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भारतीय बुद्धिष्ट रंगमंच और नई सांस्कृतीक चेतनाएँ: विरेंद्र गणविर


भारतीय बुद्धिष्ट रंगमंच और नई सांस्कृतीक चेतनाएँ
                विरेंद्र  गणविर
            भारतीय रंगमंच मे विविध षैली, प्रांत, धर्म, जाती तथा विविध पद्धती मे मनोरंजनात्मकता के तौर पर समुचा रंगमंच बिखरा पडा नजर आता है आधुनिक रंगमंच की चर्चा कि जाए या एैतिहासिक अथवा वैदीक रंगमंच कि बात हम करते है। कुल हमे परंपराओमे धार्मीकता कि नजर से भारतीय रंगमंच गोलबंद नजर आता है। किन्तु भारतीय रंगमंच कि जडे संषोधन पटलपर ज्ञान और मनुश्य के बुद्धीविस्तार अर्थात ज्ञान विचार का संपूर्ण आविश्कार जो मानवकेंद्रित विकास, एैतिहासीक रंगमंच कि खोज मे हमे मिलता है; पर इस ज्ञान रंगमंच को भारतीय रंगमंच कि मूल धारा मे स्थान नही दिया गया। स्पश्टता से इस बात को रखने के लिए मूझे कोई संदेह नही होता, के भारत के मूल नाट्य कला संस्कृती को हर तरह से नश्ट करने का प्रयास वैदीक कालखंड मे किया गया और अविचारो से उत्पत्तीत हुए जीसे मै धर्मरंगमंच कहता हु और वह एक दुसरे मनुश्य का षोशण तथा उनकी बुदधी निरास्त करने के लिए हि निर्माण हुआ है।

            डॉ. बाबा साहब आंबेडकर ने हमे बताया हमारे भारतीय संस्कृती का इतिहास दस हजार वर्श पूरातन है। नाग सभयता मे बसी नागसंस्कृती यह जंबुद्वीप भारत की मूल संस्कृती है। जहा नागरंगमंच होने के भी अवषेश पाये गये है और नाग संस्कृती यह बौद्ध संस्कृती है। जिसे आर्यो ने पूरी तरह इस देष से नश्ट किया। नागलोक आर्यो के भयंकर षत्रु थे। इनमे भयंकर युद्ध भी हुये, नागलोगोने दुनियामे बडे तौर पर बुद्ध धम्म का प्रचार प्रसार किया और पांच हजार वर्श पूर्व सिंधू नदी, घाटी जो अत्यंत समृध्द एैसी सुसंस्कृती थी उसे चार हजार वर्श पूर्व आर्य आक्रमण कार्यो ने जो की बाहरसे से आए हुए थे। उन्होने समृदध एैसी सिंधु संस्कृती मतलब नाग संस्कृती पूरी तरह से नश्ट कर दी और वैदीक ब्राम्हणी परंपरा सुरू कि। यह बात यहा रखने यह भी वजह है कि इस भारत के बहुजन समाज कि मूल सिंधू संस्कृती निर्माण करनेवाले हम नागवंषी लोग है।
            भारतीय नाटक कला का दृश्टिकोन ऐतिहासीक विवेचन पटल पर मुल इतिहास तथा लिखित अध्ययन से मिलनेवाला या अभ्यास चिंतको के माध्यम से, जो रचनात्मक नाट्यकला का दृश्टिकोन हमारे आगे खडा है, इसके सत्यता के दस्तावेज मेरे मत से तीन स्तंभ पर टटोल कर चिंतन-तत्वो के माध्यम से अंतिम निश्कर्श का प्राकृतिक एंव तर्कसंगत मानवतावादी विष्लेशण होना अत्यंत जरूरी होता है। ना की वह किसी भी राजकीय स्व हेतू या उस समय की परिस्थितीयो से किया गया समझौता, इतिहास का लेखन भविश्य को नतभ्रश्ट कर, अंधकार की दलदल मे ले जाता है। इसे हम सांस्कृतिक अधःपतन कहते है।

