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रविवार, 22 अक्तूबर 2017

शिवप्रसाद सिंह की कहानियों में ग्रामीण जीवन और सामाजिक परिप्रेक्ष्य: कंचन लता यादव


शिवप्रसाद सिंह की कहानियों में ग्रामीण जीवन और सामाजिक परिप्रेक्ष्य
कंचन लता यादव
भारतीय भाषा केंद्र जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
मोबाइल. 9868329523, ईमेल – klyjnu26@gmail.com

शिवप्रसाद सिंह स्वतंत्रता के बाद और नयी कहानी के प्रमुख रचनाकार हैं। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के बाद बदले हुए ग्रामीण परिवेश का यथार्थपरक और नग्न चित्रण उनकी कहानियों में दिखाई देता है। उन्होंने व्यक्ति और समष्टि के विघटनकारी मूल्यों की बारीकियों को पकड़ा ही नहीं बल्कि उसका नकार भी किया। उन्होंने जब कथा लेखन में प्रवेश किया तब देश औद्योगिकीकरण, पंचवर्षीय योजना आदि तमाम विकासमान मूल्यों की तरफ गतिमान था। अम्बेडकर और गाँधी के प्रयास से दलितों में चेतना सुगबुगा रही थी। गाँव का सामजिक ढ़ांचा टूट रहा था। इस तरह की स्थिति में गाँव का एक बदला हुआ परिदृश्य दिखाई दिया जिसे शिवप्रसाद सिंह ने अपनी कहानी में रूपायित किया। उन्होंने अपनी कहानियों में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, जातिगत आदि विविध समस्याओं को अभिव्यक्त किया है। इस सन्दर्भ में विवेकी राय कहते हैं, “बदले हुए गाँव और बिन बदली हुई गाँव के गरीबों की नियति से संबंधित सवालों को कथाकार शिवप्रसाद सिंह विविध कोणों से उठाते हैं। आर्थिक सवालों से तीखे सामाजिक सवाल हैं।”1 इनकी कहानियों का मूल कथ्य ग्राम जीवन पर आधारित होने के कारण, इन्हें प्रेमचंद की परम्परा से जोड़कर देखा जाता है। दोनों लेखक ग्रामीण जीवन के कथाकार हैं लेकिन अलग-अलग देश, काल, वातावरण के कारण, दोनों लेखकों की रचना-प्रक्रिया, कथ्य-शिल्प आदि में भिन्नता है। प्रेमचंद के समय साम्राज्यवाद और सामन्तवाद से जनता संघर्ष कर रही थी जिसे उन्होंने कहानी का विषय बनाया। लेकिन शिवप्रसाद सिंह के समय देश आज़ाद हो गया था, जमींदारी उन्मूलन भी हो गया था, जमींदार के रूप में ठेकेदार और पूंजीपति जैसी शोषणकारी शक्तियाँ पनप रहीं थीं लेकिन सामाजिक ढ़ांचे में कोई बदलाव नहीं आया। जमींदारी खत्म होने के बाद भी जमींदारों द्वारा शोषण बरकरार है। इस सन्दर्भ में बच्चन सिंह ने लिखा है, “परम्परा पर विचार करते समय स्मरण रखना होगा कि प्रेमचंद का जमाना और था तथा शिवप्रसाद का जमाना और है। प्रेमचंद परतंत्र भारत में लिख रहे थे जो साम्राज्यवाद और सामन्तवाद से जूझ रहा था, महाजनी सभ्यता से टकरा कर किसान चकनाचूर हो रहा था। शिवप्रसाद जी स्वतंत्र भारत की सुनहरी किरणों की ऊष्मा में लिख रहे थे।”2 शिवप्रसाद सिंह प्रेमचंद की परम्परा में होते हुए भी आधुनिक कथाकार हैं। इन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनायी जो इनकी कहानियों में द्रष्टव्य है। इनकी कहानियों में परम्परा जड़ या रूढ़ि नहीं बल्कि आधुनिकता के नवीन सन्दर्भों को रेखांकित करती है। इस संदर्भ में बच्चन सिंह ने लिखा है-“परम्परा में बहुत सारे लोग आते हैं। प्रेमचन्द की परम्परा का मतलब यह नहीं है कि प्रेमचंद की अनुकृति करना। परम्परा जड़ नहीं गत्यात्मक होती है। अपनी गत्यात्मकता में वह कुछ चीजों को छोड़ती है, कुछ चीजों को लेती है तथा कुछ नया जोड़ती चलती है। प्रेमचंद की परम्परा में गाँव के माध्यम से निम्नवर्ग के प्राणियों की पीड़ा, उच्चतर नैतिकता तथा संघर्ष दिखाई पड़ता है वह अपने किस्म का शिवप्रसाद में भी है।”