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भारत का संविधान कानून और जनजातियाँ: किरण नामदेवराव कुंभरे


भारत का संविधान कानून और जनजातियाँ
किरण नामदेवराव कुंभरे
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर दलित एवं जनजाति अध्ययन केंद्र                                                                                                                                          kiran.kumbhare56@gmail.com
                                                                                                                   Mob-8408802758

                    किसी भी देश का संविधान हो वह क़ानूनी रूप से एक व्यवस्था होती है| इसके अंतर्गत सम्पूर्ण रूप से लोकतांत्रिक राष्ट्र का संविधान यह जनता के प्रतिनिधि निकाय द्वारा किया जाता है| संविधान पर विचार करने तथा उसे अंगीकार करने के लिए जनता द्वारा चुने गए इस प्रकार के निकाय को संविधान सभा कहा जा सकता है| भारत में संविधान की संकल्पना समता,  बंधुता,  न्याय  पर आधारित है| डॉ. बाबासाहेब  अम्बेडकर की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है| भारत देश के स्वतंत्र होने के बाद समानता की नींव पड़ी थी जो जनता के हित में थी डॉ. अम्बेडकर ने भारत देश के लिए संविधान बनाके दिया  जिसके आधार पर देश की व्यवस्था चलती है|  संविधान यह क़ानूनी रूप से एक किताब है लेकिन इस किताब में भारत की समस्त जनता की लिए समानता की भावना है जिसमे कोई भी उच्च नीच नहीं  है|  संविधान में मनुष्य के लिए मुलभुत अधिकार, सामाजिक न्याय के तत्व कई ऐसे पहलु इस संविधान में सम्मेलित  है|

           भारत देश का संविधान बनने की पहले की स्थिति अर्थात  ब्रिटिश शासन के पहले भारतीय व्यवस्था बड़ी दयनीय स्वरूप की थी जातिव्यवस्था का चारोतरफ फैली हुई थी इस परिस्थिति में शोषित, वंचित, दलित, आदिवासी, पिछड़े हुए वर्गों के लिए किसी भी प्रकार का अधिकार नहीं था इस सामंतवादी व्यवस्था में उच्च जातियां शोषित वर्गों का शोषण करते थे| लेकिन भारत में ब्रिटिश शासन आने के बाद शोषितों के लिए सुविधा भी उपलब्ध कर दि गई थी| वैसे अंग्रेज लोग भारत में व्यापारी बनकर आए थे 31 दिसम्बर 1600 को लंदन के चंद व्यापारियों द्वारा बनाई गई ईस्ट इंडिया कंपनी ने महारानी एलिझाबेथ से शाही चार्टर प्राप्त कर लिया था| उस चार्टर के द्वारा कंपनी को आरंभ में 15 वर्ष की अवधि के लिए भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ क्षेत्रों के साथ व्यापार करने का अधिकार दे दिया गया था| उसमें कंपनी का संविधान, उसकी शक्तिया और उसके विशेषाधिकार निर्धारित थे| 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट भारत के संवैधानिक इतिहास में विशेष महत्वपूर्ण है क्योंकी यह भारत में कंपनी के प्रशासन पर ब्रिटिश संसदीय नियंत्रण के प्रयासों की शुरुवात थीकंपनी के शासनाधीन क्षेत्रों का प्रशासन अब कंपनी के व्यापारियों का निजी मामला नहीं रहा है | 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट में भारत में कंपनी के शासन के लिए पहली बार एक लिखित संविधान प्रस्तुत किया गया|  इससे ये पता चलता है  की ब्रिटिश शासन काल में कुछ हद तक स्थिति में सुधार हुआ| ब्रिटिशों ने भारत पर 150 वर्षो राज किया लेकिन भारत में कुछ वस्तुस्थिति को भी बदल दिया अंग्रजो ने यहाँ पर ‘फुट डालो राज करों’ की निति अपनाई थी यह वास्तविकता है| 19 शताब्दी में भारत देश में ब्रिटिशों के खिलाफ कई आन्दोलन खड़े हुए भारत देश में ब्रिटिशों से छुटकारा पाने के लिए कई विद्रोह, आन्दोलन की नींव पड़ी थी
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ब्रिटिश काल में आदिवासी विकास

