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सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव में अनुवाद की भूमिका: रक्षा कुमारी झा


सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव में अनुवाद की भूमिका
रक्षा कुमारी झा


21वीं सदी की सबसे बड़ी देन है कि विश्व एक साइबर विलेज में बदल गया है। सूचना-क्रांति और जनसंचार क्रांति ने आज विश्व को छोटा कर दिया है। विश्वभर की खबरें कुछ ही सेकेंडों में दुनिया में प्रसारित हो जाती है। इंटरनेट, सैटेलाइट और टेलीकम्यूनिकेशन ने तो क्रांति ही कर दिया है। आज ग्लोबलाइजेशन एवं बहुभाषिकता का युग है। ग्लोबलाइजेशन एवं बहुभाषिकता विभिन्न देशों की संस्कृतियों, भाषाओं एवं भौगोलिक सीमाओं में परस्पर आदान-प्रदान के कारण उत्पन्न समन्वित स्थिति एवं स्वरूप की देन है। काफ़ी हद तक यह स्थिति विभिन्न देशों के साहित्य के परस्पर अनुवाद के कारण ही संभव हो पाई है। इसलिए आज के ग्लोबलाइजेशन युग में सृजनात्मक साहित्य के अनुवाद का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। इस आधार पर अगर वर्तमान युग को अनुवाद का युग कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यदि अनुवाद न होता तो विश्व-संस्कृति की इतनी बड़ी और महत्त्वपूर्ण परंपरा विकसित नहीं होती।

सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। समाज सतत परिवर्तनशील और विकासशील होता है। इसके स्वरूप निर्माण में कई तरह के तत्त्व सक्रिय रहते हैं जिनमें आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक सांस्कृतिक चेतना आदि प्रमुख होते हैं। किसी भी समाज की जन चेतना का निर्माण, विकास एवं परिवर्तन उसकी परिस्थितियों के अनुसार होता है। युगीन परिस्थितियों से उद्भुत इस चेतना की निर्मिति में जनसामान्य की भाषा महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। विश्व के संस्कृतियों में मौखिक और लिखित साहित्य का अनुवाद एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया रही है। जब कोई रचना लोक-भाषा में उपलब्ध हो जाती है, तो ज्ञान के प्रसार से जनमानस में जागरूकता पैदा करती है। एक भाषा का साहित्य किसी-न किसी रूप में दूसरी भाषा में, दूसरी से तीसरी भाषा में इस तरह से अनेक भाषाओं में स्थान पाता है।
विश्व-संस्कृति के विकास में अनुवाद का योगदान अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण रहा है। धर्म, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, वाणिज्य-व्यवसाय, राजनीति, संस्कृति आदि के विभिन्न पहलुओं का अनुवाद से अभिन्न संबंध रहा है। जबकि समाज और अनुवाद का संबंध भी नया नहीं है। इस संबंध की जड़ें मानव समाज में काफी पुराना है। अनुवाद ने विश्वभर में ज्ञान-विज्ञान की चेतना से मानवीय ज्ञानात्मक और भावात्मक संवेदना को बदला है। अनुवाद को हम सुदृढ़ सेतु के रूप में देख सकते हैं जो संस्कृति के भौतिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक पहलुओं को गतिशीलता प्रदान करती है। विश्व-संस्कृति के निर्माण में विचारों के आदान-प्रदान का बड़ा सहयोग रहा है और यह आदान-प्रदान अनुवाद से ही संभव हो पाया है। अनुवाद कर्म ने सामाजिक चेतना के बदलाव, संघर्ष और टकराहट को प्रबल और सजग प्रक्रिया के रूप में जीवन्त रखने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाया है।

वैचारिक आदान-प्रदान की चेतना से सामाजिक वैचारिकता में एक नई भूमि तैयार करने में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका अनेक तर्कों और उदाहरणों के माध्यम से देख सकते हैं।