3 शिवप्रसाद सिंह का अनुभव क्षेत्र गाँव जीवन की पैदावार है। उनके चेतन और अवचेतन में ग्रामीण जीवन की यथार्थ स्मृतियाँ व्याप्त हैं। अत: शिवप्रसाद सिंह सहज ही इस परम्परा से जुड़े हुए हैं। उन्होंने इस संदर्भ में कहा है, “प्रेमचंद भारतीय संस्कृति की यथार्थ जमीन की महत्वपूर्ण पैदावार हैं, इसलिए उनकी परम्परा में होना खुशी की बात है, पर मैं किसी भी लेखक की परम्परा के नाम अपने को गिरवी नहीं रखना चाहता। मैं लेखकीय स्वातंत्र्य को इंतहा तक स्वीकार नहीं करता, अमल में लाना चाहता हूँ। मैं शिवप्रसाद-परम्परा का आरम्भिक और अंतिम लेखक हूँ।”4 लेकिन यह सच है कि प्रेमचंद ने जिस ग्राम जीवन को व्यापकता से देखा था उसे शिवप्रसाद सिंह गहराई में ले गये। अत: इनकी कहानियों में व्यष्टि-समष्टि के व्यापकता और गहराई का सम्पुट योग है। उन्होंने चरित्रों के बाह्य समस्याओं को ही नहीं बल्कि आन्तरिक मन:स्थिति को पकड़ने की कोशिश की है। उन्होंने स्वयं कहा है, “मैंने ग्राम-जीवन से ही अधिकांश चरित्र चुनें। यह मेरी विवशता इसलिए है, क्योंकि मैं इन चरित्रों के बाह्य-आभ्यंतरिक रूपों को ज्यादा आसानी से समझता हूँ।”5 इन पात्रों में बिंदा महाराज, नन्हों, माटी की औलाद का टीमल कुम्हार, पापजीवी का बदलू, इन्हें भी इंतजार है की कबरी, कलंकी अवतार का रोपन आदि हैं, जिनके अंत:मन की जीवन्तता कहानियों के माध्यम से द्रष्टव्य है। उनकी कहानियों के चरित्र उनके आस-पास के लोग हैं। उनके दैनिक जीवन की समस्याओं को इन्होंने बहुत नजदीक से देखा-परखा है। शिवप्रसाद सिंह को “गाँव जीवन का गहरा बोध है। बोध क्या; उन्होंने काफी हद तक जिया भी है। किसी तथ्य घटना और परिवेश को जीकर या झेल करके ही अनुभूति में तीखापन आता है। इसी को अपना कमाया हुआ सत्य कहा जा सकता है। यही सत्य उनकी कहानियों का मूलाधार है। उनकी दृष्टि ऐसे पात्रों पर भी पड़ती है जो बिना किसी अपराध के यातना पाते हैं। दर्शन की भाषा में इसे ‘अनकमिटेडसफरिंग’ कहते हैं।”6 उनकी कहानी ‘बिंदा महाराज’ ऐसा ही पात्र है जो बिना किसी अपराध के अनेक सामाजिक समस्याओं का सामना कर रहा है। नयी कहानी में ‘परिवेश की विश्वनीयता’, ‘अनुभूति की प्रामाणिकता’ और ‘अभिव्यक्ति की ईमानदारी’ का आग्रह था, उसका प्रतिरूप शिवप्रसाद सिंह की कहानियों में दिखाई देता है। शिवप्रसाद सिंह कहते हैं, “मेरी कहानियों में, उपन्यासों में जो पात्र आये हैं वे पूरे के पूरे कल्पना द्वारा नहीं निर्मित किए गये हैं। यह अलग बात है कि परिवार, रिश्ते, परिवेश और वातावरण भिन्न हैं लेकिन वो सब मेरे जाने हुए और देखे हुए हैं। कहीं न कहीं मेरा उनसे मानवीयता के धरातल पर, संवेदना के स्तर पर संपर्क रहा है। चाहे वे बुझारत हों या खुदाबख्श, या बिंदा महाराज, सब मेरे देखे हुए पात्र हैं, काल्पनिक नहीं।”