            भारतीय बुद्धिस्ट थिएटर भारतीय लोंगो में ऐतिहासिक हो या आधुनिक तौर पर भी इस रंगमंच का उल्लेख हमें नाटक विधा में नही मिलता, आमतौर पर बुद्धिस्ट थिऐटर की जडें हमें अभ्यासक - विद्वानो के माध्यम से कुछ हद तक मिलती है पर खेद है की सामान्य नाटक खेलनेवालों को इससे कोई संबंध नही होता।

            बुद्धिस्ट नाटक का सही मायने में निंव रखने का कालखंड इ.सा. पुर्व 1 षताब्दी मे बौद्ध भिख्खु भदंत अश्वघोश को जाता है। कालीदास के दो षतक पहले अश्वघोश ने इस ज्ञान (बुद्धिस्ट - ज्ञदवूसमकहम) थिएटर की अवधारणा दृढ़ता से रखी ये भारतीय रंगमंच के साथ-साथ पुरे दुनिया को मानवतावाद की षिक्षा रंगमंच के माध्यम से देने की पहल थी। अश्वघोश के काल मे भारत पर आक्रमणकारीयो का ही राज था। सिंधू संस्कृती के काल से भारतभुमी पर निरंतरता से आक्रमण होते आये। भारत पर पहले आक्रमण आर्यो ने किया है। ग्रीक भी भारत पर आक्रमण से पिछे नही रहा। उसके बाद भी कई ग्रीक आक्रमक हुऐं, उन्होंने अपनी संस्कृती भी भारत मे साथ लाई। ग्रीक नाटक, साहित्य आज भी भारतीयो के मन पर प्रभाव छोड चुका है। उसी समय किसी ग्रीक कलाकार ने अश्वघोश को नाटक देखने के लिऐ अपने साथ ले गऐ। अश्वघोश को कला मे बहुत रूची थी। (संदर्भ - वोल्गा तें गंगा - पंडीत राहूल सांस्कृत्यायन)। उस नाटक का अश्वघोश पर विलक्षण परिणाम हुआ। नाटक में अभिनय करनेवाली प्रभा नाम की अभिनेत्री से (मुलतः वह ग्रीक थी) प्यार हुआ। पर प्रभा ने अश्वघोश को कुछ अलग की हिदायत दी। केवल षरीर प्रेम की चैखट में ना रहते हुऐ कुछ अलग करने की सोचो, उसकी इस बात का अश्वघोश के मनपर अतिप्रभाव हुआं उसके बाद अश्वघोश ने उर्वषी-वियोगनाटक लिखकर खुद पुरूखा की भूमिका निभाई, तथा उर्वषी की भुमीका प्रभा ने साकार की। फिर भी अश्वघोश उस समय थे। श्ज्व इम वत दवज जव इम यह सोच उन्होने उनके सौंदर्यानंद इस महाकाव्य मे लिखी, (संदर्भ रूची मासिक सितंबर 2009 लेखक डॉ. सतिष पावडे ये सोच षेक्सस्पीयर से भी पहले और कितनी पुरातन है। ये इस बात से सिद्ध होता है।