            भारत में आदिवासी विकास का श्रेय प्रारंभ में अंग्रेजों को जाता है| आरंभ में ब्रिटिशों ने यह निति अपनाई थी की इन लोगों को अलग अलग रखा जाये और जब अशांति या विद्रोह की संभावना हो तो समयानुकूल कानून और न्याय की व्यवस्था की जाये| जनजातियों के प्रति अंग्रेज सरकार की यह सोच 1600 से 1750 तक यथावत बनी रही लेकिन बाद लगभग 150 वर्षो के बाद जब अंग्रेजों की नजरें जनजातीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली अपार प्राकृतिक वन संपदा, उपजाऊ भूमि तथा खनिज संसाधनों पर पड़ी तो वे अपनी अलगाव की नीति को कायम नई रख पाए और कई ऐसे नीतिया और कानून बनाये जिसके कारण आदिवासी क्षेत्रों कि शांति व्यवस्था प्रभावित हुई| अंग्रजों ने कई ऐसे अधिनियम बनाए थे आदिवासियों के लिए हित के संबधित थे जैसे क्लीवलैंड अधिनियम, बंगाल अधिनियम 1833 और भी ऐसे अधिनियम थे जो आदिवासियों के लिए बनाए थे|

संविधान और जनजातियाँ
          भारत देश के संविधान में आदिवासियों के लिए प्रावधान दिए हुए है| संविधान में कही भी “जनजाति” शब्द की परिभाषा दि नहीं है| वस्तुतः सम्पूर्ण सुस्पष्ट व्याख्या कही भी नहीं मिलती| आम व्यक्ति के लिए यह शब्द अपने विलक्षण आचरणों एवं रीतिरिवाज के साथ पर्वतों और जंगलों में रहनेवाले सीधे  सरल जनसमूह की और इंगित करता है| जिन्हें कुछ अधिक जानकारी है वे इस शब्द का अर्थ लोक समुदाय के उन समुदाय के उन मनोरंजक लोगों से लोगों से तुलना करते है जो अपने नृत्य, गीत और वनोषधियों के लिए विख्यात है| प्रशासन के दृष्टिकोण से यह नागरिको का वह वर्ग है जिनकी विशेष जिम्मेदारी भारत के राष्ट्रपति पर है और मानवशास्त्री के लिए यह एक सामाजिक वर्ग के अध्ययन का विशिष्ट क्षेत्र है|
             संविधान में जनजाति की परिभाषा को सीमांकित करते हुए कहा गया है कि, अनुसूचित जनजातियाँ वे है जिन्हें “राष्ट्रपति ने अनुछेद 342 की लोक अधिसूचना द्वारा जनजातियों या जनजाति समुदायों अथवा जनजातियों या जनजाति समुदायों के भागों को विनिर्दिष्ट किया है”|1 यह कह सकते है कि, स्वतंत्र भारत  का संविधान स्वीकृत हो जाने के बाद उनके विकास और कल्याण  का सम्पूर्ण दायित्व जनजातियों के विकास की जिम्मेदारी राष्ट्रपति एवं राज्यपाल के माध्यम से लोकप्रिय सरकार को सौपा गया है| इसी तरह  निदेशक तत्वों का अनुगमन करने के लिए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के कल्याणार्थ विशेष अनुछेदो की व्यवस्था कि गई है|
                स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार ने आदिवासी  विकास की और प्राथमिकता  के आधार पर कार्य करने की नीति अपनाई है| भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ.बाबासाहेब अम्बेडकर जनजाति समुदायों को प्रावधान रखने में बहुत योगदान है|  इस सभा में कई लोग थे जयपालसिंह मुंडा एवं ठक्करबापा  यह आदिवासी समाज के लोग थे| डॉ. अम्बेडकर के चलते आदिवासियों के लिए संवैधानिक प्रावधान प्राप्त हुए है| संविधान सभा में अपने उद्देशों को व्यक्त करते हुए कहा कि कमजोर और पिछड़े वर्गों को विकास के अवसर प्रदान किये जाये ताकि ये वर्ग देश की मुख्यधारा में अपने आपको सम्माहित कर सके तथा इनकी जीवन पद्धति कम से कम औसत ग्रामीण स्तर तक पहुच जाए|