7 इन्होंने अपने आस-पास के प्रत्यक्ष अनुभव को कहानी का विषय बनाया। इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा है-“ये अनुभव मेरे लेखक के लिए वरदान भी थे और चुनौती भी। वरदान इस अर्थ में कि मुझे अपनी कहानियों के प्लाट खोजने के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ता था और चुनौती इस अर्थ में कि अपने व्यक्तिगत अनुभवों को मैं किस प्रकार एक अपेक्षाकृत विस्तृत मानवीय संवेदना से युक्त करूँ कि लोगों को वह आंचलिक न लगे।”8
    ‘मंजिल और मौत’ कहानी में एक व्यक्ति के जीवन की लालसा को बड़े ही मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया गया है। इस कहानी का पात्र ‘बौड़म’ स्वतंत्र भारत में जिन्दगी की तमाम विपरीत परिस्थियों से लड़ रहा है। उसकी पत्नी ने बौड़म को पागल कह कर ठुकरा दिया और ठाकुर के इशारे पर उसके नौकर की रखैल बन गयी। तब से उसके मन की इच्छा है कि रुन-झुन पायलों वाली एक बहू लाये। उसके घर की खुशियाँ पुन: लौट आये। इस कहानी में लेखक कुएं के पास की पुरानी सीढ़ियों का प्रतिकात्मक रूप प्रस्तुत करता है जो बौड़म की जिन्दगी की तरह बिल्कुल जर्जर हो गयी “जिसके सहारे पीठ को अड़ाकर, अपने दोनों घुटनों के बीच सिर को गड़ाकर बौड़म निश्चेष्ट बैठा रहेगा, जैसे जिन्दगी के असह्य भार को क्षण भर के लिए उतारकर कोई थका-हारा बटोही विश्राम करता है।”9 इस विषम परिस्थिति में उसके अन्दर जिजीविषा है। बौड़म की इस असह्य स्थिति में भी पूरा गाँव उसे मनोरंजन का साधन मानता है। बच्चे, बूढ़े, अधेड़, औरतें सब मिलकर बौड़म को बिना पैसे का खेल समझते हैं। किसी गीत द्वारा या उसके कंधे की चादर खींच कर उसे उकसाया जाता है। उसके लाल-लाल आँखों में क्रोध, दीनता, कच्ची नींद के टूटने की खुमारी, जान पाना मुश्किल है। वह अपनी चादर लेने के लिए वहाँ खड़े प्रत्येक व्यक्ति को करुणा भरी बोझिल दृष्टि से देखेगा। उसकी आँखों में बेबसी और आग्रह की मूर्ति दिखाई देती है; ‘अरे दे न दो ! वे हँसते हैं, मर्द हैं, मजबूत हैं। तुम तो औरत हो, गरीब हो, मेरी तरह कमजोर हो, तुम मुझे परेशान क्यों करती हो।’10 इस आग्रह में कितना मर्म छिपा है, जिसे यह समाज समझना नहीं चाहता है। उसके दुःख को समझने वाला कोई नहीं है। उसके जीने का एक मात्र आसरा मिट्ठू कुत्ता है, जो एक महीने पहले से दिखाई पड़ रहा है। अब यह कुत्ता सोते-जागते हमेशा बौड़म के साथ रहता है। उस कुत्ते के आ जाने से बौड़म व्यस्त हो गया और जो भी बौड़म के करीब आने की कोशिश करता कुत्ता गुर्रा उठता। प्रेमचंद की कहानी ‘पूस की रात’ में हल्कू का एक मात्र सहारा झबरा कुत्ता बनता है। हल्कू की तरह ही बौड़म का सहारा मिट्ठू कुत्ता बनता है जिसके साथ वह अपने को व्यस्त रखता है। लेकिन बौड़म की यह व्यस्तता गाँव वालों के मनोरंजन में बाधक बनी अत: उसके मिट्ठू को जहर दे दिया गया। हमारा समाज कितना स्वार्थी और निरीह है कि अपने मनोरंजन के लिए बौड़म की खुशी का एकमात्र सहारा भी छीन लिया। लेकिन इन विपरीत परिस्थिति में भी उसके अंदर एक ऐसी जिजीविषा है, जो उसे मरने भी नहीं देती है। शिवप्रसाद सिंह इस सन्दर्भ में कहते हैं- “संत्रास के दिनों में भी यदि व्यक्ति में निष्ठा और उसकी जिजीविषा है तो विश्व की बड़ी से बड़ी समस्या का सामना कर सकता है।”