हमने पूछा मोछू से
उसके गाम-धाम के बारे में
तब उसने बताया कि हम खानाबदोश हैं बाबूजी
पीढ़ियों से हमारे पास नहीं कोई घर
नहीं एक भी धुर जगह जमीन कहीं कोई
जहाँ रुक गए वहीं बसेरा
जब जग गए तभी सबेरा
हमीं हैं असली रमता जोगी बहता पानी
कभी हमारे देश को गुलाम बनाने वाले फिरंगियों ने
हम जैसी तमाम घुमंतू जातियों को
घोषित कर दिया था अपराधी
और तब से यह लेबेल अपने चेहरे पर लगाए
मरते हुए जीने की कोशिशों में
लगातार लगे हुए हैं हम
एक समय तो आलम यह था कि
चाहें जहाँ चोरी-डकैती पड़े जिला-जवार में
हम ही पकड़ लिए जाते पूरे कुनबे समेत
तब पिछउँड़ चढा कर बाँध दिया जाता था हमें खंभे में
और बेरहमी से तब तक इतना मारा पीटा जाता
जब तक बेसुध न हो जाते
बेहोश न पड़ जाते हम मार से
मालिक सही बताऊँ आपको
मुझे तो लगता है कि
आज के समय में सबसे बड़ा अपराध है गरीबी
और तुलसी बाबा भी बहुत पहिलवे
केतना सही कह गए हैं मालिक
समरथ को नहीं दोष गोसाईं

और आज अपने जिस लोकतंत्र पर
गर्व करते हम नहीं अघाते
उसी की पहरुआ अपनी यह सरकार भी
राई-रत्ती कम नहीं फिरंगियों से
बातचीत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए
जब यह कहा मैने मोछू से
तो लगा कि जैसे
उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो मैंने
तब बेसाख्ता बोल पड़ा वह
हाँ मालिक यह ससुरी सरकार तो
कभी हमें आतंकवादी बताती है
तो कभी घोषित कर देती है नक्सलवादी
पता नहीं कहाँ से
ढूँढ़ लाती है एक से एक शब्द
अपनी भाषा में
हमें तो सूझी नहीं रहा कुछ
अब आपे बताइए मालिक
कि कैसे धोएँ हम
अपने माथे पर जबरिया लादा गया
बेमतलब का कलंक
दिक्कत की बात तो यह कि
कभी कोई समझ ही नहीं पाया हमें
अब देखिए न आपे हमारी नियति
कि पुराने जमाने का अछूत मैं
इस जमाने का अपराधी हो गया हूँ
होता रहा हमारे साथ
हमेशा बदतर सलूक
उठती रही बराबर मन में
एक अजीब सी हूक

छेड़ने के अंदाज में
अपनी बात रखते हुए कहा मैंने
हकीकत में अपराधी तो हैं
लाखों-करोड़
बिना किसी आवाज के घोट जाने वाले
हमारे नेता और अधिकारी
तमाम अपराधों के बावजूद बने रहते हैं
नेता और अधिकारी ही जो जीवनपर्यंत
मेरा इतना कहना था कि
तिलमिलाते हुए बोल पड़ा मोछू नेटुआ
मुँहदेखी बात नहीं
आप बिल्कुल साँचे कह रहे हैं मालिक
कभी इनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं दिखाई पड़ता
लाज-शरम तो जैसे घोल कर पी गए हैं ये
दरअसल असली विषधर हैं ये समाज के
अमिट कलंक हैं ये हमारे आज के
जिन्हें बाहर नहीं निकाल पा रहा कोई तंत्र-मंत्र
इन मायावियों के सामने
सारे हरवा-हथियार पड़ते जा रहे हैं बेअसर
तंत्र-मंत्र पड़ते जा रहे हैं बाँझ
और सरकार भी तो इन्हीं के पास गिरवी होती है
अब तो खोजना ही पड़ेगा हमीं लोगों को
इनसे निपटने के लिए
जमाने के मुताबिक कोई नया ब्रह्मास्त्र
एक बात बताएँ मालिक
अच्छा जाने दीजिए छोड़िए
यह कह कर अचानक
चुप्पी के समंदर में डूब गया मोछू नेटुआ
मैंने फिर बहुत कुरेदा उसे
तब हमारे बीच पसरी हुई खामोशी को
चीरते हुए बोल पड़ा वह
दरअसल अपने समय की हँसमुख दुनिया का ही

एक उदास चेहरा हैं हम
अपनी उदासी के लिए जैसे हमेशा से अभिशप्त
अब देखिए ना कि
तरह तरह की तरकीबों से
नहीं जुटा पा रहे हम आज भी
तमाम लोगों की ही तरह दूसरे टैम का भोजन
कपड़ा लत्ता भी मुश्किले से चढ़ पाता है तन पर
हमारे बाल-बच्चे जान नहीं पाए कि
जीवन का कोई अनुभव होता है बचपन
अपनी फाँकाकशी में भटकते-फिरते हम
सोच ही नहीं पाते कोई फितूर
और होते रहते हैं लगातार दर-बदर
घूमते फिरते हैं रोज इधर उधर
यही देख समझ कर आखिर एक दिन
अपना काँवर अपनी झॅंपोली फेंक-फाँक कर
भाग गए हमारे दोनों बेटुए
बाहर कहीं मेहनत मजूरी करने
बाबूजी अब तो दोनो हो गए एकदमे से बहरवाँसू
मोछू नेटुआ फख्र से बतलाते
चलो अच्छे से गुजर-बसर तो हो जाती है न उनकी
ठीक ही तो किया उन दोनों ने
दर-दर भटकना तो नहीं पड़ेगा उन्हें हमारी तरह
दो जून की रोटी जुटाने के लिए
और हम बूढ़ा-बूढ़ी की जिनगी ही कितनी बची है
कट ही जाएगी जैसे-तैसे