यूरोपीय देशों को रेनेसाँ काल में ग्रीक और रोम के साहित्य ने प्रभावित किया। ग्रीक और लैटिन भाषाओं ने भी क्लासिक भाषाओं के रूप में यूरोप की सभी भाषाओं को प्रभावित किया। बाइबिल के अनुवाद के बाद एक ऐसी साहित्यिक क्रांति आई जिसने समूचे यूरोप को ही नहीं, बल्कि अनेक देशों की संस्कृतियों को भी प्रभावित किया। बाइबिल का अनुवाद विश्व की लगभग सभी भाषाओं में किया गया। बाइबिल के अनुवाद के इतिहास को पश्चिमी संस्कृति का इतिहास कहा जा सकता है।
पूँजीवाद के विकास और सामंतवाद के पतन की श्रृंखला में किस तरह अनुवाद की भूमिका रही है, उसको देखा जा सकता है। एशिया में भारतीय ग्रंथों के अनुवाद के द्वारा अनेक देशों में बौद्ध धर्म और भारतीय संस्कृति का प्रसार किस तरह हुआ है, उसको भी हम देख सकते हैं। नवीं-दसवीं शताब्दी में इंग्लैंड के जनसमाज में सौहार्द पैदा करने और इसे एकीकृत करने के लिए किंग एल्फ्रेड ने अनुवाद की सहायता ली थी।

        इस काल में अनुवाद, व्याख्या और भाष्य ने नए आयाम विकसित किए। यूरोपीय वर्नाकुलरों के साहित्य का उदय हुआ। आगे चलकर ईसाई मत के प्रसार के साथ अनुवाद ने एक अन्य भूमिका ग्रहण की। भाषा और साहित्य की समृद्धि तथा जनचेतना की उद्भावना से आगे बढ़कर अनुवाद ‘ईश्वर की वाणी’ का प्रसार करने की ओर उन्मुख हुआ। धर्म ने अनुवादक के सामने एक नया लक्ष्य रखा और अनुवाद अब एक ऐसे परिवृत्त में घूमने लगा, जो सौंदर्यबोध और ईसाई मत दोनों के मानदंडों को एक साथ लेकर चलने लगा।

इसी तरह एशिया में भारतीय ग्रंथों के अनुवाद के द्वारा अनेक देशों में बौद्ध धर्म और संस्कृति का प्रसार हुआ। संस्कृत और पालि से चीनी भाषा में अनुवाद का कार्य ईसा की पहली शताब्दी से ही शुरू हो गया था। चीनी त्रिपिटिक के तेईशों संस्करण में 3360 से अधिक भारतीय ग्रंथों का चीनी में अनुवाद है। चीनी भाषा में भारतीय ग्रंथों के अनुवाद का यह कार्य कई शताब्दियों तक चलता रहा। चीनी भाषा में बौद्ध ग्रंथ चीन में आदरणीय बन गया और चीनी जनता उन्हें पूजने लगी।
जापान में इन चीनी अनुवादों के परिणामस्वरूप बौद्ध-धर्म के प्रसार के साथ-साथ सभ्यता का विकास होने लगा। बौद्ध-धर्म ने वहाँ एक नए विचार पैदा कर दिया। शिक्षा का सार्वजनिक प्रसार हुआ। इसके परिणामस्वरूप जापानी भाषा में साहित्य सृर्जना हुई।

भारत की अध्यात्म विद्या और दर्शन के उत्तम ग्रंथों का तिब्बती भाषा में अनुवाद किया गया। तिब्बती भाषा का एक साहित्यिक और परिष्कृत भाषा के रूप में विकास हुआ। साहित्य अनुवाद और विशद व्याख्यानों के आंदोलन ने तिब्बत में बौद्धिक चेतना को जन्म दिया। सहस्त्र सूत्रों और उनकी टीकाओं के तिब्बती अनुवाद ने ही वहाँ नवजागरण का सूत्रपात किया।