            भदंत अश्वघोश ने पांच नाट्य कृतियाँ लिखी ऐसे उल्लेख मिलते है। बुद्ध चरित्र, सौदर्यानंद (महाकाव्य), उर्वषी-वियोग, सारिपुत्र प्रकरण और राश्ट्रपाल यॅंह त्री-नाट्îधारा उनकी साहित्य कृतीया थी। अश्वघोश के नाटको के अध्ययन से पता चलता है कि वर्ण व्यवस्था विरूध्द इतनी सषक्त षैली मे आज तक किसी नाटककार ने वैसा नही लिख सके। उल्टे उनके बाद कालीदास, भास, षुद्रक, बाण, भवभूती, भारवि, श्री. हर्श आदि सभी नाटककारो ने सौंदर्यात्मक षैली का अनुसरण किया। उनके उपरोक्त नाटक बहुत बाद मे मध्य एषिया के तुर्फान नामक एक स्थान पर पाए गए, अन्यथा भारत से वे हमेषा के लिए गायब कर दिए गए थे। वैसे उनकी अन्य रचनाएँ भी गायब थी, किंतु तिब्बती तथा चीनी अनुवादो मे उन्हे सुरक्षित बना दिया, (संदर्भ - बुद्धिस्ट थिएटर मासिक 2009, डॉ.. तुलसी राम, जे.एन.यू. नई दिल्ली)। प्रो. ल्युडर्स ने अश्वघोश के नाट्य विशय मे बिलकुल स्पश्ट से लिखा है  “AS DRAMATIST ASHWAGHOSHA WAS WORTHY PREDECESSOR OR KALIDASA.”  (संदर्भ - प्रथम राश्ट्रीय बुद्धिस्ट थिएटर रिसर्च कॉन्फ्रेंस 2015 अध्यक्षीय भाशण नाटककार प्रेमानंद गज्वी) कालीदास को अश्वघोश के काव्य गुणो, नाट्य गुणो का अनुकरण करने की जरूरत पडी, इस बात को वि. वा. मिराषी, सुषीलकुमार डे, सूर्यनारायण चैधरी, डॉ.. रूपा बोधी, डॉ.. राघवण, राम षेवाळकर, सेम्युल बिल, प्रो. किथ, कावेल, डॉ.. जान्सटन, सिल्वा लेवी, टि सुझुकी, रिचर्डस, स्टेनकोनो आदि ने ये सिद्ध करके बताया है। चीनी प्रवासी यु-एन-त्संग इस बौद्ध भिक्खु ने अश्वघोश के साहित्य संपदा की स्तुती भी की है। ऐसे महान नाटककार की अवधारणा से समुचे मानवमात्रा को कल्याण हो सके ऐसे ज्ञानी की भारत मे उपेक्षा होना इतिहास पर प्रष्नचिन्ह निर्माण करता है।

            बु़िद्धस्ट थिएटर की परंपरा जैसे इ.सा.पु. 1 षताब्दी मे अश्वघोश के नाटको से मिलती है। इस अवधारणा का रंगमंच भारत मे अश्वघोश के पुर्व या पष्चात और जागतिक थिएटर मे ज्ञदवूसमकहम थिएटर की परंपरा है या नही है। उसकी खोज इस माध्यम से करने की ओर मै अग्रेसर हूँ। वेद निर्मिती का काल इ.सा.पु. 1500 माना जाता है और यदी इसके पष्चात भारत में नाट्यकला अस्तित्व मे आयी एैसा हम मानकर चलते है। क्यों की विश्वपटल पर चीनी रंगमंच की परंपरा इ.सा.पु. 2300 साल पुरानी होने के सबुत मिलते है। (संदर्भ-जागतिक रंगभुमी पुर्वरंग-माणिक कानेड पृश्ट 43) और आर्य आगमन के पूर्व किये गए उत्खन्न मे नृत्य करते षिल्प भी मिले इसका अर्थ यह होता है कि सिंधु संस्कृती मे नृत्य था, तो संगीत भी उस काल मे होगा ही। आर्य आगमण के पुर्व अस्तित्व मे होनेवाले नागवंषियो के रंगमंच कला को अनुलेख्खा से मारना इस दृश्टता की सजा आनेवाला समय देता ही है। वेद और वैदिक ब्राम्हणी परंपरा भारत मे ही समेटकर रह जाती है तथा भारतीय रंगमंच और चिनी व जपानी रंगमंच का आंतरिक संबंध बौद्ध-धम्म प्रसार के साथ प्रस्थापित है। (संदर्भ - प्रथम बुद्धिस्ट थिएटर रिसर्च कॉन्फ्रेंस 2015 अध्यक्षीय भाशण लेखक प्रेमानंद गज्वी)