11 बौड़म का पूरा जीवन संत्रास से भरा हुआ है। वह जिन्दगी से लड़ रहा है लेकिन अपनी मंजिल की उम्मीद में जिन्दगी से हार भी नहीं मान रहा है। उसके मन में पल रही आशा की किरण, उसे हारने नहीं देती है। अत: अंत तक उसके सपनों का चिराग जलता रहता है। वह तब तक हार नहीं मानता है जब तक अपनी मंजिल नहीं पा लेता है। लेकिन आज जब वह अपनी मंजिल पा लिया। उसका घर दुलहिन के रुन-झुन पायलों की आवाज से गूंज उठा। बौड़म ने नियति के क्रूर पंजे को मरोड़कर घर में खुशी ला दी। बौड़म के घर के “चारों तरफ उल्लास था, आनन्द था, और इस अपार खुशी की रात के सबेरे लोगों ने देखा कि आनंद के महासागर में तैरते हुए बौड़म का शरीर ठंडा हो गया। मरा-सा तो वह था ही, पर इच्छा का जोर उसे खींचता गया, मंजिल पर आकर राही मौन हो गया।”12 शिवप्रसाद ने ऐसे पात्रों के सन्दर्भ में लिखा है, “उनके कथा-चरित्रों में जहाँ पारिवारिक जीवन का उच्छल राग, आत्मीय अनुशासन, सामाजिक उदारता और एक खास किस्म की नैतिक चेतना बहुत दूर से भी दिखाई पड़ती है, वहीं गरीब की दारुण यातना, असमान सामाजिक मूल्यों से पैदा होने वाली दु:सह यन्त्रणा, सामाजिक कुरीतियों के घोर अभिशाप और सब ओर से तिरस्कृत-त्याज जीवन की बेधक विद्रूपता भी पाठक की चेतना को झकझोर देने वाले वेग के साथ मौजूद हैं। शिवप्रसाद के चरित्र घोर विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी अडिग जिजीविषा की शक्ति के कारण पाठक की चेतना पर बरजोरी छा जाते हैं।”13 यह जिजीविषा चाहे जिन्दगी को लेकर बौड़म में हो या आज़ादी को लेकर रोपन में, शिवप्रसाद सिंह के पात्रों को निराश नहीं होने देती है। वे मन में आशा का दीप जलाये, अंत तक संघर्षरत हैं।
          ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी में समाज में फैले अन्धविश्वासों और सामाजिक रूढ़ियों पर करारा चोट किया गया है। इसी परम्परागत समाज का एक व्यक्ति भैरो पांडे भी है जो इस सामाजिक रूढ़ि के सामने खड़ा ही नहीं होता है बल्कि उसे परास्त भी करता है। कर्मनाशा के किनारे बसे हुए लोगों में एक विश्वास प्रचलित था कि यदि एक बार नदी बढ़ आये तो बिना मनुष्य की बलि लिए लौटती नहीं। इसी गाँव में विधवा फुलमत रहती है। जिसका भैरो पांडे के भाई कुलदीप के साथ प्रेम सम्बंध है। फुलमत कुलदीप के बच्चे की माँ बनने वाली थी इसी दौरान कुलदीप सामाजिक मान-मर्यादा के भय से गाँव छोड़कर भाग गया। पूरे गाँव में यह खबर फैल जाती है कि “ फूलमतिया रांड़ मेमना ले के बैठी है। विधवा लड़की बेटा बियाकर सुहागिन बनी बैठी है।”