चौदहवीं शताब्दी में मंगाल भाषा में भी बौद्ध सूत्रों का अनुवाद शुरू किया गया। कंजूर के 108 खंडों के अतिरिक्त मंगोल भाषा एवं तंजूर भाषा में भी भारतीय कृतियों का अनुवाद किया गया। अमरकोश, काव्यादर्श आदि कृतियों के मंगोल अनुवादों ने मंगोलिया की साहित्यिक परम्परा को प्रभावित किया। मंगोल विश्व-कोष में भारतीय आयुर्वेद और रसायन शास्त्र के अनेक ग्रंथों के भी अनुवाद मिलते हैं। इसी तरह इन्डोनेशिया, श्रीलंका, वर्मा, लाओस, थाइलैंड और कम्पूचिया में भी अनेक संस्कृत तथा पालि ग्रंथों का अनुवाद किया गया। इन अनुवादों के परिणामस्वरूप उन देशों का साहित्य समृद्ध हुआ और वहाँ भारतीय धर्म-चिंतन और संस्कृति का प्रसार हुआ।

भारतीय पुस्तकों का अनुवाद अरबी में भी हुआ, लेकिन भारतीय पुस्तकों के अनुवादों ने अरबी संस्कृति को जितना प्रभावित किया उससे कहीं ज्यादा अरबी संस्कृति ने भारतीय संस्कृतियों को प्रभावित किया। अरबी और फारसी भाषा और साहित्य का वर्चस्व भारत में लंबे समय तक कायम रहा। अरबी और फारसी भाषाएँ भारत में शासकीय भाषाओं के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। उनके प्रभाव से भारतीय भाषाओं के स्वरूप में परिवर्तन आया।

यूरोप के देशों में जहाँ एक ओर एशियाई संस्कृति का प्रचार अरबी के माध्यम से हुआ, वहीं दूसरी ओर यूरोपीय देशों को ग्रीस और रोम के साहित्य ने भी प्रभावित किया। ग्रीक और लैटिन भाषाओं के क्लासिक भाषाओं के रूप में, यूरोप की सभी भाषाओं को प्रभावित किया।

नवजागरण की चेतना की जो शुरूआत इटली में हुई थी, वह साहित्य और कला के क्षेत्रों में यूनान की श्रेष्ठ कृतियों के अध्ययन और पुनः सृजन तक सीमित थी। जब जर्मनी और इंग्लैंड आदि ने बाइबिल के अनुवाद का तथा ब्रिटिश शासकों ने रोम के चर्च से मुक्ति का दुःसाहस किया तो समाज को व्यापक परिवर्तन से गुजरना पड़ा। लेकिन जर्मनी और इंग्लैंड नवजागरण को केवल सैद्धांतिक रूप में ही नहीं पाना चाहते थे, वे उसे अपने जीवन में भी उतारना चाहते थे। अतः प्राचीन ग्रीक श्रेष्ठ साहित्य और कला का अध्ययन ही पर्याप्त न था, बल्कि वर्तमान असंतोषजनक परिस्थितियों का सुधार भी आवश्यक था। बाइबिल के जर्मन तथा अंग्रेजी अनुवादों ने सामाजिक सुधार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। आम आदमी को बाइबिल पढ़ने और रखने का अधिकार मिला। इस सबके कारण यूरोपीय समाज को विप्लव के दौर से भी गुजरना पड़ा। भयंकर रक्तपात और राजनीतिक उथल-पुथल के काल-विशेष की घटना मात्र बनकर न रहे, बल्कि इससे समूचे यूरोपीय समाज के जीवन में गंभीर परिवर्तन आए। चर्च ऑफ इंग्लैंड की स्थापना तथा बाइबिल के अंग्रेजी अनुवादों के माध्यम से ईसाई धर्म में प्रोटेस्टेंट मत की शुरूआत हुई। टिंडेल, इटेसमस, मार्टिन लूथर आदि ने समाज को पोप की सत्ता की कठिन धार्मिक जर्जर रूढ़ियों से मुक्ति दिलाई। नव-जागरणकालीन यूरोप में अनुवादों की भूमिका केन्द्रीय हो गई। साथ ही इसने अतीत और वर्तमान के बीच तथा राष्ट्रवाद और धार्मिक संघर्ष के दबाव के कारण बिखरती हुई विभिन्न भाषाओं और परम्पराओं के बीच संबंध को स्पष्ट करते हुए उसे तार्किक आधार प्रदान किया। यही कारण है कि नवजागरण काल में अनुवाद किसी भी स्थिति में गौण न होकर ऐसे प्रमुख कार्य के रूप में दिखाई देता है।

भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना के बाद ब्रिटिशों ने प्राचीन भारतीय परम्पराओं, ज्ञान-विषयों पर उपलब्ध समस्त महत्त्वपूर्ण साहित्य के महत्त्व को समझा था और इसीलिए उसका अंग्रेजी में अनुवाद कराया। 1775 में सर विलियम जोन्स द्वारा स्थापित बंगाल की रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ने प्राचीन भारतीय साहित्य की खोज तथा उसके अनुवाद और प्रकाशन का कार्य आरंभ किया। 1798 में सर मोनियर विलियम्स ने कालिदास के ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ का अनुवाद किया। यूरोपीय समाज और साहित्य पर इस अनुवाद का कई रूपों में प्रभावित किया। मैक्समूलर, शॉपेनहावर, श्लेगल आदि जर्मन विद्वानों द्वारा संस्कृत के वैदिक और लौकिक साहित्य के अनुवाद कार्य से भाषा विज्ञान के क्षेत्र में नई दिशा खुली और तुलनात्मक भाषा विज्ञान का आरंभ हुआ।

हिंदी के मध्यकाल में लोकभाषाओं के विकास और लोकजागरण को अनुवाद के परिप्रेक्ष्य में देखने पर हम पाते हैं कि इस काल में संतों ने अपनी भाषा में संस्कृत और पाली के महान् साहित्य, दर्शन, धर्म, संस्कृति और नीति चेतना के ग्रंथों का स्वच्छंद अनुवाद किया। उपनिषदों, महाभारत, रामायण और गीता के विचारों के लोकभाषा में अनुवादों की एक विस्तृत परम्परा सोलहवीं शती से अठारहवीं शती तक दिखाई देती है। गीता का हिंदी अनुवाद हखल्लभ ने 1644 में, भगवानदास ने 1669 में, आनन्दराम ने 1707 में किया। इस प्रकार अनुवाद ने इस काल में जनता के मन पर जमी हुई निराशा को हटाते हुए जीवन में नई किरण दिखाई।

इसी प्रकार मध्ययुगीन कविता में भक्तिधारा को जनचेतना में प्रखर गति से प्रवाहित करने में अनुवादों की महत्त्वपूर्ण भूमिक रही। भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना के बाद नवजागरण की जो नवीन चेतना प्रस्फुटित हुई उसमें अनुवाद की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। फ्रांसीसी राजक्रांति, यूरोपीय पूंजीवाद, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद की शक्तियों और उनके खतरों से हम अनुवाद के माध्यम से ही परिचित हुए थे। पश्चिम में मार्क्स, रूसों, डार्विन और टॉलस्टॉय के विचारों के साथ यूरोप में जिस नवचिंतन का आरंभ हुआ था, उसे भारत तक पहुँचाने के कार्य में अनुवाद महत्त्वपूर्ण रहा है। इन अनुवादों से एक नया बुद्धिवाद का उदय हुआ तथा मध्ययुगीन जड़ता का ध्वंस हुआ। उन्नीसवीं सदी के भारत में मानवमुक्ति की कल्पना के विकास में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। दूसरी भारतीय भाषाओं के बीच वैचारिक आदान-प्रदान के रास्ते भी अनुवाद ने ही खोलें। बंगला से बंकिम, शरद, माइकेल मधुसूदन दत्त, रवीन्द्रनाथ, मराठी से हरिनारायण आप्टे, खाण्डेकर आदि के जो अनुवाद हिंदी में हुए, वह हिंदी-भाषी प्रदेशों में एक नया विचार-विन्मय उत्पन्न किया और जनमानस साम्प्रदायिकता और प्रांतीयता से ऊपर उठकर अखण्ड चेतना की दिशा प्राप्त किया। यह समझने की जरूरत है कि हमारे राष्ट्रीय सांस्कृतिक नवजागरण में अनुवाद ने युगान्तकारी कार्य किया है। स्वयं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हैकल की क्रांतिकारी पुस्तक ‘रिडिल ऑफ दि यूनिवर्स’ का ‘विश्व प्रपंच’ नाम से अनुवाद किया। हैकल की इस पुस्तक ने पूरे एशिया में तहलका मचा दिया था। दुनिया भर के मुक्ति संग्रामों से हमें मुक्ति संग्राम की नई चेतना मिली। दुनिया के बहुत से देश ब्रिटिश साम्राज्यवाद के नीचे पिस रहे थे उन सबकी आजादी में अनुवाद की अहम भूमिका रही है।