            उपरोक्त बात से ये सिद्ध होता है कि, भारतीय रंगमंच इ.सा.पु. 2300 साल से भी पुरातन है। तथा इसे सोची कलुपता से नश्ट किया गया है।

            हम भारतीय मुल रंगमंच के सोच के साथ मुल भारतीय नाटक परंपरा और ज्ञान रंगमंच की परंपरा को खोजने का भरकस प्रयास कर रहे है। नागवंषीयों का रंगमंच, अश्वघोश का बुद्धिस्ट रंगमंच हमे तथागत बुद्ध के विचारों का जिन भारतीय नाटककारो के नाटक मे प्रभाव मिलता है। उसमें भास, षुद्रक, मुद्राराक्षक, विषाखदत्त से सम्राट हर्शवर्धन तक का काल बौद्ध रंगमंच को तथा बौद्ध विचार प्रवाह से प्रभावित लेखन और मंचन मे हमे स्पश्ट रूप से मिलता है। (संदर्भ-काव्य नाट्य संग्रह भाग-1 साहित्य अकादमी)।

            इसी परंपरा को जब हम आधुनिक रंगमंचसे जोडने की या उस परंपरा को आधुनिकता में खोजने की कोषीष करते है तो, हर्शवर्धन से महात्मा जोतिबा फुले तक करीबन 1200 वर्ष मे (Knowledge Theatre) का स्पष्ट ऐतिहासिक संदर्भ मिलना मुष्किल दिखता है। इस काल की सामाजिक परिस्थितियां क्या थी यह भी हमने समजने की जरूरत है। कार्य हुआ या नही इससे भी उपर एक प्रष्न उठता है, कार्य नही होने की वजह? या होने की वजह? इन दोनो पहलुओ की दखल इतिहास मे उल्लेखित क्यों नही है? उस समय की सामाजिक परिस्थिती मे वर्णवाद का बोलबाला था, साथ ही विदेषियोंकी भारतपर सत्ता थी और वर्णानुसार षुद्र अतिषुद्र गुलामो के गुलाम थे ये भी एक वास्तविकता हमे ;ज्ञदवूसमकहम जीमंजतमद्ध के पन्नो की गुमषुदगी में दिखती है। पर भारत में गुलामी षोशण के विरूध्द जनजागरण की लोककलाए बडे पैमानेपर षुरू थी, इसका एक पहलू पर विचार किया जाए तो, अपने अस्तित्व, अधिकार और स्वतंत्रता के लिए यह भी उस परिस्थीती नुसार ज्ञान के लिए किया गया संघर्श था, जो कि मराठी रंगभूमी के प्रथम नाटककार राश्ट्रपिता जोतिबा फुले के तृत्तीयरत्न’ (1855) नाटक से अधिक प्रगल्भ हो उठता है। जिसे हम आधुनि बुध्दिस्ट रंगमंच का प्रारंभ भी कह सकते है यहाँ से आगे यह परंपरा म.भी. चिटणीस युगयात्रा’ (1954-1955) जयषंकर प्रसाद के स्कंदगुप्त’, ‘अजातषुत्रुऔर चंन्द्रगुप्तइस नाटक से दलित रंगमंच, आंबेडकरराईट रंगमंच, बहुजन रंगमंच, बोधी रंगमंच का काफिला बुद्धिस्ट रंगमंच में अग्रेसर हैं।
बुद्धिस्ट रंगमंच कि स्थापना हि भदंत अष्वघोश के बुद्धविचारों से प्रतित होती दिखाईदेती है। बुद्धने मनोवृत्ती, स्वतंत्रता उदारता और सभी मनुश्योंके कल्याण का मार्ग अपने धम्म मे प्रषस्त किया उसी को अष्वघोश ने अपने नाटक के विशय-महाकाव्य, संगीत, वाद्य, तथा नुक्कड नाटक के प्रचारित किये। उन्होने अपने नाटक से वैदिक धर्मपर कडे प्रहार किये, कर्मकांड, पांखड, पुजा-अर्चा और चातुवर्ण का विरोध अपने नाटको द्वारा लोगो के सामने रखा। बुद्धिस्ट रंगमंच का अर्थ या सम्बन्ध हमने धार्मिक तौर पर लेना यह अतर्क संगती होगी, क्योंकी बुद्ध अखिल मानवता क कल्याण का तर्कसंगत वैज्ञानिक दृश्ट्रिकोन यहा प्रतिपादीत करते है।