फिर मोछू की आँखों में एक चमक दिखाई पड़ी
बोल उठा वह अपने पर गर्व करते हुए जैसे
तमाम तंगहाली के बावजूद भी
मालिक हमरा एक पक्का उसूल है
आज भी जिस साँप को पकड़ते हैं हम अपने हाथों
बुलाते-बझाते हैं जिन्हें पुचकार कर
अपने सगे-संबंधियों की किरिया खा-खा कर
उन्हें छोड़ आते हैं दूर जंगल में
अपने वादे के मुताबिक
कि जिओ-खाओ घूमो-फिरो आजाद हो कर
जंगल की इस दुनिया में नागराजा
किसी को डॅंसने-मारने से बहुत बेहतर है
जिनगी जीने का यह सलीका

मालिक एक जगह कहीं सुना हमने कि
खतम होते जा रहे हैं बड़ी तेजी से साँप भी
अब तो नहीं रहे वे साँप
ना ही रहे वो सॅपधरवे
प्रश्न की शक्ल में पूछे गए
उसकी बात को बीच में ही काटते हुए बोल पड़ा मैं
जानते हो अब तो
एक मशीन ईजाद हो गई है साँप पकड़ने की
जो बड़ी आसानी से खोज लेती है
साँपों को दूरदराज से ही
हाँ मालिक हमने भी सुना है कहीं कि
साँपों को पकड़ कर
बड़ी बेरहमी से निकाल लिया जाता है उसका जहर
सुना है कि उस जहर से बनाई जाती हैं
एक से बढ़ कर एक महँगी दवाइयाँ
फिर वे अपने कहर के जहर से मार डालते हैं साँप को
महज उसकी खाल के लिए
सुना है जिससे तैयार होते हैं कारखानों में
महँगे-महँगे कोट
महँगे-महँगे बैग
बाजारों में बेचने के लिए

जैसे खूँटों से एक-एक कर गायब होते गए बैल
गायों से खाली होते गए दुआर
अपनी सख्त कवच के बावजूद
कछुए नहीं बचा पाए खुद को
और हमारे देखते-देखते गायब होते गए
दूर तक नजर रखने वाले गिद्ध
ठीक उसी तरीके से गायब होते जा रहे हैं साँप
दुनिया जहान से एक-एक कर
मेरी इस बात को पूरा करते हुए बोल पड़ा वह
देखिए ना अब तो हालत यह है कि
किसी गाँव घर से
एक अरसे से
नहीं हो रही कोई बुलाहट
और मेरी परेशानी है कि
बढ़ती ही जा रही है दिन-ब-दिन
और अब वे जंगल भी तो नहीं रहे अब
जिसमे बिना किसी डर भय के आजादी से
विचरते फिरते थे साँप अपने संगी साथियों के साथ
और जहाँ हम भी अपने वादे के मुताबिक
छोड़ आते थे पकड़े गए साँपों को

खाँसते-खखारते
देह का ही अब अंग बन गए अपने दर्द से कराहते
बूढ़े हो चले मोछू नेटुआ
अब पूछते फिरते हैं एक ही सवाल
पागलपन की हद तक जा कर
गायब करते-करते सारे जीवों को वनस्पतियों को
क्या कायम रख पाएगा आदमी
धरती के अपने इस ठिकाने पर खुद को सही सलामत
कहीं से नहीं मिलता उसे कोई जवाब
कोई जहमत नहीं उठाता अब
इस मुददे पर कुछ भी सोचने की विचारने की
सब जगह दिखाई पड़ता है उसे
मरघट सा सन्नाटा

पीढ़ियों से धंधा करते आए मोछू नेटुआ
चिंतित है अब इस बात पर
कि बेअसर पड़ता जा रहा है साँप का जहर
और लगातार जहरीला हो़ता जा रहा है आदमी
मोछू खुद भी तस्दीक करते हैं इस बात की
कि साँपों को तो आसानी से चीन्ह लेते थे हम
कि कौन गेंहुवन है कौन करैत
लेकिन आदमी को आदमी की भीड़ से बीन कर
जहरीले तौर पर अलगा पाना
एकदमे से असंभव है मालिक

और सबसे दिक्कत तलब यह कि
अभी तक के सारे तंत्र-मंत्रों को धता बताता
काँइयाँ किस्म का आदमी ऊपर से कुछ और
अंदर से कुछ और हुआ जा रहा है
अब मोछू किसका खाए किसका गाए
का ले के परदेशे जाए
बदलती हुई परिस्थितियों में
उसकी समस्या अब यह है कि
लगातार जहरीली होती जा रही इस दुनिया में से
कुछ बेजहर लोगों को वह कैसे सामने लाए
कैसे इन्हें बचा कर सुरक्षित रखे छोड़े कहीं
किस तरह अपना वचन निभाए
कैसे वह अपनी चाहत का कुछ रंग जुटा कर
अपने समय की
एक सुखद तस्वीर बनाए....।
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