14 फुलमत को कुलदीप का यह शारीरिक संबन्ध भले ही पाप न लगे लेकिन पूरा गाँव पाप बोध की पीड़ा से कराह रहा है। पूरे गाँव का मानना है कि कर्मनाशा की बाढ़ फुलमत के पाप के कारण आयी है। जिसके कारण फुलमत और उसके दुधमुंहे बच्चे को कर्मनाशा की बलि देना चाहता है। लेकिन इस बलि का विरोध भैरो पांडे आकर करता है। जिस नदी की बाढ़ को बांध द्वारा रोका जा सकता है, उसे पूरा गाँव एक स्त्री और अबोध शिशु की बलि से रोक रहा है। इस कहानी में समाज की अमानवता और कुरूपता को बड़े ही यथार्थपरक ढंग से रेखांकित किया गया है। उन पर सामाजिक रूढ़ियाँ और अन्धविश्वास इतना हावी है कि उनके लिए मानवता और अमानवता में फर्क करना मुश्किल हो गया है। उनकी सामाजिक रूढ़ियाँ मानवता का गला घोट रही है। जिसकी संवेदनाएँ बिल्कुल मर गयी हैं। क्या हमारा समाज किसी कर्मनाशा से कम है? भैरो पांडे कहते हैं कि “मैं आपके समाज को कर्मनाशा से कम नहीं समझता। किन्तु, मैं एक-एक के पाप गिनाने लगूँ तो यहाँ खड़े सारे लोगों को परिवार समेत कर्मनाशा के पेट में जाना पड़ेगा ...है कोई तैयार जाने को..?”15 इस कहानी की शुरुआत होती है-“काले सांप का काटा आदमी बच सकता है, हलाहल जहर पीनेवाले की मौत रुक सकती है, किन्तु जिस पौधे को एक बार कर्मनाशा का पानी छू ले, वह फिर हरा नहीं हो सकता।”16 जबकि उसी कर्मनाशा के पास एक नीम का पेड़ भी है जिसे कर्मनाशा की लहरें सुखा नहीं पायी। “जिन उध्दत लहरों की चपेट से बड़े-बड़े विशाल पीपल के पेड़ धराशायी हो गये थे; वे एक टूटे नीम के पेड़ से टकरा रहीं थी, सूखी जड़ें जैसे सख्त चट्टान की तरह अडिग थीं, लहरें टूट-टूटकर पछाड़ खाकर गिर रहीं थीं। शिथिल... थकी...पराजित17 जिस समाज में भैरो पांडे जैसे नयी चेतना के व्यक्ति रहेंगे वहाँ की कर्मनाशा को पराजित होना ही है। गोपाल राय ने लिखा है, “इससे कहानीकार की नयी सोच और संवेदना का पता चलता है। कर्मनाशा नदी यदि उस रूढ़िवादी परम्परा का तो भैरो पांडे उस नयी चेतना का प्रतीक हैं जिसके सामने कर्मनाशा को झुकना ही पड़ता है।”18 इस कहानी में बदलते ग्रामीण जीवन के पारम्परिक मूल्यों-मान्यताओं की ओर संकेत किया गया है। इस सन्दर्भ में शिवप्रसाद सिंह कहते हैं,“कर्मनाशा की हार मनुष्य के कर्म को नष्ट करके उसके ऊपर सामाजिक रूढ़ि और नियति का अभिशाप लादने वाली समूची प्रवृत्ति के विरोध का प्रतीक है। कर्मनाशा हमारे समाज के वैषम्य का प्रतीक है, जिसे पराजित करना नयी मानवता का सही संकल्प होना चाहिए। कहानी इसी ओर संकेत करती है।”19
        ‘नन्हों’ कहानी में नन्हों के वैवाहिक जीवन की विडम्बनाओं, परम्परागत दाम्पत्य जीवन और प्रेम संबंधों को रेखांकित किया गया है। इस कहानी में नन्हों का वैवाहिक जीवन सिर्फ और सिर्फ एक विडम्बना या जीवन एक संत्रास बनकर रह गया है, जिसमें उसे आत्मपीड़ा के अलावा कुछ नहीं मिलता है। नन्हों की शादी के लिए लड़का रामसुभग (जो सुंदर, सुडौल है) दिखाया जाता है लेकिन शादी एक अनदेखे लड़के मिसरीलाल (पैर से विकलांग) से होती है। यह बात नन्हों के पिता को मालूम है लेकिन बेटी के अच्छे घर और वर के लिए दहेज़ देने की औकात नहीं है। अत: वह इस बात का जिक्र भी नहीं करता है। हाथ भर घूँघट के नीचे आँसुओं को सुखाती हुई नन्हों सुहागिन बनी। शादी के बाद से ही नन्हों की नियति का चक्र पूरे जीवन किसी न किसी रूप में आस-पास मंडराता रहता है। शादी के धोखे की पीड़ा से वह उबर नहीं पाई थी कि पति की मृत्यु हो गयी। ये “काँच की चूड़ियाँ भी किस्मत का अजीब खेल खेला करती हैं। नन्हों जब इन्हें पहनना नहीं चाहती थी तब तो ये जबर्दस्ती उसके हाथों में पहना दी गयीं और अब जब इन्हें उतारना नहीं चाहती तो लोगों ने जबर्दस्ती हाथों से उतरवा दिया।”