विभिन्न देशों के बीच साहित्यिक तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने जीवन-मूल्यों में भारी परिवर्तन उपस्थिति कर दिया है। हजारों मील की दूरी पर बसने वाले मनुष्यों के हर्ष, उल्लास, आंसू, पीड़ा और तकलीफ़ का अनुभव अनूदित कृति या पाठ के माध्यम से होने लगा है। इन माध्यमों के द्वारा जहाँ एक ओर पेशेवर रिश्तों में दृढ़ता आई है, वहीं दूसरी ओर मानवीय संबंधों की गहराई, ऊष्मा, सुख-दुख, परस्पर-संवाद तथा अनुभूति बोध को भी जगाया है। अब व्यक्ति अथवा राष्ट्र का संकट केवल उन तक सीमित न रहकर वैश्विक संकट के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है। व्यक्ति तथा राष्ट्र की समस्या का अंतर्राष्ट्रीय समाधान खोजा जाने लगा है। अनुवाद ने दो राष्ट्रों के बीच न केवल व्यावसायिक तथा पेशेवर संबंध, बल्कि मानवीय रिश्तों को भी संप्रेषित करने का सराहनीय कार्य किया है।

वास्तव में अनुवाद कार्य ने सामाजिक चेतना में परिवर्तन की प्रक्रिया को जीवंत बनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। अनुवाद का माध्यम न होता तो 1966 में नीग्रो युवकों द्वारा बनाया गया लड़ाकू संगठन ‘ब्लैक पैंथर’ के तर्ज पर 1975 में महाराष्ट्र का ’दलित पेंथर’ भी न बना होता। मराठवाड़ा में उपजे एक विरोध के स्वर को जहाँ एक ओर अनुवाद ने व्यापक भारतीय दलित समुदाय की चेतना से जोड़ा तो, वहीं दूसरी ओर दुनिया के तमाम कोनों में चल रहे रंगभेदी आंदोलन से भी जोड़ा। अन्य भाषा-भाषियों द्वारा लिखे गये दलित साहित्य को हिंदी भाषा-भाषियों और अन्य भाषा भाषियों तक पहुँचाने में अनुवाद की अहम भूमिका रही है।

निष्कर्ष
विश्व के सभी विकसित देशों की राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिकीपरक प्रगति में अनुवाद की उल्लेखनीय भूमिका रही है। अनुवाद से ही न्यूटन के गुरूत्वाकर्षण सिद्धान्त, डार्विन के विकासवाद, फ्रायड के मनोविश्लेषणवाद और कार्ल मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की जानकारी अनुवाद से ही प्राप्त हुई है और इससे समूचा विश्व प्रभावित हुआ। वास्तव में विश्व की कम होती दूरियों में अनुवाद की भूमिका अहम है।

संदर्भ-ग्रन्थ
Ø गोस्वामी, कृष्ण कुमार, अनुवाद विज्ञान की भूमिका, नई दिल्ली, राजकमल प्रकाशन, 2008
Ø जी गोपीनाथन, टंडन, पूरनचंद, अनुवाद साधना, दिल्ली, अभिव्यक्ति प्रकाशन, 2007
Ø तिवारी, भोलानाथ, अनुवाद विज्ञान, दिल्ली, अमर प्रिंटिंग प्रेस, 1972
Ø नगेन्द्र, (सं.), अनुवाद विज्ञान सिद्धांत और अनुप्रयोग, दिल्ली, दिल्ली विश्वविद्यालय, 1993

पी-एच. डी. ( हिन्दी अनुवाद )
मो. नं. – 08130589082
भारतीय भाषा केन्द्र
भाषासाहित्य और संस्कृति अध्ययन संस्थान
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
नई दिल्ली-110067


[जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के अंक 23 में प्रकाशित आलेख]


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