रक्षात्मक प्रावधान
रक्षात्मक संविधानिक प्रावधान जनजातीय समाज को अन्य समाजों की अपेक्षा विशेष सुरक्षा प्रदान करते है|
Ø अनुछेद 15 में अ.जनजातियों के साथ किसी भी प्रकार के भेदभावों को वर्जित किया गया है|
 इसके खंड (4) के अंतर्गत अ.जाति एवं अ.जनजाति एवं पिछड़े वर्गों के विकास के लिए व्यवस्था का प्रावधान है|
Ø अनुछेद 16 में दि गई अवसर की समानता के बावजूद इसी खंड (4) के द्वारा राज्य पिछड़े एवं कमजोर तबको के लोगों के लिए नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था लागू कर सकता है|
Ø अनुछेद 23 के द्वारा बेगार प्रथा तथा बालश्रम को प्रतिबिंबित कर दिया गया है| बाद में संसद द्वारा 1976 में कानून बनाकर बंधुआ मजदूरी को प्रतिबिंबित कर दिया गया है|
Ø अनुछेद  29 के आदिवासी समुदाय को अपनी भाषा, बोली तथा संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार प्रदान करता है|
Ø अनुछेद 46 आदिवासियों के शैक्षणिक एवं आर्थिक हितों की सुरक्षा हेतु राज्य से विशेष व्यवस्था का आग्रह करता है|
Ø अनुछेद 164 बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ तथा मध्यप्रदेश राज्यों में आदिवासियों के हितों तथा कल्याण की देखरेख के लिए एक जनजातीय कल्याणमंत्री की नियुक्ति का प्रावधान करता है|
Ø  अनुछेद 275 को आधार बनाकर केंद्र सरकार राज्यों को जनजातीय कल्याण एवं विकास कार्यों के क्रियान्वयन हेतु विशेष धनराशी प्रदान करती है|
Ø अनुछेद 330,332 तथा 334 के द्वारा संसद एवं राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के लिए स्थान  आरक्षित किये गए है|
Ø अनुछेद 335 के द्वारा अनुसूचित जनजातियों के लिए शासकीय सेवा में 7.5 प्रतिशत स्थान आरक्षित किये है इसके साथ आयु सीमा में छुट, अहर्ता, मानदंड में छुट पदोन्नति में छुट, तथा अन्य तकनीकी स्तरों पर छुट प्रावधान किए गए|
Ø अनुछेद 338 में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के कल्याण हेतु राष्ट्रपति द्वारा आयुक्त की नियुक्ति का प्रावधान है| जिसका दायित्व संविधान द्वारा अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के प्रदत्त सुरक्षाओं का मूल्यांकन करना, जनजातियों लोगों और राज्य सरकारों से सम्पर्क बनाए रखना,  उनके कार्यक्रमों की जाँच करना , तथा योजनाओं के लिए मार्गदर्शन देना आदि प्रमुख कार्य है| यह आयुक्त प्रतिवर्ष राष्ट्रपति को अपना प्रतिवेदन भी भेजता है जिसमें अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन तथा अ.जनजातियों के कल्याण के संबंध में उपलब्धिया एवं कमियों को वर्णित करना|
Ø अनुछेद 339 संघ सरकार को अधिसूचित क्षेत्रों में निवास करनेवाले आदिवासियों के प्रशासन का अधिकार प्रदान करता है|
Ø अनुछेद 340 जनजातियों को सरकारी शिक्षण संस्थानों में नामांकन तथा अध्ययन के लिए आरक्षण का उपबंध करता है|
Ø अनुछेद 342 के माध्यम से राष्ट्रपति जनजातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्रदान करता है|2

पृथक प्रशासनिक व्यवस्था
      जनजाति समुदाय अन्य समुदाय से कटा हुआ और सदियों से पिछडा है| इसके साथ ही इस समुदाय की पृथक संस्कृति , परम्परा एवं भिन्न पहचान है| इसलिए भारतीय संविधान में जनजातियों के लिए अन्य समाज से भिन्न प्रशासनिक व्यवस्था का प्रावधान की पाचवी अनुसूची एवं छठवी अनुसूची में किया गया है|