            बुद्ध का अनात्मवाद, अनित्यवाद, प्रतित्यसमुत्पाद और चार आर्यसत्य, अश्टांगिक मार्ग सम्यक जीवन दृश्टी, जीवन षैली का दृश्टीकोन अपने नाटयमंचन से लोगो तक पहुंचाते है। इस ऐतिहासिक दृश्ट्रीकोन को आधुनिक परिप्रेक्ष मे नाटक और मनुश्य जीवन के उद्धार का वैज्ञानिक दृश्ट्रिोन बुद्ध के विचार से कितना प्रासंगिक है यह सिद्ध होता है। कला के लिए कला या ज्ञान की लिए कला यह दृश्ट्रिीकोन आधुनिक रंगमंचपर आज वैष्विकरण कि वजह से कमजोर होतो दिखाई दे रहा हो, फिर भी नई प्रयोगात्मकता के आधारपर रतन थियाम (नाटक-उत्तर प्रियंदर्षी), अरविंद गौड, प्रेमानंद गज्वी और विरेन्द्र गणविर बुद्धिस्ट रंगमंचपर नई नई नाट्यकृतियों के माध्यम से बुद्धिस्ट रंगमंच का आधुनिक दृष्टिकोण का फलक विस्तृत करता दिख रहे है। नई नई मंचन कौषल्यता बुद्धिस्ट रंगमंच को विकसित करती दिख रही है।

बुद्धिस्ट विचारो का प्रतिबिंब
            भारत के रंगमंचपर इतिहास से आधुनिकता कि ओर बढते हुऐ कई ऐसे नाटककार है और हो चुके जिनके नाटयकृतीयो मे बुद्ध के विचारों का प्रतिबिंब स्पश्ट रूप से हमे मिलता है, जिनमे 1) अष्वघोश के नाटक, सौदरानंद, बुद्धचरित्र, वज्रसुचि, सारिपुत्र, उर्वषी वियोग, राश्ट्रपाल 2) भास के नाटक - स्वप्नवासवदत्ता 3) शूद्रक - मृच्छकटिक 4) विषाखदत्त - मुद्राराक्षस, 5) सम्र्राट हर्शवर्धन - रत्नावली, नामानंद 6) बाण भट्ट - हर्शचरित 7) महात्मा फुले - तृतीयरत्न 8) जयषंकर प्रसाद - स्कंदगुप्त, अजातषत्रु, चंद्रगुप्त 9) रतन थिय्याम - उत्तरप्रियदर्षी 10) प्रेमानंद गज्वी - किरवंत 11) दत्ता भगत - वाटा पळवाटा 12) भगवान हिरे - नही वैरेन वैरानी 13) विरेन्द्र गणविर - भारत के आद्यनाटककार अष्वधोश, घायाळ पाखरा, दि लास्ट ह्युमंस, हिटलर कि आधी मौत। उपरोक्त नाटककार और नाट्यसंहिता तथा नाट्यमंचन कि प्रगल्भता बौद्ध रंगमंच को आज स्पश्टता से प्रतिपादित करती है। मनुश्य को बुद्धी होकर भी उसका जन्म अविद्या से ही भरा होता है, उसे ज्ञान देना और उसने ज्ञान प्राप्त करना मतलब षिक्षा ;म्कनबंजपवदद्ध उसने संपादित करना ही चाहिए। मानव केवल मानव बनकर उसके सवाल नही मिटा सकते तो उसे इन्सान बनकर जिने के लिए षिक्षा, अन्न, वस्त्र, निवारा, आरोग्य, आर्थिक सुब्बता और यही से सिद्ध होना चाहिये वह समाधान है। जन्म और मृत्यु के बिच की स्थिती मतलब समाधान, इसे हि बुद्ध दुखःमुक्ती कहते है और यही बुद्धिस्ट रंगमंच के विचारो का प्रतिबिंब नाटककार अपने नाट्यकृतीयोसे दर्षाते है।