20 नन्हों अपना पूरा जीवन सामाजिक मर्यादा और नैतिक दबाव में काट देती है। ह्रदय में आत्मपीड़ा को दबाये वह अकेले जीवन के संघर्षों से लड़ रही है। आधुनिकता के इस दौर में सामाजिक ढ़ांचा बदल रहा है। इस परिवर्तन को देखकर शिवप्रसाद सिंह ने नन्हों कहानी के संदर्भ में कहा है, “नन्हों मध्यवर्गीय नारी का प्रतिनिधित्व करती है, उसे शायद इतनी छूट मिल जाये कि वह भविष्य में अपनी मजबूरियों से बचने के लिए कोई रास्ता ढूंढ ले, क्योंकि समाज का नैतिक ढ़ांचा काफी तेजी से बदल रहा है।”21
         ‘गंगा तुलसी’ कहानी में एक विधवा स्त्री की नियति और असुरक्षित जीवन को चित्रित किया गया है। कहानी की केन्द्रीय पात्र गंगा अपने इकलौते बेटे को पढ़ाना चाहती है लेकिन उसकी आर्थिक स्थिति दयनीय है। बेटे को पढ़ाने की लालसा को पूरा करने के लिए वह जमींदार के घर चूल्हा-चौका का काम करने लगती है जहाँ उसे मजबूरन जमींदार से संबंध भी बनाना पड़ता है। गंगा इस बात को अच्छी तरह समझती है कि अगर वह ज़मीदार के कूकृत्य का विरोध करेगी तो उसके बेटे का पढ़ना तो दूर उसका इस गाँव में रहना भी मुश्किल हो जायेगा | अत: वह अपनी आत्मा को मार कर उस परिस्थिति से समझौता कर लेती है | गंगा और जमींदार के संबंध की चर्चा पूरे गाँव में फैल जाती है। यह बात जब उसके बेटे को पता चलती है तो उसी बेटा के अन्दर सुनी-सुनाई बातों से माँ के प्रति मन में घृणा और ममता का परस्पर विरोधी भाव पनप रहा है। उसे लगता है कि शायद वह नाजायज सन्तान है। उसकी प्रश्न भरी दृष्टि को देखकर मरणासन्न माँ कहती है, “गंगा के पेट में दुनिया भर की गंदगी समाई रहती है, पर पानी कभी अपवित्र नहीं होता। तेरे में कोई पाप नहीं...”22 जिस बेटे के लिए उसने पूरा जीवन संघर्ष किया। आज उसी बेटे को सफाई देनी पड़ रही है। उसमें सुनील का दोष नहीं है। हमारी सामाजिक विडम्बना ही ऐसी है।
        ‘टूटे तारे’ कहानी स्त्री जीवन की नियति को आधार बनाकर लिखी गयी है। इस कहानी की केन्द्रीय पात्र श्यामा की नियति ही वेश्या बनना है। श्यामा मनोहर के प्रेम जाल में फँस कर उसके साथ संबंध बनाती है। लेकिन बाद में मनोहर उससे शादी करने से इंकार कर देता है। गर्भवती श्यामा एक दिन बाप को बेइज्जती से बचाने के लिए घर से भाग जाती है। महीनों बाद उसे एक लड़की हुई, जिसे अपमान की आग से बचाने के लिए वह नाच-गाकर तथा अपने शरीर का सौदा करके पैसे इकट्ठा करती रही। बेटी की शादी के दिन वह खुद को रोक नहीं पाती है। लेकिन उसकी नियति वहाँ भी उसका पीछा नहीं छोड़ती है। शादी के मंडप में वर का पिता ब्याह रुकवा देता है। वह कहता है कि “वेश्या की लड़की से शादी करने चले हैं ! क्या यह लड़की आप की है। धोखा मत दीजिए, मुझे सब मालूम है। आपने इसका पालन पोषण किया है क्योंकि इसकी माँ आप को बहुत रुपया देती है। इसकी माँ वेश्या है जो आप की छत पर बैठी है।”23 वह चाहकर भी उस दलदल से निकल नहीं पा रही है। समाज उसे निकले ही नहीं दे रहा है। श्यामा को वेश्या बनाने का जिम्मेदार कौन है? क्या वह स्वेच्छा से वेश्या बनने गयी थी?