अनुसूचित क्षेत्र : संविधान के अनुछेद 244 तथा 244(1) में अनुसूचित क्षेत्रों तथा जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन का प्रावधान है| संविधान की पांचवी अनुसूची के अनुसार भारत का राष्ट्रपति किसी भी राज्य का कोई क्षेत्र ‘अनुसूचित क्षेत्र’ घोषित कर सकता है| 1977 से अब तक दो राष्ट्रपतियों ने अनुसूचित क्षेत्र घोषित किये है| ये क्षेत्र नौ राज्य है – आंध्रप्रदेश, झारखण्ड, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट, उड़ीसा, राज्यस्थान और छत्तीसगढ़| इन अनुसूचित क्षेत्रों के गठन के पीछे मुखतः दो उद्देश्य रहे है| पहला लघु प्रक्रिया तथा बिना बाधा के जनजातियों की सहायता करना तथा दूसरा अनुसूचित क्षेत्रों का विकास पथ पर लाना, एवं जनजातियों के हितों की रक्षा करना| घोषित अनुसूची क्षेत्रों वाले राज्य के राज्यपाल को विशेष व्यापक अधिकार प्राप्त होते है| राज्यपाल ही यह तय करता है कि, संसद या विधानमंडलों द्वारा पारित कानून इन क्षेत्रों में लागू में होंगे या नहीं| राज्यपाल इन क्षेत्रों में शांति बनाए रखने एवं प्रशासन के भली भांति संचालन के लिए नियम भी बना सकते है| जैसे भूमी हस्तांतरण को रोकना, भूमी आवंटन को नियंत्रित करना, साहुकारो एवं व्यापारियों की गतिविधियों को रोकना आदि|
      पांचवी अनुसूची के खंड में अनुसूची क्षेत्र वाले प्रत्येक राज्य में जनजातीय सलाहकार समिति का गठन का प्रावधान है| राष्ट्रपति के निर्देश पर राज्यों में भी जहाँ अनुसूची क्षेत्र नहीं है वहाँ पर  जनजातीय सलाहकार समिति के गठन का प्रावधान है| तमिलनाडु तथा पश्चिम बंगाल ऐसे ही दो राज्य है जहाँ अनुसूची क्षेत्र नहीं होने के बावजूद वहां जनजातीय सलाहकार समिति गठित है|
     पांचवी अनुसूची के खंड तीन में यह प्रावधान है कि राज्यपाल जनजातीय सलाहकार समिति की गतिविधियों से सबंधित प्रतिवेदन राष्ट्रपति के पास भेजता है|  
जनजातीय क्षेत्र: जनजातीय क्षेत्र एक अर्थ में तो अनुसूचित क्षेत्र है किन्तु संवैधानिक भाषा में जनजातीय क्षेत्र वे है जो संविधान की छठवी अनुसूची में उल्लेखित किये गए है| ये क्षेत्र है असम मेघालय, मिजोरम तथा त्रिपुरा| इन राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन हेतु स्वायत्त जिला एवं क्षेत्रीय परिषदों का गठन किया जाता है| प्रत्येक स्वायत्त जिले के प्रशासन के लिए एक एक जिला परिषद् की स्थापना की जाती है|जिला परिषद् के सदस्यों की संख्या अधिक से अधिक 30 होती है जिसमें से चार को राज्यपाल मनोनीत करता है शेष सदस्यों का चयन वयस्क मताधिकार के आधार पर किया जाता है| राज्यपाल चाहे तो वह सभी चुनाव क्षेत्रों को जनजातियों के लिए आरक्षित कर गैर जनजातीय समाज को चुनावी प्रतिनिधि पद से वंचित कर सकता  है| 3  
        स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत देश में विकासात्मक गतिविधियाँ चलती है| आर्थिक एवं सामाजिक विकास में गति लाने के लिए प्रशासन की और वृहद उद्देश्य एवं समयपरक कल्याणकारी योजनाये , पंचवर्षीय योजनाए के माध्यम से लागु की गई है| इन पंचवार्षिक योजनाए में जनजातियों के कल्याणार्थ समुचित धनराशी की व्यवस्था की गई| 1951 से 2007 तक देश में 10 पंचवार्षिक तथा पांच वार्षिक योजनाए पूर्ण हो चुकी है| इन पंच वार्षिक योजनाओं के अंतर्गत राष्ट्रिय संदर्भ में जो महत्वपूर्ण विकासात्मक कार्यक्रम एवं नीतिगत परिवर्तन किए गए|
कानून और जनजातियाँ
                          भारत में मुख्य रूप से जनजातियों की परिकल्पना भारतीय समाज से उनके भोगोलिक और सामाजिक अलगाव के रूप में की जाती है और इसमें  उनके सामाजिक रूपांतरण के चरण को ध्यान में नहीं रखा जाता है इसके वजह से सामाजिक रुपान्तरण के विभिन्न समूह और समुदायों का विस्तृत दायरा जनजातियों के रूप में वर्गीकृत किया गया है| इन सारे तथ्यों के देखते हुए कहाँ जाता है कि, जनजातियाँ भारतीय समाज से पृथक रहती आयी है, और अपने परिवास के प्रदेश पर शासन में उनकी स्वायत्तता है उनकी भूमी,वन और अन्य संसाधनों पर नियंत्रण है और वे स्वयं के कानूनों, परम्पराओं और रीतिरिवाज से शासित है| औपनिवेशिक काल में जनजातियों और गैर जनजातियों को एकल राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे के अंतर्गत खड़ा किया ऐसे स्थिति में अलग अलग तरीकों का इस्तेमाल किया इसके बाद से वहां से ही नये और एक समान नागरिक तथा अपराधिक  कानून की शुरुवात हुई और और साथ ही एक ऐसा प्रशासनिक ढाचा कायम हुआ जो जनजातीय परम्परा और लोकाचार से भिन्न था| इसका सारा परिणाम यह हुआ है की मौटे तौर पर भूमि जनजातीय लोगों के पास से गैर जनजाति लोगों के पास चली गई ऐसे प्रक्रिया में कई तरीके अपनाये गए थे| कुछ बातों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रवादी नेतृत्व ने स्वतंत्रता में जनजाति समुदाय पर विशेष ध्यान दिया| स्वतंत्र भारत के नागरिकों के रूप में जनजातीय लोगों को अन्य नागरिकों के समान सिविल, राजनीतिक और सामाजिक अधिकार प्रदान किए गए नागरिक और राजनीतिक अधिकार भारतीय संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों के अंतर्गत आते है, जबकि सामाजिक अधिकारों की व्यवस्था भारतीय संविधान के निर्देशक सिंद्धांतों में की गई है|
      उपरोक्त प्रावधान के अतिरिक्त जनजातियों को विशिष्ट समुदाय के सदस्य के नाते कुछ अधिकार भी प्रदान किये है ऐसे अधिकारों में अन्य बातों  के अलावा सर्वाधिक मान्यता है अनुछेद 332 , संसद और राज्य विधानमंडल में समानुपातिक प्रतिनिधित्व (अनुछेद 330 और 332) , संविधान में उनके लिए  कई ऐसे प्रावधान है अनुछेद 244 और 244 (क) की पांचवी और छठी अनुसूची में ऐसे प्रावधान है जिनमें राज्य को यह अधिकार दिया है कि वह जनजातीय क्षेत्रों में विशेष प्रशासनिक व्यवस्था कर सकता है| संविधान में अनुसुचित और जनजातिय क्षेत्रों के निर्धारण का प्रावधान शामिल है ताकि संसद और राज्य विधानमंडलों में उन्हें प्रतिनिधित्व प्रदान किया जा सके | संविधान में सविस्तर रूप से आदिवासियों के लिए कई प्रावधान है लेकिन उसका उल्लंघन हो रहा है| कुछ प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा है यह  वास्तविकता है यह सोचनेवाली बात है| आदिवासियों का विकास संवैधानिक रूप से हो सकता है यह समझना जरुरी है |