            बुद्धिस्ट थिएटर पर विस्तृतता से कार्य होना एवं उस दिषा मे संषोधन की आवष्यकता हर तरह से संभव है जिससे भारतीय रंगमंचपर (knowledge Theatre) को खडा कर विष्व रंगमंच भी समृध्द होगा। कल्पकता के साथ इन्सान को पूर्ण रूप देना वह बुद्धिट थिएटर की संकल्पना इस विचार से प्रगल्भ दिखती है।

            बुद्धिस्ट थिएटर ऐतिहासिकता से आधूनिकता तक इसकी पूननिर्मिती प्रस्तुती के साथ ही लेखन साहित्य कलात्मकता के साथ बुद्ध और डॉ.. आंबेडकर की विचारो से षुद्ध रूप मे प्रेरित होनी चाहिए। इन विचार नाट्य की नवनिर्मिती कर लोकनाट्य, नुक्कड नाटक, महानाट्य या Prosineum Theater हो. इन नाट्य अंगो कि तरफ बुद्धिस्ट रंगमंच का सुक्ष्मता से चिंतन मनन की जरूरत है।

            केवल जिना महानता नही तो हम किस तरह का जिवन जी रहे है, इसमे मनुश्य कि महानता स्पश्ट होती है, एैसा डॉ.. बाबासाहाब आंबेडकर ने डॉ.. राधाकृश्णन से कहा, एक सुसंस्कृत मन कि निर्मीती यह सर्वश्रेश्ठ सांस्कृतीक मानवतावाद कि उपलब्धी है। संस्कृती कि परिभाशा का अर्थ याने, संस्कृती-1, (Culture is a state of mind) और वह जिवन जीने की शैली भी है (culture is a way of life) इस तरह से संस्कृती मानवतावादी भी हो सकती है या अ- मानवतावादी भी, इसिलिए सभी संस्कृती को संस्कृती कहना या तो उसे मानना मुर्खता के भांती है। और संस्कृतीया समान है एैसा मानना भी पूरी तरह गलत है। मानवतावादी संस्कृती का केंद्र मानव और उसका कल्याण ही अंतीम धैय होना चाहिए मानवतावादी संस्कृती के छह तत्व आंबेडकराईट  बुद्धिस्ट रंगमंच के नाट्यकर्मीयोंने अविश्कृत करने चाहिए, जिसमे समाज का प्रतिबिंब, मानवअधिकार व मानवतावादी सभ्यता, समता, स्वातंत्र्यता, बंधुता एवं न्याय मे समाविश्ट कर समाज और देष दुनिया को दिषा देने वाली कलाकृती की निर्मीती करनी होगी और इसलिए (Odiotogy + Phycholg + Artistry + Technology) और आंबेडकराईट होना जरूरी है। और इसलिए प्रबुद्ध राश्ट्र की निर्मीती करना यह मानवतावादी संस्कृती का महान लक्ष्य आंबेडकराईट नाटककारोने सामने रख आज कार्य करने कि जरूरत है।

      (नाटककार)
  बहुजन रंगभूमी, नागपूर.
    मो. 9765718022
[जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के अंक 23 में प्रकाशित आलेख]
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