     ‘बिंदा महाराज’ कहानी का मुख्य पात्र बिंदा हिजड़ा है। उसके अन्दर मानवीय व्यापकता और संवेदनशील हृदय की गहराई है लेकिन स्त्री-पुरुषेतर होने के कारण उसे उपेक्षित जीवन व्यतीत करना पड़ता है। बिंदा महाराज जैसे तमाम स्त्री-पुरुषेतर व्यक्ति इस तरह के उपेक्षित जीवन व्यतीत करते हैं। इन्हें सामान्य जीवन धारा से बिल्कुल अलग करके देखा जाता है। क्या इस तरह के व्यक्तियों की यही नियति है? क्या समाज द्वारा उपेक्षित यह पात्र, अपनी इस स्थिति के लिए स्वयं जिम्मेदार है? अगर नहीं, तो आखिरकार क्यों वह समाज में सामान्य जीवन जीने का अधिकारी नहीं है? क्यों समाज में अलग-थलग जीवन जीने के लिए मजबूर है? क्या हमारा समाज इतना क्रूर और निर्मम है कि प्रकृति प्रदत्त इस कमजोरी में उस व्यक्ति का साथ देने की जगह उपेक्षित जीवन जीने के लिये मजबूर करें? जबकि इसमें उस व्यक्ति का कोई दोष नहीं। शिवप्रसाद सिंह कहते हैं कि “मैं उस उपेक्षित जीवन को भी एक मूल्य देना चाहता था, जिसके अन्दर पीड़ा का बोध, मानवीय पीड़ा को भी लाँघ जाता है। जो पुरुष नहीं दे पाता, नारी नहीं दे पाती, वह एक हिजड़ा दे जाता है।”24
    शिवप्रसाद सिंह की कुछ कहानियों में जैसे सँपेरा आदि को छोड़कर अंधविश्वास का नकार दिखाई देता है। इस तरह की कहानियों में ‘पापजीवी’, ‘कलंकी अवतार’, ‘कर्मनाशा की हार’ आदि हैं। शिवप्रसाद सिंह इस बात को अच्छी तरह समझ गये थे कि हमारे समाज में सामाजिक, आर्थिक शोषण से ज्यादा भयावह धार्मिक शोषण होता है जिसमें व्यक्ति छटपटा भी नहीं सकता। जब तक व्यक्ति के अन्दर से ईश्वरीय डर, अंधविश्वास आदि नहीं निकलेगा, तब तक शोषण की जड़ें ऐसे ही मजबूती के साथ गरीबों का शोषण करेंगी। इसी लिए इनकी कहानियों में ईश्वर, अन्धविश्वास और अवतारी पुरुष को प्रश्न चिह्न के कटघरे में लाकर खड़ा किया है। ‘कलंकी अवतार’ कहानी में रोपन सफेद घोड़े पर सवार व्यक्ति को देखता है तो उसे पुजारी की बातें याद आती हैं। कलियुग में अत्याचारियों के संहारक श्वेत घोड़े पर सवार कृष्णकाय कांति वाले भगवान ‘कलंकी अवतार’ लेंगे। उस अवतारी पुरुष को देखकर रोपन की आँखों से झरझर आँसू गिरने लगता है। वह सोचता है कि आज अत्याचारी जमींदार भेदुसिंह के कुकर्मों की सजा मिल कर रहेगी। वह उस अवतारी पुरुष के पीछे-पीछे चला जाता है। लेकिन जिसे वह जमींदार भेदुसिंह को दंड देने वाला कलंकी अवतार समझता है वह तो अपनी बहन के विवाह के लिए भेदुसिंह के बेटे को देखने आया है। रोपन हारे हुए जुआरी की तरह घोड़े पर सवार व्यक्ति को देखता रह जाता है। इस कहानी में एक पात्र शोभन है जो इस चीज को बहुत अच्छे से समझ गया था। वह रोपन से कहता है- “नये ज़माने के लोग ही पुराने लोगों को ठीक करेंगे दादा। गाँठ बाध लो। हमें अवतार नहीं करतार चाहिए। करतार यानी अपना हाथ ही तारेगा।”25 ‘पापजीवी’ कहानी में ‘बरम बाबा की परती’ पांच सौ बीघे की है। इस परती में किसी की जाने की हिम्मत नहीं है क्योंकि पुराने जमाने में ठाकुरों ने यहाँ किसी ब्राह्मण की हत्या की थी। एक दिन सरकार ने ‘बरम बाबा’ की परती जमीन को नीलाम कर दी। देखते ही देखते ठेकेदार का बँगला भी बनकर तैयार हो गया। बदलू को विश्वास था कि ‘बरम बाबा’ बदला लेगें, लेकिन जब ऐसा कुछ नहीं हुआ तो उसे भी मानना पड़ता है की बरम बाबा का तेज मद्धिम पड़ गया है। ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी में भैरव पांडे कहते हैं कि बढ़ी हुई कर्मनाशा की बाढ़ दुधमुहें बच्चे की बलि से नहीं बल्कि पसीना बहाकर बांध बनाने से रुकेगी। इस कहानी में वर्षों से चला आ रहा अंधविश्वास टूटता हुआ नजर आता है। शिवप्रसाद सिंह की कहानियों में “अस्तित्वगत सजगता पारम्परिक अंधविश्वासों, अवतारीय धारणाओं, पूजा-व्रतों आदि को लाँघ रही है। उसका विश्वास करतार पर नहीं, कर-तार पर आकर ठहर गया है। यही उसका क्षमाबोध है, आस्था है, जो मनुष्य को धरती का मनुष्य बनने को बाध्य करती है।”26