निष्कर्ष 
  जिन प्रावधान के लिए किसी तरह की सहायता प्रणाली उपलब्ध की गई थी उनके कुछ नतीजे जरुर सामने आए भले ही वह सहायता प्रणाली अपर्याप्त रही हो सरंक्षणात्मक वैशिष्ट्य का प्रावधान इसी का उदाहरण है लेकिन जहाँ ऐसे उपाय किए ही नहीं गए या वे अत्यंत प्रभावहीन रहे, वहां संविधान में किए गए प्रावधान जनजातीय लोगों के पक्ष में वांछित परिणाम हासिल नहीं कर पाए| बात सिर्फ यहाँ तक नहीं है जनजातियों के लिए कारगर सामाजिक -आर्थिक अधिकार विकसित और विस्तारित नहीं किये गए बल्कि जो अधिकार उन्हें प्राप्त थे जैसे भूमी और वन सबंधी अधिकार वे भी शुरू में औपनिवेशिक शासन ने और स्वतंत्रा के बाद भारतीय राज्य ने उनसे छिन लिए यह सत्य है जनजाति समुदाय मुख्य रूप से भीतरी भूमी और वनों में रहतें है| फिर भी भूमी से अलगाव की जो प्रक्रिया ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुई थी वह स्वतंत्रता के बाद में भी जारी रही| गैर जनजातीय लोगों द्वारा शोषण हो रहा है| कई ऐसे उदहारण मिल सकते है| उनकी संस्कृति खतम होती जा रही है, उनकी भाषा खतम होती जा रही है जिसके कारण आदिवासी परेशानी में जीवन यापन कर रही है| देश स्वतंत्र होने बाद भी आदिवासी जंगलों में पाए जाते है यह बहुत बड़ी समस्या है इसका निवारण करना आवश्यक है इस दृष्टी से काम करने की आवश्कता है|

संदर्भ
      1) हसनैन, नदीम. (2004 ). जनजातीय भारत. नई दिल्ली: जवाहर एन्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स.  
2) वैद्य ,नरेश कुमार (2003). जनजातीय विकास: मिथक एवं यथार्थ, जयपुर:रावत पब्लिकेशन.
3) राजपूत, उ. (2010). आदिवासी सरकारी संगठन. रावत पब्लिकेशन.
4) भालेराव, स., व धारवाड़कर, दि .(2015). भारतीय जनजातियाँ संरचना एवं विकास. नई दिल्ली: इशिका पब्लिशिंग हाउस.

[साभार: जनकृति पत्रिका]


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