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
1.      विवेकी राय, हिंदी कहानी : समीक्षा और सन्दर्भ, राजीव प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-1985, पृष्ठ सं.27 
2.      कामेश्वर प्रसाद सिंह, कथाकार : शिवप्रसाद सिंह, संजय बुक सेंटर, वाराणसी, संस्करण-1985, पृष्ठ सं.क
3.      वही, पृष्ठ सं.क
4.      शिवप्रसाद सिंह, मेरे साक्षात्कार, किताबघर, नई दिल्ली, संस्करण- 1995, पृष्ठ सं.19-20
5.      शिवप्रसाद सिंह, दस प्रतिनिधि कहानियाँ, किताबघर प्रकाशन, अंसारी रोड दरियागंज, नई दिल्ली, संस्करण 1994, पृष्ठ सं.8
6.      कामेश्वर प्रसाद सिंह, कथाकार : शिवप्रसाद सिंह, संजय बुक सेंटर, वाराणसी, संस्करण-1985, पृष्ठ सं.ख
7.      शिवप्रसाद सिंह, मेरे साक्षात्कार, किताबघर, नई दिल्ली, संस्करण-1995, पृष्ठ सं.72
8.      वही, पृष्ठ सं.67
9.      शिवप्रसाद सिंह, अंधकूप, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2005, पृष्ठ सं.68
10.  वही, पृष्ठ सं.69
11.  शिवप्रसाद सिंह, मेरे साक्षात्कार, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-1995, पृष्ठ सं.41
12.  शिवप्रसाद सिंह, अंधकूप, अंधकूप, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2005, पृष्ठ सं.75
13.  शिवप्रसाद सिंह, मेरे साक्षात्कार, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-1995, पृष्ठ सं.48
14.  शिवप्रसाद सिंह, अंधकूप, अंधकूप, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2005, पृष्ठ सं.52
15.  वही, पृष्ठ सं.61
16.  वही, पृष्ठ सं.50
17.  वही, पृष्ठ सं.61
18.  गोपाल राय, हिंदी कहानी का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2014, पृष्ठ सं.112
19.  शिवप्रसाद सिंह, मेरे साक्षात्कार, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-1995, पृष्ठ सं.22
20.  शिवप्रसाद सिंह, एक यात्रा सतह के नीचे, अंधकूप, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2005, पृष्ठ सं.27
21.  शिवप्रसाद सिंह, मेरे साक्षात्कार, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-1995, पृष्ठ सं.13
22.  शिवप्रसाद सिंह, अंधकूप, अंधकूप, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2005, पृष्ठ सं.231
23.  शिवप्रसाद सिंह, एक यात्रा सतह के नीचे, अंधकूप, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2005, पृष्ठ सं.49
24.  शिवप्रसाद सिंह, मेरे साक्षात्कार, किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-1995, पृष्ठ सं.51
25.  शिवप्रसाद सिंह, एक यात्रा सतह के नीचे, अंधकूप, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2005, पृष्ठ सं.287
26.  शशि भूषण ‘शीतांशु’, शिवप्रसाद सिंह : स्रष्टा और सृष्टि, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-1995, पृष्ठ सं.290

 [साभार: जनकृति पत